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Full text of "Bharat Ke Chikitsa Vaigyanik"

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कृष्ण मुबाबी लाल श्रीवाक्तव 


सृष्टि के आरम्भ स अब तक चिकित्सा विज्ञानी 
विज्ञान के अन्य क्षेत्रों की भाँति अपने चमत्कारो से 
मानव प्राणियो मे जिज्ञासा का सचार करते रहे है। भारत 
के चिकित्सा शास्त्री भी विश्व मे नए कीर्तिमान स्थापित 
करने मे अन्य देशो के वैज्ञानिको से पीछे नही रहे। 
उन्‍नीसवी एवं बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध मे भी उन्होंने 
भारत का नाम प्राचीन चिकित्सा शास्त्रियों के समान 
अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर रोशन किया है। 

बीसवी शताब्दी के उत्तर्रार्द्ध मे स्वतन्त्र भारत 
मे विभिन सस्थाओ, विश्वविद्यालयो और राज्य तथा 
केन्द्रीय सरकार के प्रोत्साहन एवं आर्थिक अनुदान के 
फलस्वरूप देश के चिकित्सा वैज्ञानिकों ने अपने 
अनुसन्धानो और खोजो से विश्व को अभिभूत किया 
है। उनका प्रयास और योगदान स्तुत्य एवं सराहनीय 
है। डॉ (श्रीमती) कमल जे रणदिवे, प्रो दरब के 
दस्तूर, प्रो ए एस पेटल, डॉ के एस चुघ, डॉ महदी 
हसन, डॉ अरुण बोर्दिया, डॉ एन कोचिपिल्ले, 
डॉ वीरेन्द्रसिह आदि वैज्ञानिक हमारे प्रेरणा स्नोत है। 

प्रस्तुत पुस्तक हमारे चिकित्सा वैज्ञानिको के 
व्यक्तित्व एवं कृतित्व से छात्रो, भावी चिकित्सा 
वैज्ञानिकों अध्यापको और अनुसधित्सुओ को परिचित 
कराने एव प्रेरित करने मे पूर्णत सक्षम है। 


भारत के 
चिकित्सा वैज्ञानिक 


भारत के 
चिकित्सा वैज्ञानिक 


कृष्ण मुरारी लाल श्रीवास्तव 


गीतांजलि प्रकाशन, जयपुर 


भारत के 
चिकित्सा वैज्ञानिक 


कृष्ण मुरारी लाल श्रीवास्तव 


गीतांजलि प्रकाशन, जयपुर 


86 लेखक 
सस्करण प्रथम, 2002 
मूल्य. एक सौ पचहत्तर रुपये 


प्रकाशक 
गीताजलि प्रकाशन 
हाजी बिल्डिंग, फिल्म कॉलोनी, 
जयपुर--302 003 


शब्द-सयोजक 
पचशील कम्प्यूटर्स 
फिल्म कॉलोनी, जयपुर-302 003 


मुद्रक 
शीतल प्रिन्टर्स 
फिल्म कॉलोनी, जयपुर 


प्राक्कथन 


मई, १987 मे प्रकाशित मेरी पुस्तक 'भारतीय वैज्ञानिक' के अब तक सात 
सस्करण छप चुके हैं। साथ ही उसमे से दो आलेख--भास्कराचार्य एव विक्रम साराभाई 
महाराष्ट्र गज्य उच्चतर माध्यमिक शिक्षा मण्डल, पुणे ने कक्षा 9 एव 0 की हिन्दी 
विषय की पाठ्य पुस्तको मे समाविष्ट किये हैं। पाठक जगत के इस उत्कृष्ट स्वागत 
से अभिभूत एव प्रोत्साहित होकर मैंने आधुनिक भारत के चिकित्सा वैज्ञानिको के 
जीवन एव कृतित्व पर लिखने का विचार किया। मेरे निवेदन पर कई प्रमुख वैज्ञानिको 
ने अपने व्यक्तित्व एवं वैज्ञानिक उपलब्धियो के विषय मे वाछित सूचनाये एवं तथ्य 
प्रचुर मात्रा मे मुझे उपलब्ध कराये। 

प्रस्तुत पुस्तक तीन खण्डो मे विभकत है। प्रथम खण्ड मे चिकित्सा विज्ञानी, 
द्वितीय खण्ड मे पर्यावरणीय वैज्ञानिक एवं तृतीय खण्ड मे पशु-चिकित्सा वैज्ञानिक 
सम्मिलित हैं जिनके इतिवृत्ति एव कृतित्व पर सरल, सुबोध एवं प्राजल भाषा तथा 
सरस शैली मे विशद एवं व्यापक रूप से प्रकाश डाला गया है। 

प्रस्तुत पुस्तक के अध्ययन से हमारे युवा एवं उदीयमान वैज्ञानिको, विद्यालयों 
एवं महाविद्यालयों मे अध्ययनरत छात्र-छात्राओ, भावी नागरिको एवं देश के कर्णधारो 
तथा सामान्यजनो को चिकित्सा विज्ञान की विविध शाखाओ और प्रशाखाओ मे शोध 
और प्रगति के साथ-साथ इस दिशा मे देश और विदेश की सहायक सस्थाओ का 
ज्ञान सुलभ होए"। जैज्ञानिक। को प्रदत्त किये जाने वाले पुरस्कारों एवं सम्मानो का 
ज्ञान भावी नागरिको एव वैज्ञानिको को इस क्षेत्र मे अनुसधान हेतु प्रेरित करेगा, ऐसी 
मेरी मान्यता है। 

छात्रो को चिकित्सा विज्ञान के अध्ययन एवं शोध के प्रति यह पुस्तक नई 
राह दिखाने एवं उनमे नवीन स्फूर्ति का सचरण करने मे सफल सिद्ध होगी। तभी 
मेरा प्रयास सफल एवं सार्थक होगा। 

अन्त मे में डॉ (श्रीमती) कमल जे रणदिवे, प्रो दरब के दस्तूर प्रो ए 
एस पेटल, डॉ जे जी जॉली, डॉ महदी हसन, डॉ अरुण बोर्दिया, डॉ रमंश 
सोमवशी आदि सभी चिकित्सा वैज्ञानिको के प्रति अपना आभार व्यक्त करना अपना 


पुनीत कत्तव्य समझता हूँ, जिन्होने अपने व्यस्ततम कार्यक्रम मे से अपना अमूल्य समय 
प्रदान कर अपने व्यक्तित्व एव कृतित्व के विषय मे वाछित सूचनाये उपलब्ध कराकर 
पुस्तक की रचना को सफल बनाने मे योगदान दिया। 

अन्त मे मैं प्रकाशक को साधुवाद ज्ञापित करना अपना पुनीत कर्त्तव्य समझता 
हूँ, जिन्हाने इस पुस्तक के प्रकाशन के प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर समय पर इसे 
पाठका के समक्ष प्रस्तुत किया। 

पाठक बन्धुओ के सुझावों एवं मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है। 


--कृष्णमुरारी लाल श्रीवास्तव 


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अनुक्रम 


वैज्ञानिक का नाम 


चिकित्सा विज्ञानी 

डॉ (श्रीमती) कमल जे रणदिवे (97) 
प्रोफेसर दरब के दस्तूर (924) 
प्रोफेसर सी एल पाठक (१925-992) 
प्रोफेसर ए एस पेटल (१925) 

डॉ जे जी जॉली (926) 

डॉ एम एस अग्रवाल (928 ) 

डॉ रामेश्वर शर्मा (929) 

प्रोफेसर के सम्बामूर्ति (93) 

डॉ के एस चुध (932) 

डॉ आर के करौली (१934) 

डॉ एन सिह (935) 

डॉ एस पी सुद्रानिया (936) 

डॉ महदी हसा (936) 

डॉ अरुण बोर्दिया (936) 

डॉ बी भडारी (938) 

डॉ एन कोचिपिल्ले (939) 

डॉ वी के शर्मा (94॥) 

डॉ एस डी पुरोहित (94) 

डॉ एम आर सौग्रा (942) 


पृष्ठ स 


20 
25 
27 
33 
40 
43 
47 
54 
57 
59 
66 
7] 
82 
90 
98 
]08 
2 
4 


20 
2] 
22 
23 
24 
25 


26 


27 
28 


डॉ वी एस मेहता (949 ) 
डॉ राजीव गुप्ता (952) 
डॉ यीरेन्र सिह (१954 ) 
डॉ ए के ग्रोवर (955) 
डॉ आर जी शर्मा (956) 
डॉ जयदीप डोगरा (958 ) 
पर्यावरणीय वैज्ञानिक 

डॉ ए के चारण (949) 
पशु-चिकित्सा वैज्ञानिक 
डॉ रमेश सोमवशी (953 ) 
डॉ अश्विनी शर्मा (957) 


4]7 
]2] 
]28 
]38 
।4] 
46 


5] 


]58 
]62 


डॉ. ( श्रीमती ) कमल जे. रणदिवे 
(97 ई ) 


जन्म एव वश परिचय--डॉ कमल जे रणदिवे का जन्म 8 नवम्बर, 
397 ई को भारत के महाराष्ट्र राज्य के ऐतिहासिक नगर पुणे मे प्रख्यात समरथ 
परिवार मे हुआ था। विवाह से पहले उनका नाम कुमारी कमल समरथ था। समरथ 
परिवार विद्वानो एवं शिक्षाविदों का परिवार रहा है! उनके पितामह एक प्रसिद्ध 
अर्थशास्त्री थे जिनकी सेवाये राजस्थान की भूतपूर्व ऋणग्रस्त टोक रियासत की आर्थिक 
स्थिति के उन्नयन हेतु प्रदान की गई थीं। आग से जलते हुए मकान से महत्त्वपूर्ण 
अभिलेखो को निकालने के प्रयास मे दुघटना-ग्रस्त होने के कारण 48 वर्ष की आयु 
में उनका देहावसान हो गया था। उनके पिता श्री दिनकर दत्तात्रेय, जो उस समय 
शिशु थे, की शिक्षा का प्रबन्ध रियासत ने किया था। वह उन्नति कर फर्ग्यूसन कॉलेज, 
पुणे मे प्राणिशास्त्र (जीव विज्ञान) के प्रोफेसर बन गए, जहाँ 30 वर्ष से अधिक समय 
तक कार्यरत रहे। प्रोफेसर समरथ स्वतत्र इच्छाशक्ति और स्वच्छन्द विचारो वाले व्यक्ति 
थे। पशुओ के जीवन और विकास का इतिहास पढाने के साथ-साथ वह अपने छात्रों 
को जीवन-दर्शन की शिक्षा भी देते थे। समस्त भारत मे फैले हुए अपने सैकडो छात्रो 
के वह मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक रहे, जो उन्हे अपने जीवन मे पथ-प्रदर्शन के 
लिए बडे स्नेह, सम्मान और कृतज्ञता के साथ अभी तक याद करते हैं। उनके शिष्य 
उनके घर जैविक-विज्ञानो के साथ-साथ व्यक्तिगत जीवन की समस्याओ पर भी 
उनसे सलाह और मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए सुबह, दोपहर और सायकाल आते 
रहते थे। चिकित्सा विज्ञान और जीव विज्ञान के क्षेत्र मे कार्यरत अनेक व्यवसायी 
उन्हे सवाधिक आदर के साथ याद करते हैं, जिसका 82 वर्ष की परिपक्व अवस्था 
मे निधन हुआ था। प्रगतिशील विचार वाले इस शिक्षाशास्त्री का अपनी पाँच बेटियो 
और एकमात्र पुत्र के जीवन पर प्रमुख प्रभाव पडा है। उन सभी ने अपने विभिन्‍न 
वैज्ञानिक कार्य-क्षेत्रो मे सफलता अर्जित की है। 

बाल्यकाल--जब डॉ कमल मुश्किल से सात वर्ष की थी, उनकी माता श्रीमती 
शान्ता डी समरथ का देहावसान हो गया था। वह एक वेदनापूर्ण अनुभव था। यह 
उनके पिता ही थे, जिन्होने उनके प्रारम्भिक बाल्यकाल मे उनकी भावनात्मक समस्याओ 


2 भारत कफ चिकित्सा वेज्ञानिक 


पर स्नेहपृवक ध्यान दिया तथा कालान्तर म॑ घर मे एक दूसरी पत्नी ले आए जा सदेव 
उनक लिए एक देवी माँ रही। 

प्रारम्भिक शिक्षा-डॉ रणदिवे न अपने विद्यालयी शिक्षा प्रसिद्ध हुजूरपागा 
बालिका हाइ स्कूल मे प्राप्त की थी। अपने विद्यालयी जीवन मे वह प्रथम श्रणी की 
मेधावी छात्रा तथा मराठी ओर अग्रेजी भाषाओ के सास्कृतिक कार्यक्रमों मे एक विख्यात 
अभिनेत्री रही तथा उनका नाम सम्मान-पद्र पर अकित किया गया था। उन्होने 
मेट्रिक्यूलेशन परीक्षा सन 934 ई म॑ विशेष योग्यता सहित उत्तीण को थी। 


सूअर को तरह छोटी चोटी वाली विद्यालयी छात्रा के रूप मे वह अपनी 
ऑपण्टी के साथ हुजूरपागा से शाम को घर लौटने की घटना को आज तक याद 
करती हे। क्‍या आप इस छाटी बालिका क॑ मस्तिष्क के आन॑ वाले विचारों के बारे 
मे कल्पना कर सकते है? घर पहुँच कर वह अपने पिता के प्रश्नो के उत्तर खोजा 
करती थी “आज तुमने स्कूल मे कैसा काय किया? प्राप्ताको का कुल योग कितना 
था?” उन्हे प्राथमिक विद्यालय मे प्रतिदिन की प्रगति, हाई स्कूल मे साप्ताहिक जॉच- 
परीक्षाओ तथा सभी स्तरों पर प्राथमिक प्रगति का लेखा जोखा उस समय तक देना 
आवश्यक था, जब तक कि वह बी एस सी कक्षा में उनकी छात्रा नही बन गई। 
यह उनकी पारस्परिक सूझ-बूझ थी कि यदि वह नियमित एवं विधिवत्‌ कार्य करती 
रहे, तो कोइ कारण नहीं था कि वह सवप्रथम स्थान प्राप्त न कर ले। वह लिखती 
है, ''इस विशेष देखभाल के कारण मेरा लगभग यह स्वभाव बन गया कि मैं विद्यालय 
और कॉलेज मे भलीभॉति कार्य करूँ और सभी स्तरों पर छात्रवृत्ति, पुरस्कार एवं विशेष 
योग्यता प्राप्त करूँ।! 


अपने विषय मे विचार करने का सम्भवत स्वय ज्ञान होने से पूर्व ही उन्हाने 
अपने पिताश्री को अपने इष्टमित्रों से यह कहते हुए सुना कि उनकी छोटी बेटी डॉक्टर 
बनेगी। “वह एक अच्छी शल्य चिकित्सक (सर्जन) बनेगी।'” पचास वर्ष उनकी 
हार्दिक कामना अपनी पुत्री कमल को किसी चिकित्सा-विद्यालय मे प्रवेश दिलाने 
की थी, परन्तु उनकी यह महान्‌ एवं महत्त्वाकाक्षी यांजना साकार न हो पाई। उन्होने 
पहले तो ग्रान्ट मेडिकल कॉलेज मे प्रवेश प्राप्त कर लिया था, परन्तु अन्तिम क्षण 
अपना आवेदन -पत्र वापस ले लिया। लगभग उसी समय उनका मुलाकात गणित के 
एक प्रतिभावान अध्येत युवक से हुई तथा सम्भवत उनकी आकाक्षा अपना 
चिकित्सकीय अध्ययन पूरा करने से पूर्व विवाह बन्धन मे बॉध जाने की थी। उनके 
पिताश्री ने पूर्ण रूप से अध्ययन मे ध्यान देने पर जोर दिया। उनका कथन था ''तुम्हारा 
व्यवसाय पहले है। बाद मे तुम एक डॉक्टर स शादी कर सकती हो जो तुम्हारे व्यवसाय 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक ३ 


मे एक अच्छा साथी बन सकेगा।”” अपनी पुत्री के चिकित्सकीय जीवन के विषप्र 
में उनका आदर्शवाद और स्वप्न किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं थे। फिर भी 
उन्होंने चिकित्सकीय जीवन प्रारम्भ करने से पूर्व ही उसे छोडने का निश्चय कर लिया। 

महाविद्यालयी शिक्षा--फर्ग्यूसन कॉलेज पुणे (पूना) मे बी एससी के 
आधारभूत विज्ञान पाठयक्रम के अन्तर्गत उपलब्ध वनस्पतिशास्त्र एवं प्राणीशास्त्र विषयो 
मे अध्ययन जारी रखने के अलावा उनके लिए अन्य विकल्प नही था। कॉलेज मे 
वह एकमात्र छात्रा ओर प्रथम महिला फैलो थी ' उन्होने इन दोनो विषयो मे बम्बई 
विश्वविद्यालय मे सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया एव प्राप्तोंक के प्रतिशत की दृष्टि से 
एक कीर्तिमान स्थापित किया, किन्तु उनके प्रिय पिताश्री ने उन्हे इस हेतु बधाई नही 
दी। उनमे गहरी निराशा व्याप्त थी, वह इसे प्रतिभा की सम्पूर्ण बबादी और चिकित्सा 
विज्ञान के लिए महान्‌ क्षति मानते थे। उनकी आशा और योजना मे भी बाधा पहुँची 
क्योकि वह उस जीवन-पथ पर अग्रसर नही हो सकी, जिसका उन्होने इरादा किया 
था। इस भूल के लिए उस नौजवान को दोषी ठहराया गया जिससे उनकी मुलाकात 
हुई थी और उस॑ परोक्ष रूप से इसके लिए उत्तरदायी मान लिया गया। 


उन्होंने बी एस सी की स्नातक उपाधि विशेष योग्यता के साथ प्राप्त की ओर 
938 ई में कॉलेज फैलो नियुक्त की गई। फर्ग्यूसनन कॉलेज के इतिहास मे ऐसा 
कई वर्ष बाद हुआ कि एक महिला विद्यार्थी ने प्रथम श्रेणी प्राप्त्की और वह भी 
विज्ञान मे। उन्हे स्नातकोत्तर अध्ययन हेतु सन्‌ 938 ई मे कॉलेज की योग्यता 
फैलोशिप प्रदान की गई थी। एक बार फिर वह अपने पिता के समक्ष उनसे विषय 
के चयन के सम्बन्ध मे उपस्थित हुई, जिन्होने उन्हे उस समय जीव विज्ञान के अन्तर्गत 
सर्वाधिक आधुनिक समझे गए विषय “कोशिका विज्ञान” के अध्ययन का सुझाव दिया। 
उन्हे कृषि महाविद्यालय पूना मे आधुनिक जीव विज्ञान के अन्तर्गत कोशिका विज्ञान 
में प्रथम श्रेणी छात्रों के लिए एकमात्र आरक्षित स्थान पर एम एस सी मे प्रवेश मिल 
गया। सन्‌ 938 40 का समय था और उन्हे प्रख्यात कोशिका-विज्ञानी प्रोफेसर 
एल एस कुमार के साथ कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ। कोशिका के कैसर रोग 
के अध्ययन मे उसके सम्भावित उपयोग के विषय मे उनके पिता की पूर्व दृष्टि सहित 
नियोजित काशिकाओ के अध्ययन का यह प्रारम्भ था। 


अपने अनुभवों का वर्णन उन्होने इस प्रकार किया है--'' महाविद्यालय को 
एकमात्र महिला विद्यार्थी होने के कारण मुझे कई समस्याओ का सामना करना पडता 
था। मैं एनौनेसी (॥॥70780८७८) कुल के पौधो के कोशिका तत्र पर कार्य कर रही 
थी। मुझे प्रतिदिन साइकिल से कृषि महाविद्यालय और वहाँ से गणेशखण्ड उद्यान 


है भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 
कोशिकातत्रीय तेयारियो के इलए हनुमानफल/लक्ष्मणफल (,8॥॥04- (2८00709५8) 
और मामफ्ल (»&॥77074-777070409) जेसे दुलभ पादपो के लिए विशेष पदार्थ 
एनानेसी (॥॥0782९३८) के सग्रह के लिए जाना पडता था। उन दिनां इस प्रकार 
अकेले साइकिल पर यात्रा करना अधिक सुरक्षित नही था, यद्यपि मुझे बहुत आनन्द 
आता था। प्राफेसर महोदय के विशेष सरक्षण ओर देखरेख मे मुझे कृषि महाविद्यालय 
म॑ 00 से 50 तक छात्रों की विशाल कक्षा मे सप्ताह मे दो बार कोशिका 
विज्ञान के पाठ्यक्रम सम्बन्धी व्याख्यान के समय उपस्थित होना पडा था। प्रोफेसर 
महोदय की मेज के पास ही मेरे लिए एक छोटी-सी डेस्क लगा दी गई थी जहाँ 
से मै सारी कक्षा को देख सकती थी, यह कहना व्यर्थ है कि मै कभी ऊपर की 
ओर नही देखती थी।'' 

नवम्बर, 940 ई मे उन्होने अपना शोध प्रबन्ध पूरा किया और 3। जनवरी, 
१94] ई की उन्हे एम एस सी की उपाधि प्रदान की गई। 


पारिवारिक जीवन--एम एस सी प्रथम वर्ष के शोध कार्य एवं अध्ययन से 
निव॒ृत्त होने पर 3 मई, 938 ई को उनका विवाह श्री जयसिह त्रियम्बक रणदिवे 
के साथ हो गया। अपने आलेख ''कैसर अनुसन्धान के तीन दशक (]%९४ 06०७०९५ 
० (४॥८७ 7२९६८४४८॥) '' मे वह लिखती है, ''गणित के मेधावी छात्र मेरे पति लन्दन 
विश्वविद्यालय की रजिस्ट्री सम्बन्धी परीक्षा के पत्राचार पाठ्यक्रम की तैयारी कर रहे 
थे।'' उनके एकमात्र पुत्र अनिल का जन्म 4 फरवरी, 94। ई को हुआ था। रजिस्ट्री 
अधिकारी के लिए सक्षम होने पर उनके पति को सन्‌ 94 ई मे बीमा विभाग, 
भारत सरकार, नई दिल्ली मे 6 मास के लिए कार्य प्रदान किया गया। वह और उनका 
छोटा शिशु पूना मे ही रहे। उनके पति ने वरिष्ठ रजिस्ट्री अधिकारी, प्रधान रजिस्ट्री 
अभिकारी भारतीय जीवन बीमा निगम तथा कार्यकारी अधिकारी, भारतीय जीवन बीमा 
निगम के पदो पर कार्य किया तथा सेवानिवत्त हो गए। रजिस्ट्री सम्बन्धी काय के 
सम्बन्ध मे उनके द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन महत्त्वपूर्ण थे। वह एक बौद्धिक दिग्गज थे 
तथा दिसम्बर, 977 ई में उनका देहावसान हो गया। 


व्यावसायिक जीवन--छ मास की उस अवधि मे उन्होने एक महाविद्यालय 
मे अध्यापन कार्य हेतु प्रयास किया । उनकी अति घनिष्ठ सहेली श्रीमती गुप्ता ने फर्ग्यूसन 
कालेज की जीव-विज्ञान-प्रयोगशाला मे उनके पिता के साथ प्रथम महिला प्रदर्शक 
के पद पर पहले ही कार्य करना आरम्भ कर दिया था। उनके पिता का विश्वास था 
कि वे दोनो प्रथम वर्ष विज्ञान की कक्षाओ के अध्यापन म॑ सफल रहेगी परन्तु विभाग 
के अन्य अध्यापक महिला प्रदर्शनो के स्वागत के लिए बिल्कुल इच्छुक नहीं थे। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक ८ 


अन्त मे, उनके कार्यभार ग्रहण करन क दिन ही उन्हे एक परीक्षणात्मक व्याख्यान 
देने का चुनौती भरा कार्य सौपा गया। उन्होने इस चुनौती को स्वीकार किया और 
सफल रही। प्रदर्शम के तीन पद थे--जिन पर दो महिलाये और एक नवयुवक कार्यरत 
थे। जबकि दोनो महिलाओ का दल श्रेष्ठ कार्य करता था उनके साथ कार्यरत पुरुष 
की स्थिति सुखद नही थी। प्रो श्रीमती गुप्ता उस समय से सदैव ही एक कुशल 
अध्यापिका के रूप मे अपने क्षेत्र मे कार्यरत रही। 

अपने सक्षिप्त कार्यकाल मे उन्होने अध्यापन के क्षेत्र मे बहुत अधिक सीखा। 
इससे उनके पिता मे एक नवीन आशा का सचार हुआ तथा वह अपनी बेटी मे पुन 
एक सम्भाव्य वेज्ञानिक की कल्पना कर सके। उन्होने यह देखा और अनुभव किया 
कि विवाह हो जाने से उस प्रकार का गतिरोध उत्पन्न होना आवश्यक नही जिसको 
वह आशका करते थे। उनके पति भी इस बात के लिए उतने ही इच्छुक थे कि वह 
अपना वैज्ञानिक कार्य जारी रख। तथापि, जब वह अपने पति के साथ उनके कार्य 
के सिलसिले मे शिमला मे रहने गई, तो वहाँ अपने लिए पर्याप्त अनुकूल कार्य न 
पा सकने पर वह व्यग्र होने लगीं। उनके सौभाग्य से उनके पति को ऑरियन्टल कम्पनी 
मे बम्बई लौटने का अवसर प्राप्त हो गया। छ मास तक शिमला मे उनके सहवास 
ने उन्हे घनिष्ठ होने मे सहायता दी और वे अपने पैतृक प्रदेश बम्बई वापस आ गए। 
जब वह अशकालीन अध्यापन कार्य प्राप्त करने का विचार कर रही थीं ताकि वह 
अपने द्विवर्षीय पुत्र की देखभाल भी कर सके, उनके पति उन्हे चिकित्सकीय जीवन, 
की क्षतिपूर्ति स्वरूप जैव चिकित्सीय अनुसन्धान कार्य प्रारम्भ करना चाहते थे, जिससे 
वह वचित हो गई थी तथा यह वही थे कि उन्होने टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, बम्बई 
की प्रयोगशाला मे पूर्णकालिक अनुसन्धान कार्य मे प्रवत्त कराया। 

उनके नक्षत्र भी मनमौजी रहे है। टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल मे अपने चचेरे 
भाई जैव रसायनज्ञ डॉ चित्रे से यकायक वार्तालाप के समय उन्हे पता चला कि डॉ 
खानोल्‍कर कैसर कोशिका विज्ञान पर कार्य प्रारम्भ करना चाहते थे। डॉ चित्रे ने डॉ 
खानोल्‍कर से उनके कोशिका विज्ञान की छात्रा होने का जिक्र पहले ही कर दिया 
ओर अरे। देखिए। 5 जून 943 ई मे उन्हे साक्षात्कार के लिए बुलाया गया। स्वय 
उन्ही के शब्दो, ““बम्बई की भीषण वर्षा की विशेषता के कारण प्रात काल से ही 
अन्धकार छाया हुआ था। घुटनों तक गहरे पानी मे होकर कठिनाई से चलकर में 
टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल पहुँची। साढे दस बजे मेने डॉ खानोलल्‍कर के कार्यालय 
में प्रवेश किया जिसकी दीवारे सम्पूर्ण विश्व के वैज्ञानिकां के चित्रों से सजी हुई था 
और उसकी ताके केसर पर भारी भरकम पुस्तकों से भरी हुई थी। उस दिन प्रात 
किये गये अन्त्य परीक्षण के विषय मे एक अन्य युवा डॉक्टर से बहस करते हुए 


6 भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक 


दोनो सफेद वस्त्र धारण किये हुए, डॉ खानाल्कर का शान्त चित्र अभी तक मेरे स्मृति 
पटल पर ताजा है। 

चिकित्सकीय जीवन से वचित रह जाने से तनिक निराश एवं पारवारिक 
उत्तरदायित्व के साथ मे 25 वर्षीय विवाहित महिला थी, किन्तु डॉ खानाल्कर के 
कार्यालय के उस दृश्य ने मेरे भीतर वैज्ञानिक अनुसन्धान के प्रति पूर्ण तल्‍लीनता के 
साथ गहन इच्छा जागृत कर दी। यहाँ मेरे लिए अवसर मौजूद था और मुझे इस जाने 
नहीं देना चाहिए था। “यदि आन्तरिक इच्छा दृढ और पर्याप्त रूए से उचित है, तो 
वैवाहिक और वैज्ञानिक जीवन मिलकर कार्य क्यो न करे? मै अपने हृदय और आत्मा 
को इस प्रयोगशाला मे अनुसन्धान के प्रति समर्पित कर सकती हूँ और फिर भी अपने 
घर और परिवार की देखरेख कर सकती हूँ और फिर भी अपने घर और परिवार 
की देखरेख और कर सकती हूँ। सम्भवत मैं अधिक अच्छी माँ और अधिक सुखद 
पत्नी भी बन सकेँ। मेरे पतिदेव कार्य के प्रति समर्पण मे विश्वास करते है, वह अन्य 
पतियो की तुलना मे अपनी पत्नी से कम देखरेख और ध्यान की तनिक भी परवाह 
नहीं करते। तब इस प्रस्ताव को क्यो नही स्वीकार करूँ।' ये वे विचार थे जो मेरे 
मस्तिष्क मे उस समय तेजी से गुजर रहे थे जब में एक बगल की कुर्सी पर बैठी 
हुई उन निर्देशों को छिपकर सुन रही थी, जो डॉ खानोलकर उस युवा डॉक्टर को 
दे रहे थे। वह उसे बहु आयामी शोध-प्रकरण के समान प्रत्येक कैंसर रोगी का इलाज 
करने का महत्त्व बतलाने की चेष्टा कर रहे थे। 


कुछ ही मिनटो मे डॉ खानोल्‍कर मुझसे बात करने के लिए स्वतत्र थे। महान्‌ 
व्यक्तित्व, अहकार रहित और आनन्दप्रद, एक दिग्गज वैज्ञानिक। उन्होने शीघ्र ही 
मुझे आत्मवत्‌ बन दिया। अगले दो घण्टो मे उन्होने कैसर पर प्रयोगात्मक अध्ययन 
प्रारम्भ करने की सम्भावना पर लम्बी बहस को, उन्होने मुझे प्रयोगशाला मे पयोगात्मक 
प्रदर्शन भी दिखलाया। स्तन कैसर पर पढने के लिए सुझाये गये कुछ प्रकाशित ग्रन्थ 
लिए हुए मै अपराह बजे चिकित्सालय की प्रयोगशाला से यह अनुभव करते हुए 
चली पडी कि मै तो पहले से ही इस स्थान से सम्बद्ध थी।”' 


एक पखवाडे के उपरान्त श्रीमती कमल जे रणदिवे ने 4 जुलाई, ॥943 ई 
को शोध छात्रा के रूप मे टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल प्रयोगशाला मे अपना कायभार 
ग्रहण कर लिया। कैसर पर प्रयागात्मक अनुसन्धान प्रारम्भ करने वाली वह प्रथम महिला 
थी। टाटा ममोरियल हॉस्पिटल मे उन्होने सन 977 ई तक जीवन की प्रक्रियाओ 
के रहस्यां से प्रत्यक्ष रूप से जुडे हुए, कैंसर क्यो और कैसे? को खोज निकालने 
के प्रयास के चित्ताकर्षक अनुभव के तीन दशकों से अधिक 34 वर्ष पूर्ण किय तथा 


भाग्त के चिकित्सा वैज्ञानिक 7 


“'कैसर उत्पादक का यात्रीकरण (४९९ #व॥णा। ण (''८॥022॥९७५) पर अपने कार्य 
पर उन्हे राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हुई | 

सन्‌ 952 ई मे उन्होने नव स्थापित भाग्तीय कैसर अनुसन्धान केन्द्र मे 
ऊतक सवर्धन प्रयोगशाला ([7५५प5८ ('णाप्ा8 [,४00409५) के अध्यक्ष पद पर 
कार्य प्रारम्भ किया। वरिष्ठतम अधिकारी होने के कारण डॉ रणदिवे को प्रोफेसर 
खानोल्‍कर की अनुपस्थिति मे निदेशक पद का कार्य वहन करना पडता था तथा 
प्रो खानोल्‍कर के सेवानिवृत्त होने पर उहोने सन्‌ 962 से 966 ई तक निदेशक 
पद पर कार्य किया जिसके बाद कैरुर अनुसन्धान केन्द्र टाटा ममोरियल हॉस्पिटल 
मे विलय हो गया और टाटा मेमोरियल केन्द्र कहलाया। दिसम्बर, 977 ई मे 
वह अध्यक्ष, जीव विज्ञान प्रभाग, कैसर शोध सस्थान, परेल, बम्बई--400042 के 
पद से सेवानिवृत्त हो गई तथा अपनी पीछे 50 से अधिक बहु आयामी उत्तर-डॉक्टरेट 
वैज्ञानिकों को छोड दिया, जिन्हाने डॉ रणदिवे के मार्गदर्शन मे पी एचडी की 
उपाधि प्राप्त की थी। उन्होने कैंसर शोध सस्थान, परेल, बम्बई--400042 मे दो 
वर्ष तक इमेरिटस वैज्ञानिक के पद पर कार्य किया। 


पता--उनके आवास एवं कार्यालय का पता इस प्रकार है-- 


श्रीमती डॉ कमल जे रणदिवे, 

एम एस सी पीएचडी, एफ एन ए, एफ एम ए एस 

/27, निशिगधा, रूपनगर, 

मध्यम आय वर्गीय कॉलोनी 

वेस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे, बाद्रा (पूर्व), 

बम्बई--40005, भारत 

अनुसन्धान कार्य--टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल मे कार्यभार ग्रहण करने के 

पश्चात्‌ पहले कुछ दिनो तक वह सजीव कैसर कोशिकाओ के रहस्यो की खोज 
और उस पर कार्य हेतु एक ऊतक सवर्धन प्रयोगश्गला के विचार मे निमग्न रही। 
द्वितीय विश्वयुद्ध अभी तक जारी था तथा काँच के सामान और रसायनो का आयात 
बेहद कठिन था। अत दुगसाध्य ऊतक सवर्धन तकनीक प्रारम्भ करने का विचार, 
जिसका प्रत्येक चरण आयातित पदार्थों पर निर्भर था, कुछ समय के लिए स्थगित 
करना पडा। फलत उपलब्ध सुविधाओ एवं चूहों के विशेष केसर तनावां के साथ 
हंतु-विज्ञान (८४४०0029५) एवं स्तन सम्बन्धी (7)ञा6) कैसर के विकास के यात्रीकरण 
का अध्ययन करने के लिए प्रयोगो की रूपरेखा बनाने का प्रस्ताव किया गया। 
व्यावहारत प्रयोगात्मक जीव विज्ञान मे यह अनुसन्धान का दंश मे प्राग्म्भ था। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


प्रयोगात्मक कार्यो के लिए प्रयोगशाला के स्तनपायी जीवो की एक विशाल 
बस्ती की रक्षाथ उन्हे सर्वप्रथम केसर उत्पादक मे हारमोनो सूक्ष्म सक्रामक विषाणुओ 
और रसायनो के बहु-तात्विक अध्ययन के लिए पशुओ पर सूक्ष्म शल्य-क्रियाओ के 
लिए अन्त प्रजनन, लेखन एवं स्तरीय प्रविधियो की समुचित प्रणाली स्थापित करने 
तथा उनके निजी पशु-आहार का एक सिद्धान्त विकसित करना पडा। पाँच वर्षो मे 
अन्त प्रजनित चूहो की कोमल एव अवरोधक जनसख्या के कैंसर पर किये गये अनक 
प्रयोगो ने स्तन सम्बन्धी केसर में आनुवशिक, हारमोन एवं सूक्ष्म विषाणु (वायरल) 
सम्बन्धी तत्त्वो के विषम मिलन की हमारी सूझबूझ मे वस्तुत योग दिया है। चूहों 
के विभिन्‍न अन्त प्रजनित तनावो का इच्छानुसार एव प्रयोगात्मक रूप से उत्पन्न स्तन 
सम्बन्धी केसर कैसर-उत्पादक के यात्रीकरण के अध्ययन के लिए आदर्श प्रयोगात्मक 
प्रतिदर्श माना गया। 

स्तन--कैसर पर उनके प्रयोगात्मक अध्ययन के प्रथम अश के उपलक्ष में 
लीड्स विश्वावद्यालय (इग्लैंड) के डॉ जार्जियाना बॉन्सर ने उन्हे डॉक्टरेट की उपाधि 
प्रदान की। कालान्तर मे कैसर के एक अधिकारी विद्वान बॉन्सर श्रीमती रणदिवे के 
अच्छे मित्र बन गए और उन्होने विजिटिग वैज्ञानिक के पद पर उनकी प्रयोगशाला 
मे तीन माह का समय व्यतीत किया। दिसम्बर, 949 ई में पी एच डी की उपाधि 
प्राप्त करने के बाद वह उत्तर डॉक्टरेट प्रशिक्षण हेतु रॉकफेलर सस्थान की फैलोशिप 
प्राप्त कर मार्च, १950 ई मे सयुक्त राज्य अमेरिका चली गई। उनके लिए यह सजीव 
कोशिकाओ पर कार्य करने के अपने स्वप्न की खोई हुई श्रखला को पुन प्राप्त करने 
का अवसर था। यहाँ ऊतक सवर्धन के प्रणेताओ-जॉन हॉफकिन्स हॉस्पिटल, बाल्टीमोर 
के स्वर्गीय डॉ जॉर्ज ग्रे, राष्ट्रीय स्वास्थ्य सस्थान, बेथेस्डा के स्वर्गीय डॉ अल और 
कोलम्बिया विश्वविद्यालय के चिकित्सा केन्द्र के डॉ मारग्रेट मरे के साथ रहकर उन्हाने 
ऊतक, कोशिका और अवयव सवर्धन-प्रविधि को सीखा और उसका अभ्यास किया। 
उन्होने पूर्वी समुद्र तट पर स्थित कई अमेरिकन कैंसर अनुसन्धान प्रयोगशालाआ का 
अवलोकन किया और 95 ई मे स्वदेश लौट आई, जब कुछ समय पूर्व ही भारतीय 
कैंसर अनुसन्धान केन्द्र की आधारशिला रखी गई थी। वे दिन-रात केन्द्र के भवन 
एवं बहुआयामी कैंसर अनुसन्धान के लिए आवश्यक उपकरण प्राप्ति की योजनाये 
बनाती रहती थी। भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान के इतिहास मे 3 दिसम्बर ॥952 
ई का दिन एक स्मरणीय दिन था, जब तत्कालीन केन्द्रीय स्वास्थ्य मत्री राजकुमारी 
अमृत कौर ने केन्द्र का विधिवत्‌ उद्घाटन किया। इस अवसर पर केंसर अनुसन्धान 
के क्षेत्र मे विश्वविख्यात अधिकारी विद्वान उपस्थित थे जो नव भारतीय कैंसर 
अनुसन्धान केन्द्र के सस्थापक निदेशक प्रो वो आर खानाल्कर की अध्यक्षता मे 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 0 


आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय कैसर अनुसन्धान आयोग की बैठक मे भाग लेने आए हुए थे। 
डॉ रणदिव ने भारत मे 952 ई में नव स्थापित भारतीय कैसर अनुसन्धान केन्द्र 
में प्रथभ ऊतक सवधन प्रयोगशाला स्थापित की तथा बम्बई मे कैसर अनुसन्धान केन्द्र 
की स्थापना एवं निर्माण मे अपने पी एच डी मागदर्शक प्रो वी आर खानोल्‍कर के 
साथ कार्य किया तथा केन्द्र के 6 विभागो मे से प्रत्येक की स्थापना मे निदेशक 
खागेल्कर की सहायता को, जिनमे से चार की अध्यक्ष महिला वैज्ञानिक थी। 

द्वितीय दशक (953-63 ई ) में कई क्षेत्रो मे व्यापक स्तर पर कार्य हुआ। 
उनके मुख्य कार्य दो थे केन्द्र मे कार्य के प्रत्येक पक्ष--वैज्ञानिक, तकनीकी एवं 
प्रशासनिक--मे निदेशक की सहायता करना तथा अपनी जीव-विज्ञान प्रयोगशाला की 
स्थापना जिसमे भारत की प्रमुख ऊतक सवर्धन स्थापना शामिल थी। अत्तत उनका 
एक ऐसी प्रयोगशाला का विचार अनुभव किया जा रहा था, जिसमे ऊतक, कोशिका 
और अवयव प्रणालियो का प्रयोग सजीव कैसर कोशिकाओ के अध्ययन मे किया 
जा सकता था। उनके मस्तिष्क मे कई प्रश्न उठ रहे थे जिनका उत्तर वह चाहती 
थी। इसके साथ ही एकमात्र उपाय, जिसके द्वाग वह इसे प्राप्त कर सकती थी, बहुपक्षीय 
अध्ययन का समारम्भ था। कोशिका स्तर विधिवत्‌ प्रयोग करने के लिए जीव-विज्ञान 
प्रतिदश प्रणालियो का विकास एवं कमचारियो का प्रशिक्षण आवश्यक था। एक ओर 
वह नवीन प्रयोगात्मक प्रतिदर्शो पर रासायनिक रूप से जनित स्तन सम्बन्धी कैंसर 
पर कार्य करती रही और दूसरी ओर भारत मे कतिपय पर्यावरणीय कैसर--मुँह सम्बन्धी 
कैसर और उसका चबावरे की आदत के साथ सम्बन्ध की उच्च घटना के कारण और 
प्रकार के अध्ययन हेतु प्रयोग करती रही। तीन पशुओ पर प्रयोग के लिए उन्होने 
दो प्रत्भिावान स्नातक युवकों को प्रवेश दिया। 

ऊतक सवर्धन प्रयोगशाला मे प्रत्येक आधारभूत प्रविधि का स्तरीयकरण, साधन 
की तैयारी ओर ऊतक, कोशिका तथा अवयब सवर्धन की किस्मो की स्थापना केवल 
एक सहायक की सहायता से की जाती थी। इस प्रयोगशाला में स्नातक छात्रों को 
प्रवेश देने का समय अभी तक नही आया था जब तक उनको बहुपक्षीय विषय 
तकनोक के व्यवहार का पर्याप्त अनुभव न हो। टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल शल्य क्रिया 
से प्राप्त नमूनो के आधार पर विकसित चूहों और मानव के गुल्म-कोशिका तनावां 
के निजी प्रतिदर्श स्थापित करने मे उन्हे 5 वर्ष का समय लगा। सन्‌ 957 ई मे 
एक पगत वाले ऊतको में अनिश्चित निर्वहन के लिए चयनित कार्बन ऊतक गुल्मो 
और सावधानीपूर्वक चयनित स्मरणीय वसा गुल्म अभी तक सजीव और स्वस्थ है। 
ये हजारा मार्गों सं होकर गुजरे है तथा ऑषधिया का प्रेरित करने वाली ओर अवरुद्ध 
वृद्धि क एरीथण और कोशिका के पारस्परिक कार्या म प्रयोग के लिए आदर्श कोशिका 


[0 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


सामग्री रूप मे प्रयुक्त किये गये है। कोशिका वृद्धि, कोशिका से उत्पन्न अलिगी सतति, 
केन्द्रक प्रतिरूप तथा कोशिका से उत्पन्न अलिगी चूहे को गुल्म कोशिका तनाव के 
कोशिका-बलगति विज्ञान के निरन्‍्त अध्ययन तथा मानव गुल्म क॑ समानान्तर अध्ययन 
ने कपट (द्रोह) क गुण को समझने मे योग दिया है। प्रयोगशाला मे इन सजीव 
कोशिकाओ तथा उनके द्वारा सर्वप्रथम वर्णित जानु सम्बन्धी स्तर पर कोशिकाओ के 
समूह के रूपान्तर को लाने वाली सहायक कोशिकाओ के मध्य स्वभक्षीपन के अद्भुत 
पदार्थ का जैव रासायनिक एव कोशिका रासायनिक अध्ययन कुछ चौंकने वाली 
घटनाये थी। 

भारतीय प्रयोगशालाओ की परिस्थितियो मे ऊतक सवर्धन जैसे बडी और 
दुरासाध्य तकनीक का विकास करना कठिन कार्य था। विविध रूपो मे इस तकनीक 
की सफलता उनके अध्यवसायी, अनुशासित और समर्पित युवा स्नातको के दल के 
प्रति वस्तुत एक उपहार था, जिसे वह प्रशिक्षित कर सकी। इन वर्षो मे उन्हे चौबीसो 
घण्टे काम करना पडा। उन्होने इस बात की खोज की कि कुछ मानवीय कैसर 
कोशिकाये अर्द्धरात्रि ( से 3 बजे पूर्वाह्अ) को सबसे तेज गति से सर्वोच्च सूची- 
विभाजक सूचकॉक होता है। उन्होने मानवीय कुष्ठ रोग से भिन्‍न आई सी आर सी 
शलाकाणु के अभिवर्द्धित स्वरूप का भी अध्ययन किया। कुष्ठ रोग शलाकाणु विभाजन 
अथवा कैंसर कोशिकाओ के विभाजन के माइक्रो सिनेमाटोग्राफिक आलेखन के लिए 
समयबद्ध सिनेमाटोग्राफी की सुविधा उन्हे उन दिनो प्राप्त नही थी। किसे भी कदापि 
यह विश्वास नही होगा यदि वे यह बताये कि उन्होने पेशीय जीवाणु कुष्ठ रोग को 
विभाजित होते देखा था। अवलोकनो का आलेखन का एकमात्र उपाय उसका रेखा- 
चित्र बनाना था जिसे वे हर घण्टा, रात और दिन कोशिकाओ की जॉच करते समय 
प्रति कुछ मिनटो मे स्पष्टकारी कैमरे के साथ सूक्ष्मदर्शी यत्र से देखते थे। युवा स्नातका 
ने प्रयोगशाला मे ठहरने का प्रबन्ध कर लिया था ताकि जब भी जरूरत हो, उपलब्ध 
हो सके और वह उन दिनो 0 वर्ष तक विचित्र समय पर प्रयोगशाला का अवलोकन 
करने के लिए आया करती थी, क्योकि उनका निवास-स्थान प्रयोगशाला से पॉच मिनट 
के पैदल भ्रमण की दूरी पर स्थित था। यद्यपि उनके पति को बम्बई की कतिपय 
मर्वोत्तम बस्तियो मे सुविधापूर्ण आवास उपलब्ध कराया गया था, किन्तु वे भीड- 
भाड पूर्ण मिल क्षेत्र परेल मे ही रहते रहे। वे ऊतक उत्पादन तथा कैसर कोशिका 
और कुष्ठ रोग शलाकाणु पर प्रस्तावित कार्यक्रम हेतु जीव वैज्ञानिक कोशिका भण्डारण 
के वर्ष थे। 

अन्तर्राष्ट्रीय कुष्ठ रोग पत्रिका (इटरनेशनल जर्नल ऑफ लिप्रोसी ([#0740॥9| 
॥0077व 0 ,०7705५) मे प्रकाशित उनके अनेक लेखो मे आई सी आर सी शलाकणु 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक !] 


पर सबसे अधिक मनोहारी कार्य ने विश्व स्वास्थ्य सगठन का ध्यान आकृष्ट किया। 
सन्‌ 962 ई मे विश्व स्वास्थ्य सगठन ने दक्षिणी अमेरिका मे आयोजित अपनी 
अन्तर्राष्ट्रीय बैठक मे उन्हे इस कार्य को जारी रखने के लिए बिना आवेदन किए हुए 
एक लघु अनुदान प्रदान किया। इस अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता एवं डॉलरो मे उपलब्ध राशि 
ने विविध प्रयोगो मे सजीव कोशिकाओं की प्रतिक्रियाओ के लेखन हेतु अति आवश्यक 
समयबद्ध सिनेमाटोग्राफी से प्रयोगशाला को परिपूर्ण करने मे सहायता दी। सन्‌ 966 
ई मे प्रयोगशाला ने सजीव कैसर कोशिकाओ के विभिन्‍न उत्तेजक गोचर पदार्थों का 
फिल्मॉकन किया है। कैसर उत्पादक, भक्षक कोशिकाओ द्वारा जीवाणुओ का भक्षण 
तथा बृहत्‌ भक्षकाणु गति पर उनकी फिलमे उनके यथार्थ गौरव है। उनको कई वर्षो 
तक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनो मे प्रदर्शित किया गया । उनको स्थानीय दूरदर्शन द्वारा विज्ञान- 
पाठ के रूप में भी प्रयोग किया जा रहा है। 


उनकी प्रयोगात्मक जीव-विज्ञान प्रयोगशाला मे विकसित कार्य ने अच्छी प्रगति 
की और उसका बडा सम्मान हुआ। सन्‌ 957 ई में वह नये बहुआयामी विषय 
“व्यावहारिक जीव विज्ञान! एप्लाइड बॉयोलॉजी--(49ए9०0 80029) प्रारम्भ करने 
मे सफल हुई। इसने बम्बई विश्वविद्यालय की स्नातकोत्तर उपाधि हेतु अनुसन्धान की 
सुविधाये प्रदान की । यह एक युगान्तरकारी कार्य था और अनेक स्नातकोत्तर चिकित्सा 
अनुसन्धान सस्थाओ और महाविद्यालयो की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया जिन्हे 
विमतः 20 वर्षो मे व्यावहारिक जीव विज्ञान मे छात्रो के प्रशिक्षण हेतु मान्यता प्रदान 
की जा चुकी है। 
सन्‌ 958 ई मे कैंसर अनुसन्धान के क्षेत्र मे 5 वर्ष के कार्य सम्पूर्ण करने 
पर भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद ने कैसर पर कार्य मे उनके महत्त्वपृण योगदान 
के उपलक्ष मे उन्हे वरिष्ठ कर्नल अमीर चन्द पुरस्कार प्रदान कर विभूषित किया। 


तीसरा दशक (964-74) धमाके साथ शुरू हुआ। पहला वर्ष मौलिक एव 
महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक अनुसन्धान के लिए सर्वाच्च राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त भारतीय चिकित्सा 
परिषद्‌ के प्रथम रजत जयन्ती पुरस्कार का था। वह लिखती है--' उस दिन की याद 
अभी तक एक पुष्प की भाँति ताजा हे। सुबह मैने प्रधानमत्री लाल बहादुर शास्त्री 
के हाथो से पुरस्कार प्राप्त किया था। अपराह्न मने प्रयोगात्मक केसर उत्पादक पर 
अपना भाषण प्रस्तुत किया जो बडी उपलब्धि थी | सायकाल डॉ दीक्षित के शोभायमान 
घर पर स्वागत-भोज था। उस समय वह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान सस्थान के 
निदेशक थे। यह उन अमूल्य अवसरो म॑ से एक था जब देश मे चिकित्सा-अनुसन्धान 
की त्रिमूर्ति (मेरे गुरु प्रो वी आर खानोल्‍कर, डॉ जी सी पण्डित, भारतीय चिकित्सा 
अनुसन्धान परिषद्‌ के निदेशक और हमारे यजमान डॉ दीक्षित) मुझे अभिनन्दन और 


।2 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


कक, 


भोजन से सन्तुष्ट करने के लिए उपस्थित थी। सौभाग्यवश यह अनुपम सम्मिलन था 
कि उस दिन अपनी पत्नी के भाषण और रात्रि भांज क॑ समय मेरे पति भी दिल्‍ली 
मे उपस्थित थे। मुश्किल से उस विस्मरणीय सन्ध्या को समाप्त कर हम घर पहुँचे 
ही थ कि टेलीफोन की घटी बज उठी जिसने मानव कुष्ठ रोग पर हमारे कार्य के 
उपलक्ष मे अन्तर्राष्ट्रीय वाटुमल सस्थान के पुरस्कार की घोषणा की मेरे कनिष्ठ सहयोगी 
डॉ वी सी वापट मेरे साथ वाटुमल पुरस्कार के सह विजेता थे। दिसम्बर, 964 
ई मे हमने श्रीमती वाट्मल के हाथो यह पुरस्कार दिल्ली मे प्राप्त किया था। कई 
दिन-रात के घनिष्ठ सामूहिक कार्य के परिश्रम के चहल-पहल पूर्ण पुरस्कार की 
खुशी के दिन तीव्र गति से बीत रहे थे। यह आनन्द और शान्तिमय सन्‍्तोष का विषय 
हे कि कोई भी आडम्बरपूर्ण सफलता के इन मील के पत्थरों पर मुडकर दृष्टिपात 
करता है।'' 

इस दशक की समान रूप से महत्त्वपूर्ण उपलब्धि युवा वैज्ञानिकों के जीवन 
का निर्माण था जो वर्षो तक स्नातकोत्तर छात्र के रूप मे उनके साथ ग्रशिक्षित हुए 
थे। उनमे से कई उन्नति कर वरिष्ठ वैज्ञानिक बन गए और स्नातकोत्तर अध्यापक के 
रूप मे अपना जीवन प्रारम्भ किया। जीव-विज्ञान प्रयोगशाला मे प्रशिक्षित कुछ सर्वोत्तम 
प्रतिभावान व्यक्ति विदेश मे बहुआयामी उत्तर-डॉक्टरेट प्रशिक्षण के लिए चुने गए। 
ये युवा महिला और पुरुष वैज्ञानिक नवीन दृष्टिकोण के साथ प्रयोगशालाय॑ स्थापित 
करने के लिए स्वदेश लौटे जिसका परिणाम यह हुआ कि मानव की गिल्टी (गॉठ), 
प्रतिरक्षा जीव विज्ञान, कोशिका जीव विज्ञान, कोशिका बल गति विज्ञान रासायनिक 
रोग निदान और चिकित्सा पर प्रयोगात्मक कार्य का बहुत विस्तार हुआ तथा इस अवधि 
मे कैंसर उत्पादक, वायरल और पर्यावरण पर विकसित बहुत-सा कार्य अभी तक 
जोरो से चल रहा है। उन्हे इस बात पर गर्व है कि उनके सहयोगी अधिकॉश वरिष्ठ 
वैज्ञानिको ने अपने कार्य के उपलक्ष मे स्वतत्र रूप से राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय मायता 
प्राप्त की है। भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद द्वारा प्रदत्त कई कनिष्ठ एवं वरिष्ठ 
पुरस्कार भी उन्होने अर्जित किए है। 

विगत कुछ वर्षो मे उन्होने पर्यावरणीय कैसर उत्पादक कार्यक्रम के अन्तर्गत 
भारत मे जीवः प्रणालियो के तत्त्वो--आदतो और उपयोगो जैसे चबाने की आदतो, 
भोजन के अगो जैसे विभिन्‍न प्रकार के खाद्य तेलो तथा लाक्षणिक पर्यावरणीय कैसरो 
से सम्बद्ध अन्य चिकित्सक के व्यवहार स उत्पन्न तत्त्वो के अध्ययन पर मुख्य रूप 
स॑ अपना ध्यान केन्द्रित किया है। इन खाद्य पदार्थों मे से कुछ--तम्बाकू सुपारी 
घुलनशील अवशेषो सहित दृषित तेल बहुत खतरनाक कैसर उत्पादक तत्त्व सिद्ध हो 
चुके है। कैसर अनुसन्धान सस्थान बम्बई मे कार्य करते समय उन्होंने यह खाज 


भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक [ $ 


निकाला कि स्वदेशी मूंगफली अथवा सरसो का तेल उपभोग करने वालो को कैसर 
जल्दी हो सकता है। उनके प्रयोगो से यह सिद्ध हो चुका है कि उनके उपभाग से 
आमाशय का कैसर हो सकता है जा एक प्रकार की गॉठ के रूप मे पेट को फुला 
देता है। डॉ रणदिवे का कथन था कि उन्होने भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ 
की एक प्रायोजना के अन्तर्गत कुछ खाद्य तेलो का परीक्षण किया है। उनका यह 
निष्कर्ष है कि देश मे खाद्य तेलो के निर्माताओ द्वारा प्रयुक्त घुलनशील तत्त्व इन तेलो 
मे कैसर उत्पादक की विशेषता उत्पन्न करने के लिए लापरवाही के साथ खाद्य तेल 
निकालने के कारण उत्तरदायी थे। डॉ रणदिवे ने यह रहस्य भी उद्घाटित किया कि 
भारतीय कैसर अनुसन्धानकर्त्ता एक प्रकार के रक्त कैसर-श्वेतरक्ता के विषाणु को 
पृथक्‌ करने के लिए प्रयत्तनशील है। उनके अनुसार इस दिशा मे मनुष्यों और पशुओ 
दोनो पर विद्युतीय-सूक्ष्मदर्शी प्रयोग तेजी से प्रगति पर है। डॉ रणदिवे के अनुसार 
भारत मे पारसियो मे स्तन कैंसर सर्वाधिक है। उनके मत मे यह किसी आनुवशिक 
कारण से उत्पन्न हो सकता है। अत उनमे कैसर की अधिक घटनाओ के अध्ययन 
हेतु वह स्तनों का दूध एकत्र कर रही थो। कसर नियत्रण कार्यक्रम के एक भाग 
के रूप मे कैंसर अनुसन्धान के इस काय के उपलक्ष मे उन्हे 976 ई वर्ष का सैडोज 
पुरस्कार प्रदान किया गया था। 


वेज्ञिनिक-विधियो मे आस्थावान कोई भी विचारशाली व्यक्ति यह विश्वास 
करता है कि किसी घटना अथवा गोचर पदार्थ को तभी समझा जा सकता है जब 
उसे नियत्रित किया जा सके। विगत तीन दशको मे उनका मुख्य प्रयास ओर योगदान 
विधिवत्‌ कोशिका और परमाणु स्तर पर केसर उत्पादक क्यो और कैसे? की घटना 
को समझने मे रहा है। कई वर्षों तक चिकित्सालय मे व्यावहारिक समस्या के आधारभूत 
अध्ययन से सग्रहीत सूचना के उपयोग का स्तन-कैसर मे हारमोन वायरल रेखा और 
श्वेत रक्‍्तता, मुँह के कैसर के रोगियो की असक्राम्य स्थिति श्वेतरक्तता मे कोशिका 
बल गति विज्ञान एवं कई पर्यावरणीय कैसरो मे बहुत महत्त्व है। तीन दशकों के इस 
सयुक्त दलीय प्रयास को 250 से अधिक शोध-पत्रो मे प्रकाशित कराया गया है। 


यात्राये--डॉ (श्रीमती) कमल जे रणदिवे कार्य, सम्मेलनो एवं उत्तर-डॉक्टरेट 
अध्ययन के सिलसिले मे व्यापक रूप से यात्रा कर चुकी है। उन्होने सयुक्त राज्य 
अमेरिका, जापान, रूस, इग्लैड, चीन आदि देशो की 36 से अधिक बार यात्राये की 
हैं। अन्तर्राष्ट्रीय कोशिका अनुसन्धान सगठन और यूनेस्को की बैठकों तथा सम्मेलनो 
में अन्तर्राष्ट्रीय सस्थाओ के आमत्रण पर भारत का प्रतिनिधित्व करने , कैसर की पहचान, 
रोकथाम और नियत्रण सघ (डेप्का 0070५) इन्टरनेशनल यूनियन अगेन्स्ट कैसर 
(00) स्तन कैसर के अन्तर्राष्ट्रीय समूह (शगाक्षातात।] (ा0फ09 0 डउ2ट4५। 


पे भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


अमन, 


भोजन से सन्तुष्ट करने के लिए उपस्थित थो। सौभाग्यवश यह अनुपम सम्मिलन था 
कि उस दिन अपनी पत्नी के भाषण और रात्रि भाज क॑ समय मेरे पति भी दिल्‍ली 
मे उपस्थित थे। मुश्किल से उस विस्मरणीय सन्ध्या को समाप्त कर हम घर पहुँचे 
ही थे कि टेलीफोन की घटी बज उठी जिसने मानव कुष्ठ रोग पर हमारे कार्य के 
उपलक्ष मे अन्तर्राष्ट्रीय वाट्मल सस्थान के पुरस्कार की घोषणा की । मेर कनिष्ठ सहयोगी 
डॉ वी सी वापट मेरे साथ वाटुमल पुरस्कार के सह विजेता थे। दिसम्बर, 964 
ई में हमने श्रीमती वाटुमल के हाथो यह पुरस्कार दिल्ली मे प्राप्त किया था। कई 
दिन-रात के घनिष्ठ सामूहिक कार्य के परिश्रम के चहल-पहल पूर्ण पुरस्कार की 
खुशी के दिन तीव्र गति से बीत रहे थे। यह आनन्द और शान्तिमय सनन्‍्तोष का विषय 
है कि कोई भी आडम्बरपूर्ण सफलता के इन मील के पत्थरों पर मुडकर दृष्टिपात 
करता है।'' 
इस दशक की समान रूप से महत्त्वपूर्ण उपलब्धि युवा वेज्ञानिकों के जीवन 
का निर्माण था जो वर्षो तक स्नातकोत्तर छात्र के रूप मे उनके साथ प्रशिक्षित हुए 
थे। उनमे से कई उन्नति कर वरिष्ठ वैज्ञानिक बन गए और स्नातकोत्तर अध्यापक के 
रूप मे अपना जीवन प्रारम्भ किया। जीव-विज्ञान प्रयोगशाला मे प्रशिक्षित कुछ सर्वोत्तम 
प्रतिभावान व्यक्ति विदेश मे बहुआयामी उत्तर-डॉक्टरेट प्रशिक्षण के लिए चुने गए। 
ये युवा महिला और पुरुष वैज्ञानिक नवीन दृष्टिकोण के साथ प्रयोगशालाये स्थापित 
करने के लिए स्वदेश लौटे जिसका परिणाम यह हुआ कि मानव की गिल्टी (गॉठ), 
प्रतिरक्षा जीव विज्ञान, कोशिका जीव विज्ञान, कोशिका बल गति विज्ञान, रासायनिक 
रोग निदान और चिकित्सा पर प्रयोगात्मक कार्य का बहुत विस्तार हुआ तथा इस अवधि 
मे कैंसर उत्पादक, वायरल और पर्यावरण पर विकसित बहुत-सा कार्य अभी तक 
जोरो से चल रहा है। उन्हे इस बात पर गर्व है कि उनके सहयोगी अधिकॉश वरिष्ठ 
वैज्ञानिको ने अपने कार्य के उपलक्ष मे स्वतत्र रूप से राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय मायता 
प्राप्त की है। भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद द्वारा प्रदत्त कई कनिष्ठ एवं वरिष्ठ 
पुरस्कार भी उन्होने अर्जित किए है। 


विगत कुछ वर्षो मे उन्होने पर्णवरणीय कैसर उत्पादक कार्यक्रम के अन्तर्गत 
भारत मे जीवन प्रणालियो के तत्त्वो--आदतो और उपयोगो जैसे चबाने की आदतो, 
भोजन के अगो जैसे विभिन्‍न प्रकार के खाद्य तेलो तथा लाक्षणिक पर्यावरणीय कैंसरो 
से सम्बद्ध अन्य चिकित्सक के व्यवहार से उत्पन्न तत्त्वो के अध्ययन पर मुख्य रूप 
से अपना ध्यान केन्द्रित किया है। इन खाद्य पदार्थों मे से कुछ-तम्बाकू सुपारी 
घुलनशील अवशेषो सहित दूषित तेल बहुत खतरनाक कैसर उत्पादक तत्त्व सिद्ध हो 
विके है। कैमर अनुसन्धान सस्थान बम्बई में कार्य करते समय उन्होने यह खाज 


भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक |3 


निकाला कि स्वदेशी मूँगफली अथवा मरसो का तेल उपभोग करने वालो को कैसर 
जल्दी हो सकता है। उनके प्रयोगो से यह सिद्ध हो चुका है कि उनके उपभोग से 
आमाशय का कैसर हो सकता है जो एक प्रकार की गॉठ के रूप मे पेट को फुला 
देता है। डॉ रणदिवे का कथन था कि उन्होने भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ 
की एक प्रायोजना के अन्तर्गत कुछ खाद्य तेलों का परीक्षण किया है। उनका यह 
निष्कर्ष है कि देश मे खाद्य तेलो के निर्माताओ द्वारा प्रयुक्त घुलनशील तत्त्व इन तेलो 
मे कैसर उत्पादक की विशेषता उत्पन्न करने के लिए लापरवाही के साथ खाद्य त्तेल 
निकालने के कारण उत्तरदायी थे। डॉ रणदिवे न॑ यह रहस्य भी उद्घाटित किया कि 
भारतीय कैसर अनुसन्धानकर्त्ता एक प्रकार के रक्त कैसर-श्वेतरक्ता के विषाणु को 
पृथक्‌ करने के लिए प्रयत्नशील है। उनके अनुसार इस दिशा मे मनुष्यो और पशुओ 
दोनो पर विद्युतीय-सूक्ष्मदर्शी प्रयोग तेजी से प्रगति पर है। डॉ रणदिवे के अनुसार 
भारत मे पारसियो मे स्तन कैंसर सर्वाधिक है। उनके मत मे यह किसी आनुवशिक 
कारण से उत्पन्न हो सकता है। अत उनमे कैसर की अधिक घटनाओ के अध्ययन 
हेतु वह स्तनो का दूध एकत्र कर रही थी। कसर नियत्रण कार्यक्रम के एक भाग 
के रूप मे कैसर अनुसन्धान के इस काय के उपलक्ष मे उन्हे 976 ई वर्ष का सैंडोज 

पुग्स्कार प्रदान किया गया था। 

वैज्ञानिक-विधियो मे आस्थावान कोई भी विचारशाली व्यक्ति यह विश्वास 

करता है कि किसी घटना अथवा गोचर पदार्थ को तभी समझा जा सकता है जब 

उसे नियत्रित किया जा सके। विगत तीन दशको मे उनका मुख्य प्रयास और योगदान 

विधिवत्‌ कोशिका और परमाणु स्तर पर केसर उत्पादक क्यो और कैसे? की घटना 

को समझने मे रहा है । कई वर्षो तक चिकित्सालय मे व्यावहारिक समस्या के आधारभूत 

अध्ययन से सग्रहीत सूचना के उपयोग का स्तन-कैसर मे हारमोन वायरल रेखा और 

श्वेत रक्‍्तता, मुँह के कैसर के रोगियो की असक्राम्य स्थिति श्वेतरक्तता मे कोशिका 

बल गति विज्ञान एव कई पर्यावरणीय कैंसरो मे बहुत महत्त्व है। तीन दशकों के इस 

सयुक्त दलीय प्रयास को 250 से अधिक शोध-पत्रो मे प्रकाशित कराया गया है। 

यात्राये--डॉ (श्रीमती) कमल जे रणदिवे कार्य, सम्मेलनो एवं उत्तर-डॉक्टरेट 

अध्ययन के सिलसिले मे व्यापक रूप से यात्रा कर चुकी है। उन्होने सयुक्त राज्य 
अमेरिका, जापान, रूस, इग्लैड, चीन आदि देशों की 36 से अधिक बार यात्राये की 
है। अन्तर्राष्टीय कोशिका अनुसन्धान सगठन ओर यूनेस्को की बैठकों तथा सम्मेलनो 
मे अन्तर्राष्ट्रीय सस्थाओ के आमत्रण पर भारत का प्रतिनिधित्व करने, कैसर की पहचान, 

रोकथाम और नियत्रण सघ (डेप्का 0870«) इन्टरनेशनल यूनियन अगेन्स्ट कैसर 
(00) स्तन कैंसर के अन्तर्राष्ट्रीय समूह ([7/शाक्षाणा॥ (009 णि छिा84७ 


]2 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


भाजन से सन्तुष्ट करने के लिए उपस्थित थी। सौभाग्यवश यह अनुपम सम्मिलन था 
कि उस दिन अपनी पत्नी के भाषण और रात्रि भांज के समय मेरे पति भी दिल्‍ली 
मे उपस्थित थे। मुश्किल से उस विस्मरणीय सन्ध्या को समाप्त कर हम घर पहुँचे 
ही थे कि टेलीफोन की घटी बज उठी जिसने मानव कुष्ठ रोग पर हमारे कार्य के 
उपलक्ष मे अन्तर्राष्ट्रीय वाटुमल सस्थान के पुरस्कार की घोषणा की मेर कनिष्ठ सहयोगी 
डॉ वी सी वापट मेरे साथ वाटुमल पुरस्कार के सह विजेता थे। दिसम्बर, 964 
ई मे हमने श्रीमती वाटुमल के हाथो यह पुरस्कार दिल्ली मे प्राप्त किया था। कई 
दिन-रात के घनिष्ठ सामूहिक कार्य के परिश्रम के चहल-पहल पूर्ण पुरस्कार की 
खुशी के दिन तीव्र गति से बीत रहे थे। यह आनन्द और शान्तिमय सन्‍्तोष का विषय 
है कि कोई भी आडम्बरपूर्ण सफलता के इन मील के पत्थरो पर मुडकर दृष्टिपात 
करता है।'' 

इस दशक की समान रूप से महत्त्वपूर्ण उपलब्धि युवा वैज्ञानिकों के जीवन 
का निर्माण था जो वर्षो तक स्नातकोत्तर छात्र के रूप मे उनके साथ ग्रशिक्षित हुए 
थे। उनमे से कई उन्नति कर वरिष्ठ वैज्ञानिक बन गए और स्नातकोत्तर अध्यापक के 
रूप मे अपना जीवन प्रारम्भ किया। जीव-विज्ञान प्रयोगशाला मे प्रशिक्षित कुछ सर्वोत्तम 
प्रतिभावान व्यक्ति विदेश मे बहुआयामी उत्तर-डॉक्टरेट प्रशिक्षण के लिए चुने गए। 
ये युवा महिला और पुरुष वैज्ञानिक नवीन दृष्टिकोण के साथ प्रयोगशालाये स्थापित 
करने के लिए स्वदेश लौटे जिसका परिणाम यह हुआ कि मानव की गिल्टी (गॉठ) 
प्रतिरक्षा जीव विज्ञान, कोशिका जीव विज्ञान, कोशिका बल गति विज्ञान, रासायनिक 
रोग निदान और चिकित्सा पर प्रयोगात्मक काय का बहुत विस्तार हुआ तथा इस अवधि 
मे कैंसर उत्पादक, वायरल और पर्यावरण पर विकसित बहुत-सा कार्य अभी तक 
जोरो से चल रहा है। उन्हे इस बात पर गर्व है कि उनके सहयोगी अधिकॉश वरिष्ठ 
वैज्ञानिको ने अपने कार्य के उपलक्ष मे स्वतत्र रूप से राष्ट्रीय एव अन्तर्राष्ट्रीय मायता 
प्राप्त की है। भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद द्वारा प्रदत्त कई कनिष्ठ एवं वरिष्ठ 
पुरस्कार भी उन्होने अर्जित किए हे। 

विगत कुछ वर्षो मे उन्होने पर्णवरणीय कैसर उत्पादक कार्यक्रम के अन्तर्गत 
भारत मे जीवय प्रणालियो के तत्त्तो--आदतो और उपयोगो जैसे चबाने की आदतो, 
भोजन के अगो जैसे विभिन्‍न प्रकार के खाद्य तेलो तथा लाक्षणिक पर्यावरणीय कैसरो 
से सम्बद्ध अन्य चिकित्सक के व्यवहार स उत्पन्न तत्त्वो के अध्ययन पर मुख्य रूप 
स॑ अपना ध्यान केन्द्रित किया है। इन खाद्य पदार्थों मे से कुछ--तम्बाकू सुपारी 
घुलनशील अवशेषो सहित दूषित तेल बहुत खतरनाक कैसर उत्पादक तत्त्व सिद्ध हो 
चुके हैं। कैसर अनुसन्धान सस्थान बम्बइ में कार्य करते समय उन्होंने यह खांज 


भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक !3 


निकाला कि स्वदेशी मूँगफली अथवा मसरसो का तेल उपभोग करने वालो को कैसर 
जल्दी हो सकता है। उनके प्रयोगो से यह सिद्ध हो चुका है कि उनके उपभोग से 
आमाशय का कैसर हो सकता है जां एक पकार की गॉठ के रूप में पेट को फुला 
देता है। डॉ रणदिवे का कथन था कि उन्होने भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ 
की एक प्रायोजना के अन्तर्गत कुछ खाद्य तेलो का परीक्षण किया है। उनका यह 
निष्कर्ष है कि देश मे खाद्य तेलो के निर्माताओ द्वारा प्रयुक्त घुलनशील तत्त्व इन तेलो 
मे कैसर उत्पादक की विशेषता उत्पन्न करने के लिए लापरवाही के साथ खाद्य तेल 
निकालने के कारण उत्तरदायी थे। डॉ रणदिवे न यह रहस्य भी उद्घाटित किया कि 
भारतीय कैंसर अनुसन्धानकर्त्ता एक प्रकार के रक्त कैसर-श्वेतरक्ता के विषाणु को 
पृथक्‌ करने के लिए प्रयत्नशील है। उनके अनुसार इस दिशा मे मनुष्यो और पशुओ 
दोनो पर विद्युतीय-सूक्ष्मदर्शी प्रयोग तेजी से प्रगति पर हैं। डॉ रणदिवे के अनुसार 
भारत मे पारसियो मे स्तन कैंसर सर्वाधिक है। उनके मत मे यह किसी आनुवशिक 
कारण से उत्पन्न हो सकता है। अत उनमे कैसर की अधिक घटनाओ के अध्ययन 
हेतु वह स्तनों का दूध एकत्र कर रही थी। केसर नियत्रण कार्यक्रम के एक भाग 
के रूप मे केसर अनुसन्धान के इस काय के उपलक्ष मे उन्हे 976 ई वर्ष का सैडोज 
पुरस्कार प्रदान किया गया था। 

वैज्ञानिक-विधियो मे आस्थावान कोई भी विचारशाली व्यक्ति यह विश्वास 
करता है कि किसी घटना अथवा गोचर पदार्थ को तभी समझा जा सकता है जब 
उसे नियत्रित किया जा सके। विगत तीन दशको मे उनका मुख्य प्रयास और योगदान 
विधिवत्‌ कोशिका और परमाणु स्तर पर केसर उत्पादक क्यो और कैसे? की घटना 
को समझने मे रहा है। कई वर्षो तक चिकित्सालय मे व्यावहारिक समस्या के आधारभूत 
अध्ययन से सग्रहीत सूचना के उपयोग का स्तन-कैसर मे हारमोन वायरल रेखा और 
श्वेत रक्‍्तता, मुँह के कैसर के रोगियो की असक्राम्य स्थिति श्वेतरक्तता मे कोशिका 
बल गति विज्ञान एव कई पर्यावरणीय कैसरो मे बहुत महत्त्व है। तीन दशकों के इस 
सयुक्त दलीय प्रयास को 250 से अधिक शोध-पत्रो मे प्रकाशित कराया गया है। 

यात्राये--डॉ (श्रीमती) कमल जे रणदिवे कार्य, सम्मेलनो एवं उत्तर-डॉक्टरेट 
अध्ययन के सिलसिले मे व्यापक रूप से यात्रा कर चुकी है। उन्होने सयुक्त राज्य 
अमेरिका जापान, रूस, इग्लैड, चीन आदि देशों की 36 से अधिक बार यात्राये की 
है। अन्तर्राष्ट्रीय कोशिका अनुसन्धान सगठन और यूनेस्को की बैठकों तथा सम्मेलनो 
मे अन्तर्राष्ट्रीय सस्थाओ के आमत्रण पर भारत का प्रतिनिधित्व करने, कैसर की पहचान, 
रोकथाम और नियत्रण सघ (डेप्का 7870७) इन्टरनेशनल यूनियन अगेन्स्ट कैसर 
((0८) स्तन कैसर के अन्तर्राष्ट्रीय समूह (फाशायब्राणा॥ं (ह0फ एा 324४५ 


[4 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


(था८०) के जन्म 955 मे 976 तक सदस्य एवं भारत के प्रतिनिधि के रूप म 
(प्रति तीसरे वष स्तन कैसर पर अन्तर्राष्ट्रीय बेठको में भाग लिया), तीन दस-वर्षीय 
ऊतक सवर्धन समीक्षा सम्मेलनो (प्रति दस वर्ष मे एक बार) मे 956, 966 और 
3976 मे भाग लेने और भारत का प्रतिनिधित्व करने हेतु वह जाती रही। 


सदस्यता और फैलोशिप--सन्‌ 950-5 ई मे उन्हे सजीव केसर कोशिका 
पर कार्य हंतु ऊतक सवर्धन तकनीक के ज्ञान एवं अभ्यास हेतु रॉक फैलर सस्थान 
के अनुसन्धान फैलोशिप प्रदान की गई थी। वह सन्‌ 976 ई से महाराष्ट्र विज्ञान 
अकादमी की सस्थापक फैलो (एफ एम ए एस ), 977 ई से भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान 
अकादमी की फैले (एफ एन ए ), 973 ई से भारतीय महिला वैज्ञानिक सघ की 
सस्थापक सदस्य (आइ डब्ल्यू एस ९.) तथा ॥990 इ में उसके सरक्षक मण्डल की 
अध्यक्ष रही है। 

पुरस्कार-सन्‌ 958 ई मे उन्होंने कैसर उत्पादक के यात्रीकरण पर 
अनुसन्धान के उपलक्ष मे प्रशस्ति-पत्र, स्वर्ण पदक आर एक हजार रुपये की राशि 
का बसन्ती देवी अमीर चन्द पुरस्कार प्राप्त किया। सन्‌ 964 इ मे उन्हे मानव 
लेप्रोमेटस कुष्ठ रोग पर प्रयोगात्मक अध्ययन के उपलक्ष मे प्रशस्ति-पत्र और एक 
हजार डॉलर की राशि का जी जे वाटुमल स्मृति अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया 
गया था। सन्‌ 964 ई मे कैंसर पर मौलिक एवं महत्त्वपूर्ण अनुसन्धान कार्य के लिए 
उन्हे चिकित्सा और सम्बद्ध विज्ञानो के क्षेत्र मे सर्वोच्च सम्मान और गौरव स्वरूप 
भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ का प्रथम जयन्ती अनुसन्धान पुरस्कार, प्रशस्ति 
पत्र, स्वर्ण पदक और दस हजार रुपयो की राशि प्रदान की गई थी। सन्‌ 976 ई 
मे उन्होने पर्यावरणीय कैसर उत्पादक आदते और उपयोग कार्य विशेषत भाग्त 
में प्रयोगात्मक अध्ययन के उपलक्ष मे प्रशस्ति-पत्र, स्वर्ण पदक और एक हजार रुपयो 
की राशि का सैडोज भाषण पुरस्कार प्राप्त किया। सन्‌ 982 ई मे उन्हे बनारस हिन्दू 
विश्वविद्यालय महिला महाविद्यालय का विशिष्ट महिला पुरस्कार प्रदान किया गया। 
26 जनगरी, 982 ई को भारत के राष्ट्रपति ने उन्हे 'पद्म भूषण” के अलकरण से 
विभूषित किया था। 2 अगस्त, 996 ई को भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी 
(इण्डियन नेशनल साइन्स एकेडेमी-इन्सा) नई दिल्‍ली ने डॉ (श्रीमती) कमल जे 
रणदिवे को प्रोफसर बी डी तिलक व्याख्यान पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किये। 


वैज्ञानिक उपलब्धियॉ--उनको 35 वर्ष (943-78 ई ) तक आधारभूत और 
व्यावहारिक कैसर अनुसन्धान तथा 7 वर्ष (१978 995 ई ) तक पश्चिमी महाराष्ट्र 
के आदिवासी क्षेत्र मे कैसर एवं अन्य जन स्वास्थ्य समस्याओ पर 
चिकित्सकीय--सामाजिक सेवा कार्य का श्रेय प्राप्त है। इस प्रविधि म॑ उन्होने अपने 


भारत क॑ चिकित्सा वेज्ञानिक' 5 


कार्य के उपलक्ष मे राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त किया है और चार बृहत्‌ 
पुरस्कार प्राप्त किये है--पहला 958 ई मे कैसर उत्पादक पर प्रयोगात्मक कार्य के 
लिए भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ का पुरस्कार, दूसरा 964 ई मे कैसर 
अनुसन्धान के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद का प्रथम रजत जन्यती 
पुरस्कार और मानव कुष्ठ रोग मे 'कुष्ठ रोग शलाकाणु का स्पष्ट पृथक्‍कीकरण' पर 
वाटुमल पुरस्कार, तथा चौथा सन्‌ 976 ई मे पर्यावरणीय कैसर उत्पादक विशेषत 

भारत मे कार्य पर सैडोज पुरस्कार कैसर उत्पादक के गोचर पदार्थ तथा मानव कुष्ठ 
रोग पर बहुपक्षीय कार्य ने इस प्रकार राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त की है। 
सन्‌ 4982 ई मे भारत के राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय अलकरण “पद्म भूषण' प्रदान कर उनका 
सम्मान किया। उन्होने भारत मे ऊतक सवर्धन प्रयोगशाला सहित प्रथम प्रयोगात्मक 
जीव विज्ञान प्रयोगशाला की स्थापना की। 

52 से अधिक के उनके कार्यकाल मे उनके मार्गदर्शन मे 50 छात्रो ने स्नातकोत्तर 
उपाधि (मुख्यतया डॉक्टरेट) प्राप्त की, जिनमे से 23 महिलाये है और वे सभी आज 
स्नातकोत्तर अध्यापक हैं तथा अनुसन्धान कार्य मे सलग्न है। अन्तिम 7 वर्षो मे उन्होने 
35 से अधिक आदिवासी महिलाओ को “स्वास्थ्य निरीक्षक' के रूप मे स्वास्थ्य- 
शिक्षा प्रदान करने के लिए तथा 45 से अधिक स्थानीय क्षेत्रीय कायकर्त्ताओ को ग्रामीण 
क्षेत्र मे पोषण एव स्वास्थ्य सर्वेक्षण-कार्य मे सहायता हेतु प्रशिक्षित किया है। 

स्नातकोत्तर अनुसन्धान हेतु वह बम्बई विश्वविद्यालय मे एक नवीन बहुआयामी 
विषय “व्यावहारिक जीव विज्ञान! के समारम्भ मे सफल रहीं। सयुक्त राज्य अमेरिका 
मे भारतीय छात्रो द्वारा व्यावहारिक जीव विज्ञान मे किये गये स्नातकोत्तर अध्ययन 
के लिए वह पूना और बम्बई विश्वविद्यालय मे वह सह-मार्गदर्शन की कार्य प्रणाली 
प्रारम्भ कराने मे भी सफल रही। सह-मार्गदर्शन प्रणाली के अन्तगत यह अन्तर्राष्ट्रीय 
कार्यक्रम स्नातकोत्तर कार्य के लिए है। 

कैसर और कुष्ठ रोग पर उनका कार्य उनके छात्रों के साथ सयुक्त रूप से 200 
से अधिक शोध-पत्रो मे भारतीय और अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं मे प्रकाशित हुआ है। 

कैसर और कुष्ठरोग पर उनके महत्त्वपूर्ण कार्य एव यांगदान को कतिपय 
निम्नाकित शीर्षको के अन्तर्गत विभकत किया जा सकता है-- 

। कैसर उत्पादक (अ) स्वाभाविक (ब) रासायनिक (स) वायरल और 
(द) 'इन वाइवो' और 'इन वि ट्रो' प्रणालियों के प्रयोग सहित पर्यावरणीय। 

( ब ) रासायनिक रोग निदान और चिकित्सा--पादप उत्पादन जैसे भिलावा 
(५६0 00५ 2॥40शातवापा) | 


[6 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


2 मानव कुष्ठ रोग-कुष्ठ रोग के रोगवर्द्ध और लेप्रोमेटस कुष्ठरोग से 
' आई सी आर सी ' शलाकाणु नामक तेज सूक्ष्म अवयवीय अम्ल का पृथक्कोकरण, 
जो आजकल टीका-निमाण मे सर्वोत्तम साधन के रूप मे प्रयोग किया जा रहा है। 


कैसर का रोग निदान और कैसर-उत्पादन की प्रक्रिया-- 


१ प्रतिदर्श प्रणाली के रूप मे स्तन सम्बन्धी (मूराइन ॥रापात॥८) कैसर पर 
कसर उत्पादन की प्रक्रिया और कैसर रोग-निदान पर व्यापक एवं बहुपक्षीय 
अध्ययण्न किया गया। 

(अ) तीन रोग नैदानिक तत्त्वो--आनुवशिको, हाग्मोन्स आर दुग्ध जनित 
वायरल सवाहक के अन्तर सम्बन्धो ओर पारस्परिक महत्त्व का अध्ययन पाँच अन्त 
जनित चूहो पर उनके ग्राहकत्व एवं अन्य दो तत्त्वों के मेल मे भिन्‍नता के साथ किया 
गया था। यह सिद्ध करना सम्भव हो गया है कि हारमोन तत्त्व आनुवशिकी रूप से 
ग्रहणीय स्तन सम्बन्धी ऊतक पर कार्य मे सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। दुग्ध जनित वायरल 
सवाहक श्लैष्म सम्बन्धी कार्य को नियत्रित करते हुए डिम्ब ग्रथि से हारमोन्स के 
उत्पादन कार्य को नियत्रित करता है। 


स्तन सम्बन्धी कैसर उत्पादक के यात्रीकीरण को स्पष्ट करने के लिए दुग्ध 
सवाहक वाले तनावो पर धाय द्वारा पोषित और हारमोन्स की नियत्रित मात्रा दिए गए 
जन्म से जनताग रहित किये गये चूहो का सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया था। इस 
प्रकरण पर कई लेख “दि ब्रिटिश जर्नल ऑफ कैसर--(]॥6 छत्ताओ व0प्रगाव 
('४॥०८) ' मे प्रकाशित हुए। 


( ब ) पर्यावरणीय कैसर उत्पादक विशेषत भारत मे--तम्बाकू सुपारी और 
पान की सुर्ती के अन्य सभी खाद्य पदार्थों पर अधिक मात्रा मे कार्य किया गया है, 
जिनमे तम्बाकू, चूना और सुपारी का मिश्रण सबसे खतरनाक कैसर उत्पादक सिद्ध 
हुआ है। इन खाद्य पदार्थों से खरगोश की जाति के छोटे जन्तु हेमस्टर (#वा॥०७) 
के गालो की छोटी थेली और पेट के अगले भाग मे प्रयोगात्मक मुँह का कैसर उत्पन्न 
करने पर उनका पहला सफल अध्ययन था। कैसर उत्पादक तम्बाकृ पर परमाणु स्तर 
पर कार्य अभी तक प्रगति पर है। तम्बाकू खाने वालो की हाल मे नाइट्रोसेमीन्स 
([धाा०५४7765) का पता लगाया जा चुका है। 


( स ) कैसर का रासायनिक रोग निदान और चिकित्सा--कैसर के रासायनिक 
रांग निदान और चिकित्सा के अन्तर्गत उन्हे कैसर नियत्रण हेतु कुछ पदार्थों के परीक्षण 
का श्रेय है। उनके द्वारा विकसित पदार्थ रक्त कोशिकाओ पर कोई हानिकर प्रभाव 
डाले बिना केवल कैसर कोशिका ओ को नष्ट करने वाले विशेषतया भिन्न प्रभाव डालते 


भारत के चिकित्सा वज्ञानिक ]7 


हुए पाये गये हे, जो भिलावा (#थव(॥ ]9 ॥07) भिलावा (५&॥॥ (300५ काधा(१0९पाग) 
नामक लांकप्रिय कठोर छिलके वाली सुपारी ॥७) से तैयार किया गया था। 'इन 
विट्रो' कोशिकाओ पर प्रत्यक्ष प्रभाव और चूहों मे गिल्टी (गॉठ) पर रोपड के बहुत 
अधिक प्रयोगात्मक कार्य के बाद भिलावा (॥0) के तेल और बीजो से तैयार पदार्थ 
का प्रयोग बोम्बे फार्ग्गक्यूटिकल की ' अनाकार्सिन-- (७॥4८श०॥) नामक विख्यात 
आयुर्वेदिक ओषधि के रूप मे किया जाता है तथा अब अन्य फार्माक्यूटिकल कौ 
'कासिन-5 (आटा॥-४) के नाम से। प्रत्यक्ष प्रभाव के रूप मे यह चिकित्मकोय 
व्यवहार मे गिल्‍्टी (गॉठ) कोशिकाओ को नष्ट करने के लिए बहुत बढ़िया सिद्ध 
हुई है तथा गिल्टी (गॉठ) के आकार को तुरन्त कम करती है। 

(द) (0) वूहो के नव अन्त जनित तनावो जेसे स्तन कैसर और श्वेत रकतता 
के समान स्वाभाविक सम्बद्ध चोटो से आई सी आर सी चूहा, (॥) निर्बल कैसर 
उत्पादको के परीक्षण हेतु विशेष रूप से कोमल त्वचा के साथ सी-१7 तनाव तथा 
निर्बल कैंसर उत्पादक कार्य के लिए पेट की कोमल परत खाद्य पदार्थों मे कैसर 
उत्पादको की अल्प मात्रा को जॉचने के लिए लानदायक, (77) 'इन वाइगे' रोपड 
और “इन विट्रो' उत्पादन की श्रृंखला म॑ सुरक्षित रोपड योग्य चूहे का सूत्र गुल्म, 
(५) मानवीय ओएष्ठ गुल्म कोशिकीय र॑खाये एच एल एस-2, और (५) १957 इ से 
आई सी आर सी शलाकाणु के तीत्र सूक्ष्मागी अम्ल का पृथक्‍्कीकरण (लेप्रोमेटस 
लेप्रोसी) जो अब आशिक रूप से सिन्थेटिक साधन की श्रेणी मे रखा गया है तथा 
कुष्ठ रोग विरोधी टीका निर्माण के लिए प्रयोग हो रहा है--के उपाय से कैसर अनुसन्धान 
के लिए नए जैव-वैज्ञानिक पदार्थ के विकास मे बहुत अधिक सफलता प्राप्त की 
गई है। 

2 मानव कुष्ठ रोग--आई सी आर सी (भारतीय अनुसन्धान केन्द्र) नामक 
तेज शलाकाणु अम्ल का पृथक्कीकरण सन्‌ 4957 ई से किया जा रहा है। प्रयोगात्मक 
चूहा मे चोट जैसे कुष्ठ रोग उत्पादक शलाकाणु पर 'इन विट्रो' औए “इन वाइवो' 
कार्य पर अनेक लेख प्रकाशित किये गये हैे। इस शलाकाणु पर टीका परीक्षण का 
कार्य अब व्यापक रूप से प्रगति पर है। 

3 भारतीय महिला वैज्ञानिक सघ ( आईं डब्ल्यूएस ए ) की स्थापना, 
4973 ई --वह उन चार प्रमुख सस्थापक सदस्यो मे वरिष्ठ है जिन्होने भारतीय महिला 
वैज्ञानिक सघ प्रारम्भ करने का विचार प्रतिपादित किया था। उन्होने वर्ष 4976-78 
ई में भारतीय महिला वैज्ञानिक सघ के अध्यक्ष के दायित्व का निर्वहन किया था। 
वर्ष 9984-88 ई मे वह सरक्षक मण्डल की अध्यक्ष रहां और आजकल समग्र ग्रामीण 
कार्यक्रम की सयोजक है। 


8 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


“आदिवासी कल्याण के प्रति एकीकृत दृष्टिकोण '' के अन्तर्गत निम्न प्रकरणों 
का विशेष अध्ययन किया गया है-- 

(0) पोषण और कैसर, 

(7) पोषण जीवन शैली और आदिवासियो का स्वास्थ्य, 

(7) आदिवासी महिलाओ के लिए व्यापक ग्रामीण स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रम 

(५) आदिवासी महिलाओ मे वैज्ञानिक चेतना जागृत करने के लिए “ग्रामीण 
महिला विज्ञान मण्डल । 

इस कार्यक्रम के अन्तर्गत आदिवासी महिलाओ को ' स्वास्थ्य निरीक्षक ' 
तथा अपने समुदाय के सामाजिक, सास्कृतिक और शैक्षिक उत्थान के राष्ट्रीय 
विकास कार्यक्रम के महत्त्वपूर्ण पक्ष हेतु सामाजिक कायकर्त्ताओ को प्रशिक्षित 
किया जाता है। 

सेवानिवृत्ति के उपरानत-प्रयोगात्मक जीव-विज्ञानी एबं कोशिका जीव 
विज्ञानी डॉ रणदिवे ने टाठा मेमोरियल हॉस्पिटल, भारतीय कैसर अनुसन्धान केन्द्र 
और कैंसर अनुसन्धान परिषद्‌ सस्थान मे 943-78 वर्ष मे कार्य किया और कई 
योग्यता पुरस्कार प्राप्त किए। 

दिसम्बर, 4977 ई मे सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होने भारतीय चिकित्सा 
अनुसन्धान के इमेरिटस प्रोफेसर के पद पर दो वर्ष तक कार्य किया और प्रयोगशाला 
में प्रायोजनाये पूरी की। उसके पश्चात्‌ उनका कार्य तीन स्तरो--() आदिवासी ग्रामीण 
क्षेत्रों, (2) विश्वविद्यालय, और दिल्ली--पर चल रहा है। 

4 आदिवासी ग्रामीण क्षेत्रो मे कार्य--महिलाओ और बच्चो की स्वास्थ्य 
सम्बन्धी समस्याओ के प्रति विशेष ध्यान देते हुए आदिवासी कल्याण के लिए एकीकृत 
दृष्टिकोण से आदिवासी क्षेत्र मे () स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओ के प्रशिक्षण हेतु आदिवासी 
महिलाओ के लिए व्यापक शिक्षा, (॥) आदिवासी गाँवो मे ग्रामीण महिला विज्ञान 
मण्डलो की स्थापना--आदिवासी समुदायो की सामाजिक, सास्कृतिक, सामाजिक- 
आर्थिक और स्वास्थ्य समस्याओ पर खुलकर बहस करने एव हल ढूँढने का 
मच--केन्द्र और राज्य सरकारो के विज्ञान और पौद्योगिकी विभागो के अन्तर्गत तीन 
प्रायोजनाओ सहित भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ की एक मुख्य अध्ययन 
आयोजना। 

978 ई से अब तक आदिवासी क्षेत्र मे पोषण और कैसर पर उनका कार्य 
इस बात का अध्ययन करता हे कि कम कैलोरी और कम वसा युक्त भोजन कैसर 
से बचाता है, जिसके बाद उन्होने 3 वर्ष से अधिक समय तक “आदिवासी कल्याण 
की एकीकृत विधि ' पर कार्य किया। उन्होने 25 गॉवो मे गामीण महिला विज्ञान मण्डलो 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक ]9 


की स्थापना कराई जो सामाजिक-वैज्ञानिक- सास्कृतिक कार्य कर रहे है। यह कार्य 
पश्चिमी महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्र-वासी, नव बम्बई क्षेत्र और विद्यालयों मे 'मन्द 
विद्वार्थियो ' आदि मे पूर्ण गति से चल रहा है। 

भारतीय महिला वैज्ञानिक सघ की सस्थापिका के रूप मे उन्हे महाराष्ट्र विज्ञान 
और प्रौद्योगिकी परिषद्‌ के सलाहकार मण्डल आदि मे कार्य करने क लिए आमत्रित 
किया गया! 

78 वर्ष से अधिक आयु मे भी वह हाथ मे लिए गए सभी कार्यक्रमो को 
पूरे जोश और मनोयोग से जारी किये हुए है। 

2 पूना विश्वविद्यालय--(0) उन्होंने 4980-82 मे तीन वर्ष तक सीनेट मे 
कुलाधिपति द्वारा मनोनीत सदस्य के रूप मे कार्य किया था। (0) 982-84 ई मे 
कुलाधिपति द्वारा एकेडेमिक कौसिल की मनोनीत सदस्य रही। (7) कई अन्य 
विश्वविद्यालयो की समितियों के सदस्य तथा बम्बई और पूना दोनो विश्वविद्यालयों 
की बोर्ड ऑफ स्टडीज की सदस्य रही। 

3 दिल्‍ली मे--() भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी की सदस्य, कौसिल की 
सदस्य और समितियो की सदस्य, (7) महिलाओ के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी 
विभाग की समिति की सदस्य, ग्रामीण क्षेत्रों म॑ विज्ञान और प्राद्योगिकी विकास के 
दीर्घकालीन कायक्रम के लिए ग्रामीण विकास हेतु विज्ञान और प्रौद्योगिकी उपयोग 
समिति की वह 987-90 में अध्यक्ष रही। (7) सातवी पचवर्षीय योजना मे (0) 
विज्ञान मे श्रेष्ठता (॥) ग्रामीण विकास मे विज्ञान और प्रौद्योगिकी का प्रतिनिधित्व करने 
के लिए योजना आयोग की विज्ञान और प्रौद्योगिकी परामर्शदात्री समिति की सदस्य 
रही। वह आठवी पचवर्षीय योजना के कार्यकारी समूह की सदस्य हैं। वह अन्य 
कई प्रायोजनाओ मे भी सलग्न है। 

प्रकाशन--उनका आदिवासी अध्ययन काय पश्चिमी महाराष्ट्र के सुदृरवर्ती 
क्षेत्र-अकोला ताल्‍ललुका मे चल रहा है। उनका कार्य कैसर के विविध पक्षों 
जैसे--कोशिका ऊतक तथा मानव और पशु कैसर कोशिका से सम्बद्ध है। लेप्रोमेट्स 
कुष्ठरोग के पृथक्‌ किये गये आई सी आर सी शलाकणु पर प्रयोगात्मक कार्य पर अनेक 
लेख प्रकाशित हुए है। डॉ रणदिवे के 200 से अधिक शोध-पत्र प्रख्यात राष्ट्रीय और 
अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं मे प्रकाशित हो चुके है । उन्होने 'डाउन दि मेमोरी लेन--]00जश॥ 
0९ (०7०५ .,0॥० ' नामक पुस्तक के लिए ' श्री डिकेड्स ऑफ कैंसर-- ्‌॥७८ 
70०080०5 ए ('४॥०७४' कैंसर के तीन दशक, नामक अध्याय लिखा है, जिसका 
सम्पादन उन्होने किया था। 

हा 


प्रोफेसर दरब के दस्तूर 


(।924 ई ) 


जन्म एव वश परिवार--प्रोफेसर दरब केरसस्प दस्तूर का जन्म बम्बई मे 
6 फरवरी ॥924 ई को हुआ था। उनके पिता श्री केरसस्प जे दस्तूर लेखाकार और 
दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी थे। उनकी माता श्रीमती जेबनू के दस्तूर सुगृहिणी थी। सन्‌ 
१959 ई मे उनका विवाह श्रीमती हिल्‍ला के साथ हुआ था। उनके एक पुत्र और 
एक पुत्री है। सन्‌ 96 ई मे उत्पन्न उनका पुत्र श्री मिन्‍नू डी दस्तूर बी एससी , 
व्यावर्सायक प्रशासन मे डिप्लोमाधारी टाटा कन्सल्टिग सर्विसेज मे बैकिग सलाहकार 
हं। सन्‌ 965 ई मे उत्पन्न उनकी पुत्री सुश्री रशना डी दस्तूर बी कॉम , एल एल बी 
प्रशिक्षित सॉलिसिटर है। 

शैक्षिक जीवन--प्रो दस्तूर ने अपनी विद्यालयीय शिक्षा न्यू ऐरा स्कूल, 
बम्बई मे ग्रहण की थी। उन्होने अपनी महाविद्यालयीय शिक्षा विल्सन कॉलेज तथा 
ग्रान्ट मेडिकल कॉलेज, बम्बई मे प्राप्त की। उन्होने बम्बई विश्वविद्यालय, बम्बई से 
944 ई मे जीव विज्ञान विषय मे बी एस सी (ऑनर्स ), १949 ई मे एम बी बी एस , 
952 ई मे एम डी (भेषज) और 4953 ई मे एम एस सी सूक्ष्म-जोव विज्ञान विषय 
मे उत्तीर्ण की। प्रकाशित लेखो को प्रस्तुत करने पर चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌, विकार 
विज्ञान (पैथोलॉजी-72808002५), लन्दन ने उन्हे सन्‌ 967 ई मे सूक्ष्म-जीव विज्ञान 
विषय मे एम एस सी की उपाधि प्रदान की। सन्‌ 970 ई मे बम्बई विश्वविद्यालय 
ने, जिसने उनके लेखो का चयन किया और उनकी व्याख्या की उन्हे डी एस सी 
(विकार विज्ञान) की उपाधि प्रदान की। 

व्यावसायिक जीवन--सन्‌ 949 50 ई मे उन्होने ग्रान्ट मेडिकल कॉलेज, 
बम्बई के अध्यापन से सम्बद्ध चिकित्सालयो मे हाउस सर्जन का कार्य सम्पन्न किया। 
सन्‌ 950 से 955 ई तक प्रो दस्तूर भारतीय अनुसन्धान परिषद की स्नायु रोग 
इकाई, बम्बई मे सहायक अनुसन्धान अधिकारी के पद पर कार्यरत रहे। सन्‌ 956 
ई मे वह राष्ट्रीय स्वास्थ्य सस्थान, बथेस्डा, मेरीलैंड, यू एस ए मे रॉक फेलर सस्थान 
के फैलो के पद पर कार्यरत रहे। सन्‌ १957-58 ई मे वह राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य 
सस्थान राष्ट्रीय स्वास्थ्य सस्थान, बथेस्डा सयुकत राज्य अमेरिका मे मस्तिष्क उपापचय 
विज्ञान (8ात्रा] |/९४४४७०॥५॥) प्रभाग मे विजिटिग वेज्ञानिक के पद पर कार्यरत रहे। 


92 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


है ओर अब तक प्रत्येक स्तर के दस दस शांध-प्रबन्ध स्वीकृत हो चुके है। वह 
स्‍्नायु रोग विज्ञान तथा मनोचिकित्सा विज्ञान मे' एम डी तथा स्नायु शल्य-चिकित्मसा 
मे एम एस एवं व्यावहारिक जीव विज्ञान ओर जीवन-विज्ञानो मे एम एस सी और 
पी एच डी उपाधि हेतु स्नायुरोग विज्ञान और तत्रिका-तत्र ऊतकी विषय मे छात्रो को 
व्यावसायिक व्याख्यान देते रहते है। 

व्यावसायिक सम्मान और फैलोशिप--सन्‌ 969 ई म॑ वह भारतीय 
चिकित्सा विज्ञान अकादमी, नई दिल्‍ली के फैलों बने। सन्‌ 976 ई मे डॉ दस्तूर 
रॉयल कॉलेज ऑफ पेथोलॉजिस्टस, लन्दन के फैलो निर्वाचित किए गए। सन्‌ 
॥982 ई मे वह राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के फेलो बनाये गए। सन्‌ 986 ई से वह 
इण्डियन एकेडेमी ऑफ न्यूरोसाइन्सेज के सस्थापक फैलो है। 

पुरस्कार--सन्‌ 960 इ मे उन्होने 'दि न्यूरोहिस्टोलॉीजिकल बेसिस ऑफ 
कूटानिअस एण्ड लिग्युअल सेसिबिलिटीज' विषय पर व्याख्यान के उपलक्ष मे बम्बई 
चिकित्सा परिषद्‌ का के एस के वैद्य स्मृति पुरस्कार प्राप्त किया था। सन्‌ ॥979 
ई मे उन्होने “'"पैथोलॉजी ऑफ स्पाइनल कॉर्ड इन अटलासटो-एक्सिअल डिस्लोकेशन '' 
विषय पर व्याख्यान पर इण्डियन ओर्थेपेडिक सोसायटी, बम्बई का प्रथम के टी 
धोलकिया पुरस्कार प्राप्त किया था। सन्‌ 979 मे ही दि बी-विटामिन्स एण्ड पैथोलॉजी 
ऑफ नर्व एण्ड मसिल इन मालनूट्रिशन, एण्ड विल्सन्स डिजीज इन इण्डिया कॉपर 
पेरामीटर्स इन 25 फेमिलीज '” विषय पर ऑस्ट्रेलियन एसोसिएशन ऑफ न्यूरोलॉजिस्टस 
का ग्रायम रॉबर्टसन स्मृति व्याख्यान प्रसारित किया था। सन्‌ 4980 ई मे उन्होंने बम्बई 
चिकित्सा परिषद्‌ का स्नायु रोग विज्ञान पर मेनिनो डिसूजा तराषण प्रस्तुत किया था। 
सन्‌ 98व ई मे उन्होने त्रिवेन्द्रम चिकित्सा महाविद्यालय, त्रिवेन्द्रम मे रजत जयन्ती 
भाषण दिया और पुरस्कार प्राप्त किया। सन्‌ 98 ई मे उन्होने ''लाइट एण्ड इलेक्ट्रॉन 
माइक्रोस्कोपी ऑफ नर्वस इन लेप्रस न्यूग्टीज एण्ड ब्रेन एन न्यूरोटूबरक्लोसिस ” के 
उपलक्ष मे भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌, नई दिल्‍ली का बमन्ती देवी अमीर 
चन्द पुरस्कार प्राप्त किया था। सन्‌ 983 इ मे उन्होने यूरोलॉजिकल सोसायटी ऑफ 
इण्डिया का राममूर्ति व्याख्यान प्रसारित किया। सन्‌ 985 ई म॑ उन्होने मद्रास चिकित्सा 
महाविद्यालय आर चिकित्मालय मद्रास की १50वी वर्षगॉठ के अवसर पर 
'न्यूरोपेथोलॉजी ऑफ सी जे डी इन इण्डिया, एण्ड ऑफ फेनफ्लूगमिन टोक्सिमिटी 
इन रैट्स”' विषय पर भाषण प्रस्तुत किया। सन्‌ 989 ई मे उन्होंने इण्डियन 
एसोसिएशन ऑफ नेप्रोलॉजिस्ट्स त्रिचूर के द्विवार्षिक सम्मेलन मे राष्ट्रीय 
चिकित्सा विज्ञान अकादमी का प्रोफेसर वी आर खानाल्कर स्प्रति व्याख्यान दिया। 
सन्‌ 990 ई में क्‍्योटो जापान मे इन्टरनेशनल काग्रेम ऑफ यूरापथालाजी के ग्यारहवे 
सम्मेलन मे उन्हे 20वीं शताब्दी के 39 स्नायुगग विशषज्ञा म॑ म॑ एक कहा गया। 


“992 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


ऑाा' ऑमिशाकी: 


है और अब तक प्रत्येक स्तर के दस दस शाध-प्रबन्ध स्वीकृत हो चुके है। वह 
स्‍्नायु रोग विज्ञान तथा मनोचिकित्सा विज्ञान में एम डी तथा स्नायु शल्य-चिकित्मा 
मे एम एस एवं व्यावहारिक जीव विज्ञान ओर जीवन-विज्ञानों मे एम एस सी और 
पी एच डी उपाधि हेतु स्नायुरोग विज्ञान ओर तत्रिका-तत्र ऊतकी विषय मे छात्रो को 
व्यावसायिक व्याख्यान देते रहते है। 

व्यावसायिक सम्मान और फैलोशिप--सन्‌ 969 ई मे वह भारतीय 
चिकित्सा विज्ञान अकादमी, नई दिल्‍ली के फैलो बने। सन्‌ 976 ई मे डॉ दस्तूर 
रॉयल कॉलेज ऑफ पैथोलॉजिस्टस, लन्दन के फैलो निर्वाचित किए गए। सन 
॥982 ई मे वह राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के फेलो बनाये गए। सन्‌ 986 ई से वह 
इण्डियन एकेडेमी ऑफ न्यूरोसाइन्सेज के सस्थापक फैलो है। 

पुरस्कार--सन्‌ 960 ई मे उन्होने 'दि न्यूरोहिस्टोलॉजिकल बेसिस ऑफ 
कूटानिअस एण्ड लिग्युअल सेसिबिलिटीज' विषय पर व्याख्यान के उपलक्ष मे बम्बई 
चिकित्सा परिषद्‌ का के एस के वेद्य स्मृति पुरस्कार प्राप्त किया था। सन्‌ 4979 
इ मे उन्होने ''पैथोलॉजी ऑफ स्पाइनल कॉर्ड इन अटलासटो-एक्सिअल डिस्लोकेशन /' 
विषय पर व्याख्यान पर इण्डियन ओर्थोपेडिक सोसायटी, बम्बई का प्रथम के टी 
धोलकिया पुरस्कार प्राप्त किया था। सन्‌ 4979 मे ही दि बी-विटामिन्स एण्ड पैथोलॉजी 
ऑफ नर्व एण्ड मसिल इन मालनूट्रिशन, एण्ड विल्सन्स डिजीज इन इण्डिया कॉपर 
पेरामीटर्स इन 25 फेमिलीज '” विषय पर ऑस्ट्रेलियन एसोसिएशन ऑफ न्यूरोलॉजिस्टस 
का ग्रायम रॉबर्टसन स्मृति व्याख्यान प्रसारित किया था। सन्‌ 4980 ई मे उन्होंने बम्बई 
चिकित्सा परिषद्‌ का स्नायु रोग विज्ञान पर मेनिनो डिसूजा नाषण प्रस्तुत किया था। 
सन्‌ 98व ई मे उन्होने त्रिवेन्द्रम चिकित्सा महाविद्यालय, त्रिवेन्द्रम मे रजत जयन्ती 
भाषण दिया और पुरस्कार प्राप्त किया। सन्‌ 98 ई मे उन्होने '' लाइट एण्ड इलेक्ट्रॉन 
माइक्रोस्कोपी ऑफ नर्वूस इन लेप्रस न्यूग्टीज एण्ड ब्रेन एन न्यूरोटूबरक्लोसिस '' के 
उपलक्ष मे भारतीय चिकित्सा अनुमन्धान परिषद्‌, नई दिल्‍ली का बसन्ती देवी अमीर 
चन्द पुरस्कार प्राप्त किया था। सन 983 इ मे उन्होने यूरोलाजिकल सोसायटी ऑफ 
इण्डिया का राममूर्ति व्याख्यान प्रसारित किया। सन्‌ 985 इ म॑ उन्होने मद्रास चिकित्सा 
महाविद्यालय ओर चिकित्सालय मद्रास की 50वी वर्षगॉठ के अवसर पर 
“न्यूरोपैथोलॉजी ऑफ सी जे डी इन इण्डिया, एण्ड ऑफ फेनफ्लूरामिन टोक्सिमिटी 
इन रैट्स'' विषय पर भाषण प्रस्तुत किया। सन्‌ १989 इ में उन्होंने इण्डियन 
एसोसिएशन ऑफ लेप्रोलॉजिस्टस त्रिचूर के ट्विवार्षिक सम्मेलन मे राष्ट्रीय 
चिकित्सा विज्ञन अकादमी का प्रोफेसर वी आर खानाल्कर म्प्रति व्याख्यान दिया। 
सन्‌ 990 ई में क्योटो जापान मे इन्टरनेशनल काग्रेम ऑफ यूरापथालाजी के ग्यारहवे 
सम्मेलन मे उन्हे 20वीं शताब्दी के 39 स्नायुगग विशषज्ञा म॑ से एक कहा गया। 


92 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


है और अब तक प्रत्येक स्तर क दस दस शांध-प्रबन्ध स्वीकत हो चुके है। बह 
स्‍्नायु रोग विज्ञान तथा मनोचिकित्सा विज्ञान मे एम डी तथा स्नायु शल्य-चिकित्सा 
मे एम एस एवं व्यावहारिक जोव विज्ञान ओर जीवन-विज्ञानों मे एम एस सी और 
पी एच डी उपाधि हेतु स्नायुरोग विज्ञान ओर तत्रिका-तत्र ऊतकी विषय मे छात्रो को 
व्यावसायिक व्याख्यान देते रहते है। 

व्यावसायिक सम्मान और फैलोशिप--सन्‌ 969 ई म॑ वह भारतीय 
चिकित्सा विज्ञान अकादमी नई दिल्‍ली के फेलो बने। सन्‌ 976 ई मे डॉ दस्तूर 
रॉयल कॉलेज ऑफ पैथोलॉजिस्टस, लन्दन के फैलो निर्वाचित किए गए। सन्‌ 
॥982 ई मे वह राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के फेलो बनाये गए। सन्‌ १986 ई से वह 
इण्डियन एकेडेमी ऑफ न्यूरोसाइन्सेज के सस्थापक फैलो है। 

पुरस्कार--सन्‌ 960 ३ मे उन्होने 'दि न्यूरीहिस्टोलॉजिकल बेसिस ऑफ 
कूटानिअस एण्ड लिग्युअल सेन्सिबिलिटीज' विषय पर व्याख्यान के उपलक्ष मे बम्बई 
चिकित्सा परिषद्‌ का के एस के वैद्य स्मृति पुरस्कार प्राप्त किया था। सन्‌ 4979 
ई मे उन्होने ''पैथोलॉजी ऑफ स्पाइनल कॉर्ड इन अटलान्टो-एक्सिअल डिस्लोकेशन '' 
विषय पर व्याख्यान पर इण्डियन ओथर्थोपेडिक सोसायटी, बम्बई का प्रथम के टी 
धोलकिया पुरस्कार प्राप्त किया था। सन्‌ 979 मे ही दि बी-विटामिन्स एण्ड पैथोलॉजी 
ऑफ नर्व एण्ड मसिल इन माललनूट्रिशन, एण्ड विल्सन्स डिजीज इन इण्डिया कॉपर 
पेरामीटर्स इन 25 फेमिलीज'” विषय पर ऑस्ट्रेलियन एसोसिएशन ऑफ न्यूरोलॉजिस्टस 
का ग्रायम रॉबर्टसन स्मृति व्याख्यान प्रसारित किया था। सन्‌ 980 ई मे उन्होंने बम्बई 
चिकित्सा परिषद्‌ का स्नायु रोग विज्ञान पर मेनिनो डिसूजा गषण प्रस्तुत किया था। 
सन्‌ 398 ई मे उन्होने त्रिवेनद्रम चिकित्सा महाविद्यालय, त्रिवेन्द्रम मे रजत जयन्ती 
भाषण दिया और पुरस्कार प्राप्त किया। सन्‌ 98 ई मे उन्होने '' लाइट एण्ड इलेक्ट्रॉन 
माइक्रोस्कोपी ऑफ नर्वस इन लेप्रस न्यूग्टीज एण्ड ब्रेन एन न्यूरोटूबरक्लोसिस '' के 
उपलक्ष मे भारतीय चिकित्सा अनुमन्धान परिषद्‌, नई दिल्‍ली का बसन्ती देवी अमीर 
चन्द पुरस्कार प्राप्त किया था। सन 983 इ मे उन्होने -यूरोलॉजिकल सोसायटी ऑफ 
इण्डिया का राममूर्ति व्याख्यान प्रसारित किया। सन 985 ई म॑ उन्होने मद्रास चिकित्सा 
महाविद्यालय ओर चिकित्सालय मद्रास की 50वी वर्षगॉठ के अवसर पर 
''न्यूरोपैथोलॉजी ऑफ सी जे डी इन इण्डिया, एण्ड ऑफ फेनफ्लूरामिन टोक्सिमिटी 
इन रेट्स” विषय पर भाषण प्रस्तुत किया। सन्‌ 989 ई में उन्हांने इण्डियन 
एसोसिएशन ऑफ नेप्रालॉजिस्ट्स त्रिचूर के द्विवार्षिक सम्मेलन मे राष्ट्रीय 
चिकित्सा विज्ञान अकादमी का प्रोफेसर वी आर खानाल्कर म्प्रति व्याख्यान दिया। 
सन्‌ 990 ई में क्‍्योटो जापान मे इन्टरनेशनल कांग्रेम ऑफ यूरोप थालॉजो के ग्यारहवे 
सम्मेलन म उन्हे 20वीं शताब्दो के 39 स्नायुगग विशषज्ञा में से एक कहा गया। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 23 


2। फरवरी, 99 ई को डॉ दस्तूर ने चिकित्सा एव सम्बद्ध क्षेत्रों मे विशेष रूप 
से तत्रिका विज्ञान के क्षेत्र मे महत्त्पपूण अनुसन्धान के उपलक्ष मे वर्ष १990 9] ई 
का रामेश्वरदास बिडला स्मारक कोष राष्ट्रीय पुरस्कार पाप्त किया था। 


प्रकाशन और अतिथि व्याख्यान--डॉ दस्तूर के लगभग 209 वैज्ञानिक तख 
स्वीकृत पुस्तकों और जर्नलो मे (॥) स्नायुरोग (न्यूरोपैथोलॉजी) नाडी मॉसपशी 
हतपेशी (मायोकार्डियम-])/५०८ग्रताणा)) एवं त्वचा पर 63, (2) स्नायुरोग 
(न्यूरोपैथोलॉजी ) केन्द्रीय नाडी तत्र (मस्तिष्क और मेरूरज्जु या रीढ की हड्डी) 
तथा रासायनिक गेग विज्ञान (॥०॥0792०॥0029५) पर 03 तथा (3) केन्द्रीय नाडी- 
तत्र का कायिको रोग विज्ञान (॥५०० ए४॥0029५) एवं विविध विकारों का ऊतक 
रोग विज्ञान पर 43 प्रकाशित हुए है। वह कुष्ठ रोग और स्नायु क्षय-रोग मे से प्रत्येक 
पर एक, एक पुस्तक के सह-सम्पादक हैं| सन्‌ 796-990 ई की अवधि मे उन्होने 
सयुकत राज्य अमेरिका, इग्लेड, जापान, जर्मनी आस्ट्रेलिया, भारत, आस्ट्रिया और अन्य 
देशो मे तत्रिका विज्ञान, रोग विज्ञान, कुष्ठ रोग अथवा चिकित्सा विज्ञान के सस्थाओ 
मे स्नायु रोग पर किये गये अनुसन्धान के 5 विभिन्‍न प्रकरणो पर लगभग 70 अतिथि 
व्याख्यान दिये। इसी अवधि मे उन्होंने लगभग 30 अन्तर्राष्ट्रीय काग्रेसो और सम्मेलनो 
मे लगभग 40 शोध पत्र प्रस्तुत किए। सन्‌ 979 ई मे वह आस्ट्रेलियन एसोसिएशन 
ऑफ न्यूरोलोजिस्टस के आमत्रित अतिथि वक्ता थे। वह 980 ई मे पर्थ, आस्ट्रेलिया 
मे, 4985 ई मे इन्स्टीट्यूट ऑफ बेसिक रिसर्च इन न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स, स्टेटन 
आइलैड, न्यूयार्क, और तत्रिका विज्ञान विभाग, जॉन्स हॉपकिन्स, बाल्टीमोर सयुकत 
राज्य अमेरिका मे स्नायुरोग विज्ञान के विजिटिग प्रोफेसर थे। उन्होने ''तप्रिका रोग 
विज्ञान - ए८पा०! 0०8०4 $८/६706५ .. पर एक पुस्तक का सम्पादन किया (जिनमे 
9 दशो के सम्भागी थे)-सम्पादकगण दस्तूर, डी के भरुचा, ई पी, साहनी एम 
989, इन्टरप्री, पृष्ठ 25-275 

अनुसन्धान के प्रमुख क्षेत्र--उनके अनुसन्धान के मुख्य क्षेत्र हे--मानव की 
सामान्य और विकृत आयु मे मस्तिष्कीय रक्त प्रवाह एवं उपापचय, कुष्ठरोग के विभिन्‍न 
प्रकारो एवं स्थितियों मे नाडियो की पूर्व सरवना एवं ऊतक रांग विज्ञान, क्षय -रागीय 
मस्तिष्क की झिल्ली की सूजन मे मस्तिष्क ओर मेरुरज्जू क्षयरोगीय मस्तिष्क की काई 
अव्यवस्था एव वैस्कूलापैथीज के प्रसग सहित, कई हजार स्थान घेरने वालो चांटा 
( अन्त कपाल सम्बन्धी ओर अन्त मेरुरज्जु सम्बन्धी) की ऊतक रोग मम्बण्ी व्याख्या 
सहित केन्द्रीय नाडी तत्र के गॉठो (गिल्टियो) का विकार विज्ञान, मासपेशीय प्रुटिपूर्ण 
पोषणो, मेरु रज्जु सम्बन्धी तात्रका सम्बन्धी आर अप्रचारित क्षीणता कई पेशियां मे 
सूजन और अपचय सम्बन्धी पेशी रोगो सहित मॉमपशो विकारों का रोग विज्ञान 


22 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


है ओर अब तक प्रत्येक स्तर क दस-दस शाध-प्रबन्ध स्वीकत हो चुके है। वह 
स्नायु रोग विज्ञान तथा मनोचिकित्सा विज्ञान म एम डी तथा स्नायु शल्य-चिकरित्मा 
मे एम एस एवं व्यावहारिक जीव विज्ञान ओर जीवन-विज्ञानों मे एम एस सी आर 
पी एच डी उपाधि हेतु स्नायुरोग विज्ञान और तत्रिका-तत्र ऊतकी विषय मे छात्रो को 
व्यावसायिक व्याख्यान देते रहते है। 

व्यावसायिक सम्मान और फैलोशिप--सन्‌ 969 ई म॑ वह भारतीय 
चिकित्सा विज्ञान अकादमी, नई दिल्‍ली के फैलो बने। सन्‌ 3976 ई में डॉ दस्तूर 
रॉयल कॉलेज ऑफ पैथोलॉजिस्टस, लन्दन के फेलो निर्वाचित किए गए। सन्‌ 
॥982 ई में वह राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के फेलो बनाये गए। सन्‌ 986 ई से वह 
इण्डियन एकेडेमी ऑफ न्यूरोसाइन्सेज के सस्थापक फैलो है। 

पुरस्कार--सन्‌ 960 ई मे उन्होने 'दि न्यूरोहिस्टोलॉजिकल बेसिस ऑफ 
कूटानिअस एण्ड लिग्युअल सेसिबिलिटीज' विषय पर व्याख्यान के उपलक्ष मे बम्बई 
चिकित्सा परिषद्‌ का के एस के वैद्य स्मृति पुरस्कार प्राप्त किया था। सन्‌ 979 
इ मे उन्होने ''पेथोलॉजी ऑफ स्पाइनल कॉर्ड इन अटलास्टो-एक्सिअल डिस्लोकेशन '! 
विषय पर व्याख्यान पर इण्डियन ओर्थोपेडिक सोसायटी बम्बई का प्रथम के टी 
धोलकिया पुरस्कार प्राप्त किया था। सन्‌ 979 मे ही दि बी-विटामिन्स एण्ड पैथोलॉजी 
ऑफ नर्व एण्ड मसिल इन माललनूट्रिशन, एण्ड विल्सन्स डिजीज इन इण्डिया कॉपर 
पेरामीटर्स इन 25 फेमिलीज '' विषय पर ऑस्ट्रेलियन एसोसिएशन ऑफ न्यूरोलॉजिस्टस 
का ग्रायम रॉबर्टसन स्मृति व्याख्यान प्रसारित किया था। सन्‌ 980 ई मे उन्होने बम्बई 
चिकित्सा परिषद्‌ का स्नायु रोग विज्ञान पर मेनिनों डिसूजा नाषण प्रस्तुत किया था। 
सन्‌ 98 ई मे उन्होने त्रिवेन्द्र;म चिकित्सा महाविद्यालय, त्रिवेन्द्रम मे रजत जयन्ती 
भाषण दिया और पुग्स्कार प्राप्त किया। सन्‌ 98 ई मे उन्होने '' लाइट एण्ड इलेक्ट्रॉन 
माइक्रोस्कोपी ऑफ नवूस इन लेप्रस न्यूग्टीज एण्ड ब्रेन एन न्यूरोटूबरक्लोसिस ' के 
उपलक्ष मे भारतीय चिकित्सा अनुमन्धान परिषद्‌, नई दिल्‍ली का बसन्ती देवी अमीर 
चन्द पुरस्कार प्राप्त किया था। सन 983 ई मे उन्होने -यूरोलॉजिकल सोसायटी ऑफ 
इण्डिया का राममूर्ति व्याख्यान प्रसारित किया | सन्‌ 985 इ मे उन्होने मद्रास चिकित्सा 
महाविद्यालय ओर चिकित्सालय मद्रास की १50वी वर्षगॉठ के अवसर पर 
“'न्यूरोपैथोलॉजी ऑफ सी जे डी इन इण्डिया, एण्ड ऑफ फेनफ्लूगमिन टोक्सिसिटी 
इन रैट्स'' विषय पर भाषण प्रस्तुत किया। सन्‌ 989 इ मे उन्हाने इण्डियन 
एसोसिएशन ऑफ नेप्रोलॉजिस्ट्स त्रिचूर के द्विवार्षिक सम्मेलन मे राष्ट्रीय 
चिकित्सा विज्ञान अकादमी का प्रोफेसर वी आर खानाल्कर स्मृति व्याख्यान दिया। 
सन्‌ 990 ई में क्योटो जापान मे इन्टरनेशनल काग्रेम ऑफ यूरोप थालॉजो के ग्यारहवे 
सम्मेलन म उन्हे 20वीं शताब्दों के 39 स्नायुगग विशषज्ञा म॑ से एक कहा गया। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 0, 


2] फरवरी, 99 ई को डॉ दस्तूर ने चिकित्सा एवं सम्बद्ध क्षेत्रा मे विशेष रूप 
से तत्रिका विज्ञान के क्षेत्र मे महत्त्वपूर्ण अनुसन्धान के उपलक्ष मे वर्ष 9990-9] ई 
का रामेश्वरदास बिडला स्मारक कोष राष्ट्रीय पुरस्कार पाप्त किया था। 


प्रकाशन और अतिथि व्याख्यान--डॉ दस्तूर के लगभग 209 वैज्ञानिक लेख 
स्वीकृत पुस्तको और जर्नलो मे (॥ स्नायुरोग (न्यूरोपैथोलॉजी) नाडी, मॉसपेशी 
हतपेशी (मायोकार्डियम-]/५०८००वापा॥)) एवं त्वचा पर 63, (2) स्तनायुरोग 
(न्यूरोपैथोलॉजी ) केन्द्रीय नाडी तत्र (मस्तिष्क और मेरूरज्जु या रीढ की हड्डी) 
तथा रासायनिक गेग विज्ञान (#था०००४४०॥०४५) पर 03 तथा (3) केन्द्रीय नाडी- 
तंत्र का कायिकी रोग विज्ञान (/9०0-7%0029) एवं विविध विकारों का ऊतक 
रोग विज्ञान पर 43 प्रकाशित हुए हैं। वह कुष्ठ रोग और स्नायु क्षय-रोग मे से प्रत्येक 
पर एक, एक पुस्तक के सह-सम्पादक है। सन्‌ १96-990 ई की अवधि मे उन्होने 
सयुकक्‍त राज्य अमेरिका, इग्लेड, जापान, जर्मनी, आस्ट्रेलिया, भारत, आस्ट्रिया और अन्य 
देशो मे तत्रिका विज्ञान, रोग विज्ञान, कुष्ठ रोग अथवा चिकित्सा विज्ञान के सस्थाओ 
मे स्नायु रोग पर किये गये अनुसन्धान के 5 विभिन्‍न प्रकरणो पर लगभग 70 अतिथि 
व्याख्यान दिये। इसी अवधि मे उन्होने लगभग 30 अन्तर्राष्ट्रीय काग्रेसो और सम्मेलनो 
मे लगभग 40 शोध -पत्र प्रस्तुत किए। सन्‌ 979 ई मे वह आस्ट्रेलियन एसोसिएशन 
ऑफ न्यूरोलोजिस्टस के आमत्रित अतिथि वक्ता थे। वह 980 ई मे पथ, आस्ट्रेलिया 
मे, 985 ई मे इन्स्टीट्यूट ऑफ बेसिक रिसर्च इन न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स, स्टेटन 
आइलैड, न्यूयार्क, और तत्रिका विज्ञान विभाग, जॉन्स हॉपकिन्स, बाल्टीमोर सयुक्त 
राज्य अमेरिका मे स्नायुरोग विनान के विजिटिग प्रोफेसर थे। उन्होने “'तत्रिका रोग 
विज्ञान - ि&पा00ट्टा०व॑ $02॥५८5 “' पर एक पुस्तक का सम्पादन किया (जिनमे 
9 दशो के सम्भागी थे)-सम्पादकगण दस्तूर, डी के , भरुचा, ई पी , साहनी एम 
989, इन्टरप्री, पृष्ठ 25-275 

अनुसन्धान के प्रमुख क्षेत्र-उनके अनुसन्धान के मुख्य क्षेत्र है--मानव की 
सामान्य और विकृत आयु मे मस्तिष्कीय रक्त प्रवाह एवं उपापचय, कुष्ठरोग के विभिन्‍न 
प्रकारों एवं स्थितियों मे नाडियो की पूर्व सरचना एवं ऊतक रोग विज्ञान, क्षय-रोगीय 
मस्तिष्क की झिल्ली की सूजन मे मस्तिष्क ओर मेरुरज्जू- क्षयरोगीय मस्तिष्क की कोई 
अव्यवस्था ण्व वैस्कूलापैथीज के प्रसग सहित कई हजार स्थान घेरने वाली चोटो 
(अन्त कपाल सम्बन्धी और अन्त मेरुरज्जु सम्बन्धी) की ऊतक रोग सम्बन्धी व्याख्या 
सहित केन्द्रीय नाडी तत्र के गॉठो (गिल्टियो) का विकार विज्ञान, मॉसपेशीय त्रुटिपूर्ण 
पोषणो, मेरु रज्जु सम्बन्धी तत्रिका सम्बन्धी ओर अप्रचारित क्षीणता, कई पेशियो म॑ 
सूजन और अपचय सम्बन्धी पेशी रोगो सहित मॉसपंशी विकारों का रोग विज्ञान, 


2] भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


मानवीय यकत सम्बन्धी सम्मछा और भारत में विल्सन क राग के अपचय सम्बन्धी 
प्र आइसोटोपिक मेगनीज का प्रयोगात्मक अध्ययन, नाडी तत्र के पाषण सम्बन्धी 
विकार विशेषत प्रौढो म बी विटामिन की कमी एवं बच्चों मे नाही ओर मॉसपेशी 
मनुष्यों ओर चूहो के मस्तिष्को म॑ जलातक मस्तिष्क शोथो ओर मन्द वायरस सक्रामक 
रोगो की प्रकाश ओर इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कापी, ऑषधि जनित एवं भण्डारण तथा छूत 
के विकारों में विभिन्‍न ऊतको म॑ कीटाणु नाशक पदार्थ, वातरोगीय और जन्मजात 
हृदयरोग मे हृतपेशी का ऊतक रसायन और उत्तम सरचना, प्रेरक कोशिका तत्रिका 
रोग के विशेष सदभ सहित साइकेडिज्म ((४८००५॥), लैथिरिज्म (॥ ॥णशा५ा) 
के ( मानवीय अथवा प्रयोगात्मक ) स्नायुरोग विज्ञान एव स्नायु विषाक्तता, और तत्रिका 
काशिकीय तथा ग्लाअल कोशिका भण्डारण के विशेष सदभ म॑ थध्रुधा सम्बन्धी ठोस 
पदार्थ, विट्रो मे गॉठ कोशिकाओं द्वारा कवक जीवाणु के अपच और गिरावट के विशेष 
सदर्भ मे मस्तिष्क की गॉठो का ऊतक सवर्धन और इलैम्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी, असामान्य 
स्नायुरोगो का रोग विज्ञान विशेषत स्नायु सूत्र सचय जैसे विशाल तत्रिकाक्षी अथवा 
ओषधिजनित (जैसे शिशुओ मे अतिसार विरोधी एव क्षयरोगी विरोधी ), ओर सामान्य 
एवं रुग्ण आँत के स्वय १र्देशित तत्रिक विन्यास की उत्तम सरचना ओर ऊतक रसायन | 

सन्‌ 4990 ई मे गतिविधियाँ और सम्मान--सन्‌ 990 ई मे डॉ दस्तूर 
को निम्नलिखित गतिविधियों रही और अधोलिखित सम्मात्र उन्होने प्राप्त किए-- 

( ) जनवरी रिसर्च सोसायटी ऑफ जी एम सी एण्ड जे जे एच का रजत 
जयन्ती भाषण (लेप्रस न्यूरीटिस)। 

(2) फरवरी नैयर चिकित्सालय, बम्बई की स्वर्ण जयन्ती पर डॉ सुब्रह्मण्यम 
भाषण (वायरल एनसेफेलिटाइड्स ) | 

(3) मार्च मस्तिष्ककीय गॉठो के पुन वर्गीकरण पर ज्यूरिच, स्विट्जरलैंड 
मे विश्व स्वास्थ्य सगठन की बैठक मे आमत्रित सहभागी। 

(4 ) सितम्बर क्‍्यांटो, जापान मे इन्टरनेशनल काग्रेस ऑफ न्यूरोपैथोलॉजी 
क ग्यारहवे सम्मेलन मे ट्रॉपिकल न्यूरोपैथोलॉजी पर कार्यशाला के अध्यक्ष के रूप 
में आमत्रित। 

(5) सितम्बर म्यूनिख, जर्मनी मे इन्टरनेशनल काग्रेस ऑन न्यूरोमस्कूलर 
डिजीजेज के सातवे सम्मेलन मे इन्फेक्सस न्यूरोपेथीज पर कार्यशाला को अध्यक्षता 
ढेतु आमत्रित। 

(6) इण्डियन एकेडेमी ऑफ न्यूरोसाइन्सेज के १990 9] के अध्यक्ष निर्वाचित 
तथा दिसम्बर, 990 में नई दिल्‍ली में अध्यक्षीय भाषण | 

[] 


प्रोफेसर सी एल पाठक 
(।925-992 ई ) 


जन्म और शिक्षा--5 अप्रैल, 925 ई को आविर्भूत प्रो सां एल पाठक 
ने आगरा विश्वविद्यालय, आगरा से 950 ई मे एम बी बी एस और १954 ई 
मे एम डी उपाधि, एवं ग्लासगो विश्वविद्यालय (इग्लैड) से पी एच डी की उपाधि 
प्राप्त की। 

व्यावसायिक जीवन--प्रो पाठक ने सन्‌ 952 से 954 ई तक प्रदर्शक 
(07०४7 /0०) सन्‌ 4954 से 958 ई तक व्याख्याता, सन्‌ 4958 से 963 
ई तक रीडर एवं 4963 से 980 ई तक प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, शरीर रचनाशास्त्र, 
जैव भौतिकी एवं जैवरसायन विभाग के पद पर सेवा की। सन्‌ 980 से 986 ई 
तक वह आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, जोधपुर (राजस्थान), भारत मे भारतीय चिकित्सा 
अनुसन्धान परिषद्‌ के अन्तर्गत एमेरिटस चिकित्सा वैज्ञानिक के रूप मे कार्यरत रहे। 
उन्हे 32 वर्षों का अध्यापन एवं शोध कार्य का अनुभव था। वह आयुर्विज्ञान 
महाविद्यालय, जोधपुर मे ओ आई बी आर के अध्यक्ष, निदेशक एवं परामर्शद रहे। 


प्रकाशन--प्रो पाठक के 54 शोध-पत्र राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय जर्नलो में 
प्रकाशित हुए, जिनमे अमेरिकन हार्ट जर्नल, एक्टा कार्टिओलोगोका (बेल्जियम), और 
कार्डिओलोजी (बेसेल) मे सम्पादकीय भी सम्मिलित है। उन्होने सन्‌ 979 ई मे 
“बेसिक हिस्टोलोजी एण्ड हेमेटोलोजी' विषय पर एक पाठ्यपुस्तक भी प्रकाशित 
की थी। 

फैलोशिप--इण्डियन एकेडेमी ऑफ मेडिकल साइन्सेज की फैलोशिप 
(एफ ए एम एस ) तथा इन्टरनेशनल कॉलेज ऑफ एन्गिऑलोजी, यू एस ए की 
फैलोशिप (एफ आई सी ए ) उन्हे क्रमश सन्‌ 4973 और १974 ई मे प्रदान 
की गई। 

अनुसन्धान कार्य--उनकी शोध अभिरुचि के क्षेत्र हृदयवाहिनी सम्बन्धी 
रचनाशास्त्र ( कार्डियोवेस्कूलर फिजियोलोजी), अन्त स्राव विज्ञान (एन्डोक्रिनोलॉजी ), 
पोषण (न्यूट्रिन) औषधि विज्ञान ( फर्भाकोड।यनेमिक्स), जैवभौतिकी, जैवरसायन, 


26 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


रूप-विज्ञान (मॉर्फोलॉजी), स्तनपायियो का ऊतक रसायन (हिस्टो-कैमिस्ट्री ऑफ 
मेमेलियन्स) तथा मानव हृदय थे। प्रभावोत्पादकक अवलोकनो एवं निरीक्षणो के 
फलस्वरूप नवीन अवधाराणाओ का विकास हुआ जैसे--हृदय गति का स्वाभाविक 
स्वत नियमन (फ्रागाद८ 4प/062फ970॥ ० सै २४८) वास्तविक आधारभूत 
स्वाभाविक हृदय गति (7८ 8980 ॥ग्ञा॥0० सलै८आ २४०४) औषधियो का 
द्विकलात्मक कार्य तथा सूक्ष्म खुराको के प्रति जैवीय चेतना (8छञाबदाट &०एणा ० 
[0९5 कात 300श८ब॥। $शाआआजशाए 00 १॥०९८०० 005८५) विशिष्ट कोशिका 
तत्र की उत्पत्ति (527685 ० $9९०८०॥६८० '१55४८) हत्पेशीय तन्तुओ मे बीज 
सम्बन्धी गुप्त मार्ग (चा०ए6७/ पणया॥ठ] ॥ /५४०८४०॥३। 98४) तथा नॉनलिपोफूसिन 
कणिका तत्त्व (2ाथाप।& ०णा०थ॥)। फॉस्फोरिलेस (770०//05-452०) क्षोभक 
(थारट/॥6) का प्रदर्शन हृदय की विशिष्ट कोशिका तत्र के लिए सर्वोत्तम ऊतक 
रासायनिक (]ञञू००7श॥7ा०४।) गणक (गाक्षा(८) के रूप मे किया गया था। 


सम्मान एवं पुरस्कार--उनके प्रकाशित कार्यो का प्रसग अनेक अन्तर्राष्ट्रीय 
पाठयपुस्तको, निबन्ध मालाओ, समीक्षाओ एवं जर्नलो मे मिलता है। 


उनकी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियो एवं विशिष्ट सेवाओ के फलस्वरूप राजस्थान 
राज्य सरकार ने उन्हे दस वर्ष तक “योग्यता वेतन” प्रदान किया था। विशिष्टताओ 
के विकास के उपलक्ष मे उन्हे 977 मे डॉ बी सी राय राष्ट्रीय पुरस्कार, सन्‌ 982 
ई मे श्री अमृत मोदी शोध सस्थान का यूनिट्रस्ट ग्यारहवाँ अवार्ड एव सन्‌ 983 
ई में एनेटोमिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया का डॉ एच जे मेहता स्मृति स्वर्ण पदक 
पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित एवं विभूषित किया था। सन्‌ 986 ई मे उन्होने रेन 
बेक्सी शोध सस्थान का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया था। 


देहावसान--प्रो पाठक का 9 मार्च, 4992 ई को जयपुर (राजस्थान), 
भारतवर्ष मे देहावसान हो गया। वे अपने पीछे एक पुत्र और एक पुत्री छोड गए। 


[] 


प्रोफेसर ए एस. पेटल 
(१925 ई ) 


जन्म एव वश परिचय--डॉ मानसिह एवं श्रीमती राजवश कौर की सन्‍्तान 
प्रोफेसर औतारसिह पेटल का जन्म 24 सितम्बर, 925 ई को मोगक (बमा) मे 
हुआ था। उनके पिता चिकित्सक थे। उनके एक पुत्र और दो पुत्रियोँ हैं। वह और 
उनकी पत्नी आशिमा तत्रिका (नाडी) अन्त्यो (छोरो अथवा सिरो), जिनको सग्राहक 
अथवा ज्ञापक कहा जाता है ओर जो मस्तिष्क को मूचनाये भेजते है अर्थात्‌ आन्तो 
के सग्राहक मस्तिष्क को बतलाते हैं कि आपने शरीर की आवश्यकताओ को पूरा 
करने के लिए कब अधिक खाया या पीया है, के अनुसन्धान कार्य मे एक दल की 
तरह कार्यरत है। 


शिक्षा-प्रो पेटल ने एस बी बी एस खालस्ा हाई स्कूल, लाहौर, फोरमन 
क्रिश्चियन कॉलेज, लाहोर, लखनऊ विश्वविद्यालय और एडिनबग विश्वविद्यालय मे 
शिक्षा ग्रहण की। उन्होने लखनऊ विश्वविद्यालय से एम बी बी एस और एमडी 
उपाधियों तथा एडिनबरा विश्वविद्यालय से पी एच डी और डी एस सी की उपाधियों 
प्राप्त कों। एडिनबरा विश्वविद्यालय ने उन्हे सन्‌ १960 ई में डी एस सी की उपाधि 
प्रदान की थी। 


व्यावसायिक जीवन--प्रो पेटल ने कई पदो पर कार्य किया है जैसे सन्‌ 
949 ई म किगजार्ज चिकित्सा महाविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय मे शरीर-क्रिया 
विज्ञान विषय के व्याख्याता, सन 950 ई में रॉकफेलर फेलो, सन्‌ 495। ई मे 
एडिनबरा विश्वविद्यालय मे शरीर-क्रिया विज्ञान विषय के व्याख्याता, सन्‌ 952 से 
954 ईं तक नियत्रण अधिकारी तकनीकी विकास सगठन प्रयोगशालयये, प्रतिरक्षा 
मत्रालय, कानपुर, सन्‌ 954 से 956 ई तक सहायक निदेशक, वललभ भाई पटेल 
वक्ष सस्थान, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्‍ली, सन्‌ 956 ई मे एसोशियट प्रोफेसर, 
अल्बर्ट आइन्स्टीन कॉलेज ऑफ मेडिसन, न्‍्यूयार 957 ई मे विजिटिग एसोशियट 
प्राफेसर, शरीर-क्रिया विज्ञान, ऊटा विश्वविद्यालय, सयुक्त गज्य अमेरिका, 958 ई 
म॑ विजिटिग प्रोफेसर फिजियोलोजिक इन्स्टीटयूट, गोटिगन विश्वविद्यालय, सन्‌ ॥958 
से 964 इनक प्राफेसर शरीर-क्रिया विज्ञान, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञन सस्थान 


28 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


नई दिल्ली, सन्‌ 964 से 986 ई तक प्रोफेसर, शरीर-क्रिया विज्ञान एवं निदेशक, 
सरदार वललभ भाई पटेल वक्ष सस्थान, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्‍ली तथा अगस्त, 
986 ई से जुलाई, 989 ई तक महानिदेशक, भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌, 
नइ दिल्‍ली। सन्‌ 966-67 ई मे वह अधिष्ठाता, चिकित्सा विज्ञान सकाय, दिल्ली 
विश्वविद्यालय, तथा 966-67 ई मे ही राष्ट्रमण्डल विजिटिग प्रोफेसर, शरीर-क्रिया 
विज्ञान, सेन्ट बार्थोलोम्यू हॉस्पिटल, मेडिकल स्कूल, लन्दन के पद पर कार्यरत रहे। 
अगस्त, 989 ई से अगस्त, 997 ई तक वह कार्यक्रम निदेशक, डी एस टी सेन्टर 
फॉर विसरल मेकेनिज्म, वल्‍लभ भाई पटेल वक्ष सस्थान, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली 
40007 के पद पर कार्यरत रहे तथा सेवा निवृत्ति के बाद भी अनुसन्धान कार्य में 
प्रवृत्त हैं। 

सदस्यता और फैलोशिप--सन्‌ 950 ई मे उन्हे रॉकफेलर फैलोशिप प्रदान 
की गई थी तथा वह एडिनबरा गए, जहाँ उन्होने विद्युत-शरीर-क्रिया विज्ञान के प्रख्यात 
विद्वान डॉ हिटरिज के निर्देशन मे कार्य किया। ह्विटरिज ने अनुसन्धान के प्रति पेटल 
की प्रतिभा की सराहना की। वह 953 ई मे फिजियोलॉजिकल सोसायटी, इग्लैड 
954 ई में एरगोनोमिक्स रिसर्च सोसायटी, सयुकत राज्य अमेरिका, फिजियोलॉजिकल 
सोसायट ऑफ इण्डिया, नेशनल कॉलेज ऑफ चेस्ट फिजिशियन्स (इण्डिया) , इण्डियन 
कॉलेज ऑफ एलर्जी एण्ड इम्मूनोलॉजी, तथा नेशनल एकेडेमी ऑफ मेडिकल साइन्सेज 
(इण्डिया) के सदस्य रहे। सन्‌ 98। ई मे वह रॉयल सोसायटी, लन्दन के फैलो 
बने, तथा इस अनुपम एवं विशिष्ट सम्मान को प्राप्त करने वाले वह प्रथम भारतीय 
चिकित्सा वैज्ञानिक थे, और 966 ई मे वह रॉयल सोसायटी, एडिनबरा के फैलो 
बने। सन्‌ 987 ई मे वह रॉयल कॉलेज ऑफ फिजिशियन्स के फैलो बनाये गए। 
वह सन्‌ 966 ई मे इण्डियन एकेडेमी ऑफ मेडिकल साइन्सेज, 97 ई मे इण्डियन 
नेशनल साइन्स एकेडेमी तथा 983 ई मे इण्डियन एकेडेमी ऑफ साइन्सेज के फैलो 
बनाए गए। 

सम्मान और पुरस्कार--प्रो पेटल ने सन्‌ 956 ई में शकुन्तला देवी अमीरचन्द 
पुरस्कार, सन्‌ 957 इ मे बसन्ती देवी अमीर चन्द पुरस्कार, भारतीय चिकित्सा परिषद, 
नई दिल्‍ली का 3973-74 ई का बी सी राय भाषण पुरस्कार मेडिकल कॉलेज 
ऑफ इण्डिया का रजत जयन्ती पुरस्कार 7978 इ एशियाटिक सोसायटी का बर्कले 
पदक, वर्ष 4982 ई देहाग और आमाशय के ऊपरी छिद्र के सग्राहक के क्षेत्र मे 
अनुसन्धान के उपलक्ष मे रामेश्वर दास बिडला राष्ट्रीय पुरस्कार वर्ष 983 ई , मध्यप्रदश 
सरकार का जवाहर लाल नेहरू विज्ञान पुरस्कार वर्ष १983 ई मर्चर्षि दयानन्द शताब्दी 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 29 


समारोह स्वर्ण-पदक वर्ष 983 ई, आचार्य जे सी बोस पदक वर्ष ॥985 पद्म 
विभूषण 3986 ई, भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमा पुरस्कार वर्ष 995 ई तथा 
27 फरवरी, 4995 ई को भारतीय विज्ञान काग्रेस एशोसिएशन (कलकत्ता) पदक 
वर्ष 4995 ई मे प्राप्त किया। 


प्रो पेटल सन्‌ 980 ई मे इण्डियन कॉलेज ऑफ एलर्जी एण्ड इम्मूनोलॉजी 
के अध्यक्ष, सन्‌ 98-82 ई में भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के उपाध्यक्ष, सन्‌ 
982-86 ई में नेशनल कॉलेज ऑफ चेस्ट फिजिशियन्स (इण्डिया) के अध्यक्ष, 
सन्‌ 984-85 ई में भारतीय विज्ञान काग्रेस एसोसिएशन के अध्यक्ष तथा सन्‌ 4986- 
87 ई मे भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के अध्यक्ष रहे। वह सन्‌ 984 ई मे 
एडिनबरा विश्वविद्यालय मे शार्पे शेफर व्याख्याता तथा सन्‌ 984 ई मे जवाहर लाल 
नेहरू विश्वविद्यालय मे डॉ जाकिर हुसैन स्मृति भाषणमाला के वक्ता रहे। सन्‌ 982 
ई में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, सन्‌ 984 ई मे दिल्‍ली विश्वविद्यालय और 986 
ई मे अलीगढ विश्वविद्यालय ने उन्हे डी एस सी की मानद उपाधि से विभूषित किया। 


प्रकाशन--प्रो पेटल ने मार्फोलॉजी एण्ड मेकेनिज्मस ऑफ केमोरिसेप्टर्स, 
976 ई , और रेस्पिरेटरी अडेप्टेशन्स, कैपिलरी एक्सचेज एण्ड रिफ्लेक्स मेकेनिज्मस, 
3977 नामक पुस्तको का सम्पादन किया। उनके असख्य लेख जर्नल ऑफ 
फिजिओलॉजी तथा अन्य फिजिजोलॉजिकल जर्नलो मे प्रकाशित हुए हैं। 


आमोद-प्रमोद के साधन--उनके आमोद-प्रमोद के साधन तैराकी, नौका 
चालन एवं पक्षियों का अवलोकन हैं। 

देन-प्रो पेटल ने देहाग ज्ञानदायक यात्रीकरण एवं उनके विपरीत प्रभाव, 
स्तनपायी जीवो के नाडी-तन्तुओ की विशेषताओ, ज्ञानदायक सग्राहकों पर रासायनिक 
पदार्थ के कार्य करने के ढंग, मॉसपेशियो के दबाव-दर्द सग्राहको और गतिशील प्रेरक 
तन्तुओ तथा महाधमनी सम्बन्धी रसायन-ग्राहियो की उत्तेजना के यात्रीकरण के ज्ञान 
मे महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। वह विशेष रूप से हृदय के परिकोष्ठो के सग्राहको 
के घनफल, पाचन सम्बन्धी फैलाव के सग्राहको और फेफडो के जो सग्राहक की 
खोज और यह दिखलाने के लिए प्रसिद्ध हैं कि महाधमनी सम्बन्धी रसायन-ग्राहियो 
के लिए प्राकृतिक उत्तेजना ऑक्सीजन की उपलब्धता के कारण होती थी। आजकल 
वह उच्च आकार की समस्याओं ओर जे सग्राहको के विपरीत प्रभावों और अनुभवों 
पर अनुसन्धान मे सलग्न हैं जो श्वासहीनता तथा मॉसपेशीयो दुर्बलता उत्पन्न करते 
हैं। उनके इस कार्य ने हृदय और फेफडो से सम्बन्धित कुछ रोगो को अच्छी तरह 
तरह समझने और उपचार करने का मार्ग प्रशस्त किया है। 


३0 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


डॉ ए एस पेटल ने बतलाया है कि सूखी खाँसी ओर श्वासहीनता जे सग्राहक, 
नामक सग्राहका के समूह की उत्तेजना से पंदा होती है जो हृदय के कार्य करने में 
भी निहित होते है। जा सग्रादक दर्द और स्पर्श ज्ञापफो की तरह ही सवेदीय सग्राहक 
(ज्ञापक) होते है। 

वल्लभ भाई पटेल वक्ष सस्थान, दिल्‍ली मे डॉ पेटल द्वारा किये गये अध्ययनों 
से यह स्पष्ट हो गया हे कि फेफडो मे गहरे स्थित जे सग्राहक (ज्ञापक) श्वामहीनता 
का ज्ञान (अनुभव) कराते है। यह अस्थायी श्गसहीनता का अनुभव हृदय द्वारा रक्त 
को अधिक मात्रा मे निकालन के कारण होता है और इस बात का सकेत अथवा 
प्रतीक होता है कि हृदय भलीभॉति कार्य कर रहा है। डॉ पेटल का कहना था, “कोई 
भी व्यक्ति बढे हुए हृदय रोगो के लिए आवश्यक खर्चीली कोरानरी (रक्त नलिकाओ) 
बायपास सर्जरी से साधारण रूप से पर्याप्त व्यायाम करके, बच सकता है जब तक 
कि वह श्वासहीन होता हे जो इस बात का सकेत होता है कि हृदय भलीभॉति कार्य 
कर रह है। चिकित्सको को अधिक समय तक सूखी खाँसी को असगत लक्षण नहीं 
मानना चाहिए, बल्कि फेफडो के रोगों और सम्भावित हृदय रोगो से ग्रसित रोगियों 
म॑ गम्भीर शिकायत के रूप में इसे देखना चाहिए।'' 

5 जनवरी, 995 ई को कलकत्ता मे विज्ञान काग्रेस के आधिवेशन मे डॉ 
एस के मित्रा स्मृति भाषण देते हुए डॉ पेटल ने सावधान किया कि, “सूखा खॉँसी, 
श्वासहीनता ओर मॉसपंशियो की दुबलता हृदय ओर कुछ फेफडो की बीमारियो मे 
बडे महत्त्व के होते हैं।'' 


अभी तक डॉक्टरो का विश्वास था कि सूखी खॉँसी कोशिकाओं के समूह/ 
चचलता लाने वाले सग्राहक नामक नाड़ी सिरो अथवा वायु नली और ध्वनि यत्र 
में स्थित तेजी से सघन होने वाले सग्राहको की उत्तेजना के कारण होती है। अब 
एक निर्णायक प्रमाण प्रस्तुत किया गया है कि फेफडो मे लाखो छोटी पतली झिल्लीदार 
वायु कोषो-अल्वेओली (दाँत के गड्ढे जैसा) के पास स्थित जे सग्राहक गले ओर 
सीने के ऊपरी भाग मे कुछ हलचल अथवा सनसनी पैदा करते है जिससे सूखी खाँसी 
हो जाती हे। 


चार साल से अधिक सम तक किये गए तुलनाञममक अध्ययन मे बिल्लियो 
और आदमियो के 'लोबालाइन' नम्मक पदार्थ जो ऐल्केलॉइड्प ( आधारी नाइट्रोजन 
युक्त शाकीय पदार्थ जैसे स्ट्रिकनी। निकाटी। कुकौीन मोरफीन आदि का मिश्रण 
है, जो एक श्वास सम्बन्धी उत्तेजक है और निकाटीन की तरह कार्य करता है, के 
इजेक्शन लगाये गए थे। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 3] 


अध्ययन से इस बात की पुष्टि होती है कि हृदय ओर फेफडो के कुछ रोगियों 
मे कठिन और बाधापूर्ण श्वास की स्थिति, जिसे डिस्पनोइया (कष्टमय श्वास) कहते 
है, के साथ-साथ सामान्य लोगो में श्वासहीनता की अनुभूति जे सग्राहको की उत्तेजना 
के कारण होती है। 


डॉ पेटल ने इस बात पर बल दिया कि खोजो मे यह बात निहित है कि 
ये अनुभूतियाँ कोशिकाओं के मध्य तरल (॥770) मे अस्थायी वृद्धि के कारण होती 
है, जो जे सग्राहको को उत्तेजित करता है। यह बढा हुआ तरल हृदय के बाये 
निलय (५०॥४7०0७) के रक्त प्रवाह अथवा अस्थायी सम्पर्क-सूत्रो मे वृद्धि के कारण 
होता हे | 

डॉ पेटल ने बतलाया कि परवर्ती खोज प्रामाणिक है, क्योकि यह सम्भावित 
कोरोनरी (रक्त नलिकाओ) धमनी रोग के एक सकेतक का कार्य कर सकती है। 
रक्‍त नलिकाओ की समस्याओ से पीडित रोगी हल्के व्यायाम पर भी सुकुमार होकर 
श्वासहीन होने लगते हैं, जो कोरोनरी धमनी रोग और हृदय के आघात (॥॥22८0 
का सर्वोत्तम भविष्य वक्ता है। 


नवीन अनुसन्धान के परिणाम यह बतलाते है कि तुलनात्मक रूप से कम 
परिश्रम करने पर श्वासहीनता भयकर कोरोनरी हृदय रोग का विश्वस्त सकेत है। 
4 अक्टूबर, 995 ई को भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान, अकादमी, नई दिल्ली मे सी 
वी रमन पदक भाषण करते हुए डॉ पेटल ने बतलाया कि, “परिश्रम के दौरान 
श्वासहीनता की अनुभूति फेफडो मे “जे सग्राहक ' नामक कुछ सग्राहको की उत्तेजना 
के कारण होती है। यह परिणाम अथवा खोज कुछ हृदय रोग से पीडित रोगियों 
को समझने और उपचार करने मे बडी लाभदायक होगी। जब हृदय रुकने की 
दास्तान वाले कुछ प्रौढ लोग श्वासहीनता, सूखी खासी और मॉसपेशीय दुर्बलता 
की शिकायत करते है, तो उनकी हालत गम्भीर होती है ओर तुरन्त ध्यान देने को 
आवश्यकता होती है।'' 

उनके अनुसार “जे सग्राहको ' की उत्तेजना बहुत ऊँचाई पर रहने वाले सामान्य 
सैनिको के अलावा अन्यो द्वारा अनुभव की गई श्वासहीनता, कुछ सीढियो की 
चढाई चढने वाले अथवा बस के लिए दौडने वाले लागो की श्वासहीनता को स्पष्ट 
करती है। 'जे सग्राहक' कुछ अनुभूतियॉ--मुख्यतया गले और सीने के ऊपरी भाग 
मे दबाव और दम घुटने को प्रकट करते है जिससे सूखी खॉँसी हो जाती है। 
ये अनुभूतियाँ बहुत ऊँचाई पर सैनिको हा सकी वास के समान 
ही है। 





32 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


डॉ पेटल के पूर्व अध्ययनों से यह निष्कर्ष निकला था कि माँसपेशीय व्यायाम 
फेफडो की ओर रक्‍त प्रवाह को बढा कर 'जे सग्राहको ' को उत्तेजित करता था। 
इसके फलस्वरूप उत्तेजित सग्राहक तेज, उखडी श्वास को पैदा करते हैं। 

कोई भी मस्तिष्क गला, फेफडो और उदर को जोडने वाली प्रणिशाओ 
(दशम मस्तिष्कीय तत्रिकाये) (४8४०४ 7४५८७) को चुनते हुए अवरुद्ध करके 
अथवा काटकर हृदय-रोगियो मे श्वासहीनता का उपचार कर सकता है। 
प्रभावस्वरूप यह फेफडो मे “जे सग्राहको ' मे उत्तेजना को दूर करता हे। डॉ पेटल 
ने चिकित्सको और पहलवानो (कुश्ती लडने वालो) को सावधान किया कि 
प्रणिशाओ (५३४०४ 7०५८४) को श्वासहीनता से मुक्त करने के लिए नहीं काटना 
चाहिए, क्योकि श्वासहीनता एक महत्त्वपूर्ण खतरे का सकेत होती है। उन्होने यह 
खोज निकाला है कि 'लोबेलाइन' (],092॥76) नामक दवा का इन्जेक्शन धमनी 
मे लगाने पर गले और सीने के ऊपरी भाग मे उत्तेजना पैदा करती है। यह उत्तेजना 
विभिन्‍न व्यक्तियों मे विभिन्‍न रूप से होती है जिसमे सर्वाधिक सामान्य सीने मे 
धुए की अनुभूति, घुटन अथवा खरास होती है। यह इस कारण होता है क्योकि 
हृदय का बॉयॉ पक्ष बायाँ प्रकोष्ठ कमजोर होता है और फेफडो से प्राप्त रक्त 
को बाहर निकालने मे अक्षम होता है। यह उस समय होता है जब एक व्यक्ति 
कोरोनरी धमनी रोग से पीडित होता है जो 50 वर्ष से अधिक की आयु के अधिकाश 
व्यक्तियो मे होता है। डॉ पेटल का शोध पत्र 'सिग्नीफेकेस ऑफ एक्जर्शनल 
डायस्प्रनोइया ' आस्ट्रेलिया और सेट पीटर्स बर्ग (रूस) मे चिकित्सा सम्मेलनो मे 
पढा गया था और हृदय रोग को पहचानने मे बडा महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। 


[] 


डॉ जे जी जॉली 
(]926 ई ) 


जन्म एव वश परिचय--स्वर्गीय श्री जयराम जॉली एव स्वर्गीय श्रीमती 
विद्यावतो जॉली की सनन्‍्तान डा जे जी जॉला का जन्म अक्टूबर ॥926 ई को 
रावलपिडी (अब पाकिस्तान) मे हुआ था। उनकी सहधर्मिणी श्रीमती सन्‍्तोष जॉली 
सुगृहिणी हैं। उनके तीन पुत्रियाँ और एक पुत्र है। उनकी ज्येष्ठ पुत्री श्रीमती किरण 
हुरिया का विवाह जयपुर मे रेलवे अभियन्ता श्री ए सी हुरिया के साथ हुआ है। 
उनकी दूसरी पुत्री डॉ नीलम गुप्ता का विवाह स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एव 
अनुसन्धान सस्थान, चडीगढ मे कार्यरत डॉ विपिन गुप्ता के साथ हुआ है। उनकी 
सबसे छोटी पुत्री डॉ नीरजा गुप्ता का विवाह कोलम्बस, सयुकत राज्य अमेरिका मे 
डॉ इन्द्रजीत गुप्ता के साथ हुआ है। उनके एकमात्र पुत्र डॉ नीरज जॉली ने पन्‍्त 
चिकित्सालय, नई दिल्‍ली से हृदय रोग विज्ञान मे एमडी परीक्षा उत्तीर्ण की है। 


शैक्षिक जीवन--डॉ जॉली ने सन्‌ 953 ई मे एम बी बी एस परीक्षा और 
958 ई मे एम डी (विकार विज्ञान) परीक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की। 


व्यावसायिक जीवन--डॉ जॉली ने सन्‌ 4956 से 963 ई तक सात वर्ष 
किग जॉर्ज चिकित्सा महाविद्यालय, लखनऊ मे प्रोफेसर के पद पर काय किया। 
सन्‌ 963 ई से ठह स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा अनुसन्धान सस्थान, चडीगढ मे 
सेवारत रहे। सन्‌ 963 से 969 ई तक 6 वर्ष वह निदेशक एव सहायक 
प्रोफेसर रक्त आपात एवं इम्मूनोहेमेटोलॉजी के पद पर कार्यरत रहे। सन्‌ 969 
से 983 ई तक ॥4 वर्ष वह एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत रहे। सन्‌ 
983 ई से वह प्रोफेसर के पद पर कार्यरत रहे और 30 सितम्बर, 986 ई को 
सेवानिवृत्त हो गए स्नातकोत्तर चिकित्सा सस्थान से सेवानिवृत्ति उपरान्त उन्होंने 
सजय स्नातकोत्तर चिकित्सा सस्थान, लखनऊ के निदेशक एव प्रोफेसर, आपात 
औषधि के पद पर कार्य किया। इस प्रकार उन्हे आपात औषधि के क्षेत्र मे 38 
वर्ष तक अध्यापन एवं अनुसन्धान कार्य का अनुभव है। आजकल वह आपात औषधि 
मे परामर्शद एव राष्ट्रीय एड्स समिति के सदस्य तथा रुधिर कार्यक्रम विशेषज्ञ समिति 
के अध्यक्ष है। 


34 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


प्रता--उनका वर्तमान पता इस प्रकार है-- 


डॉ जे जी जॉली 

भूतपूर्व निदेशक एवं प्रोफेसर, 

आपात ओर्षाध सेजय गॉधी स्नातकोत्तर चिकित्सा सस्थान, 
लखनऊ तथा स्नानकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एव अनुसन्धान सस्थान 
चडीगढ-600], भारत 

मकान न ॥ सेक्टर न ॥0, चडीगढ १600॥॥, भारत 


पुरस्कार--एम डी (रोग विज्ञान) परीक्षा 058 ई मे प्रथम स्थान अर्जित 
करने एवं विशिष्ट अनुसन्धान क॑ उपलक्ष मे लखनऊ विश्वविद्यालय ने डॉ जॉली को 
स्वर्ण ण्दक प्रदान किया था। सन्‌ 98 ई में उन्हे भारत मे रक्त आपात की 
विशिष्टता विकसित करने के उपलक्ष मे बी सी रॉय पुरस्कार प्रदान किया गया था। 
सन्‌ 3983 ई मे उन्होने रक्त आपात मे विशिष्ट सेवाओं के उपलक्ष मे आर के 
मेन्डा सामुदायिक सेवा पुरस्कार प्राप्त किया था। सन 984 ई मे उन्होने स्वास्थ्य 
कार्यक्रम मे विशिष्ट योगदान के लिए भारतीय चिकित्सा सघ का हरचरणसिह स्वर्ण 
पदक प्राप्त किया था। सन्‌ 986 ई मे उन्होने विशिष्ट सामुदायिक सेवाओ के उपलक्ष 
मे डॉ पी एन बहल सस्थान पुरस्कार प्राप्त किया था। 


वैज्ञानिक सस्थाओ की सदस्यता 
( अ) राष्ट्रीय--डोा जॉली इण्डियन सोसायटी ऑफ ब्टाड़ ट्रान्सफ्यूशन एण्ड 


(तब 


+िराकक 


इम्मूनोहेमेटोलॉजी के सस्थापक अध्यक्ष है। वह इण्डियन सोसायटी 
ऑफ हेमेटोलॉजी एण्ड ब्लड ट्रान्सफ्यूनन के आजीवन सदस्य है। वह 
राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान अकादमी के फैलो है। वह भारतीय चिकित्सा 
सघ की केन्द्रीय कार्य समिति एवं भारतीय चिकित्सा सघ के जर्नल 
की परामर्शदात्री समिति के सदस्य है। वह महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाये 
रक्त आपात परामर्शदात्री समिति के राष्ट्रीय विशेषज्ञ दल के सदस्य हैं । 


अन्तर्राष्ट्री--डॉ जॉली मानव रक्‍त उत्पाद एव सम्बद्ध पदार्थों के विश्व 
स्वास्थ्य संगठन विशेषज्ञ परामर्शदात्री दल वे सदस्य हैं। वह राष्ट्रीय 
विश्व स्वास्थ्य सगठन रक्त आपात केद्ध चडीगढ के अध्यक्ष है। वह 
अन्तर्राष्ट्रीय रक्त आपात सोसायटी के सम्पादक मण्डल मे राष्ट्रीय 
प्रतिनिधि और सदर हें। वह वर्ड फडरशत ऑफ हेमोफिलिआ मे 
राष्ट्रीय प्रतिनिधि हैं। 


भरत के चिकित्मा वज्ञानिक ३६ 


सम्मलनो आदि में सहभागित एवं उपलब्धियाँ 
(ज) सन्‌ 972 ३ मे चडीगढ में डॉ जॉली न म्वयसेवी रक्त दान पर प्रथम 
अखिल भाग्तीय सम्मेलन का आयोजन किया था। सन्‌ 972 इ मे 
उन्होन भारत मे रक्त आपात सेवाओ क विकाम हतु इण्डियन सोसायटी 
आऑफ ब्लड ट्रान्सफयूजन एण्ड इम्मूनोहेमटालॉजा की स्थापना की | वह 
इण्डियन सासायटी आफ ब्लड ट्रान्मफ्यूजन एण्ड इम्मूनोहेमेटालॉजी 
सम्मंलन के अह्मदाबाद सम्मंलन १973 इ आर उसके बम्बइ 
अधिवेशन, 3974 ३ में भी अध्यक्ष रह। उन्हाने 4975 इ में विश्व 
व्टस्थ्य मगठन की दक्षिग-पूर्वी एशियाइ क्षेत्रीय बैठका मे भारतीय 
रक्त आपात सोसायटी ओर विश्व स्वास्थ्य सघ का प्रतिनिधित्व किया 
था। सन्‌ 979 ई में वह स्वास्थ्य मत्रालय की रक्त आपात पर राष्ट्राय 
योनना समिति के सदस्य थे। सन॑ ।980 ई में वह चडीगढ में 
इन्टरनेशनल सोसायटी ऑफ ब्लद ट्रान्सफ्यूनन के अन्तराष्ट्रीय 
परिसवाद, विश्व स्वास्थ्य सगठन कार्यशाला तथा इण्डियन सोसायटी 
ऑफ ब्लड ट्रान्सफ्यूजप एण्ड इम्मूनाहेमेटोलॉजी के राष्ट्रीय सम्मेलन के 
शगठन सचिव थे। सन्‌ 98] इ में वह “पोस्ट ट्रान्सफ्यूजन 
हेपाटिटिस”” पर भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ के कार्य-दल 
के सदस्य थे। सन्‌ 982 इ मे वह चिकित्सा सम्थान, श्रीनगर मे रक्त 
आपात पर कार्यकारी दल के सदस्य थ। स्‌ 785 ई मे वह अधिरक्त 
स्राव (8०7०7) पर भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ के 
कार्यकारो दल के सदस्य थे। सन्‌ 983 ई मे वह योजना आयोग, 
भारत सरकार के उतहीन रोगो पर कायकारी दल के सदस्य थे। सन्‌ 
986 ई में वह स्वास्थ्य मत्रालय, भारत सरकार की रक्त आपात पर 

राष्ट्रीय परामएदात्री समिति के मदस्य ५। 


डॉ जॉनी ने किए जॉर्ज चिकित्सा महाविद्यालय लखनऊ के रोग विज्ञान और 
जीवाणु विज्ञान विभाग मे प्रतिरक्षा रुधिर विज्ञान ओर रक्त आणत की शाखा का गठन 
किया। उन्होने स्नाटकोचर चिकित्सा शिक्षा आर अनुसन्धान सम्थान, चडीगढ में नेहरू 
चिकित्सालय की प्रयांगशाला सेठा ओर चिकित्सकीय जाँच प्रयोगशालाओ का गठन 
किया। उन्होंने उत्तरप्रदेश गज्य मे रोग विज्ञान प्रयागशणालाओ ओर रक्त आपात केन्द्रों 
का गठन किया। उन्हाने स्नातकात्तर चिकित्सा शिक्षा और अनुसन्धान सस्थान, चडीगढ़ 
में रक्त आपात “व प्रतिरक्षा रुधिर विज्ञान विभाग का गठन किया। उन्होने उत्तरी क्षेत्र 
में स्वयसेवी रक्तदान की प्रगति के लिए रक्त बेंक सांसायटी चंडीगढ़ का गठन किया। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिव 


हट 


उन्होने 4965 और 97। ई मे राष्ट्रीय आपातकाल मे उत्तरी क्षेत्र मे रक्त ग्रिड क 

गठन किया। उन्होने भारत मे रक्त आपात की प्रगति हेतु भारतीय रक्त आपात और 

प्रतिरक्षा रुधिर विज्ञान सोसायटी तथा चडीगढ में भारतीय रक्त आपात और प्रतिरक्षा 

रुधिर विज्ञान सोसायटी के प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन का सगठन किया। उन्होने 

चिकित्सकीय, अतिरिक्त चिकित्सकीय एवं सामाजिक कार्यकत्ताओ के लिए रक्त 

बैंक पर विशेष प्रशिक्षण पाठयक्रमो और सेमीनारों का आयोजन किया। सितम्बर, 

4979 ई मे उन्होने रक्त आपात पर क्षेत्रीय सेमीनार का आयोजन किया था। उन्होन 

मार्च, 980 ई में चडीगढ मे अन्तर्राष्ट्रीय रक्त आपात सोसायटी के परिसवाद एव 
विश्व स्वास्थ्य सगठन की रक्त आपात पर कार्यशाला का सगठन किया था। 

(ब) अन्तर्रष्ट्री--डॉ जॉली ने कोलम्बो योजनान्तर्गत कोलम्बो योजना 

फैलो के रूप में सन्‌ 97] ई मे ऑस्ट्रेलिया मे रक्त आपात विकास 

के अध्ययनार्थ ऑस्ट्रेलिया मे पर्थ, मेलबोन, एडीलेड और सिडनी की 

यात्रा की। सन्‌ 975 ई में वह फिनलैंड की यात्रा पर गए और 

हेलसिन्की, फिनलैड मे अन्तर्रष्टीय रक्त आपात सोसायटी के चौदहवे 

सम्मेलन मे भाग लिया तथा रोग क्षमता विज्ञान ([ग्राशप्रा०.2_४०805) 

पर वैज्ञानिक सत्र की अध्यक्षता की। सन्‌ 976 ई मे वह जापान गए 

और क्योटो, जापान मे अधिरक्तस्राव के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन मे भारत 

का प्रतिनिधित्व किया। सन्‌ 4978 ई में पेरिस (फ्रास) मे रक्त आपात 

पर ग्यारहवे अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन मे उन्होंने भाग लिया। सन्‌ 4980 ई 

मे उन्होंने जर्मनी की यात्रा की और अधिरक्त स्राव के विश्व सघ के 

आमत्रण पर बोन मे प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय अधिरक्त स्राव सम्मेलन मे भाग 

लिया। सन्‌ 980 ई मे वह ग्रोनिन्गेन, नीदरलैण्ड म॑ बालरोग विज्ञान 

एवं रक्त आपात पर अन्तर्राष्ट्रीय परिसवाद मे आमत्रित किए गए थे। 

सन्‌ १98 ई में वह भारत-जर्मन प्रतिनिधिमण्डल मे स्वास्थ्य मत्रालय 

के सरकारी प्रतिनिधि के रूप मे म्यूनिख तथा भारत-रूस 

प्रतिनिधिमण्डल मे स्वास्थ्य मत्रालय के सरकारी प्रतिनिधि के रूप मे 

मास्की गए। उसी वर्ष सन्‌ 498) ई म वह विश्व स्वास्थ्य सगठन 

के फैला के रूप मे यूरोप मे रक्त बेक की विकसित तकनीक और 

रक्‍त आपात सवाओ के स्वरूप का अध्ययन करने के लिए यूरोप यात्रा 

पर गए, एडिनबरा मे स्कॉटिश रक्त आपात सेवा स्कॉट ब्लड की 

वार्षिक बेठक म॑ भाग लिया, ग्रोगिन्गेन मे सगांत्र रक्त प्रवाह समस्याओ 

और अधिरक्त स्राव व्यवस्था पर सेमीनार एव ग्रोगिन्गेन मे रक्त प्रवाह 


भारत क चिकित्सा वैज्ञानिक कक 


समस्याय॑ एवं रक्त आपात पर अन्तराष्ट्रीय परिसवाद मे भाग लेने हेतु 
नीदरलैण्ड गए तथा यूरोपीय घनाग्रता एव हैमोटटिस समूह की बेठक 
में भाग लेने मिलानो गए। सन 984 इ मे उन्होने म्यूनिख मे रक्त 
आपात के अठारहवे अन्तराष्ट्रीय सम्मेलन मे भाग लिया ओर यकृत शोथ 
(सूज) पर सत्र की अध्यक्षता की। उसी वष वह न्यूयार्क गए और 
न्यूयार्क मे रक्त आपात केन्द्र मे स्थापित रक्त आपान ओर सम्ब्द्ध रक्त 
आपात सेवाओ का अध्ययन किया। सन 986 ई मे उन्हाने अन्तर्राष्ट्रीय 
रुधिर विज्ञान सोसायटी के इक्कीसवे सम्मेलन मे तथा अन्तर्राष्ट्रीय रक्त 
आपात सोसायटी के उजलीसवे सम्मेलन मे सिडनी ऑस्ट्रेलिया मे भाग 
लिया तथा “गुणवत्ता” पर सम्मेलन के सत्र की अध्यक्षता की। सन्‌ 
987 ई मे उन्हे जकार्ता, इण्डोनेशिया मे फिडडस अन्तराष्ट्रीय सम्मेलन 
मे ''एडस--कुछ विरोधाभास एवं विकामशील देशो के लिए चुनौती '' 
विषय पर अतिथि भाषण देने हेतु आमत्रित किया गया था तथा उन्होने 
“डोनर मोटिवेशन [9णभः १/०४५७४४०॥ '' पर सत्र की अध्यक्षता की | 


डॉ जॉली ने स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एव अनुसन्धान सस्थान, चडीगढ़ 
के रक्त आपात एव प्रतिरक्षा रुधिर विज्ञान विभाग मे प्रतिरक्षा रुधिर विज्ञान एव रक्त 
आपात मे पी एच डी एवं डिप्लोमा पाठ्यक्रम हेतु स्नातकोत्तर प्रशिक्षण केन्द्र, राष्ट्रीय 
विश्व स्वास्थ्य सगठन रक्‍त आपात केन्द्र, दक्षिण-पूर्व एशिया विश्व स्वास्थ्य सगठन 
प्रशिक्षण केन्द्र, रक्त आपात से उत्पन्न रोगो पर विश्व स्वास्थ्य सगठन कार्यशाला एव 
अन्तर्राष्ट्रीय रक्त आपात सोसायटी के परिसवाद का आयोजन किया। 

प्रकाशन--डॉ जॉली के 50 शोध-पत्र राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओ मे 
प्रकाशित हुए है। उन्होने 20 पत्र अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनो मे प्रस्तुत किये, 00 पत्र राष्ट्रीय 
सम्मेलनो मे प्रस्तुत किए, 5 भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌, भारतीय वैज्ञानिक 
अनुसन्धान परिषद्‌ और अन्य शोध प्रायोजना-प्रतिवेदन, 00 पत्र देनिक एवं पाक्षिक 
समाचार पत्रो मे प्रकाशित किए तथा उनकी 5 पुस्तके प्रकाशित हो चुकी हैं। 


प्रकाशित पुस्तके है-- 


] 


प्रोसीडिग्स ऑफ दि सिम्पोजियम ऑफ दि इन्टरनेशनल सोसायटी ऑफ 
ब्लड ट्रान्सफ्यूजन ऑन डिजीजेस ट्रान्समिटेड श्र ब्लड चडीगढ, 987 
(सम्पादित) 

यूज ऑफ ब्लड एण्ड इट्स कम्पोनंट्स इन सर्जीकल प्रेक्टिस-रिसंट 
एडवान्सेज इन सर्जरी-3, जयपी ब्रदर्स मेडिकल पब्लिशर्स प्राइवेट 
लिमिटेड न्यू दिल्ली, पृष्ठ 72 22 992 


३8 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


रिसेन्ट डेवलपम॑न्टस इन ब्लड ट्रान्सफ्यूजन थेरेपी-मोनोग्राफ ऑन 
मेडिकल साइन्स इन प्रांग्रंस। 

4. फैक्टर्स हेम्परिंग दि डेवलपमेट ऑफ हेमोफिलिण सर्विसज इन 
इण्डिया स्टेट्स एण्ड एटलस ऑफ हेमोफिलिया वर्ल्डवाइड वल्ड 
फेडरेशन ऑफ हेमोफिलिया-इन्फोर्मेशन क्लीयरिंग हाउस, जमनी पृष्ठ 
१4-42, 984 


5 प्रोब्ल्म्स इन मेनेजममेट ऑफ हैमोफिलिया इन डेवलपिग कन्ट्रीज- 
प्रोसीडिग्स ऑफ 5 काग्रेस ऑफ वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ हेमोफिलिया 
एकेडेमिया प्रेस, टोक्यो, जापान, पृष्ठ 43-45, 976 


देन--डॉ जॉली रक्त आपात सेवाओ के क्षेत्र मे विकास के लिए चिकित्मा 
व्यवसाय और जन समाज द्वारा समान रूप से विगत 25 वर्षो मे भारत मे प्रमुख 
अन्वेषक माने गए है। विगत दो दशको मे उनके समर्पित कार्य ने व्यावसायिक 
सेवा अनुसन्धान और अध्यापन पक्षो, चिकित्सीय तकनीक एवं असफल सुरक्षा 
प्रणालियो, उसके आचार सम्बन्धी स्तरों एव मधुर जन सम्पर्कों मे उनके विभाग 
की श्रेष्ठता की दिशा मे सर्वाधिक योग दिया है। उच्च नैतिक ज्ञान एव सामाजिक 
रूप से महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक स्वभाव के स्गथ उन्होने प्रभावशील, स्वयसेवी सगठित 
एवं व्यापक रक्‍त दान प्रणाली की व्यावहारिकता एवं उपादेयता को प्रदर्शित एव 
स्थापित किया है। वह भारतीय रक्त आपात एव प्रतिरक्षा रुधिर विज्ञान सोसायटी 
के सस्थापक अध्यक्ष है। डॉ जॉली ने देश मे रक्त आपात सवा मे बहुमूल्य योग 
दिया है। इम बात का श्रेय डॉ जॉली के सतत्‌ प्रयासों को दिया जा सकता है 
कि रक्‍त आपात की विशेषता को भारत मे स्वोकार किया जाने लगा है। उन्हे विश्व 
स्वास्थ्य संगठन ओर अनन्‍्नराष्ट्रीय रक्त आपात मासायटी जेसी अन्तर्गष्टीय सम्था आ 
द्वारा सम्मान प्रदान किया गया है। 


3950 ई के दशक मे जिसकी डॉ जॉली ने एक धृष्ट आन्दालन क रूप मे 
कल्पना की थी, एक राष्ट्रव्यापी कायक्रम का स्वरूप प्राप्त कर चुका है जिसन सम्पूर्ण 
देश को रक्त व्यापारियों के शोषणपूर्ण गलघांटू शिकजे से बाहर निकलने का माग 
दिखलाया है। 

प्रतिथ्य रुधिर विज्ञान म डॉ जॉली की रुचि उनके यू पी स्नातकोत्तर विकार 
विज्ञान के दिना सम प्राग्म्भ होती हैं, जहाँ सयोगवश स्नातकोत्तर सस्थान म॑ जाने से 
यूर्व उन्हांने प्रभावशाली रक्‍्ट आपान सेवा के संगठन का बिचार किया। स्वयमेवी 
गक्‍्त दान इकाइयों के उचित एवं नवीन काय की स्थापना ऊं उनके दृढ़ निश्चय के 


५) 


भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक ३9 


फलस्वरूप भारतीय रक्त आपात एव प्रतिरक्षा रुधिर विज्ञान सोसाय्टी का विकास हुआ 
है जिसका विचार शिशु रक्त बेंक सोसायटी, चडीगढ का बीज बन गया ह। 


विभिन्‍न सामाजिक, सास्कृतिक धामिक, राजनैतिक ओर वैज्ञानिक सगठनो तथा 
प्रचार साधनों का समर्थन प्राप्त कर डॉ जॉली का व्यावसाण्कि आदर्श उनकी योग्यता 
के सयोग का परिणाम एक हजार रक्तदान शिविरों का आयोजन एवं दो लाख से 
अधिक उत्साही दानदाताओ का अब तक सूचीबद्ध होना है । दाता समुदाय का केनच्द्र- 
बिन्दु वह इच्छुक और आशावान युवा वर्ग है जिसके द्वारा डॉ जॉली ने इस सकटकाल 
में लाखो विचारवान लोगो के मन-मस्तिष्क मे उनके विचारपूर्ण नारे "खून मत बहाओ, 
उसे दान दो” को गुँजायमान कर दिया है। 


राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिरक्षा रुधिर वेज्ञानिक एव रक्त आपात सस्थाओ, सेमीनारो, 
विकसित प्रशिक्षण कार्यक्रम, कार्यशालाओ एवं रक्त दान शिविरों के सगठन एवं 
आयोजन के अतिरिक्त उन्होने अन्तर्राष्ट्रीय रक्त आपात सोसायटी एवं विश्व 
अधिरक्तस्राव सघ की गतिविधियो को सफल बनाने मे महान्‌ योग दिया हे। उन्होने 
सयुक्‍त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, फिनलैण्ड, यू ए एस आर , जापान, फ्रास, जर्मनी, 
नीदरलैण्ड, इंग्लैंड और इटली सहित अनेक देशो मे अपनी विशेषता से सम्बन्धित 
वैज्ञानिक दायित्वों मे भारत का प्रतिनिधित्व किया है। उनके वैज्ञानिक पत्र आपात 
औषधि सदर्भ सामग्री के अन्तर्राष्ट्रीय सग्रह का एक भाग बन गए हैं | चिकित्सा व्यवसाय 
और सम्पूर्ण समाज के प्रति उनकी सेवाओ की मान्यता स्वरूप डॉ जॉली को सन्‌ 
98] इ में भारत मे रक्त आपात की विशेषता विकसित करने के उपलक्ष मे बी 
सी रॉय पुरस्कार से, रक्त आप'त की दिशा मे विशिष्ट सेवा के लिए आर के मेन्‍्डा 
सामुदायिक सेवा पुरस्कार 983 स्वास्थ्य कायक्रमो मे विशिष्ट योगदान के लिए 
हरचरणसिह भारतीय चिकित्सा सघ के स्वर्ण पदक 984 एवं विशिष्ट सामुदायिक 
सेवा के लिए डॉ पी एन बहल सस्थान पुरस्कार 986 स सम्मानित किया गया 
है एव साथ ही विश्व स्वास्थ्य सगठन एवं भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ ने 
भी प्रशस्ति-पत्र प्रदान किए है। 
डॉ जॉली के समान कम ही व्यक्ति इतने अल्प समय मे अपनी विशेषताओ 
और समाज के लिए इतना अधिक काम करने मे सफल हुए हैं। उनकी सफलता 
का रहस्य मुख्यतया उनके इस विश्वास में निहित हे कि थोपने स बढकर निर्माण 
करना श्रेष्ठ होता हे एव समन्वयकारी मानवीय व्यक्तित्व समुचित रचनात्मक माँग की 
पूर्ति मे विफल नहीं रहता है। 
[] 


डॉ एम एस अग्रवाल 
(१928 ई ) 


जन्म एव वश परिचय--डॉ एम एस अग्रवाल का जन्म उत्तरप्रदेश के जिला 
केन्द्र बुलन्दशहर मे 7 अगस्त, 928 ई को हुआ था। वह डॉ आर एस अग्रवाल 
और श्रीमती सावित्री अग्रवाल की सन्‍्तान हैं। उनकी जीवन-सगिनी श्रीमती पुष्पा 
अग्रवाल हैं। उनके श्रीमती अनीता गुप्ता और श्रीमती भारती कान्त नामक दो सुपुत्रियाँ 
तथा श्री राजीव शरण अग्रवाल नामक केवल एक सुपुत्र है। उन्होने अपना प्रारम्भिक 
जीवन आध्यात्मिक स्थल श्री अरविन्द आश्रम पाडिचेरी मे व्यतीत किया था। 
शैक्षिक जीवन--डॉ अग्रवाल की प्रारम्भिक शिक्षा पाडिचेरी मे हुई। उन्होने 
आगरा विश्वविद्यालय से एम एस सी तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम डी परीक्षा 
उत्तीर्ण की। 
व्यावसायिक जीवन--डॉ अग्रवाल डॉ अग्रवाल नेत्र सस्थान के 
निदेशक एव प्रधानाचार्य हैं। यह सस्थान अग्रवाल रोड, 5 दरियागज, नई दिल्ली 
मे स्थित है। 
पता--उनका वर्तमान पता अधोलिखित है-- 
डॉ एम एस अग्रवाल, 
निदेशक एव प्रधानाचार्य, 
अग्रवाल रोड, 45, दरियागज, नई दिल्ली-0002 (भारत) 
सदस्यता--डॉ अग्रवाल एशिया पेसिफिक एकेडेमी ऑफ ऑफथलमॉलॉजी, 
श्री अरविन्द सोसायटी तथा परामर्श निकेतन, ऋषिकेश (हरिद्वार) के सदस्य हैं। 
प्रकाशन--डॉ अग्रवाल के 300 से अधिक लेख कादाम्बिनी जैसी पत्रिका 
तथा समाचार-पत्रो मे प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होने हिन्दी तथा अग्रेजी दोनों भाषाओं 
मे 34 पुस्तके लिखीं तथा प्रकाशित की है जिनमे प्रमुख हैं-- 
। एवरी डे आइ केयर (अग्रेजी), (2) माइन्ड एण्ड विजन (अग्रेजी) 
(3) योग फॉर परफैक्ट साइट (अग्रेजी), (4) आँखे (हिन्दी), (5) सीक्रेट्स ऑफ 
इण्डियन मेडिसन (अग्रेजी), (6) नेचर क्योर फॉर आइज (अग्रेजी), (7) हमारी 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 4] 


आँखे (हिन्दी ), (8) गुरुदेव (हिन्दी), (9) अमृत मथन (हिन्दी), (0) बटर साइट 
विदाउट ग्लासेज (अग्रेजी), () साइको-सोलर ट्रीटमेट (अग्रेजी) | 

अभिरुचि--उनकी अभिरुचि छाया चित्रकारी है तथा उनके कई छाया चित्र 
दिल्ली दूरदर्शन पर प्रदर्शित किए जा चुके हैं तथा 'दि हिन्दुस्तान” और 'टाइम्म ऑफ 
इण्डिया' की प्रमुख पत्रिकाओ मे प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होने दिल्ली दूरदर्शन पर 
30 से अधिक विशेष कार्यक्रम प्रस्तुत किए हैं। 

सम्मान--डॉ अग्रवाल डिवाइन हेल्‍थ वेलफेयर सोसायटी तथा भारत- थाइलैण्ड 
सास्कृतिक सघ के अध्यक्ष हैं। वह भारतीय बाल शिक्षा परिषद्‌ के कोषाध्यक्ष है। 
सन्‌ 968 ई मे सिगापुर मे आयोजित तृतीय नेत्र विशेषज्ञ काग्रेस मे वह भारतीय 
प्रतिनिधि थे। सन्‌ 970 ई मे वह थाइलैण्ड और कम्बोडिया मे भारतीय सास्कृतिक 
प्रतिनिधि के रूप मे गए थे। 

देन एव प्रशसाये--डॉ अग्रवाल ने नेत्र रोगो के इलाज के लिए विजन स्पेशल, 
ऑकूलो कूलैक्स, रेजोल्वेन्ट 200, रेजोल्वेन्ट 500, एलिक्जिर ऑकूलोज ऑफथेल्मो 
स्पेशल, आइसिन कैप्सूल्स, लिव-77, रोजी स्प्रे सोलूक्स स्प्रे और आई शील्ड नामक 
औषधियो का आविष्कार जडी-बूटियो से किया है। उन्होने बम्बई, कलकत्ता, मद्रास, 
बैगलौर, कानपुर तथा भारत के सभी प्रात्तो एवं गॉवो मे नि शुल्क नेत्र कैम्प लगाए 
है। इसी प्रकार के कैम्प उन्होने भारत से बाहर सिगापुर, बैंकाक, हागकाग, लन्दन, 
पेरिस और ज्यूरिच (स्विट्जरलैण्ड) मे भी लगाये है। जरुरतमन्दो को उन्होने नि 
शुल्क परामर्श भी दिया है। प्रतिदिन 5000 से अधिक रोगियो की जॉच उनके द्वारा 
की जाती है तथा उनमे से कई नि शुल्क परामर्श प्राप्त करते हैं। 


डॉ अग्रवाल मे कार्य के प्रति ललक है। उनका विचार यह है कि नेत्रो की 
चिकित्सा मे औषधि तो केवल एक सहायता होती है तथा मुख्य बात है नेत्र व्यायाम 
और नेत्रो का सही उपयोग। चश्मे का प्रयोग त्यागने मे उन्होने कई लोगो की सहायता 
की है। डॉ अग्रवाल महान्‌ जन सेवा कर रहे है। अपने पत्र मे वह लिखते है--''इस 
जीवन म॑ जो थोडा-सा कार्य मैंने किया है वह केवल मानव प्राणियो के सेवा और 
उनकी नेत्र-ज्योति के बचाव मे उनकी सहायता करना है। इसी उद्देश्य को उस समय 
युवा बनाए रखा जब मै छोटे बच्चों की आओंखो मे दोष देखता हूँ।”” नेत्रो के भैगेपन 
का उल्लेख अपने लेख “इलाज नेत्रो के भैगेपन का!” (कादम्बिनी, फरवरी 987 
पृष्ठ, 43-5) में करने के पश्चात्‌ उन्होंने भेगेपन को चार प्रकारो मे विभक्त किया 
है--() कोवरजेट (2) डाइवर जेट, (3) वटिकल और (4) औकेजनल। उन्होने 
भेंगेपन को दूर करने के लिए तीन प्रकार की चिकित्साये--(१) स्वास्थ्य का ध्यान 


42 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


देना, (2) नत्र व्यायाम यत्र चिकित्सा तथा (3) ऑपरेशन बतलाए है। उन्होने 60वीं 
हीरक जयन्ती सॉवेनियर नामक पत्रिका प्रकाशित की, जिसमे उन्होंने ओंखो के सम्बन्ध 
मे कई महत्त्वपूर्ण लेख प्रकाशित किए, जो सामान्य पाठकों एव नेत्र चिकित्सको दोनो 
के लिए लाभप्रद है तथा दोनो के लिए दिशा निर्देश देते है। 


स्वामी शिक्वानन्द ने मत व्यक्त किया है कि “हरिद्वार के स्वामी अर्जुन देव 
महाराज जो 20 0 नम्बर का चश्मा प्रयोग कर रहे थे, इन उपायो से पूरी तरह अच्छे 
हो गए।” स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री के शब्दो में, “अग्रवाल द्वारा प्रस्तावित 
चिकित्सा सरल है।'' डॉ पद्टाभिसीतारमैया लिखते है, ““मेरी धमपत्नी बायी ऑख 
के बाह्य ऋतु के लकवे (पक्षाघात) से पीडित थी, ने डॉ अग्रवाल के इलाज द्वारा 
कष्ट पर विजय प्राप्त की।”” नेपाल के राणा सर मोहन शमशेर जग बहादुर न॑ कहा 
है, “डॉ अग्रवाल के प्रति मेरी हार्दिक कृतज्ञता है जो मेरे पास आशा के दूत के 
रूप मे आए और मेरे लिए आशातीत मुक्ति लाए।”' श्री गिरजा शकर लिखते हैं, 
“डॉ अग्रवाल की विधियोँ प्राचीन भारतीय प्रयोगो पर, यदि भूले नही गए, आधारित 
हैं।'' हरियाण के भूतपूर्व उपमुख्यमत्री और वित्तमत्री श्री बनारसी दास गुप्त लिखते 
हैं-''डॉ अग्रवाल की विधियाँ प्रकृति पर आधारित और सरल है।”' 


उनके प्रशसको मे स्वर्गीय सर सी वी रमण (नाबुल पुरस्कार विजेता), 
सर ए जी क्लो, सर सी पी रामास्वामी अय्यर, भारत के स्वर्गीय राष्ट्रपति श्री 
वी वी गिरि, डॉ सी डी देशमुख, श्री गुलजारीलाल नन्दा स्वर्गीय श्री के एन 
काटजू, राजकुमारी अमृत कौर, श्री सच्चिदानन्द सिन्हा श्री अकबर हैदरी, जी डी 
बिडला, एस सी सीतलवाड, श्री वी टी कृष्णमाचारी, श्री ताराचन्द बडजात्या, 
श्रीमन्‍्नारामण, श्री आर एल नरसिहम आई सी एस , गजनफर अलीखों ( भूतपूर्व 
राजदूत पाकिस्तान), डॉ सैयद महमूद, मेजर जनरल अलादत खाँ (पाकिस्तान), 
श्री उमाशकर दीक्षित, श्री वी पी सिघानिया, रतेनसेय खटाऊ, श्री अम्बालाल 
किलाचन्द, अलवर के महाराजा जयसिह जी, श्री एम आर सोथलिया, डॉ एन 
टी थुअन (सैगोन), श्री टी एन गुरवानी (थाइलेण्ड), सरदार वाशम सिंह 
(मलेशिया) सर अकौर टसा (टोक्यो), श्री सी एच कांह /सिगापुर) श्रीमती 
जी के मैकडानल्ड (न्यूजीलैड) श्री डाले डब्ल्यू स्टाम्प (यू एमए ), एच 
शूडल्डर (इग्लैंड) याकूब युसुफ इल वान्डी (इराक), श्रीमती के पावा 
(बैकाक), श्री पकज रॉय (क्रिकेट खिलाडी), श्री भारत भूषण (फिल्म अभिनेता) 
तथा नाटाशा बेलोफ (यू एस ए आर ) प्रमुख है। 
ह्। 


डॉ रामेश्वर शर्मा 
(929 ई ) 


जन्म एव वश परिचय--डॉ रामेश्वर शर्मा का जन्म 25 मार्च, १929 ई 
को जयपुर मे हुआ था। उनके माता-पिता का नाम श्री लक्ष्मीनारायण और श्रीमती 
राधा था। उनकी धर्मपत्नी का नाम श्रीमती ज्ञानेश्वरी है ओर उनके एक पुत्र और 
दो पुत्रियों है। 

शैक्षिक जीवन--डॉ शर्मा ने सन्‌ 952 ई मे एम बी बी एस की उपाधि 
राजस्थान विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी। उन्होने सन्‌ 955 इ मे एम डी परीक्षा 
और १957 ई मे एम पी एच परीक्षा हार्वर्ड विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की। सन्‌ 
970 इ मे वह एफए एम एस हो गए। वह एफ आई पी एच ए तथा 
एफ एन आईई है। 

उन्होने () 956-4958 ई की अवधि मे हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ, 
बोस्टन मे रोकथाम और सामाजिक चिकित्सा (प्रीवेटिव एण्ड सोशल मेडिसिन) मे 
विश्व स्वास्थ्य सगठन के अध्यापन पाठ्यक्रम मे, (2) 30 नवम्बर से 8 दिसम्बर, 
960 ई तक विश्व स्वास्थ्य सगठन के “रोकथाम और सामाजिक चिकित्सा का 
अध्यापन (रीचिग ऑफ प्रीवेटिव एण्ड सोशल मेडिसिन) '' पर सेमीनार मे कोलम्बो, 
श्रीलका मे, (3) विश्व स्वास्थ्य सगठन की फैलोशिप के अन्तगत “स्वास्थ्य शिक्षा"! 
मे जनवरी से अप्रैल, 7973 तक फिलिप्पीन्स, कोरिया, मलेशिया और थाईलैण्ड तथा 
(4) ] से ॥6 दिसम्बर, १978 ई तक प्रबन्ध सस्थान, बगलौर द्वारा आयोजित 
चिकित्सा महाविद्यालयो के प्रंबन्‍्धी पर प्रशिक्षण प्राप्त किया। 


व्यावसायिक जीवन--सन्‌ 952 से 955 ई तक डॉ शर्मा ने चिकित्सा 
रजिस्ट्रार के कायालय मे हाउस अधिकारी का कार्य किया था। सन्‌ 955 ई से 958 
ई तक वह सहायक चिकित्सा अधिकारी प्रथम श्रेणी एव व्याख्याता (भेषज) के रूप 
मे कार्यरत रहे। वह सन्‌ 956-58 ई मे ग्रामीण स्वास्थ्य प्रशिक्षण केन्द्र के प्रभारी 
चिकित्सा अधिकारी थे। वह 958 से 964 ई तक रोकथाम और सामाजिक चिकित्सा 
विषय मे रीडर, 4964 ई से 980 ई तक रोकथाम और सामाजिक चिकित्मा विषय 


44 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


मे प्रोफेसर और अध्यक्ष एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय, जयपुर और सक्रामक 
रोग चिकित्सालय के प्रभारी चिकित्सा अधिकारी, 978 से ।980 ई तक पथधानाचार्य, 
चिकित्सा महाविद्यालय, जोधपुर और ॥980 ई से 4984 ई तक प्रधानाचार्य, 
एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय, जयपुर के पद पर कार्यरत रहे। सन्‌ 984 ई 
मे प्रधानाचार्य, एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय, जयपुर के पद से सेवानिवृत्त 
होने के बाद डॉ शर्मा ने 3 जून, 99] ई तक निदेशक, भारतीय स्वास्थ्य प्रबन्ध 
एवं शोध सस्थान, जयपुर के पद पर कार्य किया। 4 जुलाई, 99 ई से 30 मार्च, 
4993 ई तक डॉ शर्मा कुलपति, राजस्थान विश्वविद्यालय के पद पर रहे। वर्तमान 
मे वह 3 जुलाई, 995 ई से निदेशक, राजस्थान राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण 
सस्थान, जयपुर के पद पर कार्यरत हैं। 
उन्हे स्नातक स्तर के छात्रो को 30 वर्ष तक और स्नातकोत्तर छात्रों को 25 
वर्ष तक अध्यापन कार्य का अनुभव प्राप्त है। 
वह एम बी बी एस , एम डी , डी पी एच , डी एच ई , पी एच डी परीक्षाओ 
के लगभग 20 विश्वविद्यालयों और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान सस्थान, नई 
दिल्‍ली, अखिल भारतीय स्वास्थ्य और स्वच्छता सस्थान, कलकत्ता आदि के परीक्षक 
रह चुके है। 
पता--उनका वर्तमान आवासीय पता इस प्रकार है-- 
डॉ रामेश्वर शर्मा, 
बी-32, विजय पथ, तिलकनगर, 
जयपुर (राजस्थान)-302004, भारत 


सदस्यता और फैलोशिप--डॉ शर्मा इन्टरनेशनल एपीडेमीओलॉजीकल 
एसोसिएशन की कार्यकारी परिषद्‌ (दक्षिणी-पूर्वी एशिया मे उसके प्रतिनिधि) भी और 
भारतीय चिकित्सा परिषद्‌ की कार्यकारिणी समिति सहित लगभग 30 वैज्ञानिक 
सस्थाओ के सदस्य रहे चुके हैं। वह फाइनेसिस हेल्‍थ केयर एण्ड हेल्‍थ मेनेजमेट, 
योजना आयोग, भारत सरकार, के कार्य दल के अध्यक्ष रहे। वह योजना आयोग, 
भारत सरकार की आठवीं पचवर्षीय योजना की परिवार कल्याण के लिए परामर्शदात्री 
समिति के सदस्य रहे। वह भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌, नई दिल्‍ली की 
वैज्ञानिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष और वैज्ञानिक सलाहकार दल तथा प्रायोजना 
सलाहकार समितियो के सदस्य रहे। वह भारतीय चिकित्सा अकादमी भारतीय जन 
स्वास्थ्य सघ और राष्ट्रीय पारिस्थितिक विज्ञान सस्थान के फैलो हैं। वह राजस्थान 
विश्वविद्यालय अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय और रोहतक चिकित्सा महाविद्यालय 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 45 


के सकाय सदस्य हैं। वह परिवार “कल्याण फाउन्डेशन राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान 
अकादमी की परिचय-पत्र समिति, राजस्थान विश्वविद्यालय की सीनेट के सदस्य और 
अन्य कई महत्त्वपूर्ण सगठनो के सदस्य और आजीवन सदस्य रहे है। 


सम्मान और पुरस्कार--डॉ शर्मा को सन्‌ 98 ई मे भारतीय चिकित्सा 
परिषद्‌ का गौरवशाली डॉ बी सी रॉय राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया था। चिकित्सा 
सेवा मे उल्लेखनीय सेवाओ के लिए राजस्थान राज्य सरकार ने उन्हे सन्‌ 983 इं 
मे योग्यता प्रमाण-पत्र दिया था। सन्‌ 970 ई मे उन्हे भारतीय चिकित्सा विज्ञान 
अकादमी द्वारा फैलोशिप प्रदान की गई थी। वह सेट थॉमस मेडिकल स्कूल, लन्दन, 
इग्लैंड, स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ, जॉन हॉप्किन्स विश्वविद्यालय, बाल्टीमोर, सयुक्त 
राज्य अमेरिका, और अल फतह विश्वविद्यालय, त्रिपोली, लीबिया मे भ्रमणकारी 
(विजिटिग) प्रोफेसर रहे। वह इन्स्टीट्यूट ऑफ एबीडेमिजोलॉजीकल एसोसिएशन, 
विश्व स्वास्थ्य सगठन के सलाहकार ओर परामर्शद रहे। वह हैल्थ सर्विसेज मेनेजमेट 
रिसर्च एण्ड इन्टरनेशनल जर्नल ऑफ एपीडेमिओलॉनजी, इग्लैंड, एनल्स ऑफ मेडिकल 
साइन्सेज, इण्डियन जर्नल ऑफ कम्यूनिटी मेडिसन, और इण्डियन जर्नल ऑफ 
मेडिकल एज्यूकेशन के सम्पादक मण्डलो के सदस्य रहे हैं। वह राष्ट्रीय पारिस्थितिकी 
विज्ञान सस्थान के पूर्व छात्र सघ और मरुस्थलो, मानव और स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय सेमीनार 
के अध्यक्ष रहे । वह भारतीय स्वास्थ्य प्रशासन सोसायटी के क्षेत्रीय निदेशक, भारतीय 
चिकित्सा परिषद्‌ के निरीक्षक, केन्द्रीय लोक सेवा आयोग, उत्तर प्रदेश लोक सेवा 
आयोग, राजस्थान लोक सेवा आयोग आदि मे विशेषज्ञ, तथा राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान 
अकादमी की राजस्थान शाखा के एपीडेमिओलॉजी विशेषज्ञ मण्डल, रोकथाम और 
सामाजिक औषधि विशेषज्ञ मण्डल के सयोजक और राजस्थान विश्वविद्यालय मे 
चिकित्सा सकाय के अधिष्ठाता भी रहे हैं। उन्हे धन्वन्तरि भाषण के लिए स्वर्ण पदक 
प्रदान किया गया था। 


अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनो मे सहभागिता आदि--डॉ शर्मा सयुकत राज्य अमेरिका, 
इग्लैंड, स्विट्जरलैड, पोलैण्ड, फिलिपीन्स, कोरिया, मलेशिया, थाइलैड, श्रीलका, 
पूएट्रो रीको, जापान, पाकिस्तान, ईरान, एडिनबरा आदि मे अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनो, विश्व 
स्वास्थ्य सगठन और अन्य अन्तर्राष्ट्रीय सगठनो मे भाग ले चुके हैं । 


उन्हे सन्‌ 990 ई मे जॉन्स हॉप्किन्स विश्वविद्यालय, बाल्टीमोर मे अन्तर्राष्ट्रीय 
स्वास्थ्य और विकास पर आयोजित दसवे सेमीनार मे 'रैरिशेषन, स्ट्रक्चरल एडजस्टमेट 
एण्ड इन्नोवेटिव हैल्थ फाइनेसिग” विषय पर विशेष सत्र मे विषय विशेषज्ञ के रूप 
मे आमत्रित किया गया था तथा उन्होने एपीडेमिओलॉजी एण्ड मेनेजमेट विषय पर 


46 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


अपना पत्र प्रस्तुत किया और लन्दन विश्वविद्यालय के 'इन्स्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हैल्थ' 
मे आयोजित 'इन्टरनेशनल नेट वर्किग ऑफ हैल्थ मेनेजमेट” विषय पर सेमीनार मे 
भी भाग लिया। 

प्रकाशन--डॉ शर्मा ने विदेशो मे प्रकाशित पुस्तको मे अध्याय लिखे हैं | उनके 
40 से अधिक शोध-पत्र विदेशी और अन्तर्राष्ट्रीय जर्नतो तथा विश्व ख्याति के भारतीय 
जर्नलो मे प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने भारतीय और विदेशी पुस्तको की भूमिकाये 
तथा समीक्षाये लिखी हैं। 

अनुसन्धान और अध्यापन के मुख्य क्षेत्र एवं देन--उनकी अध्यापन और 
अनुसन्धान अभिरुचि के मुख्य क्षेत्र है--(१) स्वास्थ्य प्रबन्ध, (2) एपिडेमिओलॉजी, 
(3) रोकथाम और सामाजिक चिकित्सा और (4) सामुदायिक चिकित्सा। 

उन्होने देश के प्रथम स्वास्थ्य प्रबन्ध सस्थान की योजना, सकल्पना और सगठन 
मे योग दिया। भारत सरकार ने उन्हे 98 ई मे स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मे 
चिकित्सा शिक्षा समीक्षा समिति का सदस्य नियुक्त किया था। वह रोकथाम और 
सामाजिक चिकित्सा विभाग को चिकित्सा विज्ञान के विश्व मानचित्र पर एक महत्त्वपूर्ण 
स्थान तक ले आए और एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय मे इस विभाग के 
अवलोकनार्थ विश्व स्वास्थ्य सगठन के फैलो तथा विश्व के विभिन्‍न देशो से अन्य 
विशेषज्ञ आए। उन्होने स्नातक और स्नातकोत्तर छात्रो के लिए शैक्षिक एव 
प्रशिक्षणात्मक कार्यक्रम का पुनर्गठन किया। 

डॉ शर्मा की मान्यता है कि दम्पत्तियो की अभिरुचि, उनकी मान्यताओ तथा 
उनकी सामाजिक- आर्थिक परिस्थितियो के अनुरूप परिवार कल्याण कार्यक्रम का 
प्रचार करे, तभी जन्म दर को कम करने मे हमे सफलता मिल सकती है। 

[] 


प्रोफेसर के सम्बामूर्ति 
(]93] ई ) 


जन्म एवं वश परिचय--प्रो के सम्बामूति का जन्म ॥3 अप्रैल, 93१ ई 
को आन्ध्रप्रदेश के गुदूर जिले मे बपटला नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता स्वर्गीय 
श्री के वी नरसिहम एक वकील के यहाँ लिपिक पद पर काय करते थे। उनकी 
माता स्वर्गीय श्रीमती के पिटचम्मा गृहिणी थी। सन्‌ 7936 ई में जन्मी उनकी जीवन 
सगिनी श्रीमती के शारदा ने इन्टरमीडिएट तक शिक्षा प्राप्त की है। उनके एक पुत्री 
और दो पुत्र हैं। सन्‌ 957 ई मे उत्पन्न उनकी पुत्री श्रीमती वाई श्यामला 
एम बी बी एस स्वतत्र चिकित्सक हैं। उसका पति सन्‌ 955 ई मे उत्पन्न डॉ वाई 
नागराजू एम बी बी एस प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र मे चिकित्सक हैं। दोनो आन्श्रप्रदेश 
के श्री काकुलम जिले मे अच्युतपुरम नामक गाँव मे रह रहे हैं। उनके वाई स्पनन्दना 
नामक एक पुत्री तथा वाई दिव्य तेला नामक एक पुत्र है। सन्‌ 959 ई मे जन्मा 
उनका ज्येष्ठ पुत्र श्री के एन राव बी कॉम है और पोर्ट ट्रस्ट कार्यालय, विशाखापत्तनम 
मे लिपिक पद पर कार्यरत है। वह शारीरिक रूप से कुछ विकलॉग है तथा अविवाहित 
है। सन्‌ 96 ई मे उत्पन्न उनका दूसरा पुत्र श्री के रामना मूर्ति बीई (यात्रिक 
अभियात्रिकी ), कोरोमण्डल उर्वरक फैक्ट्री, विशाखापत्तनम मे वरिष्ठ प्लान्ट अभियन्ता 
है। उसकी पत्नी श्रीमती सुन्दर लक्ष्मी एम एस सी (वनम्पिति विज्ञान) है और एक 
स्थानीय महाविद्यालय मे व्याख्याता पद पर कार्यरत है। 


शैक्षिक जीवन--प्रो मूर्ति की प्रारम्भिक विद्यालयी और हाई स्कूल शिक्षा 
आन्श्रप्रदेश के गुटूर जिले पे बपटला नामक स्थान मे सम्पन्न हुई तथा सन्‌ 946 
ई मे उन्होने एस एस एल सी परीक्षा उत्तीर्ण की। वर्ष १946-48 ई में वह हिन्दू 
कॉलेज, गुट्र मे गणित, भौतिकी और रसायन शास्त्र विषय लेकर इटरमीडिएट मे 
अध्ययनरत रहे | इटरमीडिएट परीक्षा उन्होने प्रथम श्रेणी ओर तीन वर्ग विषयो मे विशेष 
योग्यता सहित उत्तीर्ण की। वर्ष 9948-5 ई मे वह आन्श्र विश्वविद्यालय, वाल्टेयर 
मे भैषजिकी सहित रासायनिक प्रौद्योगिकी अपने अध्ययन का मुख्य विषय लेकर 
बी एससी (ऑनर्स) तथा वर्ष 95-52 ई मे भेषजिकी सहित रासायनिक 
प्रौद्योगिकी अपने अध्ययन का मुख्य विषय लेकर एम एस सी मे नियमित छात्र रहे । 


48 भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक 


बी एस सी (ऑनर्स) और एम एस सी दोनो मे उन्होने प्रथम श्रेणी अर्जित की तथा 
भैषजिकी स्नातको म उनका स्थान प्रथम रहा तथा स्नातकोत्तर स्तर पर भेषजिकी 
सस्‍्नातको म॑ प्रथम श्रेणी प्राप्त करने वाल॑ वह एकमात्र छात्र थे। आन्ध्र विश्वविद्यालय 
से भैषजिकी सहित गसायनिक प्रौद्योगिकी विशिष्ट विषय लेकर एम एस सी परीक्षा 
उत्तीर्ण करने के उपरान्त वह अनुसन्धान कार्य मे प्रवृत्त रहे और उसी विश्वविद्यालय 
ने प्राकृतिक उत्पाद रसायन शास्त्र मे सन्‌ 960 ई में उन्हें डीएस सी की उपाधि 
प्रदान की। आन्ध्र विश्वविद्यालय मे ट्रिटरपेनोइड्स के क्षेत्र मे अनुसन्धान करने वाल 
वह प्रथम व्यक्ति थे ओर उन्होने परतत्रोतोत्पत्ति सम्बन्धी व्याख्या के साथ एक विरल 
पचचक्रीय ट्रिटरपेनोइड्स नामक एक ऑक्साइड की महत्त्वपूर्ण देन प्रदान की। 


अक्टूबर, 962 ई से जुलाई, 965 ई तक बरमिघम विश्वविद्यालय, इग्लैड 
मे पी एच डी उपाधि हेतु जैवरासायनिक अभियात्रिकी (जैवप्रोद्योगिकी का एक भाग) 
मे अनुसन्धान कार्य हतु भारत सरकार ने उनका चयन राष्ट्रमण्डलीय छात्रवृत्ति के लिए 
किया। यह कार्य मापन के लिए एक लाभदायक यत्र के रूप मे सगणक का प्रयोग 
करते हुए निदिष्ट सिद्धान्तो के सह-सम्बन्ध के साथ उत्तेजित उफान प्रणालियो मे 
ऑक्सीजन स्थानान्तरण की दरों पर समतल फल वाली टरबाइन प्रेरको के प्रारूप वैभिन्य 
के प्रभावों से सम्बद्ध है। भारत मे इस क्षेत्र मे डॉक्टरेट उपाधि प्राप्त करने वाले वह 
प्रथम व्यक्ति है तथा उनके शोध कार्य को जैवरासायनिक अभियात्रिकी विषयक पुस्तको 
मे उद्धृत किया गया है। इस प्रकार वह आन्ध्र विश्वविद्यालय से भेषजिकी सहित 
रासायनिक प्रौद्यागिकी मे विशेषता सहित एम एस सी और डी एस सी तथा बरमिध्म 
विश्वविद्यालय (इग्लैड) से पी एचडी है। 


व्यवसाय के क्षेत्र मे--स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करते ही उन्हे आमन्ध्र 
विश्वविद्यालय, वाल्टेयर मे भेषज विज्ञान विभाग मे पदभार ग्रहण करने के लिए 
आमत्रित किया गया था। वह इस विभाग के कतिपय सस्थापक सदस्यों मे से एक 
थे। 25 अगस्त, 952 ई से 3 टिसम्बर, 952 ई तक वह औषधि निर्माता क पद 
पर रहे। 4 दिसम्बर 952 ई से 2] नवम्बर, 965 ई तक वह व्याख्याता, 22 
नवम्बर, 965 ई से 28 मितम्बर, 975 ई तक रीडर और 29 सितम्बर ॥975 
ई से 30 अप्रैल 399 ई तक प्रोफेसर पद पर कार्यरत रहे तथा ) मई, 99 का 
सेवानिवृत्त हो गये। आन्ध्र प्रदेश विश्वविद्यालय मे विभागाध्यक्ष प्रति तीन वर्ष के क्रम 
से बदलता रहता है। नवम्बर 982 ई से तीन वष तक वह विभागाध्यक्ष के पद 
पर कार्यरत रहे। विश्वविद्यालय अनुदान आयाग ने उन्हे इमेरिटस फैलो का पद 
प्रस्तावित किया जिसका कार्यभार उन्होने सितम्बर, 99] ई मे ग्रहण कर लिया। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 5] 


फोस्फेटेडिल कोलिन (पीसी ) आर फोस्फोलिफेज के पृथक्कीकरण की 
प्रक्रियाओं का विकास किया। 


प्रकाशन--डॉ मूर्ति के जैव-प्रौद्योगिकी, जेंव रासायनिक अभियात्रिकी 
प्राकृतिक उत्पाद रसायन तथा औषधि निर्माण णोद्योगिकी और अन्य प्रकरणों पर 74 
शोध-पत्र भारतीय और विदेशी जर्नलो मे प्रकाशत हुए है तथा राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय 
सम्मेलनो और परिसवादो मे प्रस्तुत हुए हैं। व्यावसायिक विषयो पर उनकी रेडियो 
वातये भी प्रसारित हुई। बी फार्मा स्नातक पाठ्यक्रम पर उनकी एक पुस्तक प्रकाशित 
हुई है। 

विदेश भमण--डॉ मूर्ति तीन वर्ष तक इग्लंड रहे और वहाँ प्रवास 
काल मे वह फ्रास, पश्चिमी जर्मनी और इटली मे कुछ समय के लिए गए। सन्‌ 
3979 ई में वह व्यावहारिक सूक्ष्म जीव विज्ञान के पृथ्वी पर प्रभाव पचम्‌ 
अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेंलन मे अपना पत्र प्रस्तुत करने के लिए 0 दिन के लिए बैकाक 
गये। सन्‌ 986 ई मे वह जैव-प्रौद्योगिकी मे भारत-सोवियत सास्कृतिक आदान- 
प्रदान कार्यक्रम के अन्तर्गत 6 सप्ताह के लिए सोवियत रूस गए। इस अवधि मे 
उन्होने मास्को राज्य विश्वविद्यालय के कई विभागों तथा मास्को और लेनिनग्राड मे 
कई राष्ट्रीय शोध सस्थाओ का अवलोकन किया। मास्को और लोनिनग्राड मे उन्होने 
अपना शोध कार्य प्रस्तुत किया। दिसम्बर, 987 ई मे वह होनोलूलू मे जे यू सी 
फार्मा साइन्स नामक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन मे प्राकृतिक साधनो और पी सी से पी जी 
मे क्षोभकीय परिवर्तन एव पीजी के पृथक्कीकरण पर शोध-पत्र प्रस्तुत करने के 
लिए सम्मिलित हुए। मार्च, १99] ई मे न्‍यू ओसलीन, यूएस ए मे आयोजित 
अमेरिकन फार्मास्यूटिकल एसोसिएशन के अधिवेशन मे उन्होंने एक शोध-पत्र 
प्रस्तुत किया। 


सेमीनारो, सम्मेलनो आदि मे आमत्रण--डॉ मूर्ति पूना ओर ऋषिकेश मे 
अखिल भारतीय सृक्ष्म जीव वैज्ञानिक सम्मेलनो मे समग्र व्याख्यान प्रस्तुत करने के 
लिए आमत्रित किये गये थे। वह भारतीय प्रौद्योगिकी सस्थान, दिल्ली मे जीव वैज्ञानिक 
अभियात्रिकी अध्ययन पीठ मे तथा बडौदा और वाल्टेयर (रासायनिक अभियात्रिकी 
विभाग मे दो बार) मे जैव प्रौद्योगिकी अध्ययन पीठ के भारतीय प्रौद्योगिकी शिक्षा 
अध्ययन पीठ मे व्याख्यान माला एवं इण्डियन फार्मास्युटिकल काग्रेस, कलकत्ता मे 
'' एप्लीकेशन ऑफ इम्मोबिलाइज्ड एन्जाइम्स इन फार्मास्युटिकल इन्डस्ट्री--भेषजीय 
उद्योग मे अचल क्षोभको का प्रयोग'' पर समग्र व्याख्यान प्रस्तुत करने के लिए आमत्रित 
किए गए थे। उन्होने क्षेत्रीय अनुसन्धान प्रयोगशाला जम्मू मे ओद्योगिक खमीरीकरण 


48 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


बी एस सी (ऑनर्स) और एम एस सी दोनो मे उन्होने प्रथम श्रेणी अर्जित की तथा 
भैषजिकी सनातको म उनका स्थान प्रथम रहा तथा स्नातकोत्तर स्तर पर भेषजिकी 
स्नातको मे प्रथम श्रेणी प्राप्त करा वाल वह एकमात्र छात्र थे। आन्ध्र विश्वविद्यालय 
मे भैषजिकी सहित रासायनिक प्रौद्योगिकी विशिष्ट विषय लेकर एम एस सी परीक्षा 
उत्तीर्ण करन॑ के उपरान्त वह अनुसन्धान कार्य मे प्रवृत्त रहे और उसी विश्वविद्यालय 
ने प्राकृतिक उत्पाद रसायन शास्त्र मे सन्‌ 960 ई मे उन्हं डी एस सी की उपाधि 
प्रदान की। आन्ध्र विश्वविद्यालय मे ट्रिटरपेनोइड्स के क्षेत्र मे अनुसन्धान करने वाले 
वह प्रथम व्यक्ति थे ओर उन्होने परतत्रोतोत्पत्ति सम्बन्धी व्याख्या के साथ एक विरल 
पचचक्रीय ट्रिटरपेनोइड्स नामक एक ऑक्साइड की महत्त्वपूर्ण देन प्रदान की। 

अक्टूबर, 962 ई से जुलाई, 965 ई तक बरमिघम विश्वविद्यालय, इग्लैड 
मे पी एच डी उपाधि हेतु जैवरासायनिक अभियात्रिकी (जैवप्रौद्योगिकों का एक भाग) 
मे अनुसन्धान कार्य हतु भारत सरकार ने उनका चयन राष्ट्रमण्डलीय छात्रवृत्ति के लिए 
किया। यह कार्य मापन के लिए एक लाभदायक यत्र के रूप मे सगणक का प्रयोग 
करते हुए निदिष्ट सिद्धान्तो के सह-सम्बन्ध के साथ उत्तेजित उफान प्रणालियो मे 
ऑक्सीजन स्थानान्तरण की दरा पर समतल फल वाली टरबाइन प्रेरको के प्रारूप वैभिन्‍्य 
के प्रभावों से सम्बद्ध है। भारत मे इस क्षेत्र मे डॉक्टरेट उपाधि प्राप्त करने वाले वह 
प्रथम व्यक्ति है तथा उनके शोध कार्य को जैवरासायनिक अभियात्रिकी विषयक पुस्तको 
मे उद्धृत किया गया है। इस प्रकार वह आन्ध्र विश्वविद्यालय से भेषजिकी सहित 
रासायनिक प्रौद्योगिकी मे विशेषता सहित एम एस सी और डी एस सी तथा बरमिध्मम 
विश्वविद्यालय (इग्लैंड) से पी एचडी है। 


व्यवसाय के क्षेत्र मे--स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करते ही उन्हे आमन्ध्र 
विश्वविद्यालय, वाल्टेयर म॑ भेषज विज्ञान विभाग में पदभार ग्रहण करने के लिए 
आमत्रित किया गया था। वह इस विभाग के कतिपय सस्थापक सदस्यो मे से एक 
थे। 25 अगस्त, 952 ई से 3 दिसम्बर, 952 ई तक वह और्षाध निर्माता क पद 
पर रहे। 4 दिसम्बर 952 ई से 2। नवम्बर, 965 ई तक वह व्याख्याता, 22 
नवम्बर, 965 ई से 28 मितम्बर, 4975 ई तक रीडर ओर 29 सितम्बर ॥975 
ई से 30 अप्रैल 99] ई तक प्रोफेसर पद पर कार्यरत रहे तथा  मइ, 99] का 
सेवानिवृत्त हो गये। आन्श्र प्रदेश विश्वविद्यालय मे विभागाध्यक्ष प्रति तीन वर्ष के क्रम 
से बदलता रहता है। नवम्बर 982 ई से तीन वर्ष तक वह विभागाध्यक्ष के पद 
पर कार्यरत रहे। विश्वविद्यालय अनुदान आयाग ने उन्हे इमेरिटस फैलों का पद 
प्रस्तावित किया जिसका कार्यभार उन्होने सितम्बर, 99 ई मे ग्रहण कर लिया। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 49 


वह 40 वर्ष तक बी फामा स्तर पर भेषज निर्माण भेषजीय अभियात्रिकी, 
जैव वैज्ञानिक भेषज, विधि विज्ञान भेषज एवं सम्बद्ध विषय तथा ए फामा स्तर पर 
ज॑ंव प्रोद्योगिकी जेव रासायनिक अभियात्रिकी क्षोभक अभियात्रिकी, अचल क्षोभक 
आदि, भेषज निर्माण भेषजीय प्रौद्योगिकी तथा विकसित भोतिकीय भेषज विषय 
अध्यापित करते रहे। 


डॉ मूर्ति ने बी फार्मा और एम फार्मा स्तरों पर भेषज वर्ग मे कइ विषयो 
का समारम्भ तथा विकास किया। उन्होने स्नातकोत्तर एव पी-एच डी स्तरो पर जैव 
प्रौद्योगिकी एव जैव रासायनिक अभियात्रिकी का समारम्भ ओर विकास किया तथा 
आन्ध्र विश्वविद्यालय मे भेषजीय जैव प्राद्योगिकी मे एम फार्मा मे विशेषज्ञता हेतु पृथक्‌ 
विषय प्रारम्भ करने मे वह सहायक बने। उन्होने कई वर्ष तक आन्ध्र विश्वविद्यालय 
के एम एस सी उत्तरार्द्र के जैवरसायन विषय क छात्रो को उबाल (खमीर) प्रोद्योगिकी 
विषय पढाया तथा एम एस सी अन्तिम वर्ष के जैव रसायन विषय के छात्रो को खमीर 
प्रौद्योगिकी पर व्याख्यान देने के लिए तीन वष॑ तक सरदार वलल्‍लभ विश्वविद्यालय 
के जेवरसायन विभाग मे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विजिटिग प्रोफेसर के पद 
पर आमत्रित किए गए। 


सन्‌ 3967 ई मे डॉ मूर्ति को भारतीय शौद्योगिकी सस्थान, दिल्ली मे जैव 
रासायनिक अभियात्रिकी प्रोफेसर पद प्रस्तावित किया गया थ्य! सनू 979 ई मे उन्हे 
महाप्रबन्धक अनुसन्धान और विकास, एन्टीबॉयोटिक्स सयत्र, ऋषिकेश के पद-भार 
को ग्रहण करने क॑ लिए आमत्रित किया गया था। 


अनुसन्धान के क्षेत्र मे योगदान--बी फार्मा स्तर पर उनकी अध्यापन रुचि 
के क्षेत्र सभी भेषजीय वर्ग के विषय तथा एम फार्मा स्तर पर जैव प्रौद्योगिकी वर्ग 
के विषय है। उनकी अनुसन्धान अभिरुचि जैव प्रौद्योगिकी ओर भेषजीय प्रोद्योगिकी 
समस्याओ मे है। 

डॉ मूर्ति को 40 वर्ष का अध्यापन तथा 26 वर्ष का अनुसन्धान अनुभव है। 
उन्हांन 5 पी-एच डी और 43 एम फार्मा शोध प्रबन्ध का मार्गदर्शन किया है तथा 
0 अन्य एम फार्मा शोब प्रबन्धों का परोक्ष रूप से निरीक्षण किया है, क्योकि द्वितीय 
वर्ष एम फार्मा पूर्णतया अनुसन्धान पर आधारित है। 

शोध प्रकरण, जिन पर मार्गदर्शन किया गया है ओर किया जा रहा हे, इस 
प्रकार है--टेक्सोनोमी ऑफ रेयर एक्टिनोमाइसेटस फ्रोम टेरेस्ट्रिअल एण्ड मेराइन 
सब्सट्रेटस, एण्टीबायोटिक्स फ्रोम रेयर एक्टिनोमाइसेटस ए त्रेरययटी ऑफ आस्पेक्टस 
ऑन दि सेप्रोफिटिक्स प्रोडक्शन ऑफ एगोट एल्कालोइल्डस, एमीलोग्लूकोभाइडेस 


६0 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


एण्ड ग्ल्‌कोज आइसोमेरेस, इन्डस्टअल एन्जाइम्स एण्ड देयर इम्मोबाइलिजेशन, 
प्रोडक्शन ऑफ डेक्सट्रोज मोनोहाइड्ेट फ्रोम टेपिओका स्टॉर्च, प्रोटीन हाइड्रोलाइसेट्स 
फ्रोम प्रोटीन रिच सीड केकस एण्ड डेवलपमेट ऑफ फोर्मूलेशन्स, आइसोलेशन ऑफ 
फोस्फेटेडिल कोलिन एण्ड फोस्फोलिफेज डी फ्रोम नेचुरल सोर्सेज एण्ड एजाइमेटिक 
कन्वर्जज ऑफ फोस्फेटेडिल कोलिन ट्र फोस्फेटेडिल ग्लिसरोल एण्ड आइसोलेशन 
ऑफ फोस्फेटेडिल ग्लिसरोल, डंवलपमेट ऑफ न्यूअर सिस्टम्स एण्ड मैथ्ड्स इन 
_इक्रोबॉयोजिकल कन्वर्जज ऑफ इस्टेरोइड्स आदि। 

उन्होने मुख्य अवशोषको के अग्र भाग मे जल मे घुलनशील औषधियो को 
खुराक के दिये जाने वाले स्थिर स्वरूपो के विकास पर पी एच डी कार्य का मार्गदर्शन 
किया था। उन्होने ठण्डे शुष्क इन्सूलिन सूत्रीकरण तथा ठण्डे शुष्क उत्पादन की स्थिरता 
पर एम फार्मा हेतु कार्य का मार्गदर्शन किया। 


डॉ मूर्ति ने वैज्ञिनिक और औद्योगिक अनुसन्धान परिषद्‌ की प्रायोजना 
“'इन्वेस्टीगेशन एण्ड डेवलपमेट ऑफ इन्डिजिनस टेक्नीकल नो-हाउ ऑन दि 
इकोनोमिक प्रोडक्शन ऑफ यूजफुल एगोट अल्कालोइड्स बाइ सेप्रोफिटिक 
कल्टीवेशन ऑफ क्लेवीसेप्स स्पेसीज अर्थात्‌ क्लेवीसेप्स प्रजाति के गलितोय 
पौधो (सडी हुई वनस्पति पर जीने वाले पौधो) की खेती द्वारा लाभदायक एर्गोट 
(गेर॒ुह पौधों का एक प्रकार का रोग) के क्षाराभो (वनस्पतियो के मूल तत्त्वो) 
के आर्थिक उत्पादन पर स्वदेशी तकनीक ज्ञान का अन्वेषण और विकास '' का 
वर्ष १974-77 ई मे मार्गदर्शन किया तथा सन्‌ 962 ई से पूर्व “भारतीय 
रोडेडेन्ड्रीन (गुलाब के समान फूल वाला पौधा) प्रजाति का रासायनिक 
अन्वेषण '' नामक वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसन्धान परिषद्‌ की एक प्रायाजना 
के सह-निरीक्षक प्रभारी रहे। 


विधियो अथवा प्रक्रियाओ का विकास--डॉ मूर्ति ने अम्ल क्षोभक जल- 
अपघटन (#9970५88) द्वारा स्थानीय माड से द्वाक्षा-शर्करा मोनोहाइड्रेट ( अकेले 
किसी पदार्थ का पानी मे घोल) और एभीलोग्लूकोसीडेस के उत्पादन की प्रक्रिया 
का विकास किया। उन्होने नवीन तनाव से पृथक उच्चतर ट्राइट्रेस प्रदान करने के 
साथ तथा अधिक साधारण आरोग्य विधि के साथ नियोमाइसिन (जीवाणु नाशक 
दवा जिसका प्रयोग अन्त्रीय रोगाणुओ की वृद्धि को रोकने के लिए किया जाता 
है) के उत्पादन की प्रक्रिया विकसित की। उन्हांने एक नये हेप्टेइन एण्टीबॉयोटिक 
को पृथक किया। उन्होने घुलनशील ओर अचल क्षोभको का प्रयोग करते हुए प्रोटीन 
सम्पन्न अजवायन मिली मीठी टिकिया म॑ प्रोटीन हाइड्रोलिसेटस तैयार करने, 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 5] 


फोस्फेटेडिल कोलिन (पीसी ) आर फोस्फोलिफेज के पृथक्कीकरण की 
प्रक्रियाओ का विकास किया। 


प्रकाशन--डॉ मूर्ति के जैव-प्रौद्योगिकी, जैव रासायनिक अभियात्रिकी 
प्राकृतिक उत्पाद रसायन तथा ओषधि निर्माण णोद्योगिकी और अन्य प्रकरणों पर 74 
शोध-पत्र भारतीय और विदेशी जर्नलो मे प्रका।शत हुए है तथा राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय 
सम्मेलनो और परिसवादो मे प्रस्तुत हुए है। व्यावसायिक विषयो पर उनकी गेडियो 
वार्ताये भी प्रसारित हुई। बी फार्मा स्नातक पाठ्यक्रम पर उनकी एक पुस्तक प्रकाशित 
हुई है। 

विदेश भ्रमण--डॉ मूर्ति तीन वर्ष तक इग्लैड रहे और वहाँ प्रवास 
काल मे वह फ्रास, पश्चिमी जर्मगी और इटली मे कुछ समय के लिए गए। सन्‌ 
979 ई में वह व्यावहारिक सूक्ष्म जीव विज्ञान के पृथ्वी पर प्रभाव पचम्‌ 
अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेंलन मे अपना पत्र प्रस्तुत करने के लिए 0 दिन के लिए बैकाक 
गये। सन्‌ 4986 ई में वह जैव-प्रौद्योगिकी मे भारत-सोवियत सास्कृतिक आदान- 
प्रदान कार्यक्रम के अन्तर्गत 6 सप्ताह के लिए सोवियत रूस गए। इस अवधि मे 
उन्होने मास्को राज्य विश्वविद्यालय के कई विभागो तथा मास्को और लेनिनग्राड मे 
कई राष्ट्रीय शोध सस्थाओ का अवलोकन किया। मास्को और लोनिनग्राड मे उन्होने 
अपना शोध काय॑ प्रस्तुत किया। दिसम्बर, 987 ई मे वह होनोलूलू मे जे यू सी 
फार्मा साइन्स नामक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन मे प्राकृतक साधनो और पी सी से पी जी 
मे क्षोभकीय परिवर्तन एव पीजी के पृथक्कीकरण पर शोध-पत्र प्रस्तुत करने के 
लिए सम्मिलित हुए। मार्च 399] ई मे न्‍यू ओसलीन, यू एस ए मे आयोजित 
अमेरिकन फार्मास्यूटिकल एसोसिएशन के अधिवेशन मे उन्होंने एक शोध-पत्र 
प्रस्तुत किया। 


सेमीनारो, सम्मेलनो आदि मे आमत्रण--डॉ मूर्ति पूना ओर ऋषिकेश मे 
अखिल भारतीय सूक्ष्म जीव वैज्ञानिक सम्मेलनो मे समग्र व्याख्यान प्रस्तुत करने के 
लिए आमत्रित किये गये थे। वह भारतीय प्रोद्योगिकी सस्थान, दिल्ली मे जीव वैज्ञानिक 
अभियात्रिकी अध्ययन पीठ मे तथा बडोदा और वाल्टेयर (रासायनिक अभियात्रिकी 
विभाग मे दो बार) मे जैव प्रौद्योगिकी अध्ययन पीठ के भारतीय प्रौद्योगिकी शिक्षा 
अध्ययन पीठ मे व्याख्यान माला एवं इण्डियन फार्मास्युटिकल काग्रेस, कलकत्ता मे 
“एप्लीकेशन ऑफ इम्मोबिलाइज्ड एन्‍्जाइम्स इन फामास्युटिकल इन्डस्ट्री--भेषजीय 
उद्योग मे अचल क्षोभको का प्रयोग '' पर समग्र व्याख्यान प्रस्तुत करने के लिए आमत्रित 
किए गए थे। उन्होने क्षेत्रीय अनुसन्धान प्रयोगशाला जम्मू मे ओद्योगिक खमीरीकरण 


52 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


पर परिसवाद के एक सत्र तथा वाराणसी मे '' भारत मे भेषजीय शिक्षा--सिहावलोकन 
एवं आकॉरक्षा'' विषय पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग सेमीनार के सत्र की अध्यक्षता 
की | उन्होने वाल्टेयर मे इण्डियन फार्मास्युटिकल काग्रेस मे औद्योगिक भेषज विज्ञान 
ओर सूक्ष्म जीव विज्ञान सभाग एव प्रमुख भाषणों की अध्यक्षता की। वह कलकत्ता 
मे “उद्योग मे जैव प्रौद्योगिकीय प्रक्रियाये'” विषयक सेमीनार मे एक सत्र के सह 
अध्यक्ष रहे। उन्होने जयपुर मे इण्डियन फार्मास्युटिकल काग्रेस मे खमीरीकरण 
प्रौद्योगिकी पर प्रथम सत्र का आयोजन एवं सभापतित्व किया। वह विश्वविद्यालय 
अनुदान आयोग, वैज्ञिनिक और औद्योगिक अनुसन्धान परिषद्‌ तथा पर्यावरण 
विभाग, भारत सरकार को प्रस्तुत शोध प्रायोजनाओ के लिए सदर्भ व्यक्ति रहे । दिसम्बर, 
990 ई मे मणिपुर मे आयोजित इण्डियन फार्मास्युटिकल काग्रेस के वार्षिक अधिवेशन 
मे वह जैव प्रौद्योगिकी सत्र के अध्यक्ष थे। 


सदस्यता और सम्मान--डॉ मूर्ति देश मे भेषज विज्ञान सस्थाओ की 
कार्यप्रणाली के निरीक्षण एवं प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के लिए भारतीय भेषज विज्ञान 
परिषद्‌ की ओर से निरीक्षक, आन्ध्र विश्वविद्यालय मे भेषज विज्ञान के पाठयक्रम 
मण्डल के अध्यक्ष तथा काकलीय विश्वविद्यालय, सम्बलपुर और गुलबर्गा 
विश्वविद्यालयों मे भेषज विज्ञान क॑ पाठ्यक्रम मण्डल के सदस्य, बगलोर 
विश्वविद्यालय मे परीक्षक मण्डल के सदस्य, अन्य विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय 
प्रयोगशालाओ मे शैक्षिक कर्मचारियो एवं वैज्ञानिकों की चयन समितियो के सदस्य, 
जर्नल ऑफ माइक्रोबियल बॉयोटेक्नोलॉजी के सम्पादक मण्डल के सदस्य, 
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जैव प्रौद्योगिकी तथा भेषज विज्ञान समितियो एव सघ 
लोक सेवा आयोग चयन समितियो के सदस्य हैं। वह खमीरीकरण और सूक्ष्म जीव 
विज्ञान प्रकरणो सहित भेषज विज्ञान वर्ग के सभी विषयो मे स्नातक, स्नातकोत्तर एव 
पी एच डी स्तर पर कई विश्वविद्यालयो के परीक्षक है। वह आन्ध्र विश्वविद्यालय 
की शैक्षिक परिषद्‌ के सदस्य, भारतीय भेषज विज्ञान अध्यापक सघ के परिषद्‌ सदस्य 
तथा बाद मे उपाध्यक्ष एवं अध्यक्ष, इण्डियन फार्मास्युटिकल एसोसिएशन के आमन्ध्र 
राज्य स्कन्ध के सस्थापक मानद सचिव और कोषाध्यक्ष तथा बाद मे उपाध्यक्ष, आमन्ध्र 
विश्वविद्यालय अध्यापक सघ के अध्यक्ष तथा आन्श्रप्रदेश विश्वविद्यालय अध्यापक 
सघ के परिसघ के उपाध्यक्ष, आन्भ्रप्रदेश औषधि तकनीकी सलाहकार मण्डल के 
सदस्य, इण्डियन फार्मास्युटिकल गसोसिएशन की स्थानीय शाखा के अध्यक्ष, 
आन्श्रप्रदेश विश्वविद्यालय, वाल्टेयर म॑ शोध छात्रो के छात्रावास के अध्यक्ष, एव उसकी 
आर्थिक स्थिरता मे योग दिया, तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग प्रौद्योगिकी समिति 
के सदस्य रहे। उन्होने इण्डियन फार्मास्युटिकल एसोसिएशन के वार्षिक सम्मेलनो मे 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 53 


खमीरीकरण प्रौद्योगिकी (अब जैव प्रौद्योगिकी) को पृथक्‌ सत्र के रूप मे प्रारम्भ 
करने की दिशा मे पहल की। 
पता--उनका वर्तमान कार्यालयी पता इस प्रकार है-- 
प्रो के सम्बामूर्ति, 
एम एस सी कैम टैक (फार्मेसी), 
डी एस सी (आन्ध्र), 
पी एच डी (बरमिघम), 
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग इमेरिट्स फैलो एव 
मुख्य अन्वेषक डी बी टी प्रायोजना, 
भेषजीय विज्ञान विभाग, आन्ध्र विश्वविद्यालय, 
वाल्टेयर, विशाखापत्तनम (आशन्श्रप्रदेश)-530003, भारत 
उनका वर्तमान आवासीय पता इस प्रकार है-- 
9-9-9 बी, सी बी एम कम्पाउन्ड, 
विशाखापत्तनम (आन्धश्रप्रदेश)-530003, भारत 


डॉ के एस चुघ 
(932 ई ) 


जन्म, परिवार एवं शिक्षा--डॉ कृपालसिह चुघ का जन्म १2 दिसम्बर, 
932 ई को पजाब राज्य के अमृतसर जिले मे पट्टो नामक स्थान पर हुआ था। उनकी 
जीवन-सगिनी श्रीमती हरजीत चुध कण्ठ सगीत विषय मे व्याख्याता हैं। उनके 
मिनिआपोलिस, यू एस ए मे कार्यरत डॉ सुमीत चुध एमडी और स्नातकोत्तर 
चिकित्सा शिक्षा और अनुसन्धान सस्थान, चडीगढ मे कार्यरत डॉ सुमन्‍्त चुघ एम डी 
नामक दो पुत्र हैं। 


प्रो चुध एमबीबीएस, एमडी, एफएसीपी, एफए एम एस ओर 
एफ आई सी एस हैं। 


व्यावसायिक जीवन--डॉ के एस चुघ भूतपूर्व, अध्यक्ष, भेषज विज्ञान 
विभाग और प्रोफेसर तथा अध्यक्ष, वृक्क (गुर्दा) विज्ञन विभाग एवं उप-अधिष्ठाता 
स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा और अनुसन्धान सस्थान, चडीगढ-60042, (भारत) 
विश्वविख्यात चिकित्सक एवं वृकक्‍्क विज्ञानी हैं। वह इस पद पर सन्‌ 4980 ई से 
3 दिसम्बर, 4992 ई तक कार्यरत रहे। 


पता--उनका आवासीय पता निम्नलिखित है-- 
डॉ के एस चुघ, 
58, सेक्टर 5, चडीगढ-60005, भारत 


देन--उनकी मुख्य देन गुर्दा सम्बन्धी औषधि के क्षेत्र मे है जिसमे उष्ण 
कटिबन्धीय देशो मे विषम गुर्दा सम्बन्धी विफलता के स्वरूप, सॉप के कायने से गुर्दा 
सम्बन्धी चोटो (घावो) के रोगवर्धन, उष्णकटिबन्धीय सक्रामक रोगो जैसे कुष्ठ रोग, 
क्षय रोग और पट्ट कृमियो की वश वृद्धि से सम्बद्ध गुर्दा सम्बन्धी रोग, गुर्दा सम्बन्धी 
स्टार्चोपम (माडी सदृश) अन्तकोशिका जमाव, भारत मे नवयुवको मे ताकायासु के 
धमनी शोथ के कारण गुर्दावाहिनी सम्बन्धी उच्च रक्त चाप गुर्दा सम्बन्धी रोग से 
सम्बद्ध गर्भावस्‍था आदि सम्मलित हैं। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 55 


सम्मान और पुरस्कार--डॉ चुघ ने विभिन्‍न अन्तर्राष्ट्रीय सस्थाओ मे पद 
धारण किए है। वह एशियन पैसिफिक सांसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी के अध्यक्ष है । 
वह 975 ई मे एसोसिएशन ऑफ फिजीशियन्स ऑफ इण्डिया के अध्यक्ष तथा 
978 ई में इण्डियन कॉलेज ऑफ फिजिशियन्स तथा इण्डियन सोसायटी ऑफ 
नेफ्रोलॉजी के अध्यक्ष रहे। वह इन्टरनेशनल सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी के सदस्य 
हे । वह १9 अन्तर्राष्ट्रीय काग्रेसो में वैज्ञानिक सत्रो का सभापतित्व कर चुके है तथा 
विश्वभर मे कई विश्वविद्यालयों मे विजिटिग प्रोफेसर के पद पर कार्य कर चुके 
है। वह “उष्ण कटिबन्धीय गुर्दा सम्बन्धी रोग के वर्गीकरण' पर विश्व स्वास्थ्य 
सगठन परामर्शदात्री समिति के सदस्य रह चुके है। अन्तरांष्टीय ख्याति प्राप्त वृक्क 
विज्ञानी डॉ के एस चुघ को 5 से 9 दिसम्बर, 995 ई तक हागका7 मे 5 
दिन तक आयोजित छठी एशियन पैसिफिक काग्रेस ऑफ नेफ्रोलॉजी की अन्तर्राष्ट्रीय 
काग्रेस की अध्यक्षता करने का विशिष्ट गौरव प्राप्त हुआ। उन्होने ''रिनोवेस्क्यूलर 
हायपरटेन्शन एमन्ग दि एशियन पॉपूलेशन (€70५880ए०४ ॥97शस्‍शा&॥0॥ का]०णा8 
76 45787 707902807) -- एशियावासियो मे गुर्दा सवहनी उच्च रक्त चाप '' विषय 
पर अतिथि- नाषण प्रसारित किया। 


डॉ चुघ सर्वाधिक गौरवमय डॉ बी सी रॉय राष्ट्रीय ' प्रमुख चिकित्सा विज्ञानी 
१997 ' पुरस्कार तथा अन्य 20 राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। 
वह अमेरिकन कॉलेज ऑफ फिजीशियन्स की मानद फैलोशिप प्राप्त करने वाले 
एकमात्र भारतीय और प्रथम एशियाई व॒क्‍क विज्ञानी है, जिन्हे किडनी इन्टरनेशनल 
ने नेफ्रोलॉजी फोरम पुरस्कार प्रदान किया तथा यू एस ए के राष्ट्रीय वृक्‍क फाउन्डेशन 
ने विशिष्ट अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया। वह डॉ बी सी राय राष्ट्रीय पुरस्कार, 
भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद के दो पुरस्कारो वरिष्ठ राष्ट्रकुल पुरस्कार 
(इग्लैंड), राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान अकादमी का ग्लैक्सो भाषण पुरस्कार, 979 ई 
में निहोन विश्वविद्यालय, टोक्यो, जापान का स्वर्ण पदक पुरस्कार, 977 ई मे 
एसोसिएशन ऑफ फिजीशियन्स ऑफ इण्डिया का जॉर्ज कोइल्हो स्मृति पुरस्कार, 
3976 इ मे इण्डियन सोसायटी ऑफ नेफ्रालॉजी का बी एल खुल्लर स्वर्ण पदक 
तथा कई अन्य पुरस्कार पाने वाले एकमात्र व्यक्ति हैं। उन्होंने 4975 ई में सरोजिनी 
नायडू चिकित्सा महाविद्यालय, आगरा मे विश्वविद्यालय विस्तार व्याख्याता, 973 ई 
मे चिकित्सा विज्ञान सस्थान, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय मे, 4977 इ में उल्म 
विश्वविद्यालय पश्चिमी जर्मनी तथा चार्ल्स चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय, प्राग में 
विजिटिग प्रोफेसर के पद पर कार्य सम्पन्न किया था। उन्होने 970 ई मे के बी 
कुँवर स्मृति पुरस्कार 976 इ में एम डी अदातिया पुरस्कार तथा 975 ई मे मोतशों 


56 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


स्मृति पुरस्कार प्राप्त किया था। वह 978 ई में सयुकत राज्य विश्वविद्यालयों मे, 
4979 ई में ताइवान और जापान के विश्वविद्यालयों मे विजिटिंग लेक्चरार के पद 
पर कार्यरत रहे। रविवार, 7 नवम्बर, 993 ई को महाराष्ट्र के राज्यपाल डॉ पी 
सी अलैक्जैडर ने गुर्दा रोग विशेषज्ञ डॉ के एस चुघ को बम्बई मे एक समारोह 
मे 'धनवन्तरि पुरस्कार' से सम्मानित किया। उन्हे एक प्रशस्ति-पत्र भी भेट किया 
गया था। 

डॉ चुघ भारत मे वृक्‍क विज्ञान के जनक माने जाते हैं। 


प्रकाशन--उनके 295 लेख राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जर्नलो मे प्रकाशित 
हुए है तथा उन्होने 6 पुस्तको (१0 अन्तर्राष्ट्रीय) मे अध्याय लिखे हैं । वह उष्ण 
कटिबन्धीय गुर्दा सम्बन्धी रोग के वर्गीकरण पर विश्व स्वास्थ्य सगठन की पुस्तकों 
के सह-सम्पादक, एशियाई प्रशान्त क्षेत्र के चिकित्सको के लिए व॒कक्‍क विज्ञान की 
पाठयपुस्तक, चिकित्सा विज्ञान की एसोसिएशन ऑफ फिजीशियन्स ऑफ इण्डिया 
की पाठयपुस्तक के एसोसिएट सम्पादक, पोस्ट ग्रेजुएट मेडिसन के सम्पादक, 
972 ई से जर्नल ऑफ एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन्स ऑफ इण्डिया के 
एसोशिएट सम्पादक, इण्डियन जर्नल ऑफ नेफ्रोलोजी के सम्पादक और 
इन्टरनेशनल जर्नल ऑफ आर्टिफिशिअल इन्टरनल आऑर्गन्स, रेनल फेल्योर 
(यू एस ए ), किडनी (यू एस ए ), और जर्नल ऑफ नेशनल एकेडेमी ऑफ 
मेडिकल साइन्सेज ऑफ इण्डिया के सम्पादक मण्डल के सदस्य हैं। उन्होने 
अन्तर्राष्ट्रीय जर्नलो और पुस्तको मे कई आमत्रित सम्पादकीय और लेख लिखे है। 


सदस्यता आदि--वह इण्डियन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी के सस्थापक और 
उसके सस्थापक सचिव भी है। उन्होने 969 ई मे स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा और 
अनुसन्धान सस्थान, चडीगढ मे भारत मे वृकक विज्ञान का प्रथम प्रशिक्षण कार्यक्रम 
का आयोजन किया था तथा भारत मे 70ब से अधिक वृक्‍क विज्ञानियो को प्रशिक्षित 
करने का श्रेय उन्हे है। 


वह राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान अकादमी की कौंसिल के सदस्य, भारतीय 
चिकित्सा परिषद्‌ की कार्यकारिणी के सदस्य तथा राष्ट्रीय परीक्षा मण्डल की वृक्‍्क 
विज्ञान विशेषज्ञ समिति के सयोजक है | वह बृक्‍क विज्ञान सोसायटी, इन्स्टीट्यूशन 
ऑफ साइन्स ऑफ नेफ्रोलॉजी, एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन्स ऑफ इण्डिया 
और यूरोपियन डायलिसिस तथा ट्रान्सप्लान्ट एसोसिएशन के सलाहकार मण्डल 
के सदस्य है। 


[] 


डॉ आर के करौली 
(]934 ई ) 


जन्म एवं शिक्षा--डॉ राम कुमार करौली का जन्म 5 जुलाई, १934 ई को 
उत्तर प्रदेश के जिला मुख्यालय बुलन्दशहर नामक नगर मे हुआ था। उन्होने मेरठ, 
लखनऊ और सयुक्‍त राज्य अमेरिका मे शिक्षा प्राप्त की। उन्होने एम बी बी एस और 
एम डी (भेषज) परीक्षाये उत्तीर्ण की। 

व्यावसायिक जीवन--डॉ करौली भूतपूर्व अध्यक्ष, काय चिकित्सा एवं हृदय 
रोग विज्ञान विभाग, विलिगडन (अब डॉ राम मनोहर लोहिया) चिकित्सालय नई 
दिल्‍ली, भारत के चार राष्ट्रपतियो के चिकित्सक, एम डी काय चिकित्सा एव हृदय 
रोग विज्ञान स्नातकोत्तर प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय, लिगामेन्ट (कोरोनरी) हृदय 
रोग प्रभारी चिकित्सक, चिकित्सालय एवं लिगामेन्ट देखरेख इकाई, डॉ राम मनोहर 
लोहिया (विलिगडन) चिकित्सालय, नई दिल्ली रहे। सम्प्रति वह दिल्ली 
विश्वविद्यालय मे हृदय रोग के प्राध्यापक हैं। 

पता--उनका वर्तमान आवासीय पता है-- 


डॉ आर के करौली 
9, गुस्द्वारा रकाबगज रोड, नई दिल्‍ली 
उनका स्थायी आवासोय ओर चिकित्सालयीय पता हे-- 
कार्डिक स्ट्रेस इवेल्यूएशन सेटर 
सी-587, न्यू फ्रेन्डस कॉलोनी, नई दिल्ली 
सदस्यता और फैलोशिप--डॉ करोली कार्डियोलॉजी सोसायटी ऑफ इण्डिया 
के आजीवन सदस्य हैं। वह एफ एनसीसीपी और एफसी सी पी (यूएए) हैं। 
सम्मान और पुरस्कार--डॉ करौली अध्यक्ष काय चिकित्सा एवं हृदय रोग 
विज्ञान अनुसन्धान समिति डॉ राममनोहर लाहिया (विलिगडन) चिकित्सालय नई 
दिल्‍ली, अध्यक्ष, केन्द्रीय काय चिकित्मा मण्डल, डॉ राम मनोहर लोहिया 
(विलिगडन) चिकित्सालय, नई दिल्‍ली और मुख्य परामशद, द्वितीय काय चिकित्सा 
परामर्श, भाग्त सरकार रहे ' वह हृदय रोग विज्ञान मे उल्लेखनीय अनमन्धान के उपलक्ष 


58 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिव 


मे दो राष्ट्रीय पुरस्कारो--पद्मश्री सन्‌ 79०9 ई और पद्म भूषण सन्‌ 974 ई से अलकृत 
किये गए। वर्तमान मे वह एटीसी, एच आई एल ,एम एम टी सी, भेल आदि के 
हृदय रोग परामर्शद है। वह एक वरिष्ठ हृदय रोग परामर्शद है। 
प्रकाशन--हृदय रोग के विषय मे डॉ करोली के 52 से अधिक मौलिक शोध- 
पत्र भारतीय और विदेशी हृदय रोग सम्बन्धी पत्रिकाओ मे प्रकाशित हो चुके है 
'कादम्बिनी' नामक पत्रिका मे उनके लेख प्रकाशित होते रहते है, जैसे--दिल क 
दौरा क्यो 2 
[] 


डॉ एन सिह 
(१935 ई ) 


जन्म एव वश परिचय--डॉ नरेन्द्र सिह का जन्म जुलाई, 935 ई को 
उत्तरप्रदेश के आजमगढ जिले मे कामहेनपुर नामक गाँव मे हुआ था। उनके पिता 
स्वर्गीय श्री ठाकुर शत्रुघ्न सिह व्यवसाय से वकील थे और इलाहाबाद विश्वविद्यालय 
से स्नातक (बीए ) और एल एल बी थे। सन्‌ 952 इ मे उनका निधन हो गया। 
उनकी माता श्रीमती सूर्य दंवी गृहिणी है और अभी जीवित है । उनकी धर्मपत्नी श्रीमती 
सावित्री देवी गृहिणी है और उनसे उनके दो पुत्रियाँ उत्पन्न हुई हैं। उनकी पहली 
पुत्री श्रीमती अनिता सिह का विवाह भारतीय नौ सेना के लेफ्टिनेट कमान्डर श्री विनय 
सिह के साथ हुआ है। उसने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से इतिहास विषय मे एम ए 
किया। छोटी पुत्री श्रीमती अनुभासिह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से जैव चिकित्सा 
विज्ञान मे पी एच डी है। उसका विवाह चडीगढ मे प्रोफेसर एस के केंवर के साथ 
हुआ है, जो अनुसन्धान कर रहे हैं। डॉ एन सिह का भ्राता अपनी पत्नी और बच्चो 
और अपनी माता और उनके परिवार के साथ अपने पेतृक निवास स्थान मे सयुक्त 
परिवार के रूप मे रहते हैं। 


शैक्षिक जीवन--डॉ सिह ने कृषि विषय मे विशेष योग्यता सहित यू पी 
बोर्ड की हाई स्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी मे 4950 ई मे उत्तीर्ण की। उन्होने यू पी 
बोर्ड की इन्टर विज्ञान परीक्षा इविग क्रिश्चियन कॉलेज, इलाहाबाद से द्वितीय श्रेणी 
मे 3952 ई मे उत्तीर्ण की। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विज्ञान के स्नातक 
बने और 954 ई मे द्वितीय श्रेणी मे बी एस सी की उपाधि प्राप्त की। तत्पश्चात्‌ 
उन्हाने चिकित्सा महाविद्यालय, आगरा मे प्रवेश प्राप्त्किया और आगरा 
विश्वविद्यालय से 50ब अक सहित एम बी बी एस की उपाधि 959 ई मे प्राप्त 
की। 967 ई मे उन्हे किंग जॉर्ज चिकित्सा महाविद्यालय, लखनऊ द्वारा डॉक्टर 
ऑफ मेडिसिन (औषधि विज्ञान मे एम डी ) की उपाधि प्रदान की गई। 

व्यावसायिक जीवन--एम डी उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त डॉ सिह ने 
सशस्त्र सैन्य चिकित्सा सेवा मे कार्यभार ग्रहण किया। लेकिन पारिवारिक परिस्थितिया 
के कारण अत्यधिक दयावान आधार पर सेना से मुक्ति प्राप्त की। तदुपरान्त उन्होंने 


60 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


। जनवरी, 965 ई को किग जॉर्ज चिकित्सा महाविद्यालय के औषधि विज्ञान एव 
चिकित्सा विज्ञान विभाग मे कार्य भार ग्रहण किया। ऐसा उन्होने विशेषत आयुर्वेदिक 
मूल के औषधीय पौधों की औषधियो पर अपने गहन अनुसन्धान कार्य के कारण 
किया था। तब से वह वहीं निरन्तर गेयारत है। इसके अतिरिक्त उन्होने क्षेत्रीय आयुर्वेद 
सस्थान (केन्द्रीय आयुर्वेद एव सिद्ध अनुसन्धान परिषद्‌, स्वास्थ्य एव परिवार कल्याण 
मत्रालय, भारत सरकार के अधीन) लखनऊ का पद भार भी संभाल लिया है। यह 
एक चिकित्सालय एवं अनुसन्धान सस्थान है। 
पता--उनका वर्तमान पता निम्नाकित हैं-- 
डॉ एन सिह एमडी, एफ आई सी एन, एफ आई सी एस 
औषधि विज्ञान एवं चिकित्सा विभाग, 
किग जॉर्ज चिकित्सा महाविद्यालय, 
लखनऊ-226003, यू पी, भारत एव 
प्रभारी, क्षेत्रीय आयुर्वेद अनुसन्धान सस्थान 
(केन्द्रीय आयुर्वेद एव सिद्ध अनुसन्धान परिषद, भारत सरकार), 
474/6, सीतापुर रोड, लखनऊ-226020 
अनुसन्धान कार्य, प्रकाशन और यात्राये--अपने लगभग 3 वर्ष के 
अनुसन्धान कार्य की अवधि मे उन्होने विख्यात राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जर्नलो मे 
लगभग 200 शोध-पत्र प्रकाशित किये हैं। उनके द्वारा आविष्कृत औषधियों 
अधिकॉशत दबाव रोगो, हृदय रोगो और जोडो के रोगो (सन्धि शोथ और अस्थि 
सधि-शोथ) के लिए प्रभावकारी है। उनके कार्य की देश मे भूरि-भूरि प्रशसा की 
गई है। वह कई देशो--ऑस्ट्रिया, जर्मनी, स्वीडन, हॉलैण्ड, स्विट्जरलैण्ड, फ्रान्स, 
ऑस्ट्रेलिया, बैंकाक, हागकाग और सिगापुर की यात्रा कर चुके है और अपने कार्य 
को इन देशो मे विभिन्‍न अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनो मे प्रस्तुत किया है। अपने अनुसन्धान 
कार्य के विषय मे उन्हे इन देशो से अच्छा उत्तर और प्रोत्साहन मिला है। फिर भी 
कुछ अवर्णनीय कारणो से सम्पूर्ण कार्य उचित रूप मे नही लिया गया है और वह 
सदैव इस तथ्य के बावजूद उपेक्षित रहे कि औषधीय पादप अनुसन्धान के क्षेत्र मे 
वह सम्पूर्ण देश मे अथवा विदेश मे भी किसी से दूससे स्थान पर नही है। फिर भी 
इस दिशा म मीडियां (समाचार-पत्रो, पत्रिका और स्वास्थ्य पत्रिका) ने उनके 
अनुसन्धान कार्य को व्यापक स्थान दिया है। 
सदस्यता, फैलोशिप आदि--डॉ सिह 988 ई से इन्टरनेशनल सोसायटी 
ऑफ हर्बल मेडिसिन लखनऊ, भारत के अध्यक्ष है। वह 985 से 987 ई तक 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 6! 


इण्डियन फार्माकोलॉजिकल सोसायटी के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धो के सचिव रहे। वह 
राष्ट्रीय और कई एशियाइ और विश्व सम्मेलनों के अध्यक्ष रहे है। वह 985 इं मे 
इण्डियन जर्नल ऑफ फरॉर्माकालॉजीकिल मे तीन वर्षो मे सर्वश्रेष्ठ पत्र के लिए मुखर्जी 
पुरस्कार (इण्डियन फार्माकोलॉजीकल सोसायटी) के निर्णायक थे। वह चिकित्सकीय 
औषधि विज्ञान के लिए यू के शेठ पुरस्कार (इण्डियन फार्माकोलॉजिकल सोसायटी ) 
के निर्णायक रह चुके हैं। उन्होने किग जॉर्ज चिकित्सा महाविद्यालय, लखनऊ मे 
न्यूरीफ।मीकोलॉजी मे प्रशिक्षण पाठ्यक्रम का सचालन किया। उन्होने डॉ डी घोष 
अनुसन्धान अधिकारी, फार्माकोलॉजी, सी सी आर ए एस , मद्रास के लिए फार्माकोलॉजी 
मे व्यापक प्रशिक्षण का निरीक्षण किया। वह सोसायटी फॉर रिसर्च ऑन मेडिसिनल 
प्लान्टस, पश्चिमी जर्मनी की साधारण सभा के सदस्य हैं। वह इन्टरनेशनल सोसायटी 
फॉर हार्ट रिसर्च, इण्डियन फार्माकोलॉजीकल सोसायटी ओर एशियन फेडरेशन ऑफ 
क्लिनिकल फार्माकोलॉजिस्ट के सदस्य हैं। वह इन्टरनेशनल कॉलेज ऑफ नूट्रिशन 
के फैलो (एफ आई सी एन ) हैं। वह इन्टरनेशनल सोसायटी फॉर हर्बल मेडिसिन, 
फार्मोकोलॉजी विभाग, के जी चिकित्सा महाविद्यालय, लखनऊ के अध्यक्ष हैं। 

सम्मान और पुरस्कार--डॉ सिह को निम्नाकित पुस्तकों मे उद्धृत किए जाने 
का सम्मान प्राप्त है-- 

।.. “'मेडिसिनल प्लान्टस”' खण्ड १, लेखक विमल रामलिगम, एन सिंह 
और एच सी मित्तर ऐट अल, १974, मैसर्स इन्फोर्मेशन कार्पोरेशन, 
न्यूयार्क, यू एस ए द्वारा प्रकाशित। 

2 “'मेडिसिनल प्लान्ट्स ऑफ इण्डिया”, ॥97०, भारतीय चिकित्सा 
अनुसन्धान परिषद्‌, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित। 

3 “बिबिलिओग्राफी ऑफ इन्वेस्टीगेटेड मेडिसिनल प्लान्टस'' लेखक 
एम ए आयगर, 976, मणिपाल प्रेस, भारत। 

4. करैन्ट रिसर्च इन फार्माकोलॉजी इन इण्डिया (975-82), इण्डियन 
नेशनल साइन्स एकेडेमी, नई दिल्‍ली, 984 फार्मकोलॉजी ऑफ 
मेडिसिनल प्लान्टस मे, पृष्ठ 9-46 

डॉ सिह को भारतीय चिकित्सा और होम्पयोपैथी केन्द्रीय अनुसन्धान परिषद्‌ 

द्वारा वैज्ञानिक पुरस्कार 973 प्रदान किया गया था। 

उन्हे हेब्रू विश्वविद्यालय, हेडासस मेडिकल स्कूल द्वारा वर्ष १97 मे प्रो एफ 

बर्गमेन के अधीन रक्त चाप के केन्द्रीय नियत्रण की समस्याओ पर कार्य करने के 
लिए इन्टरनेशनल ब्रेन रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन की फैलोशिप प्रदान की गई थी। 


60 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


3 जनवरी, 965 ई को किग जॉर्ज चिकित्सा महाविद्यालय के औषधि विज्ञान एव 
चिकित्सा विज्ञान विभाग मे कार्य भार ग्रहण किया। ऐसा उन्होने विशेषत आयुर्वेदिक 
मूल के औषधीय पौधो की औषधियो पर अपने गहन अनुसन्धान कार्य के कारण 
किया था। तब से वह वही निरन्तर गेयारत है। इसके अतिरिक्त उन्होने क्षेत्रीय आयुर्वेद 
सस्थान (केन्द्रीय आयुर्वेद एव सिद्ध अनुसन्धान परिषद्‌, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण 
मत्रालय, भारत सरकार के अधीन) लखनऊ का पद भार भी सँभाल लिया है। यह 
एक चिकित्सालय एवं अनुसन्धान सस्थान है। 
पता--उनका वर्तमान पता निम्नाकित हैं-- 
डॉ एन सिह एमडी, एफ आई सी एन , एफ आई सी एस 
औषधि विज्ञान एव चिकित्सा विभाग, 
किग जॉर्ज चिकित्सा महाविद्यालय, 
लखनऊ-226003, यूपी, भारत एव 
प्रभारी, क्षेत्रीय आयुर्वेद अनुसन्धान सस्थान 
(केन्द्रीय आयुर्वेद एव सिद्ध अनुसन्धान परिषद, भारत सरकार), 
474/6, सीतापुर रोड, लखनऊ-226020 
अनुसन्धान कार्य, प्रकाशन और यात्राये--अपने लगभग 3 वर्ष के 
अनुसन्धान कार्य की अवधि मे उन्होने विख्यात राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जर्नलो मे 
लगभग 200 शोध-पत्र प्रकाशित किये हैं। उनके द्वारा आविष्कृत औषधियों 
अधिकॉशत दबाव रोगो, हृदय रोगो और जोडो के रोगो (सन्धि शोथ और अस्थि 
सधि-शोथ) के लिए प्रभावकारी हैं। उनके कार्य की देश मे भूरि-भूरि प्रशसा की 
गई है। वह कई देशो--ऑस्ट्रिया, जर्मनी, स्वीडन, हॉलैण्ड, स्विट्जरलैण्ड, फ्रान्स, 
ऑस्ट्रेलिया, बैंकाक, हागकाग और सिगापुर की यात्रा कर चुके हैं और अपने कार्य 
को इन देशो मे विभिन्‍न अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनो मे प्रस्तुत किया है। अपने अनुसन्धान 
कार्य के विषय मे उन्हे इन देशों से अच्छा उत्तर और प्रोत्साहन मिला है। फिर भी 
कुछ अवर्णनीय कारणो से सम्पूर्ण कार्य उचित रूप मे नही लिया गया है और वह 
सदैव इस तथ्य के बावजूद उपेक्षित रहे कि औषधीय पादप अनुसन्धान के क्षेत्र मे 
वह सम्पूर्ण देश मे अथवा विदेश मे भी किसी से दूससे स्थान पर नहीं है। फिर भी 
इस दिशा म मीडिया (समाचार-पत्रो, पत्रिका और स्वास्थ्य पत्रिका) ने उनके 
अनुसन्धान कार्य को व्यापक स्थान दिया है। 
सदस्यता, फैलोशिप आदि--डॉ सिह 988 ई से इन्टरनेशनल सोसायटी 
ऑफ हर्बल मेडिसिन लखनऊ, भारत के अध्यक्ष है। वह 985 से 987 ई तक 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 6] 


इण्डियन फार्माकोलॉजिकल सोसायटी के अन्‍्तराष्ट्रीय सम्बन्धा के सचिव रहे। वह 
राष्ट्रीय और कई एशियाई ओर विश्व सम्मेलनो के अध्यक्ष रहे हैें। वह 985 ई मे 
इण्डियन जर्नल ऑफ फार्माकालॉजीकिल मे तीन वर्षो मे सवश्रेष्ठ पत्र के लिए मुखर्जी 
पुरस्कार (इण्डियन फार्माकोलॉजीकल सोसायटी) के निर्णायक थे। वह चिकित्सकीय 
औषधि विज्ञान के लिए यू के शेठ पुरस्कार (इण्डियन फार्माकोलॉजिकल सोसायटी ) 
के निर्णायक रह चुके हैं। उन्होने किग जॉर्ज चिकित्सा महाविद्यालय, लखनऊ मे 
च्यूरोफार्माकोलॉजी मे प्रशिक्षण पाठ्यक्रम का सचालन किया। उन्होने डॉ डी घोष, 
अनुसन्धान अधिकारी, फार्माकोलॉजी, सी सी आर ए एस , मद्रास के लिए फार्माकोलॉजी 
मे व्यापक प्रशिक्षण का निरीक्षण किया। वह सोसायटी फॉर रिसर्च ऑन मेडिसिनल 
प्लान्टस, पश्चिमी जर्मनी की साधारण सभा के सदस्य हैं। वह इन्टरनेशनल सोसायटी 
फॉर हार्ट रिसर्च, इण्डियन फार्माकोलॉजीकल सोसायटी और एशियन फेडरेशन ऑफ 
क्लिनिकल फार्माकोलॉजिस्ट के सदस्य हैं। वह इन्टरनेशनल कॉलेज ऑफ नूट्रिशन 
के फैलो (एफ आई सी एन ) है। वह इन्टरनेशनल सोसायटी फॉर हर्बल मेडिसिन, 
फार्मकोलॉजी विभाग, के जी चिकित्सा महाविद्यालय, लखनऊ के अध्यक्ष हैं। 

सम्मान और पुरस्कार--डॉ सिह को निम्नाकित पुस्तकों मे उद्धृत किए जाने 
का सम्मान प्राप्त है-- 

।.. “'मेडिसिनल प्लान्टस'' खण्ड १, लेखक विमल रामलिगम, एन सिंह 
और एच सी मित्तर ऐट अल, 974, मैसर्स इन्फोर्मेशन कार्पोरेशन, 
न्यूयार्क, यू एस ए द्वारा प्रकाशित। 

2 “मेडिसिनल प्लान्ट्स ऑफ इण्डिया'' 976, भारतीय चिकित्सा 
अनुसन्धान परिषद्‌, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित। 

3 “बिबिलिओग्राफी ऑफ इन्वेस्टीगेटेड मेडिसिनल प्लान्टस'' लेखक 
एम ए आयगर, 976, मणिपाल प्रेस, भारत। 

4. करैन्ट रिसर्च इन फार्माकोलॉजी इन इण्डिया (975-82), इण्डियन 
नेशनल साइन्स एकेडेमी, नई दिल्‍ली, 984 फार्मकोलॉजी ऑफ 
मेडिसिनल प्लान्टस मे, पृष्ठ 9-46 

डॉ सिह को भारतीय चिकित्सा और होम्पयोपैथी केन्द्रीय अनुसन्धान परिषद्‌ 

द्वारा वैज्ञानिक पुरस्कार 973 प्रदान किया गया था। 

उन्हे हेब्रू विश्वविद्यालय, हेडासस मेडिकल स्कूल द्वारा वर्ष 7977 मे प्रो एफ 

बर्गमेन के अधीन रक्त चाप के केन्द्रीय नियत्रण की समस्याओ पर कार्य करने के 
लिए इन्टरनेशनल ब्रेन रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन की फैलोशिप प्रदान की गई थी। 


62 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


मेडिसिनल प्लान्टस सोसायटी के तीसवे अधिवेशन द्वारा डॉ सिह को आमत्रित 
किया गया था और उन्होने जुलाई, 982 ई मे ग्राज, ऑस्ट्रिया (यूरोप) मे ''एण्टी- 
स्ट्रैस प्लान्ट ड्रग्स-ए न्यू एप्रोच इन दि ट्रीटमेट ऑफ स्ट्रैस-डिजीज”” पर अपना पत्र 
प्रस्तुत किया था। जनवरी, 984 ई मे उन्हे साउथ ईस्ट एशिया एण्ड पैसिफिक लीग 
काग्रेस ऑफ रिह्य मैटोलॉजी द्वारा बैकाक, थाइलैड मे आमत्रित किया गया था। 
जुलाई-अगस्त, 986 ई मे उन्हे क्लिनिकल फार्मोकोलॉजी एण्ड थेराप्योटिक्स, 
स्टॉकहोम (स्वीडन) के तृतीय विश्व सम्मेलन मे आमत्रित किया गया था। सन्‌ 
987 ई मे उन्होने फार्माकोलॉजी की दसवी अन्तर्राष्ट्रीय काग्रेस, सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) 
में भाग लिया था। सितम्बर, सन्‌ 988 ई मे उन्होने सोसायटी फॉर मेडिसिनल प्लान्ट 
रिसर्च के 36वे वार्षिक सम्मेलन मे फ्रेइबर्ग, पश्चिमी जर्मनी मे भी भाग लिया था। 
सन्‌ 989 ई में वह चतुर्थ विश्व काग्रेस फार्माकोलॉजी इन्टरनेशनल, प्राग 
(चैकोस्लोवाकिया) मे उपग्रह परिसवाद मे अतिथि-वक्ता थे। डॉ सिह निम्नाकित 
जर्नलो के सदर्भ व्यक्ति हैं-- 


(१) इण्डियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च, 

(2) इण्डियन जर्नल ऑफ फार्माकोलॉजी, 

(3) जर्नल ऑफ रिसर्च इन आयुर्वेद एण्ड सिद्ध, 

(4) बुलेटिन ऑफ मेडिको-एथनो बोटेनिकल रिसर्च। 

१9 से 23 फरवरी, 993 ई तक लखनऊ मे आयोजित ““करेट बॉयो- 


टेक्नोलॉजीकल ट्रेन्डस इन मिडिसनल प्लान्ट रिसर्च” के राष्ट्रीय सम्मेलन के वह 
अध्यक्ष रहे। अपने अध्यक्षीय भाषण के अलावा उन्होने तीन पत्र प्रस्तुत किए। 


पेटेन्ट--डॉ सिह ने 'टिचर ऑफ नेरियम इन्डीकम ([प्रालप्रा& ण राणा 
[7भ2८णा) ' का पेटेन्ट प्राप्त किया है । इसका प्रयोग बहुत सफलता के साथ डिगिटेलिस 
निर्मित औषधियो के स्थान पर रक्त सकुलनीय (००१४०४४५८) हृदय अवरोध के रोगियो 
पर किया जा रहा है। 


अनुसन्धान कार्य का पर्यवेक्षण एव मार्गदर्शन--सन्‌ 976 ई मे डॉ सिंह 
ने लखनऊ विश्वविद्यालय की फार्माकोलॉजी मे एमडी उपाधि हेतु सहायक 
अनुसन्धान अधिकारी डॉ एस पी सिह के “रिसर्च फॉर इफेक्टिव एण्टी-फर्टिलिटी 
एजेन्टस फ्रोम इन्डीजीनस प्लान्टस सोर्सेज'' शीर्षक शोध-प्रबन्ध का मार्गदर्शन किया 
था। सन्‌ 98 ई मे उन्होने फार्माकोलॉजी मे एम डी उपाधि प्रदान करने के लिए 
''एण्टी-स्ट्ररै इफैक्टेट ऑफ “केनाबिस इन्डिका' पर फार्माकोलॉजी मे प्रदर्शक 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 63 


(डिमोन्सट्रेटर) डॉ प्रदीप कुमार के शोध-प्रबन्ध का मागदर्शन किया था। उन्होने 
फार्माकोलॉजी मे प्रदर्शम डॉ वी एस तोमर के 'वक ऑन एण्टी-स्ट्रेस प्लान्ट ड्रग्स 
का पर्यवेक्षण किया था। वह “'फार्मकोलॉजी ऑफ स्ट्रेस'' विषय पर एम डी उपाधि 
प्रदान करने के लिए 4984 इ में फामाकोलॉजी मे प्रदशक डॉ ए के श्रीवास्तव 
एम बी बी एस के मार्गदर्शक रहे। वह 984 ई मे डेक्सामेथासोन सप्रेशन टेस्ट एण्ड 
ट्राइसाइक्लिक रिस्पोन्स इन मेजर डिप्रेस' शीषक “'साइकेइटरी ”' मे एम डी के लिए 
डॉ राम गुलाम के शांध-प्रबन्ध के मार्गदर्शक थे। सन्‌ 987 इ मे उन्होने एण्टीस्ट्रेस 
न्योरोसिटी पर फार्माकोलॉजी मे एम डी हेतु स्ततपाल सिंह के शोध-प्रबन्ध का 
मार्गदर्शन किया था। 

उन्होने (१) डिपेन्डेस लाइबिलिटी ऑफ मेथाग्नालॉन 975-76, (2) एन 
एक्सपेरीमेटल इवेल्यूएशन ऑफ सम साइकोट्रोपिक ड्रग्स 976-78, (3) क्लिनिकल 
ट्रायल्स ऑफ टिचर ऑफ नेरियम इन्डीकम इन पेशेन्टस ऑफ कन्जेस्टिव हार्ट फल्योर 
सिन्‍स 974, (4) राज्य विज्ञान ओर औद्योगिक परिषद्‌ द्वारा डॉ नित्यानन्द पूर्व 
निदेशक, केन्द्रीय औषधि अनुसन्धान सस्थान, लखनऊ के सयुकत तत्त्वावधान मे 
सचालित इवेल्यूएशन ऑफ एण्टी वायरल इफैक्टस ऑफ इन्डीजीनस प्लान्ट 
'एडेप्टोज्मस' पर अनुसन्धान योजनाओं का पर्यवेक्षण किया था। 

प्रमुख खोजे--निम्नाकित की सर्वप्रथम खोज करने का श्रेय डॉ सिंह 
को है-- 

4. कार्डियो-टॉनिक एक्टिविटी ऑफ नेरियम इन्डीकम | 

2 ड्रग डिपेन्डेस लाइबिलिटी ऑफ मेथा क्यूएलॉन, मेन्ड्रेक्स एण्ड 

केन्नाविस इन्डीका। 

3 णडेप्टोजेनिक (एण्टी स्ट्रेस) प्रोपर्टीज इन ओसीकम सैंकटम (तुलसी) 
विथानिआ सोनीफेरा (अश्वगन्ध) एण्ड अल्टीन्गिआ एक्सेल्सा 
(सिलारस) | 
3/2 रिसेप्टर्स इन कोरोनरी आर्टिरीज। 
एण्टी-अरहि थमिक प्रोपर्टीज इन क्विनाजोलान्स | 
हाइपोथेसिस ऑफ एण्टी-स्ट्रेस लान्ट ड्रग्स (आयुर्वेदिक औषधियों) 
एन्टी ट्यूमर प्रोपर्टीज इन विथानिया सोमनिफेरा थ्रू इटस एडेप्टोजेनिक 
एण्ड इम्मूनोमोडूलेटर एक्शन्स (ए न्यू एप्रोच फॉर एण्टी-ट्यूमोरेजिनिक 
इफेक्ट ऑफ प्लाट डुग्स) 


54 (७७४ (ए७थऔ न 5 


0व॑ 


0 


॥॥ 


भारत के चिक्त्सा वैज्ञानिक 


क्लिनिकल यूजफुलनेस ऑफ मेलिया एजाडिराक्टे इन स्किन डिजीजेज 
एण्ड एसकारिएसिस | 

एण्टी-इनफलेमैटरी, एण्टीपायरेटिक एण्डरिहूमेटिक एक्टिविटी ऑफ 
साइपेरस रोटुन्डस एण्ड विथानिया सोम्नीफेरा। 

दि एण्टी-आर्थरिटिक इफैक्ट ऑफ साइपेरस रोटुनस एण्ड विथान्पा 
सोम्नीफेरा (क्लिनिकल ट्रायल) 

एण्टी-एस्थमेटिक इफेक्ट ऑफ इनूला रेसमोसा (क्लिनिकल ट्रायल) 


इनके अतिरिक्त, पादप औषधि और आधारभूत औषधि विज्ञान के अनुसन्धान 
पर अन्य अनुसन्धान कार्य को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हो गई है। 

अनुभव--डॉ सिह को चिकित्सकीय, अनुसन्धान एवं अध्यापन का 33 वर्ष 
से अधिक का अनुभव है। वह प्रयोगात्मक प्रविधियो मे पारगत है, जैसे-- 


] 


सामान्य औषधि विज्ञान--वह निद्राजनक, शान्तिदायक, दर्द- 
मोचक, उत्तेजना प्रतिरोधक, ज्वर प्रतिरोधक और अन्य औषधि विज्ञान 
सम्बन्धी प्रवृत्तियो के लिए प्रयुक्त प्रामाणिक प्रविधियो द्वारा पादप 
और सिन्थेटिक उत्पत्ति के पदार्थों के औषधि विज्ञान के परीक्षण मे 
कार्यरत है। 


विशिष्ट प्रविधियॉ--() कुत्तो मे हृदय-फेफडे का निर्माण, (॥) 
विच्छेदित सिर, विच्छेदित पिछले भाग और रक्‍त नलिका को पानी 
से तर करना की तरह समपार-रकत परिभ्रमण के प्रयोग, जल से 
तर करने की लगातार गति के लिए सिगमा ((' के आकार 
की रचना ) मोटर पम्प का प्रयोग करते हुए। विच्छेदित सिर 
का प्रयोग मुख्यतया औषधियो के' केन्द्रीय प्रभाव को प्रमाणित 
करने के लिए किया जाता हैं। (इस प्रविधि को भारत मे स्थापित 
करने वाले प्रथम व्यक्ति) 

विभिन्‍न पारम्परिक विधियों द्वारा एव एकोनीटाइन (मीठा तैलिया या 
वत्सनाभ नामक पौधे का क्रियाशील तत्त्व) के केन्द्रीय प्रयोग द्वारा भी 
प्रयोगात्मक हृदय सम्बन्धी लयहीनता। 

इन्ट्रासेरेत्रों वेन्ट्रीकूलर (आई सी वी ), सुषुम्ना सम्बन्धी दबाव 
(स्पाइनल कम्प्रेशन), वैस्चोमोटर रिसपोन्स (एस सी वी आर ) प्रविधियों 
द्वारा सी वी एस से सम्बद्ध न्यूरोफार्माकोलॉजीकल कार्य। 


भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक 65 


5 ओऔषधियो के ब्यद कैटीकोलेमाइन स्तरों पर प्रभाव का अध्ययन करने 
के लिए रक्‍त सग्रह हंतु एडिनल शिराओ का लरूम्बा नलिकाकार यत्र 
को शरीर मे डालने का प्रयोग (कैनूलेशन) ' 

6 प्रयोगात्मक प्रतिदर्शो मे ओषधि निर्भरता का अध्ययन। 


7  प्रयागात्मक प्रतिदश जहाँ दबाव-उत्तेजित प्रभावों को अकित किया नाता 
है अथात्‌ चूहो मे नियत्रित अलसर (अत्ननली का फाडा)। 

8 मानवीय विषयो मे चिकित्सकांय ओषधि विज्ञान सम्बन्धी अध्ययन। 

पाठयेत्तर प्रवृत्तिया--डॉ सिह न एनसीसी मे भाग लिया ओर बी 
सर्टीफिकेट परीक्षा उत्तीर्ण की। सन्‌ 952 ई मे सम्पूर्ण इविग क्रिश्वियन कॉलेज 
इलाहाबाद म॑ बाइबिल परीक्षा मे प्रथम स्थान प्राप्त करने पर “योग्यता प्रमाण-पत्र! 
प्रदान किया गया था। उन्होन ॥95-52 ड़ में वाटर पोला आर तेराकी मे इविग 
क्रिश्चियन कॉलेज का प्रतिनिवित्व किया था। उन्हे (3) सो मीटर दाड (॥) ऊँची बाधा 
दौड (॥) ब्रॉड जम्प ओर (५) होपष स्टप ओर कूद मे नए कीर्तिमान स्थापित करने 
के उपलक्ष म॑ खेलकूद मे “चार योग्यता प्रमाण-पत्र” प्रदान किए गए थे। 956- 
57 ई म॑ वह चिकित्सा महाविद्यालय, आगरा मे व्यायाम विद्या के कप्तान थे। 957- 
58 ई मे वह चिकित्सा महाविद्यालय, आगरा मे बॉलीबाल के कप्तान रहे। वह चार 
भाषाये-अग्रेजी, टिन्दी, सस्कृत और पारिभाषिक जर्मन जानत हैं। 


उल्लेखनीय व्यक्तित्व--यही नहीं, एक चिकित्सा वैज्ञानिक काय चिकित्सक 
ओर शल्य चिकित्सक होने के साथ डॉ सिह विगत तीन दशक से अधिक समय 
स॑ सार्वजनिक सेवा मे सदेव तत्पर रहते हैं। वह सेन्य चिकित्सक रहे और विभिन्‍न 
रोगो के 5 लाख से अधिक रोगियो कण मुफ्त इलाज किया है। विगत 36 वर्षो मे 
बिना एक पाई वसूल किए उन्होने विभिन्‍न रोगो के 40 लाख से अधिक गेगियो का 
इलाज किया है। अत कोई भो उनकी आर्थिक उपलब्धियो का अनुमान सरलता से 
लगा सकता है। मुफ्त सलाह देने के अलावा उन्होने अपने हजारो रोगियो को मुफ्त 
दवाये भी दी हैं। उन्होने सन्धि शोथ, श्वसन सम्बन्धी दमा ओर अन्य असाध्य रोगो 
के हजारों रोगियो का अपनी आविष्कृत औषधियों से विगत एक दशक मे इलाज 
किया है। अब इस प्रकार वह ससार मे एकमात्र ऐसे चिकित्सक हे जिन्होने अपने 
रोगियो से आज तक कुछ नही लिया है। 
[] 


डॉ एस पी सुद्रानियों 
(१936 ई ) 


जन्म एव वश परिचय--डॉ स्वयवर प्रसाद सुद्रानियोँ का जन्म राजस्थान के 
झुन्झुनूं जिले मे इस्माइलपुर नामक गाँव मे 7 मार्च, सन्‌ 936 ई को हुआ था। उनके 
पिता स्वर्गीय श्री चिरजीलाल ने केवल प्राथमिक स्तर तक शिक्षा प्राप्त की थी तथा 
कपडे का व्यापार करते थे। उनकी माताजी स्वर्गीय श्रीमती रुक्मिणी देवी अनपढ़ एव 
कुशल गृहिणी थी। उनकी जीवन-सगिनी श्रीमती बिमला इण्टरमीडिएट (कला) 
सुगृहिणी है। उनके तीन पुत्रियाँ श्रीमती कल्पना गर्ग एम ए (अग्रेजी), श्रीमती अलका 
जयदेव एम ए (अर्थशास्त्र), तथा श्रीमती सीमा गोयल एम ए (अर्थशास्त्र) और एक 
पुत्र श्री विकास बीई है। 

शिक्षा--डॉ सुद्रानियों ने अपना मिडिल स्तर की शिक्षा अपने गाँव इस्माइलपुर 
(झुन्झुनूं) मे, हाई स्कूल तक की शिक्षा बगड (झुन्झुनूं) मे तथा इण्टरमीडिएट 
(विज्ञान) की शिक्षा पिलानी (राजस्थान) मे ग्रहण की। उन्होने एम बी बी एस परीक्षा 
दरभगा (बिहार) स सन्‌ 962 ई में तथा एमडी (बाल रोग चिकित्सा विज्ञान) 
परीक्षा सवाई मानसिह महाविद्यालय, जयपुर से सन्‌ 966 ई मे उत्तीण की। 
वह सन्‌ 4979 ई मे एफ आर एस टी एम एण्ड एच लिवरपूल (इग्लैंड) तथा सन्‌ 
980 ई मे एफ आई सी पी (सयुकत राज्य अमेरिका) हो गए। 

व्यावसायिक जीवन के पथ पर--डॉ सुद्रानियों जुलाई, 962 ई से दिसम्बर, 
4963 ई तक हाउस सर्जन, 28 फरवरी, 964 ई से 3 फरवरी, 4967 ई तक ग्रामीण 
क्षेत्र मे अनुभव के लिए सहायक चिकित्सक, 4 फरवरी, 967 ई स॑ 5 जून, 973 
ई तक व्याख्याता, बाल चिकित्सा विज्ञान, 6 जून, 973 ई से 3 सितम्बर, 976 
ई तक सहायक प्रोफेसर, बाल चिकित्सा विज्ञान, 4 सितम्बर, 976 ई से 3 दिसम्बर, 
989 ई तक एसोसिएट प्रोफेसर, बाल चिकित्सा के पद पर कार्यरत रहे और 27 
मई १977 ई से 28 मई, 983 ई तक बाल चिकित्सा विज्ञान मे यूएस टी ए डी 
के पद पर लीबिया मे विदेश कार्य हेतु प्रतिनियुक्ति पर रहे। 4 दिसम्बर 989 ई 
से राज्य सेवानिवृत्ति 3 मार्च 4994 ई तक वह प्रोफेसर, बाल चिकित्सा औषधि 
विज्ञान के पद पर कार्यरत रहे | सेवा निवृत्ति के उपरान्त वह अपने निवास स्थान 60 


भारत के चिकित्सा वेज्ञिनिक 67 


हरिमार्ग, सिविल लाइन्स, जयपुर एवं दाद्‌ अस्पताल लाजपत मार्ग महावीर स्कूल 
के पास, सी स्कीम, जयपुर में रोगियो के उपचार काय मे सलग्न है। 

उन्होने सन्‌ 967 इ से एम बी बी एस ओर एम बी बी सी एच के छात्रो को 
3974 ई से एमडी और डीसीएच के #“'त्रो को, १967 ई से 3976 ई 
तक अतिरिक्त चिकित्सा छात्रो-कम्पाउन्डरो, ड्रेसर्स (मल्हम-पट्टी करने वाले), 
औषधि-विक्रेताओ तथा नर्सो को अशकालीन अध्यापक के रूप मे बी एस सी (गृह 
विज्ञान) के छात्रो को 964 से १986 ई तक और बी एस सी (नप्िंग) के छात्रों 
को 976 ई से अध्यापित किया। 


अनुसन्धान कार्य--निम्नलिखित क्षेत्रों मे अनुसन्धान के प्रति उनकी अभिरुचि 
रही है। 
(१) रक्‍त विज्ञान रक्त अल्पता (कमी और थल सेमिआ) 


(2) पोषण प्रोटीन न्‍्यूनता के कारण उत्पन्न सलक्षण (क्वाशीओरकर) 
तथा सूखा रोग (मेरोसमस) 


(3) तत्रिका विज्ञान अनुमस्तिष्कीय पक्षाघात और मानसिक रुकावट 
(4) नवजात शिशु विज्ञान कम भार वाले उत्पन्न शिशु। 


उनकी प्रमुख शोध-प्रायोजनाये क्वाशीओरकर और सूखा रोग के मुख्य तत्त्वो 
का सर्वेक्षण हैं। 


डॉ सुद्रानियों ने हस्तरेखाओ के आधार पर चिकित्सा की नवीन पद्धति का 
व्यापक अध्ययन किया है। उनके अनुसार हस्तरेखा के सहारे चिकित्सा पद्धति नवजात 
शिशुजात शिशुओ के लिए है और इससे शिशु के उत्पन्न होते ही उसकी हस्तरेखा 
के अध्ययन के आधार पर उसके नवजात रोगो का पता लगाया जा सकता है। उनके 
सीथ तीन चिकित्सा छात्रो ने हस्तरेखा से हृदण रोग तथा मानसिक विकृतियो की जाँच 
पर व्यापक शोध किया है। इसके लिए 300 शिशुओ का लगभग एक साल तक 
अध्ययन किया गया। इस तकनीक पर सन्‌ 985 ई से शोध कार्य जारी है। सितम्बर, 
4992 ई म॑ डॉ सुद्रानियों ने ब्राजील के रियो द जिनरियो मे सम्पन्न बीसवी वर्ल्ड 
काग्रेस ऑफ पेडिएट्रिक्स मे हस्तरेखा से चिकित्सा पद्धति की जानकारी दी और उनका 
आलेख एडिनबरा (इग्लैड) से प्रकाशित ''टैक्स्ट बुक ऑफ पेडिएट्रिक्स '' मे प्रकाशित 
किया गया। 


डॉ सुद्रानियों ने हस्तरेखा से रोग का पता लगाने की तकनीक के बारे मे यह 
बतलाया कि छुटली अँगुली तथा तर्जनी अँगुली के नीचे हथेली के उभारो (माउन्टेन्स) 


68 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


के मध्य बिन्दु से हथेली के अन्तिम छोर के मध्य बिन्दु तक एक त्रिकोण बनाया 
जाता है। यदि हथेली क अन्तिम छोर पर बनने वाला कोण 47 से 52 अश से कम 
होता है तो शिशु सामान्य होता है। जब यह कोण 47 अश से कम होता है तो हृदय 
सम्बन्धी बीमारी से तथा 52 अश से अधिक होने पर मानसिक रोग से ग्रसित होता 
है। डॉ सुद्रानियोाँ के अनुसार अँगुली के पोरों से भी इस तरह का पता चल सकता 
है। प्राय अँगुली पर धनुष, वक्राकार तथा चक्र के आकार मे रेखाये होती है। जब 
चक्र होता है और वह अँगूठे की ओर खुलता है, तो मानसिक और छोटी अंगुली 
की ओर खुलने पर हृदय सम्बन्धी रोगो की ओर सकेत करता है। जब पौरो पर 
वक्राकार, चक्र तथा धनुषाकार तीन तरह की रेखाये होती है, तो शिशु मे विकृतियों 
होती हैं। कितनी अँगुलियो पर यह है, उसके आधार पर रोग की गम्भीरता का पता 
चलता है। 

उनके अनुसन्धान क्षेत्र है--(0) बाल चिकित्सालयो मे वात ज्वर की घटना का 
सर्वेक्षण, (॥) इलैक्ट्रो क्राइग्राम निदानात्मक एवं रोग परिणाम सम्बन्धी भविष्यवाणी 
साधन के रूप मे, और (॥) आनुवशिक विकृतियो के लिए योजनान्तर्गत एक अध्ययन 
डर्मेटोग्लि फिक्स | 


उन्हे 979 और 980 ई मे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मण्डल (नेशनल हेल्थ बोर्ड), 
फिनलैण्ड से अनुसन्धान अनुदान अथवा पुरस्कार प्राप्त हुए। 


उन्होने एमडी (बाल चिकित्सा विज्ञान) के दस छात्रो के शोध कार्य का 
निरीक्षण एवं मार्गदर्शन किया। 


डॉ एस पी सुद्रानियों ने बच्चो के रोने की आवाज सुनकर उनके रोगों 
के बारे मे जानकारी प्राप्त करने का एक तरीका विकसित करने का दावा किया 
है। उनके अनुसार रोने की आवाज मात्र से बच्चो के लगभग साठ प्रतिशत रोगो 
के बारे मे सही जानकारी प्राप्त की जा सकती है। ऊर्जा के रूपान्तरण सिद्धान्त 
की व्याख्या करते हुए डॉ सुद्रानियों ने बताया कि बच्चे के रोने की आवाज को 
'इलेक्ट्रो-कायोग्राफ' उपकरण से कागज पर उतारा जा सकता है। इसे देखकर 
विशेषज्ञ चिकित्सक बेहद कम खर्च पर ही बच्चे को रोग के प्रति सही धारणा 
बनाकर उसका इलाज कर सकता है। 


डॉ सुद्रानियों के अनुसार जब बच्चा माँ के गर्भ से बाहर आता है तो पहली 
बार रोठा है। बच्चे के इस प्रथम रु'न को सुनकर ही उसके स्वास्थ्य सम्बन्धी भविष्य 
का निर्धारण व्टिया जा सकता है। यदि बच्चे का प्रथम रुदन जोर से हो तो यह माना 
जाता है कि वह जीवन भर स्वस्थ रहेगा। इसके विपरीत यदि रुदन न हो अथवा 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 69 


धीरे हो तो बच्चे का स्वास्थ्य ठीक नहीं माना जाता, क्योकि रोने के लिए अच्छे शरीर 
के अलावा अच्छे मस्तिष्क का होना भी निनन्‍्तात आवश्यक हाता है। 


बच्चे के प्रथम रुदन का कारण स्पष्ट करते हुए डॉ सुद्रानियों ने बताया कि 
माँ के गभ मे बच्चा परजीवी के रूप मे रहता ह जहाँ उसे समुचित रूप से ऑक्सीजन 
भोजन और शानन्‍्त वातावरण उपलब्ध होता है लेकिन ज्योही वह बाहरी ससार मे 
प्रवेश करता है, वेसे ही उसके रक्‍त में कार्बनडाइ ऑक्माइड का स्तर बढ जने से 
उसका मस्तिष्क उद्दीपित होना है और वह रो पडता है। 


रोना एक सहज एवं सरल प्रक्रिया है जिसके तहत श्वसन तत्र के अवरोध 
दूर हो जाते है एव फुफ्फुस (लग्स) सक्रिय हो उठते है। बच्चे का धीरे अथवा कम 
आवाज मे रोना उसकी फुफ्फुसीय स्थिति का परिचायक होता है। 

डॉ सुद्रानियों के अनुसार अमेरिका की स्पीच रिकगनिशन एण्ड लेग्वेज 
अडरस्टेडिग सर्विसेज प्रयोगशाला और कनाडा की ब्रिटिश कोलम्बिया विश्वविद्यालय 
के विशेषज्ञों ने भी हाल ही बच्चे के रोने की व्याख्या की है लेकिन उन्होने सन्‌ 982 
मे ही इसका वैज्ञानिक विवेचन कर इस बारे मे जापान मे व्याख्यान दिया था। डॉ 
सुद्रानियों ने टेप रिकार्डर, माइक्रोफोन ओर साउन्ड स्पेक्ट्रोग्राफ जैसे सामान्य उपकरण 
का प्रयोग करके इस प्रणाली का विकास किया है। इस प्रणाली द्वारा कम से कम छ 
रोगो--दमा, हृदय रोग, मानसिक मदता और सेरेब्रल पल्सी आदि का निदान किया जा 
सकता है। डॉ सुद्रानियों अपनी इस खोज को पेटेन्ट करवाने के लिए प्रयासरत है। 

प्रकाशन--डॉ सुद्रानियों की हिन्दी भाषा मे लिखी गई पुस्तक “शिशु ओर 
स्वास्थ्य” प्रकाशित हुई। उन्होंने विकासशील देशों के लिए बाल चिकित्सा विज्ञान 
पर एक लघु पाठ्यपुस्तक भी लिखी। 

उनके लगभग 30 लेख राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय प्रख्यात जनलो मे प्रकाशित 
हुए है। वह अब तक 7 पत्र सम्मेलनो मे प्रस्तुत कर चुक हं। उनके लेख विभिन्‍न 
महाविद्यालयों की पत्रिकाओं राज्य और सम्मेलनों एवं स्मारिकाओ मे भी प्रकाशित 
हुए है। 

सदस्यता--डॉ सुद्रानियों अखिल राजस्थान बाल रोग चिकित्सक सघ भारतीय 
बाल राग चिकित्सक अकादमी, भारतीय चिकित्सा सघ तथा भारतीय चिकित्सा शिक्षा 
विकास सघ के सदस्य है। वह भारतीय चिकित्सा सघ की जोधपुर शाखा के सचिव 
रहे तथा १973 ई मे सर्वात्कृष्ठ सचिव का पुरस्कार उन्हे प्रदान किया गया था। वह 
भारतीय चिकित्सा सघ की जोधपुर शाखा क॑ उपाध्यक्ष रहे। वह सामुदायिक विकास 
कार्यक्रम जूनियर चम्बर ऑफ इन्टरनेशनल के अध्यक्ष रहे और पुरस्कार प्राप्त किया। 


70 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


वह लायन्स इन्टरनेशनल के समाज कल्याण कार्यक्रमों के अध्यक्ष रहे और 
पुरस्कार अर्जित किया। वह ग्रामीण समूहो, चिकित्सकीय सभाओ, सेमीनारों और 
परिसवादों के जिला और राज्य स्तरों पर समन्वयक और सयोजक रहे। उन्होने 967 
से 976 ई तक जोधपुर मे अखिल भारतवर्षीय एव अखिल राजस्थान के विभिन्‍न 
सम्मेलनो के सयक्त सचिव के दायित्वों का निर्वहन किया। 


सम्मान--उन्हे सन्‌ 977 ई मे दिल्ली मे तेरहवे अन्तर्राष्ट्रीय बाल रोग चिकित्सा 
सम्मेलन मे सन्‌ 983 ई मे मनीला मे और १992 ई मे रियो (ब्राजील) मे भाग 
लेने के लिए विशेष रूप से आमत्रित किया गया था। सन्‌ 979 ई से दो वर्ष तक 
वह विश्व स्वास्थ्य सगठन के सक्रिय विशेषज्ञ दल के सदस्य रहे | उन्होने महाविद्यालय, 
जिला, राज्य, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कई वैज्ञानिक सत्रो की अध्यक्षता की। 
उन्हे वियना विश्वविद्यालय, बलिन विश्वविद्यलय, कोपेनहेगन विश्वविद्यालय, 
हेलसिकी विश्वविद्यालय, ओयलू विश्वविद्यालय, टोक्यो विश्वविद्यालय, मनीला 
विश्वविद्यालय, हागकाग विश्वविद्यालय, सिगापुर विश्वविद्यालय, बैंकाक विश्वविद्यालय, 
स्वास्थ्य मत्रालय, दुबई, सयुक्त अरब गणराज्य, जार्जिया विश्वविद्यालय, अटलान्टा, 
यू एस ए इस्ताम्बूल विश्वविद्यालय (टर्की) और रियो दि जेनेरियो विश्वविद्यालय 
(ब्राजील) ने विस्तार-भाषण हेतु आमत्रित किया था। 

वह बी एस सी (गृह विज्ञान), बी एस सी (नर्सिंग), अतिरिक्त चिकित्सा 
प्रमाण-पत्रो ओर डिप्लोमा, एम बी बी एस /एम बी बी सी एच, डी सी एच और 
एम डी (बाल राग विज्ञान) के परीक्षक है। डॉ सुद्रानियों को वर्ष १997 का नाहार 
सम्मान प्रदान किया गया। 

विदेश भ्रमण--वह यूरोप, अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका सयुकत राज्य अमेरिका 
और एशिया के 29 देशो की यात्रा अतिथि भाषण, विस्तार-भाषण सकाय भाषण 
प्रस्तुत करने, दृश्य अवलोकन और शोध-पत्र वाचन के सम्बन्ध मे कर चुके है। डॉ 
सुद्रानियोँ ने सयुक्त अरब गणराज्य (मिस्र) की राजधानी काहिरा मे 0 से 5 सितम्बर, 
१995 इ तक आयाजित अन्तर्राष्ट्रीय बाल रोग चिकित्सा सम्मेलन मे भाग लिया। डॉ 
सुद्रानियोँ ने 8 से 27 जुलाई, 996 ई तक अमेरिका की यात्रा की जहाँ उन्होने 
डरहम स्थित ड्यूक विश्वविद्यालय म॑ 8 से 9 जुलाई, 996 ई तक बाल रोग 
एच आईं वी का अध्ययन किया तथा 27 जुलाई, 4996 कां न्यूयार्क मे व्याख्यान 
प्रस्तुत किया। 


अभिरुचियॉ--उनकी अभिरुचियोँ पढना, लिखना और यात्रा करना है। 


डॉ महदी हसन 
(१936 ई ) 


जन्म एवं वश परिचय--डॉ महदी हसन का जन्म 2। माच, ॥936 ईं 
को भारत के उत्तरप्रदेश राज्य मे फैनाबाद जिले मे अकबरपुर नामक स्थान पर 
हुआ था। उनके पिता स्वर्गीय श्री जावद हुसेन का स्वगवास 940 इ में हो गया 
था, जब डॉ हसन लगभग 4 वर्ष के थे और उनका पालन-पोष्ण उनकी माता 
स्वर्गीय श्रीमती तय्यबिन निसा ने उसके बडे भाइयों श्री बख्शीश हुसैन और श्री 
गुलाम हुसैन की मदद से किया था। डॉ हसन का विवाह स्वर्गीय श्री काजिम 
हुसैन वकील की पुत्री आबिदा काजिम एम ए के साथ सन्‌ 959 ई में हुआ 
था। 5-6 बार लगातार गर्भपात के बाद सौभाग्य से सन्‌ 964 ई मे उनके अब्बास 
अली महदी नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह उनका इकलोतठ पुत्र है, जिसने 
जैव-रसायन मे पी एच डी की हे। उसने बी एससी और एम एससी (जैव 
रसायन) परीक्षाओ मे प्रथम श्रेणी प्राप्त्की और 987 ई मे 74ब अक सहित 
एम फिल की उपाधि प्राप्त की। आजकल वह जवाहर लाल नेहरू चिकित्सा 
महाविद्यालय, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़, उत्तरप्रदेश के सूक्ष्म जीव 
विज्ञान विभाग के परजीवी प्रतिरक्षा विज्ञान सभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर सुहेल अहमद 
के मार्गदर्शन मे मलेरिया के परजीवी के विरुद्ध एक टीका विकमित करने के प्रयास 
म॑ मलेरिया के परजीवी पर कार्यरत है। 


शैक्षिक जीवन--डॉ हसन ने कक्षा आठ तक अपनी प्रारम्भिक शिक्षा 
विश्वेवरनाथ हाई स्कूल अकबरपुर, फैजाबाद, उत्तरप्रदेश मे प्राप्त की थी। उनके बडे 
भाई श्री गुलाम हुसैन ने तब तक प्रान्तीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा मे सफलता प्राप्त 
कर ली थी और उनका पदस्थापन गोडा जिले मे उटराला नामक स्थान पर उपजिला 
अधिकारी के पद पर हुआ। उन्होने उन्हे और माँ को गोडा बुला लिया, जहाँ उन्होने 
यूपी बोड से हाई स्कूल परीक्षा राजकीय हाइ स्कूल से प्रथम श्रेणी मे गणित मे 
विशेष योग्यता और अग्रेजी मे 734 अक सहित 4950 ई में उत्तीण की | उनमे अध्यापन 
के प्रति सहज प्रवृत्ति थी, किन्तु उनके बडे भाई ने उन्हे अपने स्वर्गीय पिता की इच्छा 
से अवगत कराया कि उनके तीन बेटो मे से एक को चिकित्सा व्यवसाय को ग्रहण 


28, भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


करना चाहिए। अत उन्हाने यू पी पूर्व चिकित्सा परीक्षा के लिए तेयारी करने का 
निश्चय कर लिया तथा जुलाई, 950 ई मे लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज मे प्रवेश 
प्राप्त कर लिया। वहाँ से उन्होने १952 ई मे जीव विज्ञान वर्ग मे प्रथम स्थान सहित 
प्रथम श्रेणी म यूपी बोड की इन्टरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण की, किन्तु उम्र कम होने 
के कारण (एव चिकित्सा परीक्षा के लिए निर्धारित 37 वर्ष के स्थान पर ॥6 वर्ष) 
वह लखनऊ विश्वविद्यालय मे बी एससी मे दाखिल हो गए और १953 ३ मे 
बी एस सी पूवाद्ध परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। वह 952-53 ई मे वर्ष भर पूर्व-चिकित्सा 
परीक्षा के लिए तैयारी करते रहे ' इसी बीच मे उन्होने फुटबाल, हॉकी और क्रिकेट 
मे लखनऊ विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया। जून, 953 ई मे उन्होने प्रथम 
प्रयास मे पूर्व चिकित्सा परीक्षा मे सफलतापूर्वक स्पर्धा की और किग जॉर्ज चिकित्सा 
महाविद्यालय लखनऊ मे दाखिला ले लिया। चूँकि उन्होने अध्ययन के साथ खेलो 
का मेल किया, फुटबाल, हॉकी और क्रिकेट मे चिकित्सा महाविद्यालय और लखनऊ 
विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करने के साथ साथ वह सभी चिकित्सा-विषयो मे 
औसतन 62ब अक प्राप्त करते रहे। सन्‌ १955 ई मे वह चिकित्सा महाविद्यालय 
के टेबिल टेनिस के चैम्पियन रहे। खेलो और अध्ययन दोनो मे उनकी प्रवीणता के 
सम्मान मे उन्हे 957 ई मे किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज मे सर्वश्रेष्ठ छात्र और खिलाडी 
होने के उपलक्ष मे महाविद्यालय प्रतीक और भटनागर स्मृति ट्राफी प्रदान की गई। 
इससे बढकर, उन्होन॑ शरीर क्रिया विज्ञान मे बरीज स्वर्ण पदक ओर काय-चिकित्सा 
मे वार्ड कार्य के लिए द्वितीय पुरस्कार जोता था। उन्होने किंग जॉर्ज चिकित्सा 
महाविद्यालय लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ (उत्तरप्रदेश) से एम बी बी एस की 
उपाधि 60 8ब अक सहित प्रथम श्रेणी मे 958 ई मे प्राप्त की। उन्होंने 4962 ई 
म॑ शरीर रचना विज्ञान मे विशेष योग्यता सहित एम एस (मास्टर ऑफ सर्जरी) की 
उपाधि किग जॉर्ज चिकित्सा महाविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की। 
तदुपरान्त उन्हे काय चिकित्सा विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलोगढ 
(यू पी ), भारत द्वारा विष-विज्ञान मे पी एच डी (डॉक्टर ऑफ फिलाँसोफी) की 
उपाबि प्रदान की गई । उनके शोध-प्रबन्ध का शीर्षक था “इफेक्ट्स आफ थेलियम 
पॉइजनिंग ऑन दि रेट ब्रेन-ए न्यूरोहिस्टोलॉजीकले, हिस्टोकैमिकत इलैक्ट्रान 
माइक्रोस्कोपिक एण्ड क्वाटिटेटिव बॉयोकैमिकल स्टडी (चूहे के मम्तिष्क पर थेलियम 
(सीसे के समान एक सफद मुलायम धातु) के जहर का प्रभाव--ऊतकोय 
ऊतक--रासायनिक इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शीय ओर परिमाणात्मक जैव रासायनिक 
अध्ययन''। सन 983 इ मे अलीगढ विश्वविद्यालय अलीगढ़ (यू पी) भारत ने 
उन्हे डी एम सी (डॉक्टर ऑफ साइन्म) की उपाधि प्रदान की। शरीर रचना विज्ञान 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 7३ 


मे एम एस पीएचडी ओर डी एस सी (चिकित्सा) की उपाधि प्राप्त करने वाल 
वह प्रथम और आज तक एकमात्र व्यक्ति हैं। 


व्यावसायिक जीवन--958 इ मे एम बी बी एस उपधि प्राप्त करने के बाद 
मानव शरीर रचना विज्ञान मे अध्यापन ओर अनुसन्धान काय-दश्षेत्र के लिए विकल्प 
देने से पूर्व उनके सामने नेत्र-विज्ञान मे हाउस-ऑफिसर के पद पर काय के कारण 
सक्षिप्त अवरोध रहा। 6 नवम्बर, 958 ई को उन्होतरे शरीर की रचना विज्ञान विभाग 
के जी चिकित्सा महाविद्यालय, लखनऊ मे कनिष्ठ प्रदशक के पद का कार्यभार ग्रहण 
किया और मई, 963 ई तक इस पद पर कार्यरत रहे। 2 मई, 4963 ई से 7 
अक्टूबर, 963 ई तक उन्होने व्याख्याता, शरीर रचना विज्ञान के जी चिकित्सा 
महाविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ (यूपी ), भारत के पद पर कार्य 
किया। 8 अक्टूबर, 963 ई से 37 मार्च, १972 इ तक उन्होने रीडर, शरीर रचना 
विज्ञान, जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय 
अलीगढ, यू पी, भारत के पद पर कार्य किया। उन्होने इन्स्टीट्यूट ऑफ न्यूरोएनेटोमी 
गोइटिजेन विश्वविद्यालय, (पश्चिमी जर्मनी) मे प्रोफेसर पॉल ग्लीस के साथ जमन 
शेक्षिक आदान-प्रदान सेवा के फैलो के रूप मे दो सेमेस्टर व्यतीत किए थे। 497- 
72 ई म उन्हे अलेक्जेडर वोन हम्बोल्ट फैलोशिप प्रदान की गई और मस्तिष्क पर 
विषाक्त पदार्थों के प्रभाव और वृद्धावस्था पर अति-सगठनात्मक (परााबषाएलाप्र्श) 
अध्ययन का विस्तार किया। १97-72 ई के ग्रीष्मकालीन सेमेस्टर मे वह इन्स्टीट्यूट 
ऑफ न्यूरो-एनेटोमी गोइटिजेन विश्वविद्यालय (पश्चिमी जर्मनी) मे मानद विजिटिग 
प्रोफेसर थे। अप्रैल, 972 ई से वह जवाहर लाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय 
अलीगढ मुस्लिम विश्व-विद्यालय, अलीगढ (यूपी ), भारत मे शरीर रचना विज्ञान 
के प्रोफेसर के पद पर कार्यरत है। 


डॉ महदी हसन वतमान में शरीर रचना विज्ञान के प्रोफेसर ओर निदेशक, 
अन्तर्विषयक मस्तिष्क अनुसन्धान केन्द्र, जवाहर लाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय 
अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ (यूपी ), भारत के पद पर कायरत है। 


वह १2 जून 982 ई से शरीर रचना विज्ञान विभाग के अध्यक्ष है। वह 4 
अप्रेल 983 ई से 26 फरवरी, 985 ई तक जवाहर लाल नेहरू चिकित्सा 
महाविद्यालय चिकित्सालय के चिकित्सा अधीक्षक रहे । वह 26 सितम्बर ।984 इ 
से जवाहर लाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय के प्राचाय एवं मुख्य चिकित्सा 
अधीक्षक है। 

डॉ हसन पूर्व चिकित्सा स्नातक, (एम बी बी एस ) छात्रों को चिक्त्सकीय 
शरीर रचनाशास्त्र (व्यावहारिक) ((॥ाट्वा #व्नण॥ १०900) सहित सचित्र शरे" 


74 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


रचना शास्त्र (0902709॥70 »॥2०॥79) न्यूरोएनोटोमी, भ्रूणविज्ञान (ऐम्ब्रयोलॉजी ) 
माइक्रो-स्कोपिक एनेटोमी, रेडियोलॉजिक एनेटोमी, सरफेस एनेटोमी एवं आनुवशिकी 
(05०॥०४८७), स्नातकोत्तर छात्रो को न्यूरोएनोटोमी, विकासात्मक शरीर रचना शास्त्र 
([0०५८४००४०॥४४। &॥20०॥9५) (जन्मजात दोषपूर्ण निर्माणो और विकृति विज्ञान 
(2800029५) के शरीर रचना शास्त्रीय आधार सहित), बाल रोग वैज्ञानिक शरीर रचना 
शास्त्र, इलैक्ट्रॉन माइक्रोपी सहित सृक्ष्मदर्शीय शरीर रचना शास्त्र, चिकित्सीय विषयों 
मे शरीर रचना शास्त्र के उपयोग अर्थात्‌ विकलागता सम्बन्धी शल्य क्रिया, कान, नाक 
और गले की शल्य क्रिया, नेत्र विज्ञान, प्रसूति विज्ञान (००४८४१८५$) एवं यौन रोग 
विज्ञान, तथा तत्रिका-रसायन (]४८पम्ा०-0०७7रा57५9) और तत्रिका-औषधि विज्ञान 
(ष८एा०-०॥४778००0029५) मे शोध-छात्रो को तत्रिका विज्ञान (6प्रा०४2०0०८) 
पाठ्यक्रम का अध्यापन कर रहे हैं। 
पता--उनका वर्तमान कार्यालयी पता अधोलिखित है-- 
डॉ महदी हसन, 
प्रोफेसर, शरार रचना शास्त्र एव निदेशक, 
अन्तर्विषयक मस्तिष्क शोध केन्द्र, शरीर रचना शास्त्र विभाग, 
जवाहर लाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय, 
अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय, 
अलीगढ-202002, यूपी, भारत 
उनका वर्तमान पत्र-व्यवहार का पता इस प्रकार है-- 
शरीर रचना शास्त्र विभाग, जे एन 
चिकित्सा महाविद्यालय, एएमयू , 
अलीगढ-202002, यू पी 
उनका वर्तमान आवासीय पता निम्नलिखित है-- 
ए-१2, चिकित्सा परिसर, एएमयू , 
अलीगढ-202002, यूपी, भारत 
सदस्थता और फैलोशिप--डॉ हसन सन्‌ ॥976 ई से इन्टरनेशनल ब्रेन रिसर्च 
आर्गेनाइजेशन (आई बी आर सी ) के सदस्य, सन्‌ 972 ई से इन्टरनेशनल कॉलेज 
ऑफ सर्जन्स (एफ आई सी एस ) के, 976 ई से नेशनल एकेडेमी ऑफ मेडिकल 
साइन्सेज (इण्डिया) के, सन्‌ 397] ई से रॉयल माइस्क्रोस्कीपिकल सोसायटी 
(एफ आर एम एस ) (इग्लैड) के, सन्‌ 986 ई से इण्डियन एकेडेमी ऑफ न्यूरो 
साइसेज (ए +॥ई ए एन एस ) के फैलो और 967 ई से नेशनल एकेडेमी ऑफ 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 75 


मेडिकल साइन्सेज इण्डिया (एम ए एम एस ) के सदस्य है। वह वर्ष 986-89 इ 
मे इण्डियन कौसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के शाषी मण्डल के सदस्य रहे ' वर्ष १983 
84 ई से ठह विश्व स्वास्थ्य सगठन (तत्रिका विष विज्ञान) के परामर्शद रहे ह। 
सन्‌ 498 ई से वह तात्रिका विष विज्ञान (श४८ए7क्‍ा०ण०:४०००2५) यूएसए के 
सलाहकार मण्डल के सदस्य हैं। सन्‌ 972 ई से वह अलेक्जेडर वोन हम्बोल्डट, 
पश्चिमी जर्मनी के फैलो हैं । वह सन्‌ 988 ई मे एनेटोमिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया 
के अध्यक्ष और वर्ष 4986-87 ई मे इण्डियन एकेडेमी ऑफ न्यूरोसाइन्सेज के अध्यक्ष 
थे। वह सन्‌ 4986 ई से इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप सोसायटी ऑफ इण्डिया (जैव 
चिकित्सा विज्ञान) के उपाध्यक्ष है। वर्ष 982-86 मे वह एसोसिएशन ऑफ 
जनोंटोलॉजिस्ट ऑफ इण्डिया के उपाध्यक्ष थे। वह सन्‌ 4988 ई से एनेटोमिकल 
सोसायटी ऑफ इण्डिया के तथा 984 ई से इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन के सदस्य 
है। वह एसोसिएशन ऑफ दि इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप सोसायटी ऑफ इण्डिया, इण्डियन 
सोसायटी ऑफ एनवायरनमेन्टल बॉयोलॉजी और इण्डियन एसोसिएशन ऑफ 
बॉयोमेडिकल साइन्टिस्ट के आजीवन सदस्य हैं। वह एशियन सोसायटी ऑफ 
एनवायरनमेन्टल एण्ड इन्डस्ट्रियल टेक्सीकोलॉजी और इण्डियन एकेडेमी ऑफ 
न्यूरोसाइन्सेज के सस्थापक सदस्य हैं । वर्ष 4986-87 इ में वह इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप 
सोसायटी ऑफ इण्डिया के उपाध्यक्ष रहे थे। 


सम्मान और पुरस्कार--सन्‌ 955 ई में काय चिकित्सा विज्ञान विभाग 
के जी चिकित्सा महाविद्यालय, लखनऊ ने उन्हे बुरिज स्वर्ण पदक प्रदान किया था। 
सन 4950 ई मे उन्होने रोगी कक्ष (वार्ड) काय और इतिहास-लेखन के उपलक्ष 
मे चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र मे द्वितीय पारितोषिक प्राप्त किया था। सन्‌ 962 ई 
में उन्होंने एम एस (शरीर रचनाशास्त्र &78&0779) मे ऑनर्स प्राप्त किया था। जनवरी, 
१976 ई में उन्हे सर्वोत्तम शोध-पत्र के उपलक्ष मे राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान अकादमां 
( भारत) द्वारा डों एस एस मिश्र स्मृति पुरस्कार प्रदान किया गया था। दिसम्बर, 976 
ई में एनेटोमिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया ने लखनऊ मे अपने रजत जयन्ती सम्मेलन 
मे उन्हे डॉ धर्म नारायण स्व॑ण पदक भेट किया था। वर्ष १978-79 ई मे भारतीय 
चिकित्सा परिषद्‌ ने उन्हे हरि ओम अलेम्बिक पुरस्कार से विभूषित किया था। विश्व 
स्वास्थ्य सगठन (तत्रिका विष विज्ञान [॥थआण०५7०00029) के सलाहकार के रूप 
में डॉ हसन ने जून, 983 ई में मास्को मे और सितम्बर, 984 ई मे प्राग मे 
विशेषज्ञ समिति की बैठकों में भाग लिया था। 


डॉ हसन सन्‌ 967 ई से जर्नल ऑफ एनेटोमिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया 
के सम्पादक मण्डल के सदस्य हैं। वह इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप सोसायटी के बुलेटिन 


76 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


के सम्पादक मण्डल, बॉयोमेडिसिन कौ सलाहकार समिति, इण्डियन जर्नल ऑफ 
एक्सपेरिमेटल बॉयोलॉजी के 'सदर्भ व्यक्ति दल', न्यूरीटोक्सिकोलोजी (यूएसए ) 
के सलाहकार मण्डल, जर्नल ऑफ एनवायरनमेटल साइन्म एण्ड हेल्‍थ, भाग 'ब* 
कनाडा के सम्पादक-मण्डल, करेन्‍न साइन्स के “सदर्भ हल” तथा विज्ञान और 
प्रौद्योगिकी विभाग की विशेषज्ञ समिति के सदस्य है। 

डॉ हसन सघीय लोक-सेवा आयोग, दिल्ली (भारत), राजस्थान लोक सेवा 
आयोग, अजमेर (भारत) और उत्तरप्रदेश लोक सेवा आयोग, इलाहाबाद (भारत) 
के विशेषज्ञ दल के सदस्य है। 

डॉ हसन सन्‌ 986 ई मे इण्डियन एकेडेमी ऑफ न्यूरोसाइन्सेज के अध्यक्ष 
तथा वर्ष 982-86 मे एसोसिएशन ऑफ जैरोन्टोलोजिस्टस ऑफ इण्डिया तथा वर्ष 
१986-87 ई मे इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कीप सोसायटी इण्डिया के उपाध्यक्ष थे। 

दिसम्बर, 966 ई मे इलाहाबाद मे आयोजित उत्तरप्रदेश कान, नाक और गला 
शल्य चिकित्सको के वार्षिक सम्मेलन मे व्याख्यान प्रस्तुत करने के लिए डॉ हसन 
को आमत्रित किया गया था। अधिष्ठाता, चिकित्सा विज्ञान सकाय, मेशेद विश्वविद्यालय, 
ईरान ने उन्हे 8 मार्च, 4974 ई को मेशेद मे व्याख्यान प्रस्तुत करने के लिए आमत्रित 
किया था। निदेशक, चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, 
वाराणसी ने उन्हे अक्टूबर, 975 ई मे वाराणसी मे राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान अकादमी, 
भारत के उत्तरप्रदेश स्कन्ध के सदस्यो के समक्ष उनके कार्य "मस्तिष्क मे आयु सम्बद्ध 
परिवर्तनो-- [४७ 48०-7९!॥०० ०क्रा2०5 7 06 छाक्वा। पर आधारित वार्ता प्रस्तुत 
करने के लिए आमत्रित किया था। उन्हे प्रोफेसर एम एस कानूनगो, जैव रसायन सभाग, 
प्राणी विज्ञान विभाग, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी द्वारा 29 अक्टूबर, 
१975 ई को वाराणसी मे अपने स्नातकोत्तर छात्रो को उदबोधनार्थ आमत्रित किया 
गया था। डॉ हसन ने केन्द्रीय औषधि अनुसन्धान केन्द्र (सी डी आर आई ), लखनऊ 
के वैज्ञानिकों को 26 जून, १976 ई को “आयु सम्बद्ध और थेलियम (सीसे के 
समान एक सफेद मुलायम धातु) से उत्पन्न मस्तिष्क मे परिवर्तन--,82९-९।७४४९० 
था0 एक्षाएया ॥7क्‍8020 ०भा2०५ ॥ 006 छथा पर उदबोधन किया था| इण्डियन 
सोसायटी ऑफ बॉयोलॉजिकल केमिस्टस द्वारा उन्हे 28 जून, 977 ई को औद्योगिक 
विष विज्ञान अनुसन्धान केन्द्र, लखनऊ मे “मस्तिष्क मे आयु सम्बद्ध परिवर्तनो और 
पर्यावरण प्रदूषण के प्रभाव-- [॥6 88४९०-३५४०८४४७० ०॥97865 ॥ ॥6 छाक्षा। क्वात 
ह8 शीढिछटा$ णी आाशाणाशशा&॥। एगाएा0 '' पर वार्ता प्रस्तुत करने के लिए 
आमत्रित किया गया था। 8 दिसम्बर, 977 ई को स्नातकोत्तर विभाग, काय चिकित्सा 
और विषाणु विज्ञान मे “इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी ऑफ लिपोफूसिन एण्ड सेरोइड इन 


भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक 77 


न्यूरोनल एजिग न्यूरोट्रोमेटि-साइजेशन एण्ड न्यूरोटोक्सि सिटी ”” पर व्याख्यान प्रस्तुत 
करने के लिए डॉ हसन को आमत्रित किया गया था। उन्हे 4 दिसम्बर, 976 ई 
को इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप सोसायटी ऑफ इण्डिया द्वारा मोलिक शोध कार्य “'इलैक्ट्रॉन 
माइक्रोस्कोपी ऑफ न्यूरोनलएजिग एण्ड थेलीटोक्सिकोसिस पर आधारित आमत्रित 
व्याख्यान प्रस्तुत करने के लिए आमत्रित किया गया था। एनेटोमिकल सासायटी ऑफ 
इण्डिया के 26वे वार्षिक सम्मेलन के आयोजन सचिव प्रोफेसर रामास्वामी द्वारा उन्हे 
29 दिसम्बर, 977 इ को बगलौर मे ''दि रिसेन्ट एडवान्सेज इन एजिग इन दि नर्वस 
सिस्टम-नाडी तत्र मे वृद्धावस्था मे नवीनतम विकास '” पर व्याख्यान प्रस्तुत करने के 
लिए आमत्रित किया गया था। उन्हे प्रोफेसर ए कृष्णामूति द्वारा अगस्त, 979 ई 
मे पोस्ट ग्रेजुएट इन्स्टीट्यूट ऑफ बेसिक मेडिकल साइन्सेज, तारामणि, मद्रास मे 
आयोजित चिकित्सा अध्यापको के लिए स्नातकोत्तर प्रशिक्षण सस्थान मे प्रयोगात्मक 
प्रविधियो पर सक्षिप्त स्नातकोत्तर सेमीनार मे “'रिट्रोग्रेड एक्सोनल ट्रान्सपोर्ट ऑफ 
एच आर पी *” पर स्नातकोत्तर व्याख्यान प्रस्तुत करने के लिए आमत्रित किया गया 
था। एनेटोमिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया के 28वे वार्षिक सम्मेलन के आयोजन 
सचिव प्रोफेसर ए एल मेहता ने उन्हे दिसम्बर, 979 ई मे बम्बई मे ''पेडिएट्रिक्स 
हिस्टोलॉजी-बाल चिकित्सा विज्ञान ऊतक विज्ञान”! पर व्याख्यान प्रस्तुत करने के लिए 
आमत्रित किया था। दिसम्बर, 979 इ मे चडीगढ मे आयोजित ई एम एस आई के 
वार्षिक सम्मेलन मे स्केनिग इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी ऑफ वेन्ट्रीकूलर एपेन्डायमा 
पर व्याख्यान प्रस्तुत करने के लिए उन्हे आमत्रित किया गया था। 9 से १4 जून, 
980 ई को उन्हे पश्चिमी जर्मनी मे एस ई एम पर लित्ज कार्यशाला मे ''स्केनिग 
इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी ऑफ दि स्पेन्डायमा ऑफ थर्ड एण्ड फोथ वर्टिकिल्स ऑफ 
दि ब्रेन” पर व्याख्यान प्रस्तुत करने के लिए आमत्रित किया गया था। 47 सितम्बर 
982 ई को उन्होने इन्स्टीट्यूट ऑफ न्यूरीटोक्सिकोलॉजी, अल्बर्ट आइन्स्टीन कॉलेज 
ऑफ मेडिसिन, न्यूयार्क मे “थेलियम न्यूरोटोक्सि सिटी” पर वार्ता प्रस्तुत की थी। 
22 सितम्बर, 982 ई को उन्होने नेशनल सेटर फॉर २क्सिकोलॉजिकल रिसच, 
जफरसन, अर्कान्सस, यू एस ए मे “'-यूरोटोक्सिकोलॉणजी एण्ड न्यूरोजेरोन्टोलॉजी '' पर 
वार्त प्रस्तुत की थी। उन्होने सन्‌ 7982 ई मे काय चिकित्सा विज्ञान सस्थान, हनोई 
विश्वविद्यालय, यू एस ए. मे, नवम्बर, 979 मे औषधि विज्ञान सकाय, सफात, कुवैत 
मे, 98 ई में गैरी-आउनिस विश्वविद्यालय, बेघाजी लीबिया मे, सन्‌ 4983 ई 
मे गोटिन्जन विश्वविद्यालय, जर्मनी मे, औद्योगिक स्वास्थ्य सस्थान डडलडोर्फ, जमनी 
मे न्यूरों सर्जरी विभाग, मेक्स पश्चिमी जर्मनी मे और । जून 984 ई को विको 
इक्विन्स, नेपल्स, इटली मे भी आमत्रित व्याख्यान प्रस्तुत किये थे। 


78 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


डॉ हसन ने विद्वत्‌ सस्थाओ/सम्मेलनो के वैज्ञानिक सत्रो का सभापतित्व किया 
था जैसे--() 28 दिसम्बर, 977 ई को एनोटोमिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया 
के 26वे वार्षिक सम्मेलन मे न्यूरोएनोटोमी का सत्र, (2) ॥0 दिसम्बर ॥977 ई 
को भाभा परमाणु अनुसन्धान केन्द्र, बम्बई मे इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप सोसायटी ऑफ 
इण्डिया के बॉयोलॉजिकल इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी सत्र, (3) ॥0 जनवरी, 979 ई 
को काय चिकित्सा विज्ञान विभाग, मद्रास चिकित्सा महाविद्यालय, मद्रास मे इलैक्ट्रॉन 
माइक्रोस्कोप सोसायटी ऑफ इण्डिया का बॉयोलॉजिकल इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी 
सत्र, (4) 4 जनवरी, 979 ई को पटियाला मे आयोजित एनेटोमिकल सोसायटी 
ऑफ इण्डिया के 27वे वार्षिक सम्मेलन मे न्यूरों एनेटोमी सत्र, (5) १7 दिसम्बर, 
979 ई की सेनन्‍्ट्रल साइन्टिफिक इन्स्ट्रमेटस ओऑर्गेनाइजेशन, चडीगढ मे बॉयोलॉजिकल 
एप्लीकेशन्स ऑफ इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी सत्र, और (6) 30 दिसम्बर, 979 ई 
को ग्रान्ट मेडिकल कॉलेज, बम्बई मे आयोजित एनेटोमिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया 
के 28वे राष्ट्रीय सम्मेलन का न्यूरोलॉजी सत्र। 
उनके नाम का उल्लेख () रिफरेन्स एशिया, ट्रेड्समेन, इण्डिया, दिल्‍ली, 975, 
पृष्ठ 4, (॥) हूज हू इन इण्डिया इन इन्डो-अमेरिकन एज्यूकेशन, 975, फेमस इण्डिया 
पब्लिकेशन्स, दिल्ली, पृष्ठ 02, (7) इण्डियाज हूज हू ईयर बुक 977-78 पृष्ठ 446, 
अल्फा पब्लिकेशन्स, दिल्‍ली मे किया गया है। 
प्रकाशन--डॉ हसन के 207 शोध-पत्र प्रकाशित हुए हैं। उनकी निम्नाकित 
5 पुस्तके और आठ पुस्तक-समीक्षाये प्रकाशित हुई हैं-- 
प्रकाशित पुस्तके 
।4. “लिफोफूसिन इन न्यूरोनल एजिग एण्ड-डिसीजेज'' लेखक पी ग्लीस 
एवं महदी हसन, जॉर्ज थीम वर्लग, स्ट्रटगर्ट, ॥976 
2 “डायग्नोस्टिक हिस्टोलॉजी' लेखक एम हसन, डी आर सिह एव 
पी ग्लीस, अनिता प्रकाशन, लखनऊ, भारत, 974 
3 “मोर्फोलॉजिस्च एण्ड फिजिओलॉजिस्च ग्रुनालाजेन डेस जेन्‍्ट्रालेन 
वेजिटेटिवेन नर्वेन सिस्टम्स'” लेखक पी ग्लीस और एम हसन, 
किलनस्च पैथोलॉजी देस वेजिटेटिवेन नेरेवेनसिस्टम्स मे (सम्पादक 
स्टर्म और बिर्कमेयर), गेस्टाव फिस्चर वर्लग, स्ट्रटगर्ट, 976 
4. “एनेटोमिकल बेसिस ऑफ क्लिनिकल प्रोसीजर्स '' लेखक एम हसन, 
मैकमिलन (इण्डिया), 986 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 79 


5 


*' अन्डरस्टेडिंग ह्यमन ब्रेन एण्ड स्पाइनल कोर्ड'' लेखक महदी हसन 
और एस एच एम अब्दी गलगोटिया पब्लिकेशन्स नह दिल्‍ली, 
992 


पुस्तक समीक्षाये 


] 


न्यूरो बॉयोलॉजी ऑफ दि ट्रेस एमीन्स. फिजिजोलॉजिकल, 
फार्मकोलॉजिकल, बिहेविअरल एण्ड क्लिनिकल आस्पेक्टस (सम्पादक 
ए ए बॉउल्टन, जी बी बेकर, डब्ल्यू जी डेवर्टस और एम सेडलर), 
ह्मन्स प्रेस, क्लिफ्टन, एन जे, 984, पृष्ठ 597, डॉलर 59 50 , एम 
हसन न्यूरोकेमिकल पैथोलॉजी (यू एस ए ) 3 439-१40, 985 
दि न्यूरो बॉयोलॉजी ऑफ जिन्क भाग “अ' फिजियो केमिस्ट्री, एनेटोमी 
एण्ड टेक्निक्स, भाग “ब' डेफिसिऐसी, टोक्सिसिटी एण्ड पैथोलॉजी 
(सम्पादक सी जे फ्रेडरिक्शन, जी ए हॉवेल और ई जे 
कसारस्किस) एलन आर लिस, इन्स, न्यूयार्क, 984, पृष्ठ 390 ( भाग 
अ) डॉलर 54 00 आई एस बी एन 0-845-272-8 और 345 
(भाग ब) डॉलर 58 00 आई एस बी एन 0-845-273-6 एम 
हसन, न्यूरोकेमिकल पैथोलॉजी 4 65-67, 985 

प्रोग्रेस इन न्यूरो एन्ड्रो क्रिनोलॉजी खण्ड १-न्यूरो एन्ड्रोक्रेनोलॉजी ऑफ 
होमेनिट्रानस्समीटर इन्टरएक्शन्स (सम्पादक एच परवेज, एस परवेज 
और डी गुप्ता), वी एन यू साइन्स प्रेस, 3500 जी बी यूटरेच्ट, 
दि नीदरलैण्ड्स, 985, पृष्ठ 305, डॉलर डी एम 67, एम हसन, 
इण्डियन जर्नल ऑफ एक्सपेरीमेटल बॉयोलॉजी, 25. 429-430, 
987 

प्रिवेन्‍शशन ऑफ न्यूरोटॉक्सिक इलनैस इन वर्किंग पॉपूलेशन (सम्पादक 
बैरी एल जोन्सन (सम्पादक एडवर्ड एल बेकर, मुस्तफा एल बाटावी, 
रेनाटो गिलिओली, हेलेना हेनीनेन, अन्ना मेरी सेप्पालेनेन, चार्ल्स 
सिनाटारस, एसोसिएटेड एड), विले एण्ड सन्‍्स, चिचेस्टर, न्यूयार्क, 
१987, पृष्ठ 257, समीक्षक एम हसन, न्यूरोकैमिकल पैथोलॉजी, 8 
225-226, 988 

ट्रेस एमीन्‍न्स कम्परेटिव एण्ड क्लिनिकल न्यूरोबॉयोलॉजी (सम्पादक 
ए ए बॉउल्टन एवी जूओरिओ और आर जी एच डाउनर), हूमाना 
प्रेस क्लिफ्टन, एन जे 988 डॉलर 75, समीक्षक एम हसन 988 


80 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


6. दिहामेन ब्रेन (लखक पी ग्लीस), केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, केम्ब्रिज, 
न्यूयाके, 988, पृष्ठ 204, समीक्षक एम हसन, जर्नल एनेटोमिकल 
साइनस ॥990, 2 59-60 

7 एडवास्सेज इन न्यूरोलॉजी खण्ड 5 “एलजेइर्म्स डिसीज'' (सम्पादक 
आर जे वर्टमेन, एस कोर्किन, जे एच ग्रोडोन, ई आर वाकर), 
राबेन प्रेस, न्यूयार्क, पृष्ठ 282, समीक्षक एम हसाा, न्यूरोकेमिकल 
पैथोलॉजी (99), मोलेक्यूलर एण्ड केमिकल न्यूरोपैथलोजी। 


8 णडेनोसाइन एण्ड एडेनोसाइन रिसेप्टर्स (सम्पादक माइकेल विलियम्स) , 
हूमाना प्रेस, क्लिफ्टन न्यूजर्सी, 990, पृष्ठ 56, समीक्षक एम हसन, 
मोलेक्यूलर एण्ड कैमिकल न्यूरोपैथोलॉजी, 99], 4. 67-68 
उनका कार्य 400 से अधिक शोध-पत्रो और 5 स्तरीय अन्तर्राष्टीय पुस्तको 
और लेखमालाओ मे उद्धृत किया गया है। 
यात्राये--डॉ हसन ग्गोटिजन (पश्चिमी जर्मनी) की दो बार, लन्दन (इणग्लैंड) 
की दो बार, सफात (कुवैत), केम्ब्रिज वेटजलर (जर्मनी), लॉसन (स्विट्जरलैंड), 
शिकागो, न्यूयार्क, लिटिल रॉक, जेफरसन और हवाई (यू एस ए ) मास्को (रूस), 
बेघाजी (लीबिया), प्राग, नेपल्स (इटली) और आइनधोवेन (हॉलैण्ड-दि 
नीदरलैण्ड्स) की यात्राये अब तक कर चुके हैं। 
अनुसन्धान कार्य--उनके अनुसन्धान के प्रमुख क्षेत्र न्यूरोएनेटोमी, न्यूरोहिस्टो 
कैमिस्ट्री, ट्रानस्समिशन इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी, स्केनिग इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी और 
एक्सपेरिमेटल जैरोन्टोलॉजी मे विशेषज्ञता हैं। 
आजकल उनकी अभिरुचि (१) पर्यावरणीय और औद्योगिक तत्रिका विष 
विज्ञान (2) प्रयोगात्मक जैरोन्टोलॉजी (3) छोटी मात्रा मे धातुओ का तत्रिका विष 
विज्ञान, (4) रक्‍त मस्तिष्क प्रतिरोधक और (5) पर्यावरण प्रदूषण के क्षेत्रों मे है। 


डॉ हसन ने कई शोध प्रविधियों सीखी हैं, जैसे--लाइट माइक्रोस्कोपी, इलैक्ट्रॉन 
माइक्रोस्कोपी, इलैक्ट्रो फिजिओलॉजी और न्यूरकैमिकल प्रविधिया। 


प्रो हसन का मत है क्रि बालो का उपयोग शरीर के लिए सम्भावित हानिकारक 
तत्त्वो का पता लगाने के लिए भी किया जा सकता है। उनके शोध-पत्र के अनुसार 
बालो की जडे अपने पोषक तत्त्व रक्त से प्राप्त करती है और शरीर मे व्याप्त तत्त्वो 
की झलक बालो मे मिल सकती है। डॉ हसन मनुष्य के स्नायु सस्थान पर धातुओ 
के असर का अध्ययन कर रहे है। उनके अनुसार कुछ धातुओ की कमी या वृद्धि 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 8] 


से मस्तिष्क की कोशिकाओ व विभिन्‍न सम्प्रेकक रसायना के कायकलापो म॑ इससे 
अन्तर आ जाता है। डॉ हसन का दावा है कि बालो के माध्यम से रोग निदान का 
तरीका कई मामलो मे रकक्‍त-परीक्षण के पारम्परिक त्रीके से भी अच्छा साबित हो 
सकता है। 


डॉ हसन ने () अलेक्जेडर वोन हम्बाल्डट सजा-सज्जा अनुदान रुपये 
3,50,000, (2) वेज्ञानिक और ओद्योगिक अनुसन्धान परिषद्‌ रुपये 2,00,000, 
(3) भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌, (4) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग शोध 
योजना रुपये 50,000 और शोध फैलोशिप तथा (5) विज्ञान एव प्रोद्योगिकी परिषद्‌, 
उत्तरप्रदेश से शोध फैलोशिप और फुटकर अनुदान जेसे शोध अनुदान प्राप्त किये। 


वह पी एच डी आशार्थियो की 6 शोध आयोजनाओ का पर्यवेक्षण कर 
चुके हैं। 

देन--जेरोन्टोलॉजी (5.०॥00४8०५) की समस्याओ के परीक्षण हेतु 
उपकरण के रूप मे स्नायु विष सम्बन्धी माध्यम--अन्तर्विषयक स्नायु जैव वैज्ञानिक 
अध्ययनो ने इस बात का सकेत दिया हे कि सबेदात्मक, ज्ञानात्मक, चालक प्रक्रियाओ 
और जीव वैज्ञानिक गतिवधियों सस्‍्नायु एवं तत्रिका अन्त रुगवी तत्रों के रचनात्मक एव 
कार्यकारी सगठन से सम्बन्धित की जा सकती है। एकीकृत अनुकूल नियत्रक तत्रो 
के रूप मे मस्तिष्क और तत्रिका अन्त स्रवियाँ सम्पूर्ण जीवन-दश्षेत्र मे पर्यावरणीय 
चुनौतियो के प्रति सर्मास्थर अनुकूलन के साथ घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध किये गये हैं। 
मस्तिष्क की योग्यता मे तत्रिका कोशिकाओ /7०070॥8) तत्रिका श्लैष्म (7०07029) 
और रक्‍त नलिकाओ के अत्यन्त विषम स्थान सम्बन्धी सम्बन्धो को कार्यकारी प्रभावों 
की पूर्णरूप से प्रशसा करने के लिए अति सगठनात्मक व्याख्या विस्तार से की गई। 
बहिर्जन विषो के लिए स्नायु तत्र की प्रतिक्रियाये मानव स्नायु तत्र मे सामान्य विकास 
और वृद्धावस्था की अनेक घटनाओ को सक्षेप मे वर्णन के लिए ज्ञात हैं। स्नायु तत्र 
पर विषाक्त पदार्थों के आवृत्ति वैज्ञानिक प्रभाव इस प्रकार अनेक बुरी तरह समझी 
गई बीमारियों के रोगवर्द्धन मे प्रभावपूर्ण अन्तर्दृष्टि को स्पष्ट करते है। मस्तिष्क मे 
वृद्धावस्था के परिणाम चिन्ता का अधिक प्रतिनिधित्व करते है, क्योकि आअशत 
मनोवैज्ञानिक वृद्धावस्था बहुत मन्द और कोमल प्रक्रिया का होना प्रतीत होती है। 
सस्‍्नायु विष सम्बन्धी माध्यमों को इस प्रकार जैव वैज्ञानिक वृद्धावस्था को बढाने के 
लिए प्रयोगात्मक साधनो के रूप मे प्रयोग किया जा सकता है जिसके द्वारा उसकी 
उत्पत्ति मे अधिक उत्तम अन्तर्दृष्टि का अवसर प्रदान किया जाता है। 

[] 


डॉ अरुण बोर्दिया 
(4936 ई ) 


जन्म एव वश परिचय--डॉ अरुण बोर्दिया का जन्म 6 अप्रैल, 936 ई 
को उदयपुर मे हुआ था। उनके पिता श्री केसरी लाल जी बोर्दिया माध्यमिक शिक्षा 
बोर्ड, राजस्थान, अजमेर के भूतपूर्व अध्यक्ष थे। उनकी माता श्रीमती तारा बोर्दिया 
एक गृहिणी थी। उनकी जीवन-सहचरी श्रीमती मजुला बोर्दिया मीरा कन्या 
महाविद्यालय, उदयपुर मे दर्शनशास्त्र विभाग मे सहायक प्राध्यापक है। उनका पुत्र 
श्री प्रशान्त बोर्दिया और उनकी पुत्री सुश्री सुरभि बोर्दिया पी एच डी उपाधि हेतु सयुक्त 
राज्य अमेरिका मे अनुसन्धान करते रहे हैं। 


शैक्षिक जीवन--डॉ बोर्दिया ने राजस्थान विश्वविद्यालय से 960 ई मे 
एम बी बी एस परीक्षा तथा 4964 ई मे एम डी (सामान्य भेषज) परीक्षा उत्तीर्ण को | 
सन्‌ 975 ई मे वह अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी के फैलो (एफ ए सी सी ) 
बन गए। उन्होने 966 ई मे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान सस्थान, नई दिल्ली मे, 
969-70 ई मे रॉचेस्टर जनरल हॉस्पिटल, रॉचेस्टर, यूएसए मे और 975 ई 
मे ग्रान्ट मेडिकल कॉलेज, बम्बई मे हृदय रोग विज्ञान (कार्डियोलोजी--८#'०002५) 
मे प्रशिक्षण प्राप्त किया था। 


व्यावसायिक जीवन--डॉ बोर्दिया ने 44 जुलाई, 96+ से 6 नवम्बर, 
964 ई तक सिविल असिस्टेट सर्जन, 7 नवम्बर, 964 ई से 4 अक्टूबर, 966 
ई तक भेषज विज्ञान में टूटर, 5 अक्टूबर, 966 ई से 20 अगस्त, १97] ई तक 
सहायक प्राध्यापक 2] अगस्त, १97] ई से 8 जून, 989 ई तक एशोसिएट प्रोफेसर 
के रूप मे सेवा की। वह 9 जून, 989 ई से प्रोफेसर भेषज विज्ञान, 975 ई से 
अध्यक्ष, स्वदेशी औषधि अनुसन्धान केन्द्र और अगस्त ॥989 ई से सेवानिवृत्ति 
तिथि 30 अप्रैल 994 तक अध्यक्ष, भेषज विज्ञान विभाग के रूप मे कार्यरत रहे। 
4 अगस्त, 989 ई से 3। मार्च, 990 ई तक डॉ बोर्टिया ने मुख्य अन्वेषक मधुमेह 
चिकित्सा केन्द्रो (भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ की प्रायोजना) के- रूप में 
कार्य किया था। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 83 


पता--उनका आवासीय पता इस प्रकार है-- 
76 बी, ओल्ड फतेहपुरा 
उदयपुर (राजस्थान)-3300॥ भारत। 

सदस्यता और फैलोशिप--डॉ बोर्दिया कॉर्डियोलॉजी सोसायटी ऑफ इण्डिया 
और एसोसिएशन ऑफ फीजीसियन्स ऑफ इण्डिया के सदस्य हैं। वह अमेरिकन 
कॉलेज ऑफ कॉर्डियोलॉजी के फैलो है। 

पुरस्कार एवं सम्मान-- अमेरिका कॉलेज ऑफ कॉडियोलॉजी ने डॉ बोर्दिया 
को 969-70 ई मे उत्तर-डॉक्टरेट फैलोशिप प्रदान की। इस फैलोशिप को प्राप्त 
करने वाले वह राजस्थान मे पहले ओर भारत मे अट्ठाइसवे व्यक्ति है। इस क्षेत्र मे 
यह सर्वोच्च सम्मान माना जाता है। रॉचेस्टर जनरल हॉस्पिटल, रॉचेस्टर, न्‍्यूयाक मे 
हृदय रोग विज्ञान (कॉर्डियोलॉजी--८४0700£29) मे प्रशिक्षण काल मे डॉ बोर्दिया 
ने चिकित्सालय मे फेलो ओर अवशिष्ट व्यक्तियों मे सर्वोत्तम चिकित्सकीय काय के 
लिए प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया था। ' श्रीमती रुप्तम जाल वकील अध्यापक और 
हृदय-फुफ्फुस (फेफडा) सम्बन्धी रोग मे स्वर्ण पदक 973'” एशोसिएसन ऑफ 
फीजीसियन्स ऑफ इण्डिया, बम्बई द्वारा उन्हे हृदय रोग विज्ञान के क्षेत्र म अनुसन्धान 
मे उनके महत्त्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रशस्ति-पत्र एव नकद राशि 
के रूप मे प्रदान किया गया था। उन्होने 977 ई मे मर्क भाषण पुरस्कार प्राप्त 
किया। इसमे दो हजार रुपये नकद और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है। उन्होने 
अपना पत्र एशोसिएसन ऑफ फीजीसियन्स ऑफ इण्डिया के सयुक्त सम्मेलन में 22 
जनवरी, 977 ई को प्रस्तुत किया था। युवा वैज्ञानिकों मे पत्र सर्वोत्तम माना गया 
था। विगत दो वर्षो मे राजस्थान के समस्त चिकित्सा महाविद्यालयो मे प्रकाशित सर्वोत्तम 
पत्र के लिए उन्हे वर्ष 7973 ई के लिए एक हजार रुपये और प्रशस्ति का गार्गी 
देवी एस वी सिह पुरस्कार प्रदान किया गया। बारहवे राजस्थान चिकित्सक सम्मेलन, 
कोटा मे 978 ई मे उन्हे अनुसन्धान के क्षेत्र मे उल्लेखनीय योगदान के लिए थॉमस 
भाषण पुग्स्कार प्रदान किया गया था। इसमे एक रजत फलक, एक प्रशस्ति-पत्र और 
नकद राशि प्रदान की जाती है। सन्‌ 977 ई मे वह राजस्थान सरकार एवं तत्फलस्वरूप 
भारत सरकार द्वारा विश्व स्वास्थ्य सगठन के हृदय रोग विज्ञान के विजिटिग वैज्ञानिक 
(फैलो) चयनित और नियुक्त किए गए। इसके अन्तर्गत उन्होने इग्लैंड और सयुकत 
राज्य अमेरिका का भ्रमण किया। 26 जनवरी 985 ई को गजस्थान सरकार की 
ओर से राजस्थान राज्य के राज्यपाल ने 2७ जनवरी को गणतत्र दिवस पर डॉ बोर्दिया 
को यांग्यता सेवा पुरस्कार से सम्मानित किया था। अमेरिकन कॉलेज ऑफ 


५4 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


कॉडियोलॉजी की फेलोशिप उन्हे सयुक्त राज्य अमेरिका के राजदूत ने 975 ई मे 
नई दिल्ली मे प्रदान को थी। वेस्ट जर्मन सोसायटी फॉर कम्युनिटी हेल्‍थ एण्ड मेडिसिन 
पश्चिमी जर्मनी ने 4988 इ मे “'स्वास्थ्य और औषधि '” पर अपना गोरवशाली पुरस्कार 
उन्हे प्रदान किया था। इसमे 0000 डी एम (लगभग 85 हजार रुपये) नकद और 
एक प्रशस्ति-पत्र दिया गया। विश्व विख्यात सस्था ने पहली बार एक भारतीय को 
अपना पुरस्कार प्रदान किया था। यह इस आधार पर प्रदान किया गया कि भारतीय 
जडी बूटियो के क्षेत्र मे डॉ बार्दिया के कार्य ने लोगो के स्वास्थ्य मे सुधार किया 
है | इस प्रकार डॉ बोर्दिया को “'चिकित्सकीय अनुसन्धान, लहसुन और अन्य भारतीय 
जडां-बूटियो के प्रयोग, विशेषत “इफेक्ट ऑफ-गार्लिक ऑन मोर्टेलिटी एण्ड 
इन्सीडेस ऑफ रि-इनफार्कशन इन पेसेन्ट्स ऑफ कोरोनरी आर्टेरी डिसीज'' शीर्षक 
नामक उनके अनुसन्धान के क्षेत्र मे उनके अनुसन्धान योगदान के उपलक्ष मे पुरस्कार 
के लिए चुना गया था। डॉ बोदिया को प्रदत्त प्रशस्ति से पक्तियो को यहाँ उद्धृत 
किया जाता है। ''चिकित्सा के इस क्षेत्र मे यह प्रमुखता उन औषधियो के कारण 
है जिनका शरीर पर कोई हानिकारक प्रभाव नही होता है--जो आप, प्रोफेसर बोर्दिया 
ने मार्गदर्शक अनुसन्धान किया है जिसके मानवीय उपयोग मे पूर्णतया ग्रहण करने 
से स्वास्थ्य और ऐसी ही अनेक लोगो को जीवन अवधि निश्चित रूप से सुधरंगी।'' 
“सामुदायिक स्वास्थ्य और चिकित्सा सोसायटी के मण्डल” का कम से कम यह 
मत है कि आपके अनुसन्धान को ''स्वास्थ्य ओर चिकित्सा ' पुरस्कार से सम्मानित 
किया जाना चाहिए जिसमे इसमे सम्बन्धित अभिलेख और दस हजार डी एम की 
पारिश्रमिक राशि सम्मलित है जिसे अब आपको सौपते हुए हमे हर्ष है'' '“हम अपने 
आपको सौभाग्यशाली समझेगे प्रिय प्रोफेसर, यदि आप अनेको-अनेको लोगो को 
स्वास्थ्य के अनुसरक्षण क॑ हित मे पौधो के सक्रिय सिद्धान्त के क्षेत्र मे अपना अनुसन्धान 
जारी रखे।'' महाराणा मेवाड फाउन्डेशन, उदयपुर द्वारा हृदय रोग विज्ञान के क्षेत्र मे 
“नके उल्लेखनीय योगदान के लिए डॉ बोर्दिया को विशिष्ट पुरस्कार स्वरूप 5 हजार 
रुपये नकद, एक शॉल और प्रशस्ति-पत्र अप्रैल, 990 ई मे प्रदान किया गया था। 
प्रशस्ति-पत्र म कहा गया है “' भारतीय परिवेश मे आयुर्विज्ञान मे अर्जित उपलब्धियो 
क उपलक्ष म॑ “महाराणा मेवाड फाउन्डेशन'” आपको विशिष्ट पुरस्कार से सम्मानित 
करता है।'” उन्होने (॥) हेनरी फोर्ड चिकित्सालय डेटरॉइट (॥) यूनिवर्सिटी ऑफ 
मैसाचूसेट्स मेडिकल सेटर मैसाचूसेटस, और (॥) गूयस्‌ हॉस्पिटल, लन्दन के 
अवलोकनार्थ विश्व स्वास्थ्य साग,न--विजिटिग फैलाशिप अवॉर्ड प्राप्त किया। 
सन्‌ 976 ई मे बोर्दिया को फेडरेशन ऑफ हगरियन मेडिकल सोसायटी द्वारा 
हगरी में चतुर्थ इन्टरनेशनल आर्टरिजोस्क्लेरसि। (#&॥00५5८/20५५) सम्मेलन मे 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 85 


अपना कार्य प्रस्तुत करने के लिए आमत्रित किया था। नवम्बर 979 इ में उनन्‍्ह 
एशियन पैसिफिक काग्रेस ऑफ काडियोलॉजी बेकाक थाइलेड म विशिष्ट भाषण 
देने हेतु आमत्रित किया गया था। डॉ बोदिया को स्वदशी ओषधिया पर ब्यि गये 
कार्य को प्रस्तुत करने के लिए 7 से 32 सितम्बर 980 इ तक एथेन्म म काग्रस 
ऑफ द्वादश वल्ड काग्रेस ऑफ एन्गिओलॉजी द्वारा आमत्रित किया गया था। सन 
3985 इ मे उन्हे यूरोपियन सोसायटी फॉर फाइटोथेरेपी ([0900॥289॥५) स काल्‍न 
(९०४) पश्चिमी जर्मनी मे भाषण देने के लिए निमत्रण प्राप्त हुआ था। सन्‌ 988 
ई मे उन्हे जर्मन सोसायटी फॉर हर्बल रिसर्च द्वारा मन्स्टर (/प्ाा०रश) ( जमन प्रजातात्रिक 
गणराज्य) मे द्वितीय जडी-बृटी अनुसन्धान काग्रेस मे भाषण देने के लिए बुलाया 
गया था। फरवरी, 989 ई मे उन्हे लुन्बर्ग विश्वविद्यालय पश्चिमी जर्मनी द्वारा भारतीय 
जडी-बूटियो और हृदय रोग पर भाषण देने के लिए आमत्रित किया गया था। अगस्त, 
990 ई मे उन्हे वाशिगटन डी सी , सयुक्त राज्य अमेरिका मे “लहसुन का स्वास्थ्य 
के लिए महत्त्व--दि सिगनिफिकेस ऑफ गार्लिक (॥6 झशाएी८क्रा०८ ण (६0९) 
पर प्रथम विश्व काग्रेस मे भाषण देने के लिए आमत्रित किया गया था। उन्हे प्रेस 
क्लब ऑफ जर्मनी द्वारा हेम्बर्ग मे जडी-बूटियों और हृदय रोग पर अपने अनुभठ 
और प्रयागो को प्रम्तुत करने के लिए बुलाया गया था। मार्च, १99] ३ मे उन्‍्ह बलिन 
विश्वविद्यालय द्वारा “लहसुन पर परिसवाद”' हेतु वैज्ञानिक समिति का सदस्य बनने 
एवं सत्र की अध्यक्षता करने हेतु बुलाया गया था। 


डॉ बोर्दिया भारत के कुछ गौरवशाली सस्थानो जैसे--0) स्नातकोत्तर 
चिकित्सा शिक्षा और अनुसन्धान सस्थान, चडीगढ मे 985 ई मे ओर (7) 25 जून, 
977 ई को अमेरिकन कॉलेज ऑफ चेस्ट फीजिशिन्यस एण्ड एशोसिएशन ऑफ 
फीजिशियन्स ऑफ इण्डिया-बम्बई शाखा मे विजिटिग वैज्ञानिक रहे। सन्‌ 4974 इ 
मे डॉ बोर्दिया को एशोसिएशन ऑफ फीजिशिन्यस की कोयम्बटूर शाखा द्वारा भाषण 
हेतु आमत्रित किया गया था। सन्‌ 978 ई मे उन्हे कनाटक चिकित्सा परिषद द्वारा 
लहसुन और धमनी काठिन्य (00 ॥70 &07९००४८०८०४१५) पर भाषण देने के 
लिए बुलाया गया था। सन्‌ 984 ई मे अठारहवे राजस्थान चिकित्सा सम्मेलन, जो धपुर 
मे “हृद-धमनी रोग की रोकथाम (फा्श्थ्ाण एण ८णणाक्षा काल 056356) 
पर भाषण देने के लिए बुलाया गया था। उन्हे विश्व स्वास्थ्य सगठन की ''लिपिड्स 
एण्ड लिफेप्रोटीन्स इन हैल्थ एण्ड डिजीज विद स्पेशल रिफरेस टू इण्डिया ([॥छ05 
क्षात [90ञातलशा$ ता वल्वात कराते ता52882 जात 50968५०४ 7€शथिशाट€ (० 
[009) पर नई दिल्ली मे कार्यशाला मे “अतिथि भाषण” हेतु आमत्रित किया 
गया था। 20 फरवरी ॥983 ई का जबलपुर मे आयोजित मध्य रेलवे के 


86७ भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक 


सम्मेलन मे हृदय रोग की रोकथाम पर भाषण देने के लिए बुलाया गया था। 5 फरवरी 
983 ई को अहमदाबाद मे सी एच डी पर राष्ट्रीय वाद-विवाद मे सूची मे और 
मुख्य वक्ता के रूप मे उन्हे बुलाया गया था। 6 मई, ।985 ई को उन्हे हृदय रोग- 
आयुर्वेद पर राष्ट्रीय सम्मेलन मे हृदय रोग और आयुर्वेद की भूमिका पर वैज्ञानिक 
सेमीनार मे विशिष्ट भाषण हेतु बुलाया गया था। सन्‌ 979 इ मे फीजिशियन्स ऑफ 
इण्डिया की सयुक्त परिषद्‌ की मद्रास मे आयोजित बैठक में 'हाथपरलिपिडेमिआ' 
पर वाद-विवाद समूह को अध्यक्षता हेतु चयनित किया गया था। उन्हे (3) डायबिटिक 
एशोसिएशन ऑफ इण्डिया, (॥) एशोसिएशन ऑफ फीजिशियन्स ऑफ इण्डिया, 
(7) लिपिड एण्ड कोलेस्ट्रोल रिसर्च कमेटीज अन्डर इण्डियन कौंस्लि ऑफ मेडिकल 
रिसर्च, और (५) कॉर्डियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया द्वारा आयोजित विभिन्‍न 
वैज्ञानिक सेमीनारों की अध्यक्षता करने के लिए आमत्रित किया गया था। 


वह 975 से 986 तक 'इण्डियन हार्ट जर्नल' के सम्पादक मण्डल मे रहे 
तथा जर्नल ऑफ एशोसिएशन ऑफ फीजिशियन्स ऑफ इण्डिया, इण्डियन हार्ट जर्नल, 
इण्डियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च, इण्डियन जर्नल ऑफ आशथरोस्लेरोसिस से उनके 
पास लेख अवलोकन एव स्वीकृत हेतु आते रहते है' 

] जनवरी, 977 ई को वह इण्डियन हार्ट जनल के सम्पादक द्वारा इण्डियन 
हार्ट जर्नल के कार्डिक थेरापेयुटिक्म (हृदय चिकित्सा विज्ञान) पर इण्डियन हार्ट जर्नल 
के गौरवशाली अध्यापन अक मे आलेख प्रस्तुत करने हेतु आमत्रित किये गए थे। 

वर्ष 980-8] ई में वह इण्डिया हार्ट जर्नल के हा4५रलिपिडेमिय। पर 
अध्यापन विशेषाक के “अतिथि सम्पादक' थे। 

प्रकाशन--डॉ बोर्दिया के लगभग 80 शोध-पत्र राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जर्नलो 
मे प्रकाशित हो चुके है। वे मुख्यतया स्वदेशी औषधियो, धमनी काठिन्य, रक्त लिपिडस 
और बिम्बाणु (9०(22) कार्यो पर उनके प्रभावों से सम्बन्धित है। 

उन्होने निम्नाकित पुस्तको का सम्पादन किया है-- 


 प्रोग्रेस इन वेसकूलर डिजीजेज ([0022५55 ॥ ४४४८७& ५28५८५) 
978 

2 ट्रेन्डस इन कार्डियोलॉजी (५७805 ॥॥ (070]029) ५98] 

अनुसन्धान कार्य--डॉ बोर्दिया ने स्वदेशी औषधि अनुसन्धान के क्षेत्र मे 
व्यापक कार्य किया है और इस कारण राजस्थान सरकार ने उनको अध्यक्षता मे 
रवीन्रनाथ टैगोर आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, उदयपुर मे स्वदेशी औषधि अनुसन्धान केन्द्र 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 87 


की स्थापना की। स्वदेशी ओऑषधि अनुसन्धान एवं आयुर्वेदिक और एलोपेथिक चिकित्सा 
प्रणाली के एकीकृत क्षेत्र म॑ महत्त्वपृण यागदान किया गया है । उनके कार्य को पहले 
ही विश्वव्यापी मान्यता प्राप्त हो चुकी है। केवल इस विषय पर राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय 
जर्नलो मे उनके 35 लेख है। अधिकॉश लेख अधोलिखित विषयो पर रह हे-- 

सक्रिय सिद्धान्तो (गुणो) का पृथक्‍कीकरण और धमनी काठिन्य रक्त लिपिड्स 
और रक्‍त जमाव पर उनका प्रभाव, जडी-बूटियों और प्याज लहसुन जैसे मसालो 
विटामिन-सी, अदरख, गोद गुग्गल, गोद हींग, लौंग का तेल, इलायची हल्दी 
दालचीनी, सौंफ, मेथी, ऑवला अर्जुन की छाल, नीम, तुलसी और च्यवनप्राण पर 
बिम्बाणु समुच्चय | 

प्याज, लहसुन और हीग के सक्रिय सिद्धान्त (गुण) को पृथक्‌ करने वाले 
और हृदय रोग की रोकथाम और व्यवस्थापन मे उनका प्रयोग स्थापित करने वाले 
डॉ बोर्दिया पहले व्यक्ति थे। इस हेतु उन्हे विश्व स्वास्थ्य सगठन की विजिर्टिंग 
फैलोशिप तथा भारत एवं विदेश से भाषण हेतु अनेक आमत्रण प्राप्त हुए। 

3 लहसुन ओर प्याज के अधोलिखित गुणो को बतलाने वाले वह प्रथ्म 
व्यक्ति थे-- 

(0) उनके सक्रिय सिद्धान्त (गुण) को पृथक्‌ किया, 

(0) धमनी-काठिन्य प्रतिरोधिता, 

(7) बिम्बाणु समुच्वय का निषेध और चिपकनापन 

(५) रक्‍त लिपिड्स को कम करने वाला गुण, 

(०) रक्‍त का थक्‍का जमाने का गुण। 

इन गुणो को उन्होने पहली बार विश्व साहित्य मे दर्शाया था और तदुपरान्त 
सयुकत राज्य अमेरिका, जर्मनी, जापान और अन्य देशा मे वैज्ञानिको ने उनकी पुनरावृत्ति 
की। इस कारण उन्हे सम्पूर्ण विश्व मे विभिन्‍न परिसवादो एवं सम्मेलनो मे आमत्रित 
किया गया है। उनके निष्कर्षो ऑर खोजो का यह परिणाम है कि लहसुन को हृदय 
रोगियो के प्रयोग के लिए और कॉलेस्ट्रोल को कम करने तथा बिम्बाणुआ पर लाभकारी 
प्रभाव हेतु एक औषधि के रूप मे स्वीकार कर लिया गया है। 

2 गोद गुग्गल--गोद गुग्गल के बिम्बाणु-प्रतिरोधी एवं रक्त का थक्‍्का जमाने 
के गुणो को बतलाने वाले वह प्रथम व्यक्ति थे। उन्होने इसके रक्त मे बसा होने 
की दशा को कम करने के प्रभाव को भी बतलाया। उनके कार्य के फलस्वरूप अब 
गोद गुग्गल रक्त द्रव कौलेस्टोल को कम करने मे एक प्रभावकारी रोग निदान और 


88 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


चिकित्सा स्वीकार कर लिया गया है तथा विभिन्‍न औषधि निर्माता गोद गुग्गल सहित 
उत्पाद तैयार कर रहे है। 


3 ऑवला फल का अध्ययन--ऑवला फल अत्यधिक मात्रा मे विटठामिन- 
सी धारण करने के लिए विख्यात है तथा स्वास्थ्य पर लाभकारी प्रभग्व डालने वाला 
बतलाया गया है। इस फल का उपयोग च्यवनप्राश अथवा मुरब्बा के रूप म॑ किया 
जाता है। इन दोनो रूपो मे ऑवला 2-3 घण्टो तक उबाला जाता है। कोई भी यह 
आशा कर सकता है कि उबालने के समय विटामिन-सी नष्ट हो जावेगा और इसलिए 
यह प्रश्न उत्पन्न हुआ कि आवला स्वास्थ्य के लिए किस प्रकार लाभप्रद है। इस 
दिशा मे उन्होने ऑवले के विषय मे अधोलिखित निष्कर्षो से अवगत कराया-- 


0) आंवला मे विद्यमान विटामिन-सी केवल ऑशिक रूप से नष्ट हो जाता 
है और फल को उबालने के बावजूद पर्याप्त मात्रा मे फलो मे विद्यमान 
रहता है। 

(7) आऑवला फलो मे वर्तमान विटामिन-सी अन्य विटामिन-सी की तुलना 
मे रक्त मे अधिक समय तक बना रहता है। उन्होने सुझाव दिया 
कि ऑवला फल का विटामिन-सी कुछ पकाने के बाद डिब्बा बन्द 
किया जाता है और इसलिए रक्त द्रव स्तर अधिक समय तक बना 
रहता है। 

(7) उन्होने बतलाया कि ऑवला मे रेशे की लम्बी श्रृंखला होती है जो 
हृदय रोग की रोकथाम करने और कॉलेस्टोल स्तर को कम करने मे 
सर्वाधिक लाभप्रद है। 


4 च्यवनप्राश--च्यवनप्राश का पहला वैज्ञानिक अध्ययन उन्हांने किया हे, 
जो यह प्रकाश डालता है कि-- 


(0) तीन घण्टो तक आऑवला उबालने के समय ऑवला फल मे विटामिन- 
सी ऑशिक रूप से नष्ट हो जाता है। 


(07) च्यवनप्राश विटामिन-सी लेने से रक्त के स्तर विद्यामान रहते हे। 
(॥) च्यवनप्राश स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हे। 


5 ग्रामीण निवासियों मे हृदय रोग की सक्रामकता का अध्ययन करने वाले 
वह प्रथम हैं। 
6 विटामिन-सी के नए गुण अर्थात्‌ इसके रक्त का थक्‍्का जमाने वाला प्रभाव 
और बिम्बाणु प्रतिरोधी प्रभाव को बतलाने वाले वह प्रथम हैं। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 89 


7 उनके कार्य ने यह मत स्थापित किया ह कि भारत मे वन गेगो को उत्पन्न 
करने वाले महत्त्वपूण कारकों मे से एक तम्बाकू खाना ओर बीडी पीना ह। ( जनल 
ऑफ फीजीशियन्स ऑफ इण्डिया खण्ड 25 जून, 977) 


इस प्रकार डॉ बोर्दिया के अनुसार भारतीय भोजन मे काम आने वाल मसाले 
स्वास्थ्य के लिए अच्छे हैं, विशेषकर हृदय रोगो मे तो काफी उपयोगी हैं। उनका 
कहना है कि केवल खुशबू अथवा स्वाद के लिए ही मसालो का उपयोग नही किया 
जाता बल्कि इनका हृदय पर अच्छा प्रभाव पडता है। आमतौर पर भारतीय मसालेदार 
सब्जी खाते हैं। इन सब्जियो मे घी/तेल अच्छी मात्रा मे डाला जाता ह। मसाले शरीर 
मे घी/तेल के दुष्प्रभावो को कम करते हैं। धमनियो मे वसा के जमाव को कम करते 
हैं, रक्त को पतला करते हैं तथा रक्त चाप को भी सामान्य बनाये रखते हैं। 


डॉ बोर्दिया को उपर्युक्त कार्य हेतु अनुसन्धान अनुदान प्राप्त हुए-- 

4. “ धमनी काठिन्य मे प्रयोगात्मक रूप से प्याज ओर लहसुन के आवश्यक 
तेल [सक्रिय सिद्धान्त (गुण)] के अध्ययन हेतु ''-भारतीय चिकित्सा 
अनुसन्धान परिषद्‌, 3975-76, 76-77 


2. “मानव मे घातक अध्ययन मे रक्त लिपिड्स पर प्याज और लहसुन 
के आवश्यक तेल के प्रभाव का अध्ययन करना '” १975-76, चिकित्सा 
अनुसन्धान केन्द्र, बम्बई हॉस्पिटल ट्रस्ट । 

3 “मानव मे रक्त समुच्चय पर प्याज और लहसुन के सक्रिय सिद्धान्त 
(गुण) के दीर्घकालीन प्रभाव का अध्ययन करना।” वेज्ञािनिक और 
औद्योगिक अनुसन्धान परिषद्‌, 4976-77, 977-78 


4. “मानव मे रक्त लिण्ड्सि पर लहसुन के प्रभाव का अध्ययन करना 
१979-80 और १98-82 
5. रक्‍त लिपिड्स पर गुग्गल का प्रभाव, अनुसन्धान अनुदान 983, 84 
ओर 85 वेज्ञानिक और औद्योगिक अनुसन्धान परिषद क पक्ष मे प्राप्त 
किया गया था। 
रुचिकर कार्य--उनके रुचिकर कार्य सगीत, बागवानी ओर खेल है। वह 
बैडन्टिन नाटक हॉकी आदि मे राजस्थान विश्वविद्यालय के विजेता गह चुके है। 


[] 


डॉ. बी भण्डारी 
(१938 ई ) 


जन्म एवं शिक्षा--डॉ भगवती लाल भण्डारी का जन्म 3 जनवरी, 938 ई 
को भारत के राज्य राजस्थान मे झीलो की नगरी उदयपुर मे हुआ था। उनकी विद्यालयी 
और महाविद्यालयी शिक्षा उदयपुर मे सम्पन्न हुई थी। उन्होने एस एम एस चिकित्सा 
महाविद्यालय, जयपुर (राजस्थान), भारत के नियमित छात्र रहकर सन्‌ 960 ई 
मे एम बी बी एस परीक्षा और 963 ई मे एमडी (भेषज विज्ञान) परीक्षा तथा 
१964 ई मे कॉलेज ऑफ फिजिशियन्स एण्ड सर्जन्स, बम्बई से डी सी एच परीक्षा 
उत्तीर्ण की। 


व्यवसाय के पथ पर--डॉ भण्डारी विभिन्‍न पदो पर कार्यरत रहे। वह 
7 मई, 4963 स॑ 4 सितम्बर, 964 ई तक एस एम एस चिकित्सालय, जयपुर और 
आर एन टी चिकित्सा महाविद्यालय, उदयपुर मे सहायक चिकित्साधिकारी के पद पर 
कार्यरत रहे । वह आर एन टी चिकित्सा महाविद्यालय, उदयपुर मे 5 सितम्बर, 964 
से 8 अक्टूबर, 965 ई तक बाल रोग विज्ञान विषय मे सहायक चिकित्साधिकारी 
एवं ट्यूटर के पद पर, 49 अक्टूबर, 965 ई से 20 अक्टूबर, 967 ई तक 
बालरोग विज्ञान विषय मे व्याख्याता पद पर, 2। अक्टूबर, 967 ई से 3 सितम्बर, 
974 ई तक बाल रोग विज्ञान विषय मे रीडर के पद पर, 4 सितम्बर से बाल रोग 
विज्ञान विषय के प्रोफेसर पद पर, 22 जनवरी, 985 ई से बाल रोग विज्ञान विषय 
के वरिष्ठ प्रोफेसर पद पर, 8 अप्रैल, *984 ई से 3 अक्टूबर, 989 ई तक 
चिकित्सा अधीक्षक, सामान्य एवं जनाना चिकित्सालय, उदयपुर के पद पर, नवम्बर, 
3987 ई से 45 जून, 988 ई तक वरिष्ठ प्रोफेसर तथा प्रधानाचार्य एवं नियत्रक 
के पद पर, तथा 3 जुलाई, 4989 ई से 58 वर्ष की वय पर राज्य सेवा से अपनी 
सेवानिवृत्ति तिथि 3] जनवरी, 3996 ई तक वरिष्ठ प्रोफेसर तथा प्रधानाचार्य एव 
नियत्रक के पद पर कार्यरत रहे। 

उन्होने (0) चडीगढ मे विश्व स्वास्थ्य सगठन द्वारा १968 ई मे आयोजित 
“*नियोनाटोलॉजी (]२७०॥४॥०/०४५) - नवजात शिशु विज्ञान'' मे विकसित पाठ्यक्रम, 
(॥) अन्तर्राष्ट्रीय बाल केन्द्र, पेरिस और विश्व स्वास्थ्य सगठन द्वारा 969 ई मे नई 


भाग्त के चिकित्सा वैज्ञानिक 9] 


दिल्‍ली मे “सामाजिक और निरोधक बाल रोग विज्ञान पर आयाजित दक्षिण पूव 
एशिया कार्यगोष्ठी, (॥॥) विश्व स्वास्थ्य सगठन द्वारा 972 इ मे जयपुर मे आयोजित 
“पुन आद्रता स्थापन (रिहाइड्रेसन) राग निदान ओर चिकित्सा (थिरैपी)'' में 
विकसित पाठयक्रम, और (१५) उदयपुर मे (विश्व स्वास्थ्य सगठन-भारताय चिकित्सा 
अनुसन्धान परिषद्‌, महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाये) 98 ई मे ओरल रिहाइड्रेसन थिरैपो 


पर राष्ट्रीय सेमीनार मे विशष प्रशिक्षण प्राप्त किया था। 


सदस्यता और फैलोशिप--वह अमेरिकन एकेडेमी ऑफ पेडिएण्ट्रिक्स, 
यू एस ए और भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी के सदस्य है। वह रॉयल सोसायटी ऑफ 
ट्रॉपिकल मेडिसिन, लन्दन के फेलो हेँं। वह सेवा मन्दिर, उदयपुर ओर ज्ञान मन्दिर 
उदयपुर के आजीवन सदस्य है। वह विज्ञान समिति, उदयपुर और विकलॉग समिति 
उदयपुर के सस्थापक और आजीवन सदस्य है | वह सन्‌ 988 इ मे इण्डियन एकेडेमी 
ऑफ थडिएट्रिक्स के फेलो (एफ आइ ए पी ) ओर 989 ई में एकेडमी ऑफ 
मेडिकल साइन्सेज के फेलो (एफ ए एम एस ) बने। 

उन्होने वर्ष 4960-6 इ में ''शिशुओ मे अन्त परिस्तरीय रक्त आयात-]#74- 
एशाणाटवा 9006 (एक्षा्प६0) ॥ एथि॥|5/' पर अनुसन्धान कार्य हेतु थेमिस 
फेलोशिप “पीप बनाने वाली मस्तिष्क की झिल्ली मे सूजन मे कमी--]२९५७॥॥ 
पा ?902थ॥आ५ (८॥४०४९॥४१५ पर शाध कार्य हेतु 96] ई में बम्बई चिकित्सालय 
जर्नल शोध पूल फैलोशिप, '' अकुरा कृमि (चनूना) रोग मे बिटोस्केनेट (8/0९0 44९ 
7 00-४7 ०5७85८ पर अनुसन्धान कार्य हेतु सन्‌ 964 ई मे फार्बेवर्की 
होइकस्ट, पश्चिमी जर्मनी, फैलोशिप, '' विशिष्ट पोषण कार्यक्रम के धर्मस्व प्राप्तकर्ताओ 
के मूल्यॉकन '' हेतु वर्ष 4972 73 इ मे समाज कल्याण विभाग, राजस्थान सरकार 
का शोध अनुदान, “' भारतीय बाल्यकाल मे किसी अग विशेषकर यकृत की अन्तरालीय 
सूजन मे जम्ते की भूमिका--२06 ० गाए ॥ सतवाशा (फ्रा080095 (ता0डा5 
हेतु चिकित्सा अनुसन्धान कन्द्र, बम्बई चिकित्सालय का वष 4976-77 का शोध 
अनूदान “' धनुस्तम्भ नवजात शिशु रोग मे अन्त रक्षकावरणीय ए टी एस --]70608/ 
6& [58 का वीलक्राए७ पिल्णावाणापा। हेतु भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ 
का वष 978-79 ई में अनुसन्धान- अनुदान तथा फेैलोशिप, '' अस्वाभाविक वस्नुओ 
के खा+ को लालसा (चाह) मे जस्ता--2770 ॥ [०३ हेतु चिकित्सा अनुसन्धान 
केन्द्र बम्बई चिकित्सालय का वर्ष 978-79 इ मे शोध अनुदान “डीपीटी 
भण्डारण और दुलाइ”' हेतु भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ का वष 979- 
80 मे शोध अनुदान “बीसी जी टीका युक्त बच्चों मे क्षय रोग” हतु चिकित्सा 


92 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


अनुसन्धान केन्द्र, बम्बई चिकित्सालय का वर्ष ॥980 8] मे शोध अनुदान, 
'' आदिवासियो मे प्रचलित स्तन पान प्रथाओ पर बहु केन्द्रिक अध्ययन '' हेतु भारतीय 
चिकित्सा अनुसन्धान परिषद का वर्ष 982-84 ई मे शोध अनुदान तथा ''परिरंखीय 
स्वास्थ्य सेवाओ '' पर वर्ष 988-9] ई मे और ““तत्रिका सम्बन्धी नली दोषा ”' मे 
वर्ष 989 ई मे भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद के अनुदान प्राप्त किये। 


अनुसन्धान कार्य--डॉ भण्डारी ने बाल रोग विज्ञान से सम्बन्धित विभिन्‍न 
प्रकरणो जैसे--(3) शिशुओ मे अन्त परिस्तरीय रक्त आपात, (॥) पीप बनाने वाली 
मस्तिष्क की झिल्ली मे सूजन मे कमी, (॥) अकुरा कृमि (चनूना) रोग मे 
बिटोस्केनेट, (५) भारतीय बाल्यकाल मे किसी अग विशेषकर यकृत की अन्तरालीय 
सूजन मे जस्ते की भूमिका, (५) धनु-स्तम्भ नवजात शिशु रोग मे अन्त रक्षकावरणीय 
एटीएस, (५) डी पीटी भण्डारण और ढुलाई, (शा) बीसीजी टीका युक्त 
बच्चो मे क्षयरोग, (श॥ध) आदिवासियो मे प्रचलित स्तनपान प्रथाओ पर बहुकेन्द्रिक 
अध्ययन, (/:) परिरेखीय स्वास्थ्य सेवाये, और (५) तत्रिका सम्बन्धी नली दोषों 
पर अनुसन्धान कार्य किया है। 


सम्मान और पुरस्कार--बाल रोग विज्ञान के क्षेत्र मे श्रेष्ठ कार्य और प्रकाशनो 
के उपलक्ष मे राजस्थान सरकार ने डॉ भण्डारी को सन्‌ 98 ई मे योग्यता प्रमाण- 
पत्र और दो हजार रुपये का नकद पारितोषिक प्रदान किया था। चिकित्सा विज्ञान 
के क्षेत्र मे उनकी महत्त्वपूर्ण सेवाओ के लिए उन्हे डॉ फारुख अब्दुल्ला पुरस्कार, 
99 ई मे प्रदान किया गया था। 


वह गृह विज्ञान महाविद्यालय, उदयपुर विश्वविद्यालय, विस्तार शिक्षा 
निदेशालय, उदयपुर विश्वविद्यालय, शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय विद्या भवन, 
उदयपुर, शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, डबोक (उदयपुर), सामाजिक विज्ञान 
और सामाजिक कार्य पीठ, उदयपुर, पुनश्चर्चा प्रशिक्षण केन्द्र, उदयपुर, विद्या 
भवन ग्रामीण सस्थान, उदयपुर, ऑगनबाडी कार्यकर्ता प्रशिक्षण केन्द्र जनता 
कॉलेज, डबोक और राजस्थान महिला विद्यापीठ, उदयपुर मे विजिटिग व्याख्याता 
रहे थे। 

वह वर्ष 966-69 ई में भारतीय चिकित्सा सघ, उदयपुर के मानद 
सचिव, वर्ष 972-73 और १973-74 मे रोटरी क्लब, उदयपुर के सचिव तथा 
वर्ष 974-75 में उपाध्यक्ष वर्ष 4970-76 मे विज्ञान समिति के उपाध्यक्ष, सन्‌ 
977 ई में भारतीय बाल रोग विज्ञान अकादमी राजस्थान राज्य शाखा के अध्यक्ष, 
सन्‌ 984 ई में भारतीय बाल रोग विज्ञान अकादमी क॑ कार्यकारी सदस्य, वर्ष 4975- 


भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक 93 


76 और 976 77 मे रोटरी क्लब उदयपुर के अध्यक्ष वर्ष 977-80 ई मे विज्ञान 
समिति, उदयपुर के अध्यक्ष वर्ष 979-80 इ मे छात्र परिषद्‌, आर एन टी चिकित्सा 
महाविद्यालय उदयपुर के अध्यक्ष तथा सन्‌ 4982 से 984 इ तक विकलॉग कल्याण 
समिति, उदयपुर के अध्यक्ष थे। 

विदेश भ्रमण--वह पश्चिमी जर्मनी ईरान, डेन्माक इग्लेड हॉलेण्ड फ्रास 

स्विटजरलैण्ड, आस्ट्रिय, इटली यूनान, इजरायल, कनाडा और यू एस ए की यात्रा 
कर चुके है। 

प्रकाशन--उनके 90 से अधिक शोध-पत्र राज्य, राष्ट्रीय ओर अन्‍न्तराष्ट्रीय 

चिकित्सा जर्नलो मे प्रकाशित हो चुके हैं। 

उन्होने निम्नलिखित आठ पुस्तके लिखीं/सम्पादित की है-- 

(।) बालको का बीमारियो से बचाव (हिन्दी)-सेवा मन्दिर प्रकाशन द्वारा 
प्रकाशित, 9/0, डॉ बी भण्डारी, द्वितीय सस्करण १976, तृतीय 
सस्करण १979। 

(2) बालको का सनन्‍्तुलित आहार (हिन्दी)-सेवा मन्दिर प्रकाशन द्वारा 
प्रकाशित, 4972, डॉ बी भण्डारी एव बी एम गुप्ता, द्वितीय सस्करण, 
3976 नाम “शिशु आहार” और तृतीय सस्करण 979। 

(3) शाला स्वास्थ्य स्कवायेन एव शिक्षा (हिन्दी) राजस्थान माध्यमिक शिक्षा 
मण्डल द्वारा 977 ई मे प्रकाशित (पृष्ठ 450), डॉ बी भण्डारी। 

(4) बाल स्वास्थ्य (हिन्दी) भारतीय बाल रोग विज्ञान अकादमी राजस्थान 
राज्य शाखा द्वारा प्रकाशित, 977 (पृष्ठ 47), डॉ बी भण्डारी द्वारा 

& सम्पादित। 

(5) “प्रोग्रेस इन पेडिएट्रिक्स 9979-80'' डॉ बी भण्डारी, डॉ एस एल 
मण्डोवरा और डॉ आर के पामेचा द्वारा सम्पादित, भारतीय बाल रोग 
विज्ञान अकादमी (राजस्थान राज्य शाखा) | 

(6) “पेडिएट्रिक्स प्रेसक्राइबर'' 983 (65 पृष्ठ), डॉ बी भण्डारी तथा 
डॉ बी शारदा, बाल रोग विज्ञान विभाग। 

(7) इन्ट्रीगेटेड चाइल्ड डेवलपमेट सर्विसेज'' द्वारा डॉ बी भण्डारी तथा 
डॉ एस एल मण्डोवरा (पृष्ठ 58) बाल रोग विज्ञान विभाग। 

(8) स्मारिका द्विदशकीय वार्षिक समारोह 984। 


94 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


उन्होने अधोलिखित पाठयपुस्तको मे अध्याय लिखे हैं-- 


() 


(॥) 


(॥) 


(॥५) 


ओ पी थॉमन द्वारा सम्पादित “टेक्स्ट बुक ऑफ पेडिएट्रिक्स-बाल 
रोग विज्ञान की पाठयपुस्तक '', 983 मे “'रेस्पिरटेरी डिजीजेज-श्वास 
रोगो'' पर एक अध्याय। 

भारतीय बाल रोग विज्ञान अकादमी के लिए पी एम उदानी द्वारा 
सम्पादित “टेक्स्ट बुक ऑफ पेडिएट्रिक्स-बाल रोग जिज्ञान की 
पाठ्यपुस्तक'' मे “पेराइसाइटिक डिजीज-पराजीवी रोग'” पर एक 
अध्याय | 

डॉ एडिवन ऑर्थर द्वारा सम्पादित 'पेडिएट्रिक ऐक्टिसेज इन ट्रॉपिकल 
कन्ट्रीज” मे ““इन्ट्रीगेटेड चाइल्ड डेवलपमेट सर्विसेज-एकीकृत बाल 
विकास सेवाये'” पर अध्याय। 

डॉ मेहरबानसिह द्वारा सम्पादित '“'ऐमरजेसीज इन चिल्ड्रन-बच्चो मे 
आपताये'' मे “हायपरपायरेक्सिया-अति ज्वर'' पर एक अध्याय। 


उन्होने निम्नलिखित स्मारिकाओ मे अध्याय लिखे है-- 


] 


डॉ एस सक्सेना और प्रेमप्रकाश द्वारा सम्पादित ''सम कॉमन टोपिक्स 
इन पेडिएट्रिक्स', 979 मे 'टूबरकूलर मेनिनजाइटिस, पायओजेनिक 
मेनिजाइटिस और फ्रेबाइल कनन्‍्वलजन्श' पर अध्याय। 

इण्डियन एकेडेमी ऑफ पेडिएट्रिक्स के लिए डॉ सत्य गुप्ता द्वारा 
सम्पादित 'ड्रग थिरेपी इन पेडिएट्रिक्स' मे 'ड्रग थिरेपी इन इन्टेस्टीनल 
हेल्‍्मीन्थीएसिस' पर अध्याय, 980। ४ 

भारतीय बाल रोग विज्ञान राजस्थान शाखा के लिए डॉ सी बी दास 
गुप्ता द्वारा सम्पादित ““निओनेटल केयर” पर लघुपुस्तिका मे 98॥ 
मे अध्याय “'सीजर्स इन न्यू बोर्न''। 

प्रोफेसर सी के जोशी द्वारा सम्पादित-स्शरिका-इण्डियन एसोसिएशन 
ऑफ प्रीवेटिग एण्ड सोशल मेडिसिन, ॥983 में अध्याय 
“आई सी डी एस ।”' 

इण्डियन एकेडेमी ऑफ पेडिएट्रिक्स की राजस्थान शाखा के लिए 
“'ऐमरजेसीज इन चिल्ड्रन'' पर लघुपुस्तिका मे “'रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस 
पर अध्याय। 

डॉ ओ पी घेई और डॉ पी एन तनेजा द्वारा सम्पादित ' करेन्ट टॉपिक्स 
इन पेडिएट्रिक्स' 4977। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 95५ 


वह 4960 ई से 'लोक विज्ञान ' के स्वास्थ्य प्रखण्ड तथा इण्डियन जनल ऑफ 
पेडिएट्रिक्स का 975 से सम्पादन कर रहे हैं। वष 973-74 ई में वह इण्डियन 
पेडिएट्रिक्स के सम्पादकोय सलाहकार मण्डल के सदस्य थे। 


सम्मेलनो मे सहभागिता--वह निम्नलिखित सम्मेलनो मे भाग ले चुक हे-- 


] 


१0 


१964, ॥967, 97, 974, 976 और १98॥ ई में भारतीय बाल 
रोग विज्ञान अकादमी के राष्ट्रीय सम्मेलन, पत्र प्रस्तुत किये ओर सत्रो 
की अध्यक्षता की। 


सन्‌ 968 ३ मे फ्रेकफर्ट, पश्चिमी जर्मनी मे “ अकुरा कृमि रोग पर 
अन्तर्राष्ट्रीय सेमीनार”” मे पत्र प्रस्तुत करने के लिए आमत्रित। 


उदयपुर मे 97 ई मे राजस्थान राज्य चिकित्सा सघ सम्मेलन '' प्रोटीन 
कैलोरी माल न्यूट्रीशन” और “'लिम्फ नोड बाइओष्सी ए न्यू बेड 
साइड मेथूड”' 

गोवा मे गेस्ट्रोएन्ट्रोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया का वाषिक 
सम्मेलन ''रिवेनोल लेक्टेट इन डायरिया इन स्कूल चिल्ड्ून'' 


4973 ई में उदयपुर मे एसोसिएशन ऑफ फिजीशियन्स ऑफ इण्डिया 
के वार्षिक सम्मेलन मे 'फ्लूइड एण्ड इलैक्ट्रो लाइट्स इन क्लीनिकल 
प्रेक्टिस'” पर परिसवाद मे पत्र प्रस्तुत करने के लिए आमत्रित। 
हाफकिन सस्थान, बम्बई के प्लेटिनम जयन्ती समारोह, 973 ई में 
आमत्रित और पत्र प्रस्तुत किया। 


फरवरी, 3974 ई मे उदयपुर मे “स्वास्थ्य एव जनसख्या कार्यशाला '' 
मे भाग लिया तथा एक सत्र का सभापतित्व करने एवं व्याख्यान देने 
के लिए आमत्रित। 

3977 ई में नवम्‌ अन्तर्राष्ट्रीय बाल रोग विज्ञान काग्रेस, नई दिल्ली 
मे भाग लिया और पत्र प्रस्तुत किये। 

नवम्बर, 977 ई मे राजस्थान राज्य शाखा के अध्यक्ष और आयोजन 
सचिव के रूप मे भारतीय बाल रोग विज्ञान अकादमी की राजस्थान 
राज्य शाखा के पचम्‌ वार्षिक सम्मेलन का आयोजन किया। 
फरवरी, 978 ई में उदयपुर मे इण्डियन एसोसिएशन एट प्रीवेटिव 
एण्ड सोशल मेडिसिन के राष्ट्रीय सम्मेलन मे परिसवाद में भाग लेने 
के लिए आमत्रित और भाग लिया। 


96 


]2 


3 


]4 


5 


6 


37 


8 


9 


भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक 


उदयपुर विश्वविद्यालय मे बच्चो मे मानसिक मन्दता पर राष्ट्रीय सम्मेलन 
मे एक पत्र प्रस्तुत करने एवं एक सत्र की अध्यक्षता करने के लिए 
आमत्रित। 

978 ३ में भारतीय बाल रोग विज्ञान अकादमी की मध्य प्रदेश राज्य 
शाखा के मन्दसौर मे वार्षिक सम्मेलन मे अतिथि व्याख्यान देने हेतु 
आमत्रित। 

१984 इ में हैदराबाद मे मानसिक मन्दता पर समग्र सत्र हेतु भारतीय 
बाल रांग विज्ञान अकादमी द्वारा आमत्रित। 

भारतीय बाल रोग विज्ञान अकादमी के राष्ट्रीय सम्मेलन जोधपुर 988, 
आगरा १989, हैदराबाद, 990 आदि म॑ आमत्रित व भाग लिया। 


बी जे चिकित्सा महाविद्यालय अहमदाबाद के बाल रोग विज्ञान 
विभाग के 4 दशक समारोह, 988 मे “आई सी सी *” पर अतिथि 
व्याख्यान हेतु आमत्रित और प्रस्तुत किया। 

भारतीय बाल रोग विज्ञान अकादमी के राजम्थान स्कन्ध वार्षिक 
सम्मेलन कोटा, 990, भीलवाडा, 992 में आमत्रित/भाग लिया। 
24-28 सितम्बर, 989 को ब्रूसेल्स मे '“न्यूट्रीऑन-मेटाबोलिक 
डिसओरर्डर्स' पर कार्यशाला मे भाग लेने के लिए भ्रतीय बाल रोग 
विज्ञान अकादमी द्वारा प्रायोजित। 

99] ई में भारतीय चिकित्सा परिषद्‌ द्वारा प्रायोजित 'क्लिनिकल 
केयर, केयर मेडिसिन' पर भारत-अमेरिकन परिसवाद और कार्यशाला 
का आयोजन किया। 

2-3 नवम्बर 992 ई को मनीपाल मे ''इन्डो-यू एस सी एम ई आन 
इन्फेक्सस डिजीज'' मे भाग लिया। 


एकीकृत बाल विकास सेवाये--वह मार्च, 4977 ई से एकीकृत बाल विकास 
सेवाओ के परामर्श द है। विभिन्‍न प्रशिक्षण कार्यक्रमां मे वह 26 रेजीडेट डॉक्टरो, 
2650 इन्टर्न्स, 2690 ऑगनबाडी कार्यकर्त्ताओोे, 350 अगेंगनबाडी पर्यवेक्षको 20 
चिकित्सा अधिकारियो और 28 एकीकृत बाल विकास सेवा सलाहकारो को प्रशिक्षित 


कर चुके है। 


चिकित्सा बाल स्वास्थ्य सेवाये--सन्‌ 963 ई से वह बच्चों के कल्याण 
हेतु प्रमुख रूप से कार्य कर रहे है। उन्हे बाल स्वास्थ्य जैसे-प्रतिरक्षण (रोग क्षमता 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 97 


लाना) विटामिन 'अ' की कमी बाल अति जीवन, कुपोषण रक्त अल्पता आदि 
मे राष्ट्रीय/अन्तराष्ट्रीय लक्ष्यो की ज्राप्ति एव जागृति लाने का श्रेय है। 


उन्हे महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तर पर बाल रोग विज्ञान को एक पृथक 
विषय निर्मित कराने का श्रेय है ओर अब राजस्थान राज्य यह पूव मे स्नातक स्तर 
पर यह एक पृथक्‌ विषय है तथ्य सभी कॉलेजो मे स्नातकोत्तर स्तर पर यह विषय 
है! स्नातकोत्तर स्तर पर प्रवेश प्राप्त करने वाले छात्रो द्वारा इसे सर्वोच्च प्राथमिकता 
दी जा रही हे। 70 एम डी और 28 डिप्लोमा बाल स्वास्थ्य ने इस विभाग से उत्तीर्ण 
किया। कई भारत ओर विदेशों म॑ उच्च पदों पर आसीन हैं। 


उन्हे शिशु अवस्था मे वर्तमान स्नातकोत्तर विभाग तक सामान्य तथा जनाना 
चिकित्सालय, उदयपुर मे बाल रोग विज्ञान विभाग के निर्माण का श्रेय है, जो सम्पूर्ण 
दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान तथा पडोसी राज्यो की भी पूण सेवा कर रहा है। 425 
बिस्तर वाला एक पृथक बाल रोग विज्ञान चिकित्सालय सन्‌ 993 ई मे स्थापित 
किया गया था। 


हा 


डॉ एन कोचुपिल्ले 
(१939 ई ) 


जन्म, परिवार एवं शिक्षा--डॉ एन कोचुपिल्लै का जन्म 0 फरवरी, 
939 ई को हुआ था। उनका विवाह डॉ विनोद कोचुपिल्लै के साथ हुआ है, जो 
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान सस्थान, नई दिल्‍ली मे चिकित्सा अर्बुद विज्ञान (१८०८४ 
07000४५) विषय की प्रोफेसर हैं। उनके 980 और १98 ई मे जन्मी मालिनी 
और मृणाली नामक दो पुत्रियाँ हैं। उन्होने बीएस सी, एमबीबी एस , एमडी , 
एफ ए एम एस और एफ ए एस सी उपाधियों प्राप्त की हैं। 

व्यावसायिक अनुभव एवं उपलब्धियॉ--उन्हे चिकित्सकीय औषधि, अन्त 
स्राव विज्ञान (॥000770089) सर्मष्ट प्रक्रिया विज्ञान एव मधुमेह मे उत्तर-एम डी 
चिकित्सकीय, अध्यापन और अनुसन्धान का 28 वर्ष का अनुभव है। सक्रामक रोग 
सम्बन्धी विधि का प्रयोग करके एवं साथ ही साथ मिश्रित वैज्ञानक प्रौद्योगिकी का 
विकास एवं उपयोग करके क्षेत्र आधारित शोध प्रायोजनाये प्रारूपित करने एवं 
क्रियान्वित करने का उन्हे व्यापक अनुभव है। इसमे से अधिकॉश अनुभव स्वास्थ्य 
सम्बन्धी समस्याओ से सम्बद्ध हैं जो सामान्यत विकासशील देशो एव विशेषत भारत 
के लिए अद्वितीय है। इन अध्ययनो को (अ) जैव चिकित्सा विज्ञानो मे नवीन परिज्ञान 
प्रदान करने के लिए एव (ब) समाज के लिए तत्काल दीर्घकालीन लाभ बढाने के 
लिए क्रियान्वित किया गया था। 

इस प्रकार, उदाहरणार्थ, उत्तरप्रदेश के सुदूर स्थानीय गण्डमाला रोग से पीडित 
गॉवो मे नवजात शिशु सम्बन्धी थाइरॉइड की कमी से उत्पन्न निद्रा रोग पर क्षेत्रीय 
अध्ययन के समय सैकडो नवजात शिशुओ को, जो थाइरॉइड निद्रा से ग्रसित हुए 
खोज निकाले गए, मानसिक मन्दता से रोकने के लिए एक वर्ष तक थाइरॉइड विनाशक 
उपचार प्रदान किया गया था। इसके अलावा, गोडा और देवरिया के गम्भीर रूप से 
प्रभावित गॉवो मे आयोडीन की कमी की महामारी को रोकने के लिए रोग रोधक 
आयोडीन युक्त तेल का इजेक्शन 2,000 से अधिक लोगो को लगाया गया था। 

उनके कार्य के परिणामस्वरूप भारत मे खाद्य नमक के सार्वजनिक 
आयोडीनकरण की स्वास्थ्य सम्बन्धी राष्ट्रीय नीति अपनाई गई है। इस नीति को 


भारत क चिकित्सा वैज्ञानिक 99 


उत्तरप्रदेश म॑ पहले ही लागू कर दिया गया है जिसका परिणाम पांषक आयोडीन 
की कमी की समाप्ति के साथ वहाँ नवजात शिशु सम्बन्धी थाइरॉइड राग की घटनाओ 
में बहुत कमी हुई है। ये व्यापक क्षेत्रीय अनुसन्धान एव रोकथाम/उपचारात्मक प्रवृत्तियाँ 
देश के सुदूर भागो मे भी सचालित की गई, क्योकि वह अन्त स्राव विज्ञान एव 
समष्टि प्रक्रिया विज्ञान (मधुमेह) विभाग की चिकित्सकीय सकाय के सदस्य के रूप 
मे चिकित्सीय, अध्यापन एवं प्रयोगशाला के दायित्वा मे पूणतया अपनी भूमिका का 
निर्वहन करते रहे है। उनके क्षेत्र आधारित अनुसन्धान एवं चिकित्सकीय काय के 
उपलक्ष मे भारतीय चिकित्सा परिषद्‌ ने उन्हे हरिओम आश्रम एलेम्बिक पुरस्कार प्रदान 
किया हे। 
वह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान सस्थान, नइ दिल्ली मे चिकित्सा सकाय 
(चिकित्सकीय अन्त स्राव विज्ञान एवं समिष्ट प्रक्रिया विज्ञान) के 24 वर्षो से सदस्य 
हैं तथा रेडियां इम्मूनोएसे मे 49 वष का तकनीकी अध्यापन एवं अनुसन्धान अनुभव 
उन्हे है। 
उन्होने राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय सस्थाओ जैसे भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान 
परिषद्‌, विश्व स्वास्थ्य संगठन ओर यूनीसेफ और आई एई ए के परामर्शद/विशेषज्ञ 
के रूप मे कई बार कार्य किया है। 
वह 985 ई मे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान सस्थान मे “ आयोडीन पोषण, 
थायरोक्सिन और मानसिक विकास--60976 एा।णा फिजशणजधा6 भा छिक्षा 
[0०४७।००४४०॥ ” पर आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय परिसवाद-कार्यशाला के आयाजन 
सचिव रह चुके हैं। 
विगत 8 वर्षो से वह अखिल भारतीय आयुविज्ञान सस्थान मे एम एस सी स्तर 
के लिए जैव प्रौद्योगिकी मे प्रशिक्षण कार्यक्रम के विकास मे सक्रिय रूप ये सलग्न 
है। वह एम एस सी जैव प्रौद्योगिकी कार्यक्रम के जेव-मात्रा (870-0एक्षाए।श्ञा0ण) 
प्रौद्योगिकी के मुख्य समन्वयक रह चुके हैं। इस कायक्रम आर आइ ए भाग मे 
अध्यापक के रूप मे उनकी देनो को छात्रो एव विद्वानो ने महत्त्वपूर्ण मान लिया है। 
पता--उनका वर्तमान पता इस प्रकार है-- 
डॉ एन कोचुपिल्लै, 
एमडी, एफए एम एस , एफए एससी , 
प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, 
अन्त स्राव विज्ञान एव समष्टि प्रक्रिया विज्ञान (मधुमेह) विभाग, 
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान सस्थान 
असारी नगर, नई दिल्ली-0029 ( भारत) 


]00 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


प्रकाशन--उनके 80 से अधिक लेख विभिन्‍न राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जर्नलो 
एवं दैनिक-पत्रो मे प्रकाशित हो चुके है। इनमे से 47 अन्तर्राष्ट्रीय रूप से सुविख्यात 
वैज्ञानिक प्रकाशनो जैसे नेचर, लेन्सेट, एन्डोक्रिनोलॉजी, विश्व स्वास्थ्य सगठन की 
बुलेटिन आदि मे प्रकाशित हुए है। नेचर, लेन्सेट, एन्डो क्रिनोलॉजी और विश्व स्वास्थ्य 
सगठन की बुलेटिन मे सम्मिलित इन 50 प्रकाशनो के वह प्रथम लेखक भी है। इसके 
साथ ही, 30 से अधिक पत्र अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनो/परिसवादो मे प्रस्तुत किये जा चुके 
है तथा १0 पत्र राष्ट्रीय बैठको मे प्रस्तुत किए गए है। उन्होने एक लेखमाला 
(770॥087987॥) का सम्पादन किया है, राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित 
पुस्तको मे कई अध्याय लिखे है तथा विश्व स्वास्थ्य सगठन/यूनीसेफ द्वारा प्रकाशित 
“ भूटान, नेपाल और चीन मे आयोडीन की कमी से विकारो”” पर तीन लेखमालाये 
लिखी है। विश्व स्वास्थ्य के निवेदन करने पर उन्होने भारत मे रेडियो-इम्मूनोएसे 
मे अध्यापको के प्रशिक्षण हेतु अध्यापन सामग्री तैयार की है। 


उनके वैज्ञानिक प्रकाशनों से 4 वर्ष से अधिक समय से निरन्तर अन्तर्राष्ट्रीय 
वैज्ञानिक साहित्य मे उद्धरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जैसा कि अब अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञान 
प्रशस्तियो से सिद्ध हो गया है। उनको अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित प्रमुख 
पाठ्यपुस्तको, लेखमालाओ, प्रमुख वैज्ञानिक जर्नलो के सम्पादकीयो एव वैज्ञानिक 
समीक्षाओ मे भी उद्धृत किया जाता है। 

महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक एव व्यावसायिक देने-- 

() बहुत कम स्तर का विकिरण और मानव स्वास्थ्य--उन्होने सक्रामक 
रोग सम्बन्धी और कोशिकानुबवशिकोय विधियो का उपयोग करके 
अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक साहित्य मे पहली बार यह प्रदर्शित किया कि प्रति 
वर्ष 500 से 3000 एम रैड्स (विकिरण की इकाइयॉ) के क्रम मे 
बहुत कम स्तर का विकिरण मनुष्य मे सहजात अपसामान्यताये 
(पैदाइशी नियम विरुद्धताये) और कोशिकानुबेशिको4 विचलन उत्पन्न 
कर सकता है। गोलाकार विकिरण के विपदग्रस्तता ( धूप-वायु के प्रभाव 
मे अवस्थान) मे बढते हुए झुकाव को ध्यान मे रखते हुए यह खोज 
जन-स्वास्थ्य के लिए बडे महत्त्व की है। उनका शोध-आलेख प्रतिष्ठित 
जर्नल 'नेचर' मे 976 ई मे प्रकाशित हुआ था। इसे प्रमुख वैज्ञानिक 
साहित्य मे व्यापक रूप से उद्धृत किया गया है और उसका साराश 
निकाला गया और अमेरिकन मेडिकल एसोशिएशन के जर्नल क 
“चयनित साराश'' खण्ड मे प्रमुख वैज्ञानिक प्रकाशन के रूप मे पुन 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 0] 


(2) 


(3) 


(4) 


प्रकाशित किया गया। इस प्रकाशन के बाद शीघ्र ही राष्ट्रीय एव 
अन्तर्राष्ट्रीय समाचार-पत्रो मे व्यापक रूप से इस अध्ययन को प्रसारित 
किया था। 


स्थानीय गण्डमाला रोगग्रस्त क्षेत्रों मे प्रौढो मे थाइराइड के विकास 
से उत्पन्न निद्रा गेग- सूक्ष्मग्राही और मिश्रित प्रविधियो का प्रयोग 
करके उन्होने पहली बार साहित्य मे वैज्ञानिक प्रमाण प्रकाशित किया 
कि एक स्थान मे प्रौढ गण्डमालारोगग्रम्त लोगो मे कार्य रूप मे थाइराइड 
को कम किया जा सकता है। 'लेन्सेट' मे 4973 मे प्रकाशित इस निष्कर्ष 
को बाद मे दूसरो ने स्वीकार किया और उसी जर्नल मे सम्पादकीय 
टिप्पणी को आकर्षित किया। जन-स्वास्थ्य और वैज्ञानिक रुचियो की 
दृष्टि से इस कार्य को प्रमुख साहित्य मे उद्धृत किया गया है। इसका 
साराश लिखा गया और “ईयर बुक ऑफ इन्डोक्रिनोलॉजी '” 974 मे 
वर्ष के महत्त्वपूर्ण प्रकाशन के रूप मे प्रकाशित किया गया। 


विकासशील देशो मे नवजात शिशु सम्बन्धी थाइरॉइड के विकार 
से उत्पन्न निद्रा रोग के छेटाव के आयोजन हेतु समुचित प्रौद्योगिकी 
एव क्षेत्रीय व्यूह रचनाओ का विकास--उन्होने भारत मे सुदूर और 
सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछढे स्थानीय गण्डमाला रोगग्रस्त क्षेत्रो 
मे नवजात शिशु सम्बन्धी थाइरॉइड की कमी से उत्पन्न निद्रा रोग के 
बडे पैमाने पर फिल्टर पेपर (छन्‍ना कागज) पर खून के धब्बो पर 
आधारित छटाव (बहुत से व्यक्तियो की परीक्षा कर उन्हे किसी विशेष 
रोग अथवा लक्षणा हेतु देखा जाना)के आयोजन हेतु समुचित एवं मूल्य 
प्रभावित प्रौद्योगिकी तथा क्षेत्रीय व्यूह-रचनाओ का विकास किया। इस 
उपलब्धि ने विकासशील जगत मे कही भी पहली बार आयोडीन की 
कमी वाले स्थानीय क्षेत्रो मे थाइरॉइड की कमी से निद्रा रोग के नवजात 
शिशुओ का छटाव सम्भव बना दिया। परिणामस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय स्तर 
पर यह सुझाया गया है कि थाइरॉइड की कमी से निद्रा रोग के नवजात 
शिशुओ का छटाव स्थानीय भयानकता के साथ-साथ प्रचलित आयोडिन 
रोगरोधक कार्यक्रमों के प्रभाव को मापने के लिए महत्त्वपूर्ण तरीका 
होना चाहिए। 

भारत मे भयकर रूप से आयोडीन की कमी से गण्डमाला रोगग्रस्त 
स्थानो मे नवजात शिशुओ मे थाइरॉइड की कमी से निद्रा रोग की 


802 


(5) 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


कई सौ गुना घटनाओ का प्रदर्शन--नवजात शिशुओ मे थाइरॉइड 
की कमी से निद्रारोग के छटाव की मौलिक विधियो एव प्रविधियो 
का प्रयोग करके उन्होने यह प्रदर्शित किया कि नवजात शिशुओ मे 
थाइरॉइड की कमी से निद्रा रोग की घटनाये भारत मे आयोडोन बहुल 
क्षेत्रो की तुलना मे गरीबी से सताये गम्भीर रूप से आयोडीन की कमी 
वाले क्षेत्रों में कई सौ गुना अधिक है। सावधानीपूर्वक किये गये 
चिकित्सकीय-- सक्रामक रोग सम्बन्धी और एमिजीक्रिनीलोनिक 
अध्ययनो से भी उन्होने यह दिखलाया कि नवजात शिशुओ मे थाइराइड 
की कमी से निद्रारोग की बडी घटना स्थानीय निवासियो मे बडे पेमाने 
पर उप-चिक्तश्रान्त्यात्मक मानसिक क्षति पहुँचाता है। इसके जन- 
स्वास्थ्य महत्त्व को ध्यान मे रखकर इस कार्य को प्रस्तुत करने के लिए 
उन्हे कई अन्तर्राष्ट्रीय बैठकों मे आमत्रित किया गया तथा यह अन्तर्राष्ट्रीय 
स्तर पर प्रकाशित अनेक वैज्ञानिक लेखो का आधार है। 'नेचर ' पत्रिका 
ने इस खोज को अपने समाचार एवं विचार खण्ड मे स्थान दिया और 
राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया ने खांज के बारे मे समाचार सामग्री/ 
लेखो के रूप मे प्रकाशित किया। इस खोज ने नवोन जागृति उत्पन्न 
की कि पोषक आयोडीन की कमी स्थानीय निवासियों मे बडे पैमाने 
पर मानसिक क्षति कर सकती है और स्थानीय गण्डमाला रोगग्रस्त क्षेत्रो 
के अनियत्रित सामाजिक-आर्थिक पिछडेपन और पोषक आयोडीन की 
कमी के मध्य सभावित कारण बतलाने वाला बन्धन (दरार-सेतु) पर 
प्रकाश डाला। 


देश व्यापी अतिरिक्त हिमालय सगम में स्थानीय गण्डमाला रोग 
और पोषक आयोडीन की कमी का प्रदर्शन भारत मे खाद्य नमक 
के सार्वजनिक आयोडीन को राष्ट्रीथ नीति & औचित्य--प्रो रामलिगम 
स्वामी के हिमालय मे स्थानीय गण्डमाला रोग के अध्ययन में 4962 
ई में दिल्‍ली को 'अदेशज' नियत्रण क्षेत्र के रूप मे प्रयोग किया गया। 
तथापि सावधानीपूर्वक किये गए आयोडीन के समष्टि प्रक्रिया विज्ञान 
और बलगति विज्ञान के अध्ययनों के आधार पर वह 960 के दशक 
मे दिल्‍ली और पडौसी क्षेत्रों मे साधारण गण्डमाला रोग मे देखी गई 
आयोडीन को कमी के जैव रासायनिक प्रमाणो को प्रदर्शित करने मे 
सफल हुए। बाद मे उनके द्वारा तथा साथ ही साथ एनजीसी मे 
सावधानीपूर्वक सक्रामक रांग सम्बन्धी अध्ययनों ने दिल्ली मे स्थानीय 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक [03 


सकी 


गण्डमाला रोग के प्रचलन को प्रकट कर दिया। शीघ्र ही देश के अन्य 
भागो से ऐसी ही सूचनाये प्राप्त हुइ। अत भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान 
परिषद्‌ ने गण्डमाला रोग फैलने के सम्बन्ध में देशव्यापी बहुकेन्द्रीय 
अध्ययन का आयोजन किया। इस अध्ययन के दो प्रमुख समन्वयको 
मे से वह एक थे जिसने देश के विभिन्न भागो से सभी 44 जिलों 
मे स्थानीय गण्डमाला रोग के प्रचलन को प्रकट कर दिया। उपर्युक्त 
अध्ययनो ने स्वास्थ्य समस्या के रूप म॑ पोषक आयोडीन की कमी 
की गम्भीर प्रकृति पर नइ अन्तर्दृष्टि के साथ मिलकर १992 ई तक 
भारत मे खाद्य नमक के सार्वजनिक आयोडीनोकरण की प्राप्ति हेतु 
राष्ट्रीय नीति का उचित आधार तैयार किया। 


उत्तरप्रदेश मे सार्वजनिक खाद्य नमक के आयोडीनीकरण का 
निर्देशन एवं मूल्यॉकन प्रचार रूप मे प्रधानमत्री के प्रौद्योगिकी 
प्रचार प्रायोजना की क्रियान्विति उत्तरप्रदेश से पोषक आयोडीन 
की कमी की समाप्ति--स्वास्थ्य समस्या के रूप मे पोषक आयोडीन 
की कमी की गम्भीर प्रकृति पर उत्पन्न नई अन्तर्दृष्टि के साथ-साथ 
स्थानीय गण्डमाला रोग के देशव्यापी प्रचलन के प्रदर्शन के 
फलस्वरूप भारत ने 992 ई तक देश से पोषक आयोडीन की कमी 
को दूर करने के लिए खाद्य नमक के सार्वजनिक आयोडीनीकरण 
की नीति अपनाई है। उनके द्वारा उत्तरप्रदेश मे प्रदर्शित आयोडीन 
की कमी की गम्भीरता को देखते हुए सरकार ने वहाँ तुरन्त पोषक 
आयोडीन की कमी को दूर करने के लिए व्यापक प्रयास किए थे। 
सन्‌ 4987 ई के अन्त तक सम्पूर्ण उत्तरप्रदेश आयोडीन युक्त नामक 
के रोग अवरोधक से पूर्ण हो गया था। सन्‌ 4988 ई से प्रधानमत्री 
द्वारा एक वैज्ञानिक और प्रोद्योगिकी प्रायोजना इस कायक्रम के प्रभाव 
के निर्देशन एवं मूल्यॉकन हेतु प्रारम्भ की गइ थी। प्रचार रूप मे 
इस प्रायोजना को चलाने का दायिन्व उन्हे सापा गया था। इस दिशा 
मे निर्देशन एवं मूल्यॉकन हेतु त्रिसूत्रो विधि ठिकसित और क्रियान्वित 
की गई थी। इस निर्देशन एव मूल्यांकन क नवीनतम परिणामां से 
यह स्पष्ट होता है कि () समस्त उत्तरप्रदेश मे खुदरा दुकानों से 
प्राप्त नमक के 90 प्रतिशत से अधिक नमूने आयोडीन युक्‍न हे 
(2) उत्तरप्रदेश मे मूत्र सम्बन्धी आयोडीन मल त्याग प्रणाली में 
फौलिस के समूह पाँच (गम्भीर पोषक आयोडीन की कमी) से 


04 भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक 


फोलिम के समूह दो (आयोडीन की सन्तोषजनक जैव-उपलब्धता) 
तक व्यापक रूप से सुधार हुआ है और (3) तराई जिला म नवजात 
शिशु सम्बन्धी आयोडीन की कमी से निद्रा रोग की घटनाये जन्म 

पूर्व आयोडीनीकरण के प्रति हजार 99 से जन्म बाद आयोडीनीकरण 
के प्रति हजार 8 तक प्रभावकारी रूप से कम हो गई है। इन 
अध्ययनो के परिणामो से स्वास्थ्य मत्रालय, भारत सरकार तथा 
प्रधानमत्री के वैज्ञानिक सलाहकार के कार्यालय को अवगत कराया 
गया। उन्हे प्रकाशित भी किया गया। इस प्रायोजना के कार्य एवं 
उपलब्धि की प्रधानमत्री के वैज्ञानिक सलाहकार ने प्रशसा की है। 


(7) भूटान मे आयोडीन की कमी से विकारोे के प्रचलन का देशव्यापी प्रदर्शन 
किया गया। 


(8) रोगी की देखरेख और अनुसन्धान हेतु मौलिक आर आई ए 
प्रविधियो का विकास--उन्होने अन्त स्राव विज्ञान एव समष्टि प्रक्रिया 
विज्ञान विभाग की आर आई ए प्रयोगशाला मे 5 विविध आर आई ए 
प्रविधियोँं स्थापित की | उनमे से 0 उनके द्वारा अथव्ग उनके मार्गदर्शन 
मे विकसित और प्रमाणित मौलिक परीक्षण प्रणालियों है। इन परीक्षण 
प्रणालियो का अखिल भारती० आयुर्विज्ञान सस्थान मे रोगी की देखरेख 
सेवा और/अथवा अनुसन्धान के लिए प्रयोग किया जा रहा है। एक 
राष्ट्रीय समान गुण युक्त रिएजेन्ट (वह पदार्थ जो किसी 'घोल' मे अन्य 
पदार्थ की उपस्थिति ज्ञात करने मे मदद करता है) कार्यक्रम (५६४०4 
३०॥९० २४०४९०॥ शिठश्ाआ॥॥०) के अन्तर्गत विकसित दो 
प्रतिरोधियों (टैस्टोस्टेटोरोन और णी आर एल --([७५४052/076 40 
शरा ) भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर 
पर अन्वेषको को उपलब्ध कगये जा रहे हैं। उनकी प्रयोगशाला मे 
विकसित और प्रमाणित मौलिक परीक्षण प” ५ पड ॥ 7५ 7४ 
टेस्टोस्टेोरोन ([४४०४८००८) पी आर एल (श२],) और इन्सूलिन 
(775प7॥7) की 4 और 8 श्रुखलाये है। 


वर्तमान मे उनकी प्रयोगशाला मे महत्त्वपूर्ण चल रहे कार्य और 
उपलब्धियों 

(अ) श्लैष्मा सम्बन्धी (शाप्राध्ा५) दीर्घ (70.॥0) गॉँठ (५0९॥0779५) 

की सूक्ष्म अन्त स्राव-श्लेष्मा सम्बन्धो गॉठ की कोशिका का 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक [05 


सफलतापूवक सवर्द्धन किया गया। कार्य मे हावड मंडिकल स्कूल 
के साथ सहयोग । 


(ब) उत्तरी भारत मे युवाओं मे मधुमेह के रोगजनक (पहली बार अन्तराष्ट्रीय 
बैठक मे सारॉश बतलाया गया) 


भारत मे युवा मधुमेह रोगियो मे स्वरोग प्रतिरक्षण द्वीप कोशिका 
क्षरण के रोग जनन मे प्रमुख द्वीप कोशिका प्रतिजन--प्रयोगशाला 
मे आई सी एबी परीक्षण का अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानकीकरण किया 
गया। द्वीप कोशिका प्रतिजनो के विपरीत प्रतिक्रियात्मक कई मूराइन 
(प्राप776) मोनोक्लोनल प्रतिरोधियो को बढाया गया। (पहला सारॉश 
एक अन्तर्राष्ट्रीय जर्नल को भेजा गया) 


(द) भ्रूण सम्बन्धी अन्त सत्रावी तथा अन्त गर्भाशय सम्बन्धी विकास 
मन्दता के साथ नवजातो के विकास तत्त्वो का पाएवदृश्य--पहला 
सारॉश सयुकत राज्य अमेरिका मे अन्तर्राष्ट्रीय बैठक मे प्रस्तुत करने के 
लिए स्वीकृत किया गया। 

(य) इन्सूलिन के जैव-सश्लेषण हेतु पुन सधि डी एन ए प्रविधि का 
विकास--आनुवशिकी अभियात्रिकी इकाई, जवाहरलाल नेहरू 
विश्वविद्यालय (प्रोफेसर एच के दास) के दास डी बी टी सहकर्मी 
अनुसन्धान प्रायोजना इन्सूलिन की प्रथम और द्वितीय श्रृंखला को प्रकट 
करने वाले पुन सधि एक कोशिका से जन्मे लोगो के मुक्त उटाव 
हेतु प्रतिक्रिया करने वाले रासायनिक पदार्थों का विकास पहले ही किया 
गया था। 


(२) आन्ध्रप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रो मे आयोडीन की कमी के रोगजनक 
मे आयोडीन कमी-गण्डमाला की अन्त क्रिया--उच्च मूत्र सम्बन्धी 
गन्धक युक्त सायेनेट मल त्याग को दिखलाया गया | गण्डमाला परीक्षण 
के लिए उत्तम विधियों विकसित की जा रही है। 


अखिल भारतीय आवयुर्विज्ञान सस्थान नई दिल्‍ली के एडोक्रापनोलॉजी एण्ड 
मेटाबोलिज्म विभाग के अध्यक्ष प्रो एन कोचुपिल्लै के अनुसार खानपान की वजह 
से ही शहरी आबादी विशेषत मध्यम तथा उच्च मध्य वर्ग म मधुमेह की घटनाये 
बढ रही हैं। देश की कुल आबादी का 2 25 प्रतिशत मधुमह रोगियो का है और 
शहरी आबादी मे यह प्रतिशत 8 है। अत लोगो का यह जानना जरूरी है कि खानपान 
कैसा हो | डॉ कोचुपिल्लै के अनुसार परम्परागत भारतीय भोजन मधुमेह रोगियों 


(स 


सकी 


06 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


लिए सर्वश्रेष्ठ होता है। उनके मत म॑ मधुमेह एक गम्भीर बीमारी है, लेकिन आहार 
नियत्रण से न केवल इस पर काबू पाया जा सकता है बल्कि इसका निदान भी किया 
जा सकता है। 
डॉ कोचुपिल्ले के अनुसार मधुमेह के रोगी के लिए सबसे जरूरी होता 
है कि वह अपनी डॉक्टरी देखभाल करना खुद सीखे, क्योकि यह रोग उम्र भर 
का होता है। अत अच्छा है कि वह वैज्ञानिक तरीके से जान सके कि उसे क्‍या 
करना चाहिए। 
पुरस्कार एवं सम्मान--उनके व्यावसायिक एव वैज्ञानिक कार्य के उपलक्ष 
मे उन्हे निम्नाकित राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानो से सम्मानित किया 
गया हे-- 
। सोलोमन ए बर्सन अन्तर्राष्ट्रीय फैलोशिप--रेडियो इम्मूनोएसे 
(आर आई ए ) मे अनुसन्धान के लिए चिकित्सा मे नोबुल पुरस्कार 
विजेता डॉ आर एस यलो के साथ (975-77) (फैलोशिप की 
अवधि मे डॉ कोचुपिल्लै के कार्य और उपलिब्धयो के विषय मे नोबुल 
पुरस्कार विजेता डॉ आर एस यलो का प्रमाण-पत्र) । 


2 भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद द्वारा शकुन्तला अमीरचन्द 
पुरस्कार, (980 ई )। 

3 भारतीय चिकित्सा परिषद्‌ द्वारा हरिओम आश्रम एलेम्बिक पुरस्कार, 
4983 ई । 

4. नेशनल एकेडेमी ऑफ मेडिकल साइन्सेज को फैलोशिप 985 ई । 


5 बसन्ती देवी अमीरचन्द पुरस्कार, 4986 ई -भारतीय चिकित्सा 
अनुसन्धान का यह सर्वोच्च माना जाने वाला पुग्स्कार उन्हे भारत मे 
थाइरॉइड रोगो पर उनके अनुसन्धान योगदान के उपलक्ष मे दिया 
गया। 

6 नेशनल एकेडेमी ऑफ साइन्सेज, बगलौर की फैलोशिप, 989 ई । 


7 रेडियो इम्मूनोएसे के भारत मे अध्यापको के प्रशिक्षण हेतु अध्यापन 
सामग्री तैयार करने के लिए विश्व स्वास्थ्य सगठन का विजिटिग 
वैज्ञानिक अनुदान। 

8 आयोडीन की कमी से विकारो के नियत्रण हेतु अन्तर्राष्ट्रीय परिषद्‌, 
एडीलेड, ऑस्ट्रेलिया के मण्डल सदस्य। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक ]07 


9 


]2 


]3 


4 


पर्यावरण सरक्षण हेतु अन्तराष्ट्रीय सासायटी वियना ऑस्ट्रया की 
वैज्ञानिक परामर्शदात्री समिति का सदस्य । 

सूक्ष्म अन्त स्राव विज्ञान का विभाग, मिडिलसेक्स हॉस्पिटल, लन्दन मे 
प्रोफेसर आर पी एकिन्स के आमत्रणानुसार विजिटिग वेज्ञानिक। 
हार्व्ड मेडिकल स्कूल और नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ हैल्थ, बेथेस्डा 
के अवलोकनार्थ आमत्रणानुसार विश्व स्वास्थ्य सगठन का विजिटिग 
वैज्ञानिक अनुदान प्राप्तकर्त्ता | 

निमत्रणानुसार डॉ डेल्बर्ट ए फिशर की प्रयोगशाला, यू सी एल ए , 
कैलीफोर्निया मे विजिटिग वैज्ञानिक अगस्त, 4987 

“आयोडीन डेफिसिऐन्सी एण्ड थाइराइड फन्कशन'' पर वेज्ञानिक 
परामशदात्री समूह क॑ सदस्य के रूप मे आई एइए, वियना द्वारा 
आमत्रित, 987 

नक्लियर मेडिसिन सोसायटी द्वारा मजूमदार ओरेशन अवॉर्ड 989 


नव 


डॉ दी. के. शर्मा 
(94] ई ) 


जन्म एव वश परिचय--डॉ विमल कुमार शर्मा का जन्म 7 सितम्बर, 
94॥ ई को भारत मे राजस्थान राज्य के जिला केन्द्र एव पूर्व मत्स्य राज्य की राजधानी 
अलवर मे हुआ था। उनके पिता श्री गोपाल नारायण शर्मा उस समय वकील थे, जो 
बाद मे जिला जज बन गए। उनकी माता श्रीमती शकुन्तला देवी गृहिणी हैं। उनके 
तीन भाई और एक बहिन है। उनकी जीवन-सहचरी डॉ लीला शर्मा वरिष्ठ चिकित्सा 
अधिकारी हैं जिनके साथ उनका विवाह 2 जून, 966 ई को सम्पन्न हुआ था। 
उनके सन्‌ 4970 ई मे जन्मी सुश्री धृति शर्मा तथा सन्‌ 973 ई मे जन्मी सुश्री 
प्राची शर्मा नामक दो पुत्रियों हैं। उनके एकमात्र पुत्र श्री विभोर शर्मा का 6 अप्रैल, 
399 ई को एक दुर्घटना मे निधन हो गया। 


शैक्षिक जीवन--डॉ शर्मा ने प्रारम्भिक स्तर पर कक्षा दशम्‌ तक यशवन्त 
हायर सैकण्डी स्कूल, अलवर मे अध्ययन किया था। कालान्तर मे वह अपने पिताजी 
के स्थानान्तरण के कारणवश विद्याभवन, उदयपुर चले गए। उन्होने हायर सैकण्ड्री 
परीक्षा विद्या भवन, उदयपुर से उत्तीर्ण की। सन्‌ 960 ई मे उन्होने त्रिवर्षीय स्नातक 
पाठयक्रम की प्रथम वर्ष की परीक्षा महाराणा भोपाल महाविद्यालय, उदयपुर से उत्तीर्ण 
की, सन्‌ 960 ई मे ही सवाई मानसिह आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, जयपुर मे प्रवेश 
प्राप्त किया और 965 ई मे एम बी बी एस परीक्षा उत्तीर्ण की | उन्होने अपने सेवाकाल 
मे क्षय एवं वक्ष रोग मे स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम (डी टी सी डी ) मे प्रवेश 
प्राप्त किया, जिसे उन्होने 968 ई मे उत्तीर्ण कर लिया। कालान्तर मे सन्‌ 974 
ई मे उन्होने एम डी (सामान्य भेषज) मे प्रवेश प्राप्त किया जिसे उन्होने सन्‌ 976 
ई मे उत्तीर्ण किया। ये दोनो परीक्षाये उन्होने सवाई मानसिह आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, 
जयपुर मे अध्ययनरत रहकर उत्तीर्ण की थीं। सन्‌ 967 ई मे उन्होने राष्ट्रीय क्षय 
रोग सस्थान, बगलौर मे प्रशिक्षण प्राप्त किया था। 

व्यवसाय के पथ पर--डॉ शर्मा ने फरवरी, 7966 ई को सहायक 
चिकित्साधिकारी के पद पर राजस्थान चिकित्सा सेवा मे पर्दापण किया तथा दीर्घकाल 
तक अर्थात्‌ सन्‌ 969 ई से नवम्बर, 974 ई तक प्रभारी, क्षय रोग चिकित्सा केन्द्र 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक [09 


के पद पर कार्यरत रहे। सन्‌ 3977 इ में वह कनिष्ठ क्षय रोग विशेषज्ञ बन गए, 
किन्तु सन्‌ 978 ई मे अध्यापन क्षेत्र मे आ गए तथा सन्‌ 98] ई तक व्याख्याता 
पद पर कार्यरत रहे, जब वह रीडर, क्षय रोग के पद पर पदोन्‍नत किए गए तथा 
इस पद पर 985 ई तक कार्यरत रहे। 2 फरवरी, 986 इ को प्रोफसर एवं अध्यक्ष, 
क्षय रोग एवं वक्ष रोग, एस पी चिकित्सा महाविद्यालय बीकानेर के पद पर उनकी 
पदोन्नति हो गई। अक्टूबर, 989 ई मे उनका स्थानान्तरण सवाई मानसिह आयुर्विज्ञान 
महाविद्यालय वक्ष चिकित्सालय मे प्रोफेसर के पद पर हो गया और तब से वह इस 
पद पर कार्यरत हैं। फरवरी 993 ई मे उनकी नियुक्ति चिकित्सा अधीक्षक, वक्ष 
एवं क्षय रोग चिकित्सालय जयपुर के पद पर की गई। 


आविष्कार और पुरस्कार--उन्होने अम्ल तीत्र शलाकाणु अथातू क्षय रोग 
शलाकाणु सहित मभी प्रकार की सस्‍लाइडो (खुर्दबीन या सूक्ष्मदर्शी यत्र से देखे जाने 
योग्य पदार्थों को रखने के लिए शीशे का पत्तर) पर धब्बे डालने के लिए एक यत्र 
अथवा उपकरण का आविष्कार किया तथा सन्‌ 982 इ मे राजस्थान सरकार ने उन्हे 
नकद योग्यता पुरस्कार प्रदान किया। 


उन्होने उन क्षय रोगियो के लिए इन्ट्राकैविटी नामक प्रविधि का विकास किया, 
जिनका उपचार शल्य क्रिया द्वारा नहीं किया जा सकता है अथवा जिन पर औषधियो 
का अनुकूल प्रभाव नहीं पडता है। 


उन्होने क्षय रोग से पीडितो के लिए भारतीय जडी-बूटियो से एक नई औषधि 
विकसित की। यह वैज्ञानिक रूप से अत्यन्त शान्तिदायक एवं बेक्ट्रिया की गति को 
स्थिर करने वाली सिद्ध हुई है। 


डॉ शर्मा के अनुसार मेहन्दी की पत्तियो से क्षय रोग पर काबू पाया जा सकता 
है। उन्होंने गिनी-पिग एव सफेद चूहों पर सफल परीक्षण किये। उन्होने इजेक्शन 
द्वारा गिनी-पिग एवं सफेद चूहो के शरीर मे क्षय रोग के 30 हजार से अधिक कीटाणु 
प्रविष्ट कर उनमे रोग उत्पन्न किया और फिर अपनी तैयार की गई औषधि के इजेक्शन 
लगाकर इस रोग पर काबू पाया। इस पद्धति के विषय मे डॉ शर्मा का लेख दिसम्बर, 
)992 ई में लन्दन की पत्रिका 'स्यूबरक्ले' मे प्रकाशित हुआ। 


डॉ विमल कुमार शर्मा ने मेहन्दी के पत्तो से तपेदिक रोधी औषधि तैयार की 
है। डॉ शर्मा का दावा है कि इस दवा से तपेदिक के गम्भीर रोगियो का उपचार 
सम्भव हो सकेगा। उन्होने करीब तीन दशक के अथक परिश्रम एवं निरन्तर शोध 
से तैयार “'विलीसिन'” नामक इस दवा का पेटेन्ट प्राप्त कर लिया है तथा शीघ्र ही 
इसका व्यावसायिक उत्पादन होने की आशा है। डा शमा सन्‌ 968 से इस दिशा 


]|0 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


मे कार्य कर रहे थे। वे मेहन्दी से टी बी के जीवाणु का रजक (स्टेन) तैयार 
करने मे जुटे थे। एक प्रयोग के दौरान तब उनके आश्चर्य का ठिकाना नही रहा 
जब उन्होने देखा कि जिन जीवाणुओ को रजित किये जाने के लिए उन्होने एक 
विसेष माध्यम मे रखा था वे इस दवा के प्रभाव से नष्ट होने लगे थे। इस प्रयोग 
के बाद उन्होने ''गिनी-पिग”' पर इसका परीक्षण किया तो इसमे उत्साहवर्ड्धक 
परिणाम सामने आए। गिन-पिग के शरीर मे तपेदिक का प्रतिरोधी एटीजन उपस्थित 
नही होता जिससे यदि उसके शरीर मे तपेदिक का एक भी जीवाणु प्रवेश करवा 
दिया जाए तो तुरन्त वृद्धि करने लगते है। इस प्रयोग के दौरान उन्होने गिनी-पिग 
मे 33 हजार जीवाणु प्रवेश करवा कर जब यह औषधि दी तो उनकी इस दवा 
ने जादू का सा असर दिखाते हुए इन जीवाणुओ को नष्ट करना शुरू कर दिया। 
बाद मे उन्होने यही प्रयोग सफेद चूहो के साथ दोहराया तो उसमे भी अच्छी सफलता 
प्राप्त हुई। तपेदिक ग्रस्त चूहो को जब तपेदिक की अन्य प्रतिजैविक दवा दी गई 
तो लगभग 40 प्रतिशत चूहे ठीक हुए लेकिन जिन चूहो को यह दवा दी गई वे 
शत-प्रतिशत ठीक हुए। 


आगरा मे लेओसी इन्स्टीट्यूट (कुष्ठ रोग सस्थान) मे जब यही प्रयोग अन्य 
तरीके से दोहराया गया तो ज्ञात हुआ कि तपेदिक के उपचार के लिए विकसित 
यह औषधि न सिर्फ तपेदिक के जीवाणुओ की वृद्धि ही रोकती है अपितु इन जीवाणुओ 
को नष्ट भी करती है। अत इसे बेक्टीरियोफारड्स (जीवाणु नष्ट करने वाली) 
माना गया। 


बाद मे सवाई मानसिह मेडिकल कॉलेज की एथिकल कमेटी से अनुमति लेकर 
इस दवा के मरीजों पर आजमाया गया। प्रारम्भ मे तपेदिक के ऐसे 80 मरीजो का 
चयन किया गया जो गत 2 से ॥0 वर्ष से तपेदिक ग्रस्त थे एवं बाजार मे उपलब्ध 
सभी टी बी रोधी दवाओ के प्रति प्रतिरोधक क्षमता अर्जित कर चुके थे। इन मरीजो 
को अन्य दवाओ के साथ यह औषधि भी सहयोगी दवा के रूप मे दी गई और सभी 
80 मरीजो को फायदा हुआ। उनकी इस दवा का अब तक कोई प्रतिकूल असर नहीं 
देखा गया है। यह दवा यकृत के लिए भी अच्छी मानी गई है जबकि अन्य सभी 
तपेदिक रोधी औषधियों यकृत पर बुरा प्रभाव डालती हैं। इस दवा के निर्माण मे मामूली 
लागत आती है तथा इसके निर्माण के समय निकलने वाला सह उत्पाद जलने के 
मरीजो पर बेहद कारगर सिद्ध होता है। 


प्रकाशन--वक्ष एव क्षय रोग के विभिन्‍न पक्षो एवं प्रकरणो पर डॉ शर्मा के 
लगभग 47 लेख राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय जर्नलो मे प्रकाशित हुए हैं। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक ]]] 


सन्‌ 992 ई में स्नातक एवं स्नातकोत्तर विद्यार्थियो के लिए उनकी पुस्तक 
“'रेडियोलॉजी फॉर चेस्ट-ए हैण्ड बुक'' प्रकाशित हुई। 
फैलोशिप--सन्‌ 972 ई मे उन्हे पश्चिमी जर्मनी से आदान-प्रदान फेलोशिप 
प्राप्त हुई थी। वह नेशनल कॉलेज ऑफ चेस्ट फिजिशियन्स के फैलो 
(एफ एन सी सी पी ) हैं। वह भारत के विभिन्‍न विश्वविद्यालयों के आन्तरिक एव 
बाह्य परीक्षक का कार्य भी सम्पादित कर चुके हैं। 
पता--उनका वर्तमान कार्यालयी पता इस प्रकार हे-- 
डॉ वी के शर्मा, 
प्रोफेसर, क्षय एवं वक्ष रोग, एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय एव 
चिकित्सा अधीक्षक, वक्ष एवं क्षय रोग चिकित्सालय, जयपुर (राज ) 
उनका स्थायी आवासीय पता इस प्रकार है-- 
डॉ वी के शर्मा, 
4 ज 6, जवाहरनगर, 
जयपुर-302004, राजस्थान, भारत 


डॉ एस. डी पुरोहित 
(94] ई ) 


जन्म एव वश परिचय--श्री स्ुइज नारायण और श्रीमती रतन कौर के सुपुत्र 
डॉ सत्यदेव पुरोहित का जन्म ॥ दिसम्बर, 494] ई को जोधपुर मे हुआ था। उनकी 
सहधर्मिणी श्री दामोदर आचार्य की सुपुत्री श्रीमती चित्रा देवी गृहिणी है। उनके श्री 
शैलेश पुरोहित एवं श्रो कमलेश पुरोहित नामक दो पुत्र हैं। 


शिक्षा-दीक्षा--डॉ पुरोहित ने सन्‌ 965 ई मे राजस्थान विश्वविद्यालय से 
एम बी बी एस परीक्षा उत्तीर्ण की। सन्‌ १967 ई मे उन्होने पजाब विश्वविद्यालय् 
से वक्ष रोगो मे डिप्लोमा पाठयक्रम (डी सी डी ) उत्तीर्ण किया। सन्‌ 970 ई , मे 
उन्होने बम्बई विश्वविद्यालय से एम डी (क्षय रोग) परीक्षा उत्तीर्ण की। 


व्यवसाय के पथ पर--] फरवरी, 966 ई से 30 नवम्बर, 966 ई तक 
डॉ पुरोहित एसपी चिकित्सा महाविद्यालय, बीकानेर (राजस्थान) मे हाउस 
फिजीशियन (क्षय रोग) के पद पर कार्यरत रहे। 26 जनवरी, 967 ई से 3। दिसम्बर 
4967 ई तक उन्होन टी बी सेनेटोरियम, अमृतसर (पजाब) मे हाउस फिजिशिय 
के दायित्व का निर्वहन किया। वह १ मार्च, 968 ई से 3 जनवरी, 969 ई तक 
सी वी टी सी के ई एम चिकित्सालय, परेल, बम्बई मे शोध अधिकारी के पद पर 
कार्यरत रहे। उन्होने 4 फरवरी, 969 ई से 3। दिसम्बर, 4970 ई तक क्षय 
चिकित्सालय समूह, सेवरी बम्बई-5 मे रेजीडेट चिकित्सा सहायक एवं रजिस्ट्रा 
के पद पर कार्य किया। 2 जनवरी, 97] ई से 25 मार्च, 97] ई तक वह क्षय 
रोग चिकित्सालय, सिरोही (राजस्थान) मे सहायक चिकित्सा अधिकारी के पद पर 
कार्यरत रहे। 29 मार्च, 497] ई से 29 मई, 973 ई तक उन्होने सवाई मानसिह 
चिकित्सा महाविद्यालय, जयपुर (राजस्थान) मे सहायक चिकित्साधिकारी एवं टूटर 
का कार्य सम्पादित किया। 30 मई, 4973 ई से 2 सितम्बर, 3975 ई तक उन्होने 
रवीन्द्रनाथ टैगोर चिकित्सा महाविद्यालय, उदयपुर (राजस्थान) मे क्षय रोग एवं व& 
रोग विषय मे व्याख्याता पद पर सेवा की। 3 सितम्बर, 975 ई से 5 फरवरी 
984 ई तक वह एस एन चिकित्सा महाविद्यालय, जोधपुर (राजस्थान) मे क्षय 
रोग एवं वक्ष रोग विषय के रीडर पद पर कार्यरत रहे। फरवरी, 98 ई से जनवरी 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक ]3 


993 ई तक बह प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, क्षय रोग एवं वक्ष रोग सवाइ मानसिह 
चिकित्सा महाविद्यालय, जयपुर तथा चिकित्सा अधीक्षक वक्ष एव क्षय रोग चिकित्सालय, 
जयपुर (राजस्थान) के पद ण्र कार्यरत रहे। फरवरी ॥993 इ से वह ज्वाहर लाल 
नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय, अजमेर के प्रधानाचाय पद को सुशोभित कर रहे हैं। 


पता--उनका वर्तमान कार्यालयीय पता निम्नलिखित है-- 
डॉ एस डी पुरोहित, 
प्रधानाचार्य, 
जवाहर लाल "हरू चिकित्सा महाविद्यालय 
अजमेर-30500, राजस्थान, भारत 


अनुसन्धान का क्षेत्र--उनकी रुचि और शोध का विशिष्ट क्षेत्र क्षय रोग और 
वक्ष रोग है। 

फैलोशिप तथा सम्मान--डॉ पुरोहित नेशनल कॉलेज ऑफ चेस्ट, इण्डिया 
के फैलो हे। वह कॉलेज ऑफ चेस्ट फिजीशियन्स, यू एस ए के भी फैलो हे। 
सन्‌ 984 ई मे वह टी बी एसोशियशन ऑफ इण्डिया की केन्द्रीय समिति के 
सदस्य निर्वाचित किये गये थे। वह नेशनल कॉलेज ऑफ चेस्ट, बम्नई के आजीवन 
सदस्य है। वह श्री कल्याण आरोग्य सदन, सावली (सीकर) की अनुसन्धान समिति 
के सदस्य है। 

उनका उल्लेख 'भारत कौन कहाँ” (796 $ ४४४० $ ५/॥०) 985 तथा 
'डिक्शनरी ऑफ इन्टरनेशनल बॉओग्राफी,' 987 मे हो चुका है। उनका जीवन- 
परिच्य 'एशियाज लर्नेड ॥990-9 मे प्रकाशित हो चुका है। डिक्शनरी ऑफ 
इन्टरनेशनल बॉयोग्राफी के अधिकृत अधिकारी ने उन्हे योग्यता प्रमाण पत्र प्रदान किया 
था। सन्‌ 990 तथा 99 ई मे उन्होने क्षय रोग एवं वक्ष रोगो पर सेमीनार एव 
सतत शिक्षा कार्यक्रमों का आयोजन किया था। 

अभिरुचि--डॉ पुरोहित की रुचि सगीत के वाद्य यत्रो को बजाने मे रही हे। 

प्रकाशन--डॉ पुरोहित के 82 शोध पत्र जर्नलो एवं सम्मेलनो में प्रकाशित 
हो चुके है। सन्‌ 987 ई में उन्होने अपना एक शोध-पत्र दक्षिण-पूव एशियाइ क्षेत्रीय 
सम्मेलग, लाहौर (पाकिस्तान) मे प्रस्तुत किया था। 

उन्होने भारत की प्रमुख स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओ के प्रति लोगो मे चेतना 
जागृत करने के लिए हिन्दी मे “स्वास्थ्य सूत्र” नामक पुस्तक की सरचना की है। 

[] 


डॉ एम. आर स्नौग्रा 
(१942 ई ) 


जन्म एवं वश परिचय--स्वर्गीय श्री एच सी सौग्रा एवं श्रीमती मुरली देवी 
सौंग्रा के सुपुत्र डॉ मगलराम साँग्रा का जन्म 25 जून, 942 ई को बीकानेर मे 
हुआ था। जब डॉ सौग्रा केवल चार वर्ष के ही थे, उनके पिता का स्वर्गवास हो 
गया। उनकी जीवन-सगिनी श्रीमती कमला सौंग्रा गृहिणी है। उनके सुश्री मधु और 
सुश्री मजू नामक दो पुत्रियाँ तथा श्री भूपेन और श्री रूपेन नामक दो पुत्र है। 

शिक्षा-दीक्षा-डॉ सौंग्रा कक्षा प्रथम से हायर सैकण्ड्री स्‍तर तक राजकीय 
बहुद्देश्यीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, बीकानेर मे अध्ययनरत रहे । डूँगर महाविद्यालय, 
बीकानेर के छात्र रहकर उन्होने प्रथम वर्ष त्रिवर्षीय पाठ्यक्रम (विज्ञान) परीक्षा उत्तीर्ण 
की। उन्होने सरदार पटेल चिकित्सा महाविद्यालय बीकानेर का छात्र रहकर 
एम बी बी एस परीक्षा सन्‌ 967 ई में तथा एप एम एस चिकित्सा महाविद्यालय, 
जयपुर मे अध्ययनरत होकर एम डी (पी एस एम ) पीरक्षा सन्‌ 972 ई मे उत्तीर्ण 
की थी। 


व्यवसाय के क्षेत्र मे--2 जनवरी, 968 इ से 5 जनवरी, 4972 ई तक डॉ 
सौंग्रा एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय, जयपुर मे वरिष्ठ प्रदर्शक के पद पर सेवारत 
रहे। वह 6 जनवरी, 972 ई से 26 जुलाई 978 ई तक सहायक प्रोफेसर, 26 
जुलाई, 4978 ई से 29 अप्रेल 984 ई तक एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत 
रहे। 30 अप्रेल, 984 ई से बह प्रोफेसर एव कोषाधिकारी (उपप्रधानाचर्ग्य), 
एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय एवं चिकित्सालय, जयपुर के पद पर कार्यरत 
है। वह 2 जनवरी, 968 ई से पूर्व स्नातक छात्रो को तथा 972 ई से स्नातकोत्तर 
छात्रो को अध्यापित कर रहे है | उनके कार्य एवं दायित्व अध्यापन/प्रशिक्षण/अनुसन्धान/ 
रोगी सुश्रुषा/प्रशासन ह। 


पता--उनका वर्तमान पता अधोलिखित है-- 


डॉ मगल राम सौंग्रा, 
प्रोफेसर, 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 5 


सामुदायिक औषधि विज्ञान एव कोषाधिकारी (उपप्रधानाचाय) 
एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय एवं चिकित्सालय, 
जयपुर (राजस्थान)-302004, भारत 
उनका वर्तमान आवासीय पता इस प्रकार हे-- 
_हरक '', 4-त-2, जवाहर नगर, जयण्पुर-302004 (राजम्थान), भारत 

विदेश भ्रमण--नवम्बर, 975 ई से जून, 98। इ तक डॉ सौंग्रा सरकार 
द्वारा पतिनियुक्ति पर लीबिया गए थे। विश्व स्वास्थ्य सगठन की फेलोशिप के अन्तगत 
वह अप्रैल, 4983 ई से मई, 983 तक श्रीलका, इण्डोनेशिया ओर थाइलैण्ड गए 
और वहाँ कार्यरत रहे। 44 से 6 दिसम्बर तक उन्होने अन्तराष्ट्रीय अनुसन्धान और 
प्रशिक्षण सगठन (इन्टरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ रिसच एण्ड ट्रेनिग-0२7') मे 
वाशिगटन, डी सी, यू एस ए मे भाग लिया था। अप्रैल से मइ, 99 इ तक वह 
रोग नियत्रण केन्द्रों के अवलोकनार्थ अटलाटा, यू एस ए, गए। अन्य देश, जिनकी 
वह यात्रा कर चुके हैं, वे हे--इटली, हॉलैण्ड, जमनी दुबई इग्लेड, सिगापुर, यूनान, 
कुवैत और पाकिस्तान। 

सदस्यता और फैलोशिप--डॉ सौंग्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन और इण्डियन 
सोसायटी कम्यूनिकेबिल डिजजिज के फैलो है। वह श्न्‌ू 986 से 989 इ तक 
राजस्थान चिकित्सा परिषद्‌ के सदस्य रहे। वह सन्‌ 984 से 988 ई तक राजस्थान 
होम्योपैथिक चिकित्सा मण्डल के सकाय सदस्य रहे । वह इण्डियन एसोसिएशन ऑफ 
फिजियोलॉजी सर्जरी एण्ड मेडिसिन (आई ए पी एस एम ) के आजीवन सदस्य हैं। 
वह भारतीय चिकित्सा सघ के भी सदस्य है। वह आई ए पी एस एम की राजस्थान 
शाखा के 986 से 988 ई तक उपाध्यक्ष और सन्‌ 988 ई मे इण्डियन एसोसिएशन 
ऑफ प्रिवेटिव एण्ड सोशल मेडिसिन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की शाषी परिषद्‌ के 
सदस्य थे। 


सम्मान और पुरस्कार--डॉ सौग्रा को भारत के राष्ट्रपति डॉ शकर दयाल 
शर्मा ने 5 जनवरी, 4993 ई को सामाजिक-चिकित्सा सहायता के क्षेत्र मे उनकी 
उल्लेखनीय सेवाओ के उपलक्ष मे डॉ बी सी रॉय राष्ट्रीय पुरस्कार 99 इ प्रदान 
कर सम्मानित किया। इस पुरस्कार स्वरूप उन्हे 5 हजार रुपये नकद एक स्वर्ण 
पदक एव प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया गया था। 22 जनवरी ॥993 ई को वह राजस्थान 
सामुदायिक चिकित्सा सघ के अध्यक्ष निर्वाचित किये गये। 

विशेषज्ञ/परामर्शद/परीक्षक आदि--डॉ सौंग्रा सघीय लोक सेवा आयोग, 
नई दिल्‍ली और राजस्थान लोक सेवा आयोग, अजमेर मे विशेषज्ञ का कार्य सम्पादित 


6 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


करते हैं। वह भारतीय चिकित्सा परिषद्‌, नई दिल्ली के निरीक्षक है। वह राजस्थान, 
मेरठ, आगरा, कानपुर, गोरखपुर, बम्बई, दिल्‍ली, इलाहाबाद, नागपुर, त्रिवेन्द्रम, मद्रास, 
पजाब, इन्दौर, मराठवाडा और अमरावती विश्वविद्यालयो की एम बी बी एस तथा 
राजस्थान विश्व-विद्यालय की डी एच एम एस और बी एच एम एस परीक्षाओ के 
परीक्षक रहे है। 


अनुसन्धान कार्य-डॉ सौग्रा सामुदायिक चिकित्सा के क्षेत्र मे स्नातकोत्तर 
छात्रो को अनुसन्धान कार्य मे मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं। उन्हे प्रतिरक्षण, मृत बच्चो 
के जन्म, ट्रबेक्टोमी, कुपोषण, पशु काटने, बाल चिर जीवन प्रवृत्तियो, सक्रामक रोग 
बिज्ञान, परिवार नियोजन चिकित्सा सेवा और प्रशिक्षण तथा स्वास्थ्य प्रबन्धन के क्षेत्र 
मे अनुसन्धान अनुभव प्राप्त है। उनके एमडी शोध प्रबन्ध का शीर्षक 
था--''चिकित्सालय मे भर्ती मृत जन्मे बच्चो की घटनाओ पर सामाजिक-आर्थिक 
एवं पर्यावरणीय कारको का प्रभाव।”! 


प्रकाशन--उनके 20 से अधिक शोध-पत्र प्रख्यात जर्नलो मे प्रकाशित हो चुके 
हैं। वह समय-समय पर स्वास्थ्य प्रकरणो पर रेडियो और टी बी वार्ताये प्रसारित 
करते रहते हैं। 


्ि 


डॉ वी एस मेहता 
(]949 ई ) 


जन्म एवं वश परिचय--डाॉ वी एस मेहता का जन्म 5 दिसम्बर, 
3949 ई को जयपुर मे हुआ था। उनके पिता श्री टी एस मेहता राजस्थान सरकार 
के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं। उनकी माता श्रीमती फतेह कुमारी मेहता गृहिणी हैं । 
उनका विवाह श्रीमती प्रभा मेहता के साथ हुआ है। उनके विभव मेहता और अभिनव 
मेहता नामक दो पुत्र हैं। 

शिक्षा--डॉ मेहता की प्रारम्भिक शिक्षा जयपुर मे हुई थी। उन्होने एस एम एस 
आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, जयपुर के छात्र के रूप मे राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 
से एम बी बी एस , एम एस (सामान्य शल्य चिकित्सा), और एम केम (यूरो सर्जरी) 
परीक्षाये उत्तीर्ण कीं। उन्होने अक्टूबर, 987 ई मे म्यूनिख, पश्चिमी जर्मनी मे न्यूरो 
सर्जरी मे याग लेसर के प्रयोग पर दो सप्ताह का प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होने फरवरी- 
मार्च, 4979 ई में पश्चिमी जर्मनी के प्रोफसर ए डब्ल्यू पिआ और प्रोफेसर ई 
ग्रोट द्वारा आयोजित सूक्ष्म शल्य क्रिया (माइक्रोसर्जरी--- ्रालए०5णा्छआ५) कार्यशाला 
मे भाग लिया था। उन्होने टाया इन्स्टीट्यूट ऑफ फनन्‍्डामेटल रिसर्च, बम्बई मे 
एन एम आर के जैव वैज्ञानिक प्रयोग पर शीतकालीन पीठ म॑ भाग लिया था। 


व्यावसायिक जीवन--डॉ मेहता ने 9 माह तक न्यूरो सर्जरी विभाग, 
एस एम एस आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, जयपुर मे हाउस सर्जन का काय किया। वह 
दो वर्ष तक न्यूरो सर्जरी विभाग, एस एम एस आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, जयपुर मे 
स्नातकोत्तर अध्येता रहे। उन्होने दो वर्ष तक न्यूरो सर्जरी विभाग, एस एम एस 
आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, जयपुर मे रेजीडेट डॉक्टर का कार्य किया। मार्च, 
978 ई से जनवरी, 4979 ई तक डॉ महेता ने न्यूरों सर्जरी विभाग, अखिल भारतीय 
आयुर्विज्ञान सस्थान, नई दिल्‍ली मे रिसर्च एसोसिएट के पद पर कार्य किया और 
प्रोफेसर पी एन टण्डन के अधीन भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ की एक 
अनुसन्धान प्रायोजना पर कार्य किया। जनवरी, 4979 ई से अगस्त, 98] ई तक 
डॉ मेहता ने न्यूरो सर्जरी विभाग, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान सस्थान नई दिल्ली 
मे सीनियर रेजीडेट डॉक्टर के पद पर कार्य किया। अगस्त, 498 ई से फरवरी, 


।]8 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


3984 ई तक वह न्यूरो सर्जरी विभाग, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान सस्थान नई 
दिल्ली मे व्याख्याता रहे । मार्च, 984 ई से 3। दिसम्बर, 985 ई तक उन्होने 
सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्य किया और । जनवरी ।986 ई से वह एसोसिएट 
प्रोफेसर, न्यूरोसर्जनी विभाग, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान सस्थान, नई दिल्ली के 
पद पर कार्यरत है। 
पता--उनका वर्तमान पता अधोलिखित है-- 

डॉ वी एस मेहता, 

एसोसिएट प्रोफेसर, न्यूरो सर्जरी विभाग, 

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान सस्थान, 

असारी नगर, नई दिल्‍ली-40029 (भारत) 


पुरस्कार--न्यूरोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया के कलकत्ता मे आयोजित 
वर्षिक सम्मेलन मे डॉ मेहता को वर्ष 4980 इ के लिए उनके सर्वोत्तम पत्र के लिए 
मर्क स्वर्ण पदक प्रदान किया गया था। उन्हे पुन न्यूगेलॉजिकल सोसायटी ऑफ 
इण्डिया के पटना मे आयोजित वार्षिक सम्मेलन मे वर्ष 985 ई के लिए उनके 
सर्वोत्तम पत्र के उपलक्ष मे मर्क स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। 


फैलोशिप--डॉ मेहता को जैक एण्ड मोनिका ब्रिटन ट्रेवलिग फैलोशिप प्रदान 
की गई और उन्होने इस फैलोशिप के अन्तर्गत मार्च-अप्रैल, 986 ई में पाँच सप्ताह 
तक इग्लैंड मे विभिन्‍न न्यूरो सर्जिकल केन्द्रो का अवलोकन किया। 


अन्य विशेषताये--डॉ मेहता देश के विभिन्न भागो से डॉक्टरो (स्नातकोत्तर 
के बाद) को सूक्ष्म शल्य क्रिया का प्रशिक्षण देने के लिए भारत मे अपनी तरह का 
पहला-सूक्ष्म शल्य क्रिया प्रयोगशाला प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहे है। चिकित्सा को; 
विभिन्‍न शल्य क्रिया सम्बन्धी प्रशाखाओ से 35 डॉक्टर, न्यूरो सर्जन, विकलॉगता 
सम्बन्धी शल्य चिकित्सक, बाल शल्य चिकित्सक, प्रसूति शल्य चिकित्सक, स्त्री रोग 
विशेषज्ञ प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके है। 


डॉ महेता भारत के नियमित रूप से बन्द गिल सम्बन्धी तत्रिका जाल की 
चोटो की शल्य क्रिया करने वाले प्रथम व्यक्ति थे और उन्होने महत्त्वपूर्ण रूप से 
अच्छे परिणाम दिखलाये। 

बन्द गिल सम्बन्धी तत्रिका जाल चोट मे एनएम आर की भूमिका को 
आई एन एम ए एस एस के डॉक्टर आर के गुप्ता के साथ कार्य करते हुए दिखलाने 
वाले वह प्रथम व्यक्ति हैं। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक ]]9 


डॉ मेहता विभिन्‍न विश्वविद्यालयों क प्रश्न-पत्रां का निमाण करते रहते हैं। 

भारत मे न्यूरो सर्जरी के प्रश्न-पत्रो क लिए वह सदभ व्यक्ति भी हें। 

वह स्नातकोत्तर/बी एस सी नर्सिग/पी एच डी उात्रो के मागदशक/सह- 
मार्गदर्शक भी रहते हैं। 


अनुसन्धान कार्य-डॉ मेहता ने अनुसन्धान किया ओर एम एस (सामान्य 
शल्य क्रिया) के लिए ““क्रिटिकल इवेल्यूएशन एण्ड मेनेजममेट ऑफ सबडयूरेबिल 
हेमेटोमा ((प्रततठब्व ९एक्य॑पबाणा बात प्रध्माबएआशा। 0 उफ्रतणाब0९ ॥श708079) 
शीर्षक अपना लघु शोध प्रबन्ध प्रस्तुत किया। उन्होने पुन एम केम के लिए (१) 
ए प्रोस्पेक्टिव स्टडी ऑफ पलमोनरी इन्फेक्शन एमन्ग 00 कॉनन्‍्सीकूटिव हैड इन्जर्ड 
पेशेन्ट्स (७ 90872०॥९८ ४ंघतए ०एी एणा)णाक्ष»५ प्रॉल्याणा क्ाणाए 400 
००१३2८०ए॥४८ #९३० ्राप्ा०0 9॥०॥5) (2) रिलाइबिलिटी ऑफ सी टी स्केनिग 
इन दि हिस्टोलॉजिकल डायग्नोसिस ऑफ इन्ट्राक्रेनेकल स्पेस ऑकृपाइग लेसिअन्स 
(राणा छा एग इठशाधाएं ॥॥ ही कारशंतठाएश्राट४ं त9शा0ड४ा5 रण 
प्रा।॥०क्षाआ८क्व 59802 0०27शए8 ०४7075) और (3) माइकोटिक इन्फेक्शन ऑफ 
दि ब्रेन-ए रिव्यू ऑफ 42 केसेज (४८०८ प्रालटा0 0 6 छाक्षा---8 72५69/ 
० 42 ८85८5) पर अपना लघु शोध प्रबन्ध प्रस्तुत किया था। 


डॉ मेहता ने भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ की प्रायोजना '' कौलेबोरेटिव 
स्टडी ऑफ हैड इन्जरीज, एपीडेमिजोलॉजिकल पैथोलॉजिकल क्लिनिकल एण्ड 
साइकिए-ट्रिक आस्पेक्ट्स (८णाक्रणशाए& #प्त) री ॥680 व्रा[पा65 
९ए0श॥रा00ा0४/ एक00श6॥, टापराटक 070 9१/लआशाए20 380०८५$) पर 
न्यूरो सर्जरी विभाग, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान सस्थान, नई दिल्‍ली मे रिसच 
एसोसिएट का कार्य सम्पन्न किया था। 


डॉ मेहता ने () रिजल्टस ऑफ सजरी फॉर ब्रेचिअल प्लेक्सस एण्ड पेरीफेरल 
नर्व इन्जरीज स्पेशली विद दि यूज ऑफ सूरल नर्व ग्रेफ्स, (2) लोग टर्म 
फौलो अप ऑफ हैड इन्जरीज एलौंग विद देयर साइकौलॉजिकल इवेल्यूएशन 
(3) फार्माकौलॉजिकल इन्टरवेशन इन न्यूरोजैनिक पलमोनरी ऐडेमा-हेमोडायनेमिक 
एण्ड बॉयोकैमिकल प्रोफाइल, (4) डे केयर सर्जरी फॉर सलेक्टड ग्रुप ऑफ 
न्यूरोसर्जिकल पेशेन्टस, (5) कार्डिओवैसकूलर एब्नौर्मेलिटीज इन हेड इन्जरीज विद 
यूज ऑफ बेटा ब्लॉकर्स इन सलैक्टेड ग्रुप ऑफ पेशेन्टस, (6) रोल ऑफ 
एन एम आर इन ब्रेचिअल प्लेक्सस इन्जरीज, (7) एन्डोस्कोापक कोएगूलेशन ऑफ 
कोरोइड प्लेक्सस इन कौन्जेटीनल हाडड़ोसेफेलस (8) एपीडेमिओलॉजिकल 


20 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


स्टडी ऑफ न्यूरोलॉजिकल डिसओरर्डर्स इन ए रूरल कम्यूनिटी एट बल्‍लभगढ, (9) 
डेवलपमेन्ट ऑफ ए न्यूरोसाइकोलॉजिकल बैट्री फॉर दि यूज ऑन हिन्दी नोइग पेशेन्टस, 
(१0) दि इफैक्ट ऑफ बुपीवेकाइन स्केल्प इनफिल्ट्रेशश ऑन दि हैमोडायनेमिक 
रिस्पोन्स टू क्रोनिओटोमी अन्डर जनरल एनेस्थेशिया, और (११) एस्टीमेशन 
ऑफ 5 एच टी ए इन सी एस एफ बिफोर एण्ड ऑफ्टर शन्टिग पर भी अनुसन्धान 


किया है। 


प्रकाशन--डॉ मेहता ने निम्नाकित तीन पुस्तके/प्रातवेदन लिखे हैं-- 


] 


हैड इन्जरी ए प्रैक्शलीकल गाइड फॉर जनरल सर्जन्स, सम्पादक पी 
एन टण्डन/वी एस मेहता। 

वी एस मेहता, पी एन टण्डन, एस रॉय, एस गुप्ता एन 
एपिडेमिजी लॉजिकल, क्लिनिकल एण्ड पैथोलॉजिकल स्टडी ऑफ हैड 
इन्जरी--भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ के अध्ययन 986 पर 
प्रतिवेदन। 


डब्ल्यू एम एल्बस, एआर टी कोलोहन, सी ग्रॉस, वी एस मेहता, 
पी एन टण्डन, जे ए जेन मोर्टोलिटी फ्रोम सीरियस हैड इन्जरीज 
इन टू सीरीज विद रैडिकली डिफरेट ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इमरजेसी 
मेडिकल सर्विसेज, न्यूरोसर्जरी विभाग, वर्जीनिया विश्वविद्यालय, 
चारलोटसविले और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान सस्थान, नई दिल्ली 
का सयुक्त अध्ययन, प्रथम चरण का अध्ययन 986 का प्रतिवेदन। 


उन्होने अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनो/सेमीनारो/परिसवादो/कार्यशाला मे १6 पत्र प्रस्तुत 
किए हैं। उन्होने विभिन्‍न राष्ट्रीय जर्नलो मे 25 शोध-पत्र प्रकाशित किये है। 


[] 


डॉ राजीव गुप्ता 
जन्म 952 ई 


जन्म एव वश परिचय--डॉ राजीव गुप्ता का जन्म 26 सितम्बर, 952 ई 
को कोटा (राजस्थान), भारत मे हुआ था। उनके पिता डॉ के डी गुप्ता चिकित्सक 
और भेषज विज्ञान के एमेरिटस प्रोफेसर हैं और पूर्व मे एसपी मेडिकल कॉलेज 
के प्रोफेसर और अध्यक्ष, भेषज विज्ञान विभाग तथा प्राचार्य थे और 4977 ई मे 
राजकीय सेवा से सेवानिवृत्त हुए। उनकी माता श्रीमती कुसुमलता गुप्ता सुगृहिणी हैं। 
उनकी धर्मपती श्रीमती मधु गुप्ता गृहिणी हैं। उनके 982 ई मे उत्पन्न निशान्त ओर 
4984 मे उत्पन्न रेवन्त गुप्ता नामक दो पुत्र हैं। 


शिक्षा-वर्ष 966-69 ई मे डॉ गुप्ता ने सार्दुल पब्लिक स्कूल, बीकानेर 
(राजस्थान), भारत मे अध्ययन किया था। ॥969-70 ई मे वह राजस्थान 
विश्वविद्यालय डूँगर कॉलेज, बीकानेर के छात्र थे। १970-76 ई की अवधि मे वह 
राजस्थान विश्वविद्यालय, सरदार पटेल चिकित्सा महाविद्यालय, बीकानेर (राजस्थान), 
भारत मे अध्ययनरत रहे और 976 ई मे शरीर क्रिया विज्ञान, शरीर रचना विज्ञान, 
विकार विज्ञान, औषधि विज्ञान, फोरेन्सिक मेडिसन, शल्य विज्ञान, काय चिकित्सा और 
सामुदायिक भेषज विज्ञान मे सम्मान (ऑनर्स) सहित एम बी बी एस परीक्षा राजस्थान 
विश्वविद्यालय, जयपुर (भारत) से उत्तीर्ण की। वर्ष 4976-79 ई के काल मे वह 
स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा और अनुसन्धान सस्थान, चडीगढ (भारत) के छात्र रहे 
और 979 ई मे एम डी (आन्तरिक काय चिकित्सा) परीक्षा स्नातकोत्तर चिकित्सा 
शिक्षा और अनुसन्धान सस्थान, चडीगढ (भारत) से उत्तीर्ण की। 


उन्होने राजस्थान चिकित्सा परिषद्‌ ओर पजाब चिकित्सा परिषद्‌ दोनो से 
१976 ई में मेडिकल लाइसेस प्राप्त किया। 


छात्रवृत्तियो और पुरस्कार--उन्होने 968 ई मे भारत सरकार और माध्यमिक 
शिक्षा बोर्ड राजस्थान से योग्यता छात्रवृत्ति पुरस्कार प्राप्त किया। 972 इ मे उन्होने 
राजस्थान विश्वविद्यालय एस पी चिकित्सा महाविद्यालय, बीकानेर मे एम बी बी एस 
प्रथम वर्ष मे शरीर रचना विज्ञान मे प्रथम होने पर अप्पाजी स्वर्ण पदक प्राप्त किया। 


22 चाएए भा ॥+।कए्ला १श॥नक 


3973 ई मे एस पी चिकित्सा महाविद्यालय बीकानेर मे एम बी बी एस द्वितीय वर्ष 
परीक्षा मे द्वितीय आने पर राजस्थान विश्वविद्यालय से योग्यता छात्रवृत्ति प्राप्त की। 
एम बी बी एस अन्तिम परीक्षा मे प्रथम आने पर राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा उन्हे 
वर्ष 4976 ई में सवाई मानसिह स्वर्ण पदक और बीकानेर नगर परिषद्‌ स्वर्ण पदक 
4976 ई मे प्रदान किया गया। 976 ई मे राजस्थान (भारत) मे शैक्षिक श्रेष्ठता 
के उपलक्ष मे उन्होने पोद्दार स्मारक पुरस्कार प्राप्त किया। 979 ई मे उन्होने फाइजर 
स्वर्ण पदक और स्नातकोत्तर पुरस्कार प्राप्त किया। 982 ई मे उन्हे ( भारतीय जूडी- 
बूटियो की औषधियो के प्रचलन पर अध्ययन--80668 ० छा०५4४॥०९ ० ताक्षा 
प्र&#० 9४९2७) वैज्ञानिक श्रेष्ठता के उपलक्ष मे भारतीय चिकित्सा सघ पुरस्कार प्रदान 
किया गया था। उन्हे 984 ई मे लॉयन इन्टरनेशनल व्याख्याता, 986 ई मे रोटरी 
इन्टरनेशनल व्याख्याता, और 987 ई मे राष्ट्रीय कल्याण सगठन व्याख्याता बनाया 
गया। वर्ष 499] ई में उन्होने हृदय रोग विज्ञान मे कौर्नेल विश्वविद्यालय और 
मेमोरियल सस्‍लोअन कैटरिंग हॉस्पिटल, न्यूयार्क (यू एम ए ) मे वारून महाजन ट्रस्ट 
न्यूयार्क की विजिटिंग फैलोशिप प्राप्त की। 992 ई मे उन्होने मेडिकल प्रेक्टिशनर्स 
सोसायटी, जयपुर का पुरस्कार प्राप्त किया। 3-6 नवम्बर, 4992 ई को 
कार्डियालॉजिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया, नई दिल्ली के 44वे वार्षिक सम्मेलन मे 
(भारत के ग्रामीण क्षेत्र कोरोनरी हृदय रोग सक्रामक रोग विज्ञान) शीर्षक तृतीय सर्वश्रेष्ठ 
पत्र प्रस्तुत करने के उपलक्ष मे उन्हे कार्डियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया का 
पुरस्कार प्रदान किया गया। इस पुरस्कार मे डेढ हजार रुपये नकद प्रदान किये गए। 
दिसम्बर से 4 दिसम्बर, 994 ई तक जयपुर मे सम्पन्न हुए कार्डियांलॉजी 
सोसायटी ऑफ इण्डिया के 46वे वार्षिक सम्मेलन के अन्तिम दिन रविवार 4 दिसम्बर, 
१994 ई को डॉ राजीव गुप्ता को डॉ डी पी बासु पुरस्कार से सम्मानित किया 
गया। यह सम्मान उन्हे उनके शोध-कार्य “'शैक्षिणक स्तर का कोरोनरी हृदय गेग 
व उसके कारणो पर राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्र मे अध्ययन '” पर दिया गया | यह अध्ययन 
जनमगल ट्रस्ट द्वारा प्रायोजित था तथा नागौर जिले की परबतसर तहसील मे किया 
गया। कुल 348 लोगो, जिनमे 982 पुरुष व 66 महिलाये है, का विस्तृत हृदय 
परीक्षण किया गया। इसमे यह पाया गया कि कोरोनरी हृदय रोग 34 प्रतिशत पुरुषों 
व 37 प्रतिशत महिलाओ मे है। अशिक्षित लोगो मे इसकी व्यापकता 50 प्रतिशत 
था जबकि उच्च शिक्षित लोगो मे 253 प्रतिशत। 22 अगस्त, 997 ई को भारतीय 
चिकित्सा अनुसन्धान परिषद की ओर से हृदय रोग चिकित्सा के क्षेत्र मे महत्त्वपूर्ण 
यागदान क लिए वर्ष 4997 का चतुर्वेदी कलावती जगमोहनदास पुरस्कार डॉ राजीव 
गुप्ता को दिया गया है। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 23 


यह भी पाया गया कि अशिक्षित व कम शिक्षित लोगो म॑ धूम्रपान व उच्च 
रक्‍त चाप का मात्रा भी अधिक थी। बम्बइ के डॉ पहलाजानी का मत था कि 
यह अनुसन्धान यह दर्शाता है कि भारत मे हृदय रोग लगातार बढ रहा है ओर 
अब गाँवों मे एवं गरीब तबके मे भी पहुँच गया। इस अध्ययन मे राजस्थान 
विश्वविद्यालय के डॉ वी पी गुष्ता व मोनीलेक अस्पताल के डॉ एच पी गुप्ता 
का सहयोग रहा। 


व्यावसायिक जीवन--सितम्बर, 975 से अगस्त, 976 ई तक उन्होने 
पी बी एम चिकित्सालय समूह, बीकानेर (भारत) मे इन्टर्नशिप की । वह अगस्त, 976 
से जुलाई 979 ई तक काय चिकित्सा विभाग, स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा और 
अनुसन्धान सस्थान, चडीगढ मे कनिष्ठ रेजीडेट रहे। वह अगस्त, 977 से जुलाई, 
979 ई तक काय चिकित्सा विभाग, स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा और अनुसन्धान 
सस्थान चडीगढ मे रेजीडेट टीचिंग फैलो रहे। वह अगस्त, 979 ई से दिसम्बर, 
)979 ई तक काय चिकित्सा विभाग की हृदय रोग विज्ञान और श्वसन चिकित्सा 
इकाइयो मे स्नातकोत्तर चिकित्सा और अनुसन्धान सस्थान, चडीगढ मे वरिष्ठ रेजीडेट 
थे। दिसम्बर, 979 ई से दिसम्बर, 980 ई तक वह डॉ एस एन चिकित्सा 
महाविद्यालय और सम्बद्ध चिकित्सालयों मे सहायक प्रोफेसर काय चिकित्सा के पद 
पर कार्यरत रहे । जून, 985 ई से जुलाई, 985 ई तक वह हृदय रोग विज्ञान विभाग, 
हैमरस्मिथ चिकित्सालय, लन्दन, इग्लैंड मे विजिटिंग फीजिशियन रहे। अप्रैल, 99॥ 
ई से मई, 4994 ई तक वह मेमोरियल स्‍लोअन कैटरिंग हॉस्पिटल और कौर्नेल 
विश्वविद्यालय, न्यूयार्क, यू एस ए मे हृदय रोग मे निदानिक पर्यवेक्षक रहे। 
वह जनवरी, 98 ई मे वरिष्ठ चिकित्सक और निदेशक, नॉनइनवेसिक 
कार्डिक लेबोरेट्री, के डी गुप्ता मेडिकल सेटर, जयपुर (भारत) के रूप मे 
आन्तरिक काय चिकित्सा और हृदय रोग विज्ञान मे निजी चिकित्सा कार्य कर रहे 
हैं। अक्टूबर, 985 ई से वह मौनिलेक चिकित्सालय और अनुसन्धान केन्द्र, जयपुर 
( भारत) मे मुख्य चिकित्सक एवं हृदय रोग विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत हैं। वह अप्रैल, 
3992 ई से निदेशक अनुसन्धान मौनिलेक चिकित्सालय और अनुसन्धान केन्द्र, जयपुर 
(भारत) के पद पर कार्यरत हैं। 
पता--उनका चिकित्सालयीय पता निम्नलिखित है-- 
डॉ राजीव गुप्ता एमडी , 
मुख्य चिकित्सक एव हृदय रोग विशेषज्ञ, 
मोनिलेक चिकित्सालय एवं अनुसन्धान केन्द्र 


[24 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


सेक्टर 4, जवाहर नगर, 
जयपुर (राजस्थान)-302004 (भारत) 
उनका पत्र-व्यवहार का एवं आवासीय पता इस प्रकार है-- 
6, चिकित्सालय मार्ग, 
जयपुर 30200। (भारत) 


अभिरुचियॉ--उनकी अभिरुचियाँ पढना (मुख्यतया प्राचीन और आत्मकथा 
सम्बन्धी उपन्यास), तैल चित्रकारी और यात्रा करना है। 


सदस्थता--वह नवम्बर, 985 ई से मौनिलेक चिकित्सालय और अनुसन्धान 
केन्द्र, जयपुर (भारत) की प्रबन्ध समिति के सदस्य है। वह जनवरी, 986 ई से 
मार्च, 499 ई तक मेडिकल प्रेक्टिशनर्स सोसायटी, जयपुर (भारत) की वैज्ञानिक 
समिति के सयोजक रहे। दिसम्बर, 987 ई से वह एपेक्स हॉस्पिटल्स प्राइवेट 
लिमिटेड, जयपुर के निदेशक हैं। वह अप्रैल, 994 ई से एसोसिएशन ऑफ 
फीजिशियन्स ऑफ इण्डिया, राजस्थान राज्य शाखा के एक्जीक्यूटिव सदस्य हैं। 


वह 979 ई से एसोसिएशन ऑफ फीजिशिन्यस ऑफ इण्डिया के, 
98] ई से इन्टरनेशानल कॉलेज ऑफ ऐगिओलॉजी के, 984 ई से अमेरिकन 
कॉलेज ऑफ चेस्ट फीजिशियन्स के, 984 ई से न्यूयार्क एकेडेमी ऑफ साइन्स 
के, 985 ई से कार्डियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया के, 4988 ई से इण्डियन 
मेडिकल एसोसिएशन के, और 992 ई से अमेरिकन एसोसिएशन फॉर एडवान्समेट 
ऑफ साइन्स के सदस्य हैं। 


प्रकाशन--वह जयपी पब्लिशर्स, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित 'रिसेट एडवान्सेज 
इन मेडिकल थेरेपी (२९८८०॥ 40५70९5 पा (९००८४ ॥॥०४७५) ' शीर्षक पुस्तक 
के प्रधान सम्पादक है। उन्होने ' कन्टेम्पोरेरी मेडिसन ((१णा।शाएणब्ला> |/९०८०॥९) ' 
शीर्षक एक अन्य पुस्तक का सम्पादन भी किया है। राजस्थान के चिकित्सको द्वारा 
प्रकाशित इस पुस्तक मे चिकित्सा क्षेत्र मे किये जा रहे आधुनिक विकास की जानकारी 
दी गई है। देश-विदेश के रोग विशेषज्ञों ने हदय आघात, निमोनिया, पीलिया एव 
रक्‍त कैसर आदि की चिकित्सा प्रणाली पर प्रकाश डाला है। 

उनके अब तक 80 से अधिक पत्र जर्नलो, पत्रिकाओं और सम्मेलनो मे 
प्रकाशित हो चुके हैं। 

अनुसन्धान प्रायोजनाये और अनुदान--उन्होने नवम्बर 990 ई से फरवरी, 
399 ई तक “'एपिडेमिओलॉजी ऑफ वाल्वूलर हार्ट डिजीज इन स्कूल चिल्ड्रिन 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक ]25 


एट जैपुर इकोकार्डियोग्राफिक स्टडी (स्ञातटाग्रा0089 णी ५३४एपाॉश वट्शा 
तइ24९८ ॥॥ इता00ं त्ांगिया 2 उब्वएप्ता सिला००भा00्शाधए॥0 $७0ए पर 
प्रायोजना और अक्टूबर, 99] ई से जनवरी, 992 ई तक “'लाइफस्टाइल इन्फ्लूऐस 
आन एम डी एल कोलेस्टेरोल लेवल्स (6४४८ व्ररए्ाल्ट णा ४ ०0, 
०॥0००८४2४० ।०५८।५) पर प्रायोजना के लिए इन्टरनेशनल मेडिकल कोर, जयपुर से 
अनुदान प्राप्त किया था। वह अप्रेल, 992 ई से '' एपिडेमिओलॉजिकल स्टडी ऑफ 
कोरनरी हार्ट डिजीज इन राजस्थान (#फाता0ए0शा०े #प्त५ ण॑ ०णणाबआज वक्‍6क्षा 
0॥5285८ ॥॥ रि4[8०॥9) '' पर प्रायोजना के राजस्थान पत्रिका से और “'इवेल्यूशन 
ऑफ इन्डीजीनस प्लान्टस एण्ड हर्बस इन रिड्यूसिग रिस्क ऑफ आशथरोक्लेरोसिस 
एण्ड हायपर कोलेस्टेरोलेमिआ (एफ्रब्वांपद्माणा णी ॥068श0005 एक्षा।5 क्ातं ॥0005 
720पटग29 ए#( रण १0श02००85 थात ॥992८॥0९5४०70]०709 ' पर प्रायोजना 
के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, राजस्थान सरकार से अप्रैल, 992 से अनुदान 
प्राप्त कर रहे हैं। 
सम्मेलनो मे सहभागिता--उन्होने अब तक निम्नलिखित सम्मेलनो मे भाग 
लिया है-- 
(७) अन्तर्राष्ट्रीय 
4. 982. इन्टरनेशनल काग्रेस ऑन ट्रोपिकल कार्डियोलॉजी, बम्बई। 
2 १984  इन्टरनेशनल काफ्रेन्स ऑन कार्डियोलॉजी, नई दिल्‍्ली। 
3 985 थर्ड यूरोपियन-अमेरिकन कार्डियोलॉजी काफ्रेन्स, हैमरस्मिथ 
हॉस्पिटल, लन्दन, इग्लैड। 
4. १988 नवी इन्टरनेशनल काफ्रेन्स ऑफ न्यूरोलॉजी, नई दिल्ली। 
5 १99] इन्टरनेशनल सिम्पोजियम ऑन प्रिवेटिव कार्डियोलोजी एण्ड 
कार्डियो वैसकूलर एपीडेमिओलॉजी, नई दिल्‍्ली। 
6 १99 छठा एन्युलअल कन्वेन्‍्शन ऑफ अमेरिकन सोसायटी ऑफ 
हायपरटेशन, न्यूयार्क, यू एस ए । 
7 994 डॉ गुप्ता हॉलैण्ड के इट्रेक्ट नगर मे यूरोपिन एथीरोस्कलरोसिस 
सोसायटी के सम्मेलन मे “राजस्थान की ग्रामीण व शहरी महिलाओ 
म॑ हृदय रोग एवं उसके कारणों की जॉच' तथा “राजस्थान के पुरुषों 


मे कोलेस्ट्रोल की समस्या का अध्ययन' विषय पर 43 जून को शोध- 
पत्र पढने तथा सयुक्त राज्य अमेरिका के नगर न्यूयार्क स्थित 


!26 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


एल आई जे मेडिकल सेटर विश्वविद्यालय मे 'राजस्थान मे उच्च रक्त 
चाप की समस्या एवं उसके सामाजिक कारण' विषय पर आमत्रित 
व्याख्यान देने के लिए एव न्यूयार्क मे 77 से 20 जून तक होने वाले 
अमेरिकन सोसायटी ऑफ हाइपरटेशन के ॥0वे वार्षिक सम्मेलन मे 
'राजस्थान मे उच्च रक्त चाप” विषय पर व्याख्यान देने हेतु गए। 


राष्ट्रीय 

4. १980-92 एसोसिएशन ऑफ फीजिशियन्स ऑफ इण्डिया, वार्षिक 
सम्मेलन। 

2 980-92 कार्डियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया, वार्षिक 
सम्मेलन | 


3 १992 इण्डियन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी वार्षिक सम्मेलन। 


अनुसन्धान कार्य और देन--गौरवशाली स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा और 
अनुसन्धान सस्थान, चडीगढ से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरान्त उन्होने 
जोधपुर चिकित्सा महाविद्यालय मे सहायक प्रोफेसर काय चिकित्सा के पद पर कार्य 
किया। वह विगत ॥2 वर्षो से नॉनइनवेसिव कार्डियोलॉजी, कार्डियोवैसकूलर 
एपिडेमिओलॉजी और प्रिवेटिब (रोकथाम सम्बन्धी) कार्डियोलॉजी (हृदय रोग 
विज्ञान) के क्षेत्र मे नॉनइनवेसिव कार्डियोलॉजिकल चिकित्सा और अनुसन्धान मे 
सलग्न हैं। 


4982 ई मे उन्होने भारतीयों ने परिलक्षित कोरोनरी हृदय रोग के कारणो की 
खोज पर कार्य प्रारम्भ किया। चूँकि यह रोग इस देश मे सक्रामक स्वरूप धारण करता 
जा रहा है, यह उचित ही था कि इसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध मे कुछ आधारभूत 
अनुसन्धान किया जावे। उनकी प्रारम्भिक खोज से पता चला कि कोरोनरी हृदय रोग 
भारत के शहरी क्षेत्र मे व्यापक रूप से प्रचलित था और 982 ई में स्टेट ऑफ 
दि ऑर्ट स्ट्रैस टेस्ट तकनीक का प्रयोग करके वह यह प्रदर्शित कर सके कि यह 
रोग वास्तव मे आम (3ब प्रचलन) है। इन व्यक्तियो के अनुगमन अध्ययनों ने यह 
सिद्ध कर दिया कि वास्तव मे यह ऐसा ही है। 

कोरोनरी हृदय रोग के रोगियो के परवर्ती अनुसन्धान ने यह दिखलाया है कि 
इस परिस्थिति का महत्त्वपूर्ण कारण मानसिक तनाव होता है। 


उन्होने देश मे पहली बार यह दिखलाया है कि कोरोनरी हृदय रोग से पीडित 
रोगियो मे यदि रक्त चाप का स्तर नियत्रित कर लिया जाता है और धूम्रपान को बन्द 


भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक [27 


कर दिया जाता है, तो सम्पूर्ण जीवन यापन मे सुधार किया जा सकता है। इसी प्रकार 
उन्होंने दिखलाया ह कि हमारे देश मे सम्भवत सम्पूर्ण कोलेस्ट्रोल स्तर महत्त्वपूण 
नहीं हैं। 

इस कार्य के दूसरे भाग के रूप मे कोरोनरी हृदय रोग के सही निदान के 
लिए उन्होने ट्रेडमिल एक्सरसाइज स्ट्रैस टैस्ट का प्रयोग किया है। इस देश म पहली 
बार उन्होने यह दिखलाया है कि हृदय रोग से पीडित रोगियो मे मृत्यु के भावी खतरे 
को निश्चित करने के लिए ट्रैडमिल स्ट्रेस टेस्ट का प्रणगेग किया जा सकता है। इस 
कार्य को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हुई है। 


वह अपनी खोजो के नवीनतम चरण मे कोरोनरी हृदय रोग की रोकथाम के 

उपायो को निश्चित करने की चेष्टा कर रहे हैं। गाँवों मे कोरोनरी हृदय रोग और 

खतरे के कारको के अध्ययन के प्रारम्भिक परिणामो से उन्होने यह पाया है कि स्तरीय 

खतरे के कारकों से बढकर सामाजिक और आर्थिक कारक इस परिस्थिति के अधिक 

महत्त्वपूर्ण कारण हैं। हमारे देश मे यह इस प्रकार का सबसे विषद अध्ययन है। इस 
अध्ययन के अधिक लाभकारी परिणाम शीघ्र उपलब्ध हो सकेगे। 

+]१ 


26 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


एल आई जे मेडिकल सेटर विश्वविद्यालय मे ' राजस्थान मे उच्च रक्त 
चाप का समस्या एव उसके सामाजिक कारण' विषय पर आमत्रित 
व्याख्यान देने के लिए एव न्यूयार्क मे 77 से 20 जून तक होने वाले 
अमेरिकन सोसायटी ऑफ हाइपरटेशन के ॥0वे वार्षिक सम्मेलन मे 
'राजस्थान मे उच्च रक्त चाप” विषय पर व्याख्यान देने हेतु गए। 


राष्ट्रीय 

4. 4980-92 एसोसिएशन ऑफ फीजिशियन्स ऑफ इण्डिया, वार्षिक 
सम्मेलन | 

2 १980-92 कार्डियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया, वार्षिक 
सम्मेलन | 


3 4992 इण्डियन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी वार्षिक सम्मेलन। 


अनुसन्धान कार्य और देन--गौरवशाली स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा और 
अनुसन्धान सस्थान, चडीगढ से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरान्त उन्होने 
जोधपुर चिकित्सा महाविद्यालय मे सहायक प्रोफेसर काय चिकित्सा के पद पर कार्य 
किया। वह विगत ॥१2 वर्षों से नॉनइनवेसिव कार्डियोलॉजी, कार्डियोवैसकूलर 
एपिडेमिओलॉजी और प्रिवेटिव (रोकथाम सम्बन्धी) कार्डियोलॉजी (हृदय रोग 
विज्ञान) के क्षेत्र मे नॉनइनवेसिव कार्डियोलॉजिकल चिकित्सा और अनुसन्धान मे 
सलग्न हैं। 

3982 ई मे उन्होने भारतीयो ने परिलक्षित कोरोनरी हृदय रोग के कारणो को 
खोज पर कार्य प्रारम्भ किया। चूँकि यह रोग इस देश मे सक्रामक स्वरूप धारण करता 
जा रहा है, यह उचित ही था कि इसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध मे कुछ आधारभूत 
अनुसन्धान किया जावे। उनकी प्रारम्भिक खोज से पता चला कि कोरोनरी हृदय रोग 
भारत के शहरी क्षेत्र मे व्यापक रूप से प्रचलित था और 982 ई मे स्टेट ऑफ 
दि ऑर्ट स्ट्रैस टेस्ट तकनीक का प्रयोग करके वह यह प्रदर्शित कर सके कि यह 
रोग वास्तव मे आम (१3ब प्रचलन) है। इन व्यक्तियो के अनुगमन अध्ययनों ने यह 
सिद्ध कर दिया कि वास्तव मे यह ऐसा ही है। 

कोरोनरी हृदय रोग के रोगियो के परवर्ती अनुसन्धान ने यह दिखलाया है कि 
इस परिस्थिति का महत्त्वपूर्ण कारण मानसिक तनाव होता है। 


उन्होने देश मे पहली बार यह दिखलाया है कि कोरोनरी हृदय रोग से पीडित 
रोगियो मे यदि रक्त चाप का स्तर नियत्रित कर लिया जाता है और धूम्रपान को बन्द 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 27 


कर दिया जाता है, तो सम्पूर्ण जीवन यापन मे सुधार किया जा सकता है। इसी प्रकार 
उन्होने दिखलाया है कि हमारे देश मे सम्भवत सम्पूर्ण कोलेस्ट्रोल स्तर महत्त्वपूण 
नहीं हैं। 

इस कार्य के दूसरे भाग के रूप मे कोरोनरी हृदय रोग के सही निदान के 
लिए उन्होने ट्रेडमिल एक्सरसाइज स्ट्रैस टैस्ट का प्रयोग किया है। इस देश म॑ पहली 
बार उन्होने यह दिखलाया है कि हृदय रोग से पीडित रोगियो मे मृत्यु के भावी खतरे 
को निश्चित करने के लिए ट्रैडमिल स्ट्रैस टैस्ट का प्रणेग किया जा सकता है। इस 
कार्य को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हुई है। 


वह अपनी खोजो के नवीनतम चरण मे कोरोनरी हृदय रोग की रोकथाम के 

उपायो को निश्चित करने की चेष्टा कर रहे हैं। गॉवों मे कोरोनरी हृदय रोग ओर 

खतरे के कारको के अध्ययन के प्रारम्भिक परिणामो से उन्होने यह पाया है कि स्तरीय 

खतरे के कारकों से बढकर सामाजिक और आर्थिक कारक इस परिस्थिति के अधिक 

महत्त्वपूर्ण कारण हैं। हमारे देश मे यह इस प्रकार का सबसे विषद अध्ययन है। इस 
अध्ययन के अधिक लाभकारी परिणाम शीघ्र उपलब्ध हो सकेगे। 

हा 


डॉ वीरेन्द्र सिह 
(]954 ई ) 


जन्म एव वश परिचय--डॉ वीरेन्द्र सिह का जन्म भारत के राजस्थान राज्य 
के झुन्झुनूँ जिले के एक बहुत छोटे गॉव भोजासर मे 9 सितम्बर, 954 ई को हुआ 
था। उनके पिताश्री रामेश्वर सिह सेवानिवृत्त आई ए एस अधिकारी और राजस्थान 
राज्य भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा के अध्यक्ष है। उनकी माता श्रीमती पतासी 
देवी गृहिणी है। उनकी जीवन-सहचरी श्रीमती सरिता चौधरी एम कॉम गृहिणी है। 
उनके सुश्री शीतू सिह और सुश्री मिशू सिह नामक दो पुत्रियों हैं। 

शिक्षा-दीक्षा-वर्ष 960-62 ई मे डॉ सिह झालावाड जिले (राजस्थान) 
में राजकीय प्राथमिक विद्यालय, अकलेरा मे छात्र रहे। सन्‌ 9७3 ई मे वह रेलवे 
स्कूल, गगापुर सिटी मे अध्ययनरत रहे। वह वर्ष 964-66 ई मे सर हिन्द विद्या 
भवन, सीकर एवं वर्ष 967 ई मे एस के स्कूल, सीकर के छात्र रहे। वर्ष 967- 
68 ई मे वह महात्मा गॉधी स्कूल, कोटा के छात्र थे। वर्ष 968-69 ई मे वह 
सुमेर हायर सैकण्ड्री स्कूल, जोधपुर मे अध्ययनरत रहे। वर्ष 969-74 ई में वह 
महाराजा कॉलेज, जयपुर मे अध्ययन करते रहे। सितम्बर, 97] ई से सितम्बर, 
980 ई तक वह एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय, जयपुर के छात्र रहे तथा 
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर से एम बी बी एस और एम डी (सामान्य भेषज) 
उपाधियों प्राप्त की । 

व्यवसाय के क्षेत्र मे--जुलाई, 977 ई से सितम्बर, 980 ई तक डॉ सिह 
ने एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय और चिकित्सालय जयपुर (राजस्थान) मे 
भेषज विज्ञान विषय मे पजीयक क॑ पद पर कार्य किया था। अक्टूबर, 980 से मई, 
982 ई तक राजस्थान सरकार, जयपुर मे चिकित्साधिकारी के पद पर कार्यरत रहे। 
मई, 982 से नवम्बर, 988 ई तक वह एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय एव 
चिकित्सालय, जयपुर मे सहायक प्रोफेसर के पद पर रहे | नवम्बर, 988 से नवम्बर, 
989 ई तक वह श्वास भेषज सभाग, सिटी चिकित्सालय, नॉटिग्घम, इग्लैंड मे 
राष्ट्रकुल चिकित्सा फैलो के पद पर रहे। नवम्बर, १989 ई से वह एस एम एस 
चिकित्सा महाविद्यालय एवं चिकित्सालय, जयपुर (राजस्थान), भारत मे सहायक 
प्रोफेसर (भेषज विज्ञान) के पद पर कार्यरत है। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक ]29 


पता--उनका वर्तमान व्यावसायिक पता इस प्रकार है-- 
डॉ वीरेन्र सिह एमडी, 
सहायक प्रोफेसर, भेषज विज्ञान विभाग, 
एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय एवं चिकित्सालय, 
जयपुर (राजस्थान)-302004, भारत 


उनका आवासीय एव पत्र-व्यवहार का पता निम्न प्रकार है-- 
सी-86, शास्त्रीनगर, 
जयपुर (राजस्थान)-30206, भारत 
सम्मान और पुरस्कार--डॉ सिह ने 5 अगस्त, 989 इ को देश मे सर्वोत्तम 
आविष्कार-पिक सिटी फ्लोमीटर के आविष्कार के उपलक्ष मे राष्ट्रीय अनुसन्धान 
विकास निगम, नई दिल्‍ली (भारत) लू 50 हजार रुपयो का स्वतत्रता दिवस पुरस्कार 
प्राप्त किया था। यह श्वास प्रवाह मीटर पीक एक्सपाइरेटरी फ्लो रेट (पी ई एफ आर )- 
उच्च उच्छावसन (नि श्वसन) प्रवाह दर के साथ-साथ पीक इन्सपाइरेटरी फ्लो 
(पी आई एफ ) उच्च प्रश्वसन (अन्त श्वास) प्रवाह को आलेखित करता है। इस 
साधन की विशषता यह है कि इसका एक सिरा मुँह मे लगाने वाले भाग के रूप 
मे प्रयोग किया जा सकता है तथा कार्य को अधिक सरल और कम समय लेने वाला 
बनाते हुए पीई एफ आर और पी आई एफ को आलेखित किया जा सकता है। 


डॉ सिह ने 5 अगस्त, 990 इ को अपने आविष्कारों और खोजो के उपलक्ष 
मे राजस्थान सरकार से 45 हजार रुपयो का नकद योग्यता पुरस्कार प्राप्त किया था 
जो राजस्थान सरकार द्वारा दिया गया सर्वोच्च नकद पुरस्कार था। जनवरी, 99 ई 
मे आगरा मे आयोजित एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन्स ऑफ इण्डिया के 46वे 
अधिवेशन (सम्मंलन) के अवसर पर वक्ष रोगो के क्षेत्र मे सर्वोत्तम पत्र प्रस्तुत करने 
के उपलक्ष म एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन्स ऑफ इण्डिया का ई मक पुरस्कार 
प्राप्त किया था। उन्होने 3 अप्रैल, 7992 ई को भारत के तत्कालीन प्रधानमत्री श्री 
पी वी नरसिहराव से देश मे अपने सर्वोत्तम जैव-अभियात्रिकी कार्य एवं अस्थमा 
पर योग श्वसन क्रियाओ का प्रभाव' विषय पर लिखे उनके मोलिक एवं शोधपूर्ण 
कार्य के उपलक्ष मे राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान अकादमी का डॉ श्याम लाल सक्सेना 
स्मृति पुरस्कार तथा सन्‌ १992 ई मे देश मे सर्वोत्तम प्रकाशनो के लिए श्री कृष्णजी 
गोविन्द एवं प्रमीला भाटे स्मृति व्याख्यान पुरस्कार प्राप्त किया था। 5 जनवरी, 
993 ई को भारत के राष्ट्रपति डॉ शकर दयाल शर्मा ने चिकित्सा के क्षेत्र मे अस्थमा 
रोगियो के फेफडो और श्वसन की जॉच के लिए पिक सिटी फ्लो मीटर, उसके उपचार 


30 भारत के चिकित्सा जैज्ञानिक 


के लिए पिकी सिटी एक्ससाइजर के आविष्कारों तथा एसीडिटी और अस्थमा क 
सम्बन्ध मे शोध कार्य अर्थात्‌ चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र मे देश मे सर्वोत्तम आधारभूत 
शोध कार्य क॑ उपलक्ष मे भारतीय चिकित्सा परिषद्‌ का हरिओम आश्रम एलेम्बिक 
शोध पुरस्कार दस हजार रुपये नकद, एक स्वर्ण पदक और प्रमाण-पत्र प्रदान कर 
डॉ बी सी रॉय पुरस्कार समारोह के अवसर पर उन्हे सम्मानित एवं विभूषित किया। 
23 अप्रैल, १994 ई को उन्हे जयपुर मे एकता मच ने एकता पुरस्कार से उनके पिक 
सिटी लग एक्सरसाइजर के आविष्कार के लिए सम्मानित किया। 2) जनवरी, 995 
ई को मद्रास मे उन्हे दमा के इलाज मे काम आने वाले कई उपकरणो का आविष्कार 
करने के उपलक्ष मे एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन्स ऑफ इण्डिया के स्वर्ण जयन्ती 
अवसर पर “साराभाई ओरेशन' पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्होने इन आविष्कारो 
को पेटेन्ट करवा लिया है। 9 मई, 995 ई को डॉ सिह ने सान्फ्रासिस्को (यू एस ए ) 
मे अमेरिकन थोरेसिक सोसायटी की ओर से आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय काफ्रेस मे ' अस्थमा 
सत्र' की अध्यक्षता की। 

सम्मेलनो मे सहभागिता--इण्डियन चेस्ट सोसायटी और एसोसिएशन ऑफ 

फिजिशियन्स ऑफ इण्डिया के वार्षिक सम्मेलनों मे भाग लेने के अलावा उन्होने 
निम्नलिखित अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनो मे भाग लिया और पत्र प्रस्तुत किये-- 

(।) अक्टूबर, 4985 ई मे वाशिगटन डी सी मे आयोजित अति अनुभूति 
विज्ञान (एलर्जी सम्बन्धी विज्ञान) और चिकित्सीय प्रतिरक्षा विज्ञान पर 
42वीं अन्तर्राष्ट्रीय काग्रेस । 

(2) ब्रिटिश थोरेसिक सोसायटी की शीतकालीन बैठक (सभा), लन्दन, 
दिसम्बर, 988 | 

(3) अमेरिकन थोरेसिक सोसायटी सम्मेलन, सिन्सिन्टी, यू एस ए, मई, 
989 | 

(4) ब्रिटिश थोरेसिक सोसायटी की सभा, साउथम्पटन, इग्लैंड, जुलाई, 
989 | 

(5) श्वास सम्बन्धी भेषज विज्ञान की प्रक्रियाओ पर परिसवाद, केम्दब्रिज 
इग्लैंड, सितम्बर, 989। 

(6) वर्ल्ड लग काग्रेस, बोस्टन, यू एस ए, मई 990। 

(7) नवम्बर, 992 ई में वाशिगटन मे एलर्जी पर आयोजित तेरहवी 
अन्तर्राष्ट्रीय काग्रेस, दमा एबं एसिडिटी पर शोध-पत्र प्रस्तुत किया 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक |3] 


(8) 


(9) 


और पिक सिटी फ्लोमीटर का भी प्रदर्शन किया जिसकी विशेषज्ञो 
ने सराहना की। 

बोस्टन, यू एस ए मे मई, 994 ई में श्वास रोग (दमा) पर अमेरिकन 
थोरेसिक सोसायटी सम्मेलन ओर अपने आविष्कार 'पिक सिटी लग 
एक्सरसाइजर' के परिणाम प्रस्तुत किये तथा नाटिघम भी गए। 

मई, ॥995 ई मे सानफ्रासिस्को, यू एस ए मे अमेरिकन थोरेसिक 
सोसायटी का सम्मेलन, ' अस्थमा सत्र' की अध्यक्षता की, श्वास रोग 
मे 'एलर्जन्स' की भूमिका पर भारत मे हो रही चिकित्सा पद्धति पर 
व्याख्यान दिया, न्यूयार्क म॑ वेर्टन्स मेडिकल कॉलेज तथा फ्लोरिडा मे 
टैम्पा मेडिकल कॉलेज मे व्याख्यान दिये। 


डॉ सिह ने बताया कि न केवल एलर्जन्स बल्कि साधारण लगने वाली शारीरिक 


गतिविधियाँ, 


जैसे खासना, रोना, चिल्लाना, हँसना, दौडना आदि कारण भी श्वास 


रोग बढा सकते हैं। इसका कारण हवा से श्वास नलियो मे होने वाला घर्षण है। 


इस प्रकार डॉ सिह इग्लैंड और अमेरिका मे आयोजित 9 अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनो 
और भारत मे 4] से अधिक सम्मेलनो मे भाग ले चुके हैं। 


प्रकाशन--डॉ सिह के 40 से अधिक शोध अध्ययन प्रख्यात राष्ट्रीय और 
अन्तर्राष्ट्रीय जर्नलो मे प्रकाशित हो चुके हैं। 


महत्त्वपूर्ण कार्य--आविष्कार 


] 


पिक सिटी फ्लोमीटर--सन्‌ 985 ई मे डॉ सिह ने पिक सिटी 
फ्लोमीटर का आविष्कार किया। यह उच्छावसन और प्रश्वसन प्रवाह 
को आलेखित करता है। यह एक ऐसा यत्र है, जिसके द्वारा दमा 
(अस्थमा) रोग की तीव्रता को उसी प्रकार मापा जा सकता है जिस 
प्रकार थर्मामीटर ज्वर की तीव्रता को मापता है। धूम्रपान से उत्पन्न 
फेफडो का रोग इमफाइसोमा (शरीर ऊतक मे असाधारण वायु या गैस 
का दबाव होना) का पता इस यत्र द्वारा जल्दी लगाया जा सकता है। 
52 0ब भारतीय जनसख्या धूम्रपान करने वाली है। अत समाज के लिए 
यह बहुत उपादेय है। राष्ट्रीय अनुसन्धान विकास निगम ( भारत सरकार ) 
ने इस यत्र के आविष्कार के उपलक्ष मे 45 अगस्त, 989 ई को उन्हे 
50 हजार रुपये का पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया था। राष्ट्रीय 
अनुसन्धान विकास निगम के सर्वोच्च पुरस्कार प्राप्त करने वाले डॉ 
सिह देश मे सर्वप्रथम चिकित्सक हैं। इस यत्र से सम्बन्धित अध्ययन 


32 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


प्रमुख राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जर्नलो मे प्रकाशित हुए है। भारत और 
विदेशों के सैकडो चिकित्सको ने इस यत्र की सराहना की है। 


2 पिक सिटी लग एक्सरसाइजर--दमा (अस्थमा) बहुत पुराना 
(चिरकालिक) श्वास रोग होता है। दमा के रोगी को दीर्घकाल तक 
और कभी-कभी जीवन पर्यन्त औषधियो का सेवन करना पडता है। 
औषधियो के मूल्य (खर्च) और उनके दुष्प्रभावों को ध्यान मे रखकर 
औषधिविहीन विभिन्‍न प्रकार रोग निदान और चिकित्साये सुझाई गई 
हैं। दमा रोग मे सुधार हेतु यौगिक उपाय भी बताये जाते है, किन्तु 
समुचित अधिकृत अध्ययनो की कमी थी। डॉ सिह ने इस दिशा मे 
पिक सिटी लग एक्सरसाइजर नामक यत्र का सन्‌ 4986 ई मे 
आविष्कार कर इस कमी को दूर किया है। इस यत्र के विषय मे दैनिक 
नवज्योति, जयपुर मे 23 सितम्बर, 986 ई को समाचार प्रकाशित 
हुआ था। पिक सिटी लग एक्सरसाइजर यत्र हमारे देश के प्राचीन विज्ञान 
योग के शीतली प्राणायाम के सिद्धान्त पर आधारित है। इसको प्रयोग 
मे लाने से दमे तथा धूम्रपान से होने वाली सॉस की बीमारी के मरीजों 
के फेफडो की क्षमता बढाई जा सकती है। पिक सिटी लग एक्सरसाइजर 
एक ऐसा यत्र है जिसके द्वारा प्रयोग करने वाला प्राणायाम की विधि 
से सॉस लेता और सीखता है। इस यत्र द्वारा सॉस निकालने की प्रक्रिया 
मे लगने वाला समय सॉँंस अन्दर लेने मे लगने वाले समय से ठीक 
दुगुना होता है। पिक सिटी लग एक्सरसाइजर नामक यह यत्र राजस्थान 
इजीनियरिंग वर्क्स के केवल परनामी एवं इजीनियरिंग कॉलेज के 
मैकेनिकल विभाग के इजीनियर ए पी एस राठौड की मदद से बन 
सका है। 


पिक सिटी लग एक्सरसाइजर के प्रयोग से न केवल सॉस लेने मे आम आने 
वाली मॉसपेशियो की क्षमता बढती है बल्कि श्वसन प्रक्रिया भी नियमित हो जाती 
है जिससे रोगी को आराम मिलता है और धीरे-धीरे उसकी सॉस की तकलीफ कम 
होने लगती है। दमे के उन रोगियो जिनमे सॉस की तकलीफ देर रात या प्रात होती 
है द्वारा यदि इस यत्र को काम मे लिया जाये तो उन्हे बलगम निकालने मे सुविधा 
होगी जिससे रोगी पुन सॉस लेने की स्वस्थ प्रक्रिया की तरफ अग्रसित हो सकेगा। 


एक स्वस्थ व्यक्ति भी फेफडो को मजबूत एवं सदैव स्वस्थ बनाये रखने हेतु 
इस यत्र को पयोग मे ले सकता है। इस यत्र को नित्य काम मे लेने से उसके पूरे 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 33 


श्वसन तत्र की एक व्यवम्थित कसरत हो जावेगी, प्राणायाम से होने वाले सभी लाभो 
से भी लाभाविन्त होगा। भविष्य हेतु उसके फेफडे स्वस्थ रहते हुए किसी भी सॉस 
की बीमारी को नाकाम करने हेतु सदैव तैयार रहेगे। 

इस यत्र की सफलता इसकी तकनीक एव सिद्धान्त के अतिरिक्त आम आदमी 
तक इसकी पहुँच हो सके, इसका आविष्कार करते समय इस बात का खास ध्यान 
रखा गया है कि एक साधारण से साधारण व्यक्ति भी इस यत्र को खरीद सके। 
व्यावसायिक उत्पादन करने पर इस यत्र की लागत 0-१5 रुपये आती है। 

इस यत्र की सहायता से प्राणायाम की प्रभावशीलता का अध्ययन नौटिघम, 
इग्लैड के दमा रोगियो पर अध्ययन-प्रायोजना के अन्तर्गत किया गया था। इस अध्ययन 
मे रोगियो के दमा रोग मे लाभप्रद प्रभाव विशेष रूप से देखा गया था। १5 जुलाइ, 
4990 ई को 'सन्‍्डे एक्सप्रेस (इग्लैंड)' मे श्री लायने ग्रीनवुड ने इस प्रकार सूचना 
प्रकाशित कराई थी, '“'नौटिघम सिटी चिकित्सालय मे परीक्षण की जा रही भारत की 
एक सरल श्वसन विधि अनेक दमा पीडितो को बिना औषधियो के लिए जीवनदारी 
हो सकती है।'' 

35 वर्षीया शोध वैज्ञानिक क्रिस्टाइन पोर्टर ब्रिटेन मे बीस लाख से अधिक 
दमा रोगियो मे से एक है। 

हजारो अन्य रोगियो की भाँति वह सामान्यतया श्वासहीनता, खॉसी और घरघर 
सॉँस लेने के लक्षणो को नियत्रित करने के लिए प्रस्तावित श्वसन-यत्र का उपयोग 
करती है। 

किन्तु उन्होने चिकित्सालय मे योग मे प्रयुक्त की जाने वाली धीमी, गहरी 
श्वास वाले व्यायामो का अभ्यास कराने वाले परीक्षणो मे भाग लिया और यह पाया 
कि उनके लक्षण मे बहुत कमा हुई। 

वह उन 8 कोमल पीडितो मे से एक थी जो सिटी चिकित्सालय की श्वसन 
भेषज विज्ञान इकाई द्वारा आयोजित पाच-सप्ताह के परीक्षण कार्यक्रम मे भाग लेने 
के लिए सहमत हुई थीं। 

ब्रिटेन मे अपनी किस्म का पहला यह परीक्षण भारत मे जयपुर से एक वर्ष 
की फैलोशिप पर नौटिघम आने वाले डॉ वीरेन्द्र सिह ने सुझाया था, जहाँ दमा के 
इलाज मे यौगिक श्वसन को सहायक होने मे विश्वास किया जाता है। 

उन्होने एक साल उपाय बतलाया जो इसके प्रयांग करने वालो को मन्द श्वसन 
तथा प्राणायाम योग श्वसन व्यायाम के समकक्ष 4 2 अनुपात मे श्वास के अन्दर 
लेने और बाहर निकालने के लिए बाध्य करता है। 


832 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


प्रमुख राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जर्नलो मे प्रकाशित हुए है। भारत और 
विदेशों के सैकडो चिकित्सको ने इस यत्र की सराहना की है। 

2 पिक सिटी लग एक्सरसाइजर-दमा (अस्थमा) बहुत पुराना 
(चिरकालिक) श्वास रोग होता है। दमा के रोगी को दीर्घकाल तक 
और कभी-कभी जीवन पर्यन्त औषधियो का सेवन करना पडता है। 
औषधियो के मूल्य (खर्च) और उनके दुष्प्रभावों को ध्यान मे रखकर 
औषधिविहीन विभिन्‍न प्रकार रोग निदान और चिकित्साये सुझाई गई 
हैं। दमा रोग मे सुधार हेतु यौगिक उपाय भी बताये जाते है, किन्तु 
समुचित अधिकृत अध्ययनों की कमी थी। डॉ सिह ने इस दिशा मे 
पिक सिटी लग एक्सरसाइजर नामक यत्र का सन्‌ 986 ई मे 
आविष्कार कर इस कमी को दूर किया है। इस यत्र के विषय मे दैनिक 
नवज्योति, जयपुर मे 23 सितम्बर, 986 ई को समाचार प्रकाशित 
हुआ था। पिक सिटी लग एक्सरसाइजर यत्र हमारे देश के प्राचीन विज्ञान 
योग के शीतली प्राणायाम के सिद्धान्त पर आधारित है। इसको प्रयोग 
मे लाने से दमे तथा धूम्रपान से होने वाली सॉस की बीमारी के मरीजों 
के फेफडो की क्षमता बढाई जा सकती है । पिक सिटी लग एक्सरसाइजर 
एक ऐसा यत्र है जिसके द्वारा प्रयोग करने वाला प्राणायाम की विधि 
से सॉस लेता और सीखता है। इस यत्र द्वारा सॉस निकालने की प्रक्रिया 
मे लगने वाला समय सॉस अन्दर लेने मे लगने वाले समय से ठीक 
दुगुना होता है। पिक सिटी लग एक्सरसाइजर नामक यह यत्र राजस्थान 
इजीनियरिंग वर्क्स के केवल परनामी एव इजीनियरिंग कॉलेज के 
मैकेनिकल विभाग के इजीनियर ए पी एस राठौड की मदद से बन 
सका है। 


पिक सिटी लग एक्सरसाइजर के प्रयोग से न केवल सॉँस लेने मे आम आने 
वाली मॉसपेशियो की क्षमता बढती है बल्कि श्वसन प्रक्रिया भी नियमित हो जाती 
है जिससे रोगी को आराम मिलता है और धीरे-धीरे उसकी सॉस की तकलीफ कम 
होने लगती है। दमे के उन रोगियो जिनमे सॉस की तकलीफ देर रात या प्रात होती 
है द्वारा यदि इस यत्र को काम मे लिया जाये तो उन्हे बलगम निकालने मे सुविधा 
होगी जिससे रोगी पुन सॉँस लेने की स्वस्थ प्रक्रिया की तरफ अग्रसित हो सकेगा। 


एक स्वस्थ व्यक्ति भी फेफडो को मजबूत एवं सदैव स्वस्थ बनाये रखने हेतु 
इस यत्र को पयोग मे ले सकता है। इस यत्र को नित्य काम मे लेने से उसके पूरे 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक का 


श्वसन तत्र की एक व्यवम्थित कसरत हो जावेगी प्राणायाम से होन वाले सभी लाभो 
से भी लाभाठिन्त होगा। भविष्य हेतु उसके फेफडे स्वस्थ रहते हुए किसी भी सॉस 
की बीमारी को नाकाम करने हेतु सदैव तैयार रहेगे। 

इस यत्र की सफलता इसकी तकनीक एव सिद्धान्त के अतिरिक्त आम आदमी 
तक इसकी पहुँच हो सके, इसका आविष्कार करते समय इस बात का खास ध्यान 
रखा गया हैं कि एक साधारण से साधारण व्यक्ति भी इस यत्र को खरीद सके। 
व्यावसायिक उत्पादन करने पर इस यत्र की लागत 0-5 रुपये आती है। 

इस यत्र की सहायता से प्राणायाम की प्रभावशीलता का अध्ययन नौटिघम, 
इग्लैड के दमा रोगियों पर अध्ययन-प्रायोजना के अन्तर्गत किया गया था। इस अध्ययन 
मे रोगियो के दमा रोग मे लाभप्रद प्रभाव विशेष रूप से देखा गया था। 5 जुलाई, 
4990 ई को 'सन्डे एक्सप्रेस (इग्लैंड)' मे श्री लायने ग्रीनवुड ने इस प्रकार सूचना 
प्रकाशित कराई थी, ''नौटिघम सिटी चिकित्सालय मे परीक्षण की जा रही भारत की 
एक सरल श्वसन विधि अनेक दमा पीडितो को बिना औषधियो के लिए जीवनदारी 
हो सकती है।'' 

35 वर्षीया शोध वैज्ञानिक क्रिस्टाइन पोर्टर ब्रिटेन मे बीस लाख से अधिक 
दमा रोगियो मे से एक है। 

हजारो अन्य रोगियो की भाँति वह सामान्यतया श्वासहीनता, खाँसी और घरघर 
सॉँस लेने के लक्षणो को नियत्रित करने के लिए प्रस्तावित श्वसन-यत्र का उपयोग 
करती हैं। 

किन्तु उन्होने चिकित्सालय मे योग मे प्रयुक्त की जाने वाली धीमी, गहरी 
श्वास वाले व्यायामो का अभ्यास कराने वाले परीक्षणो मे भाग लिया और यह पाया 
कि उनके लक्षण मे बहुत कमा हुई। 

वह उन 8 कोमल पीडितो मे से एक थी जो सिटी चिकित्सालय की श्वसन 
भेषज विज्ञान इकाई द्वारा आयोजित पाच-सप्ताह के परीक्षण कार्यक्रम मे भाग लेने 
के लिए सहमत हुई थीं। 

ब्रिटेन मे अपनी किस्म का पहला यह परीक्षण भारत मे जयपुर से एक वष 
की फैलोशिप पर नौटिघम आने वाले डॉ वीरेन्द्र सिह ने सुझाया था, जहाँ दमा के 
इलाज मे यौगिक श्वसन को सहायक होने मे विश्वास किया जाता है। 

उन्होने एक साल उपाय बतलाया जो इसके प्रयोग करने वालो को मन्द श्वसन 
तथा प्राणायाम योग श्वसन व्यायाम के समकक्ष 4 2 अनुपात मे श्वास के अन्दर 
लेने और बाहर निकालने के लिए बाध्य करता है। 


| 34 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


पिक सिटी लग एक्सरसाइजर (पिक सिटी का तात्पर्य जयपुर) एक मुँह मे 
लगाने वाला यत्र है जो एक डिस्क से जुडा होता है जिसमे छिद्र होते है जो एक- 
मार्गीय वाल्व धारण करते है। वाल्व को अन्दर और बाहर की सॉस के सहां अनुपात 
एवं मन्द श्वसन को नियत्रित करने के लिए लगाया जाता है। 


चिकित्सालय मे प्रशिक्षण सत्र के उपरान्त 9 और 54 वर्ष के मध्य आयु 
के सभी धूम्रपान न करने वाले स्वय सेवको को शान्तिपूर्वक बेठने और अपनी श्वास 
को एकाग्र करने के लिए कहा गया जबकि वे घर पर प्रतिदिन दो बार 5 मिनट 
तक एक्सरसाइजर का उपयोग करते थे। 


वे एक से पॉच तक एक पैमाने पर दिन और रात के घरघराहटपूर्ण श्वास, 
खॉसी और वक्ष की कटोरता की तीव्रता को एक डायरी चार्ट पर अकित करते थे। 


आठ वर्ष से दमा से पीडित 32 वर्षीया नर्स गिलिअन ने एक्सरसाइजर को 
उपयोग के लिए सरल पाया जब वह पहले सोकर उठीं और पुन रात को सोते समय | 


क्रिस्टाइन और गिलिअन दोनो का कहना है कि यद्यपि श्वसन यत्र की सहायता 
से अपने लक्षणो से आसानी से मुक्ति हो जाती है, वे इसका प्रयोग न करना अधिक 
पसन्द करती है।'' 


श्वसन विज्ञान के व्याख्याता डॉ जॉन ब्रिटन का कहना था, “जहाँ तक हमे 
ज्ञात है यह पाश्चात्य जगत्‌ मे अपनी किस्म का पहला परीक्षण है। यह प्रेरणादायक 
है, क्योकि परीक्षण यह प्रदर्शित करता है कि आप औषधियो का प्रयोग किये बिना 
दमा मे थोडा-सा भी सुधार कर सकते हैं। 


रियाद, जेद्दा, धहरान और काहिरा से एक साथ प्रकाशित हांने वाले सऊदी 
अरब के अग्रेजी भाषा के प्रथम दैनिक अखबार “अरब न्यूज” मे “योग श्वसन 
प्रविधियों'' शीर्षक के अन्तर्गत जेफ्री ए फिशर एमडी ने लिखा था “वास्तव मे 
शरीर के बढ़े हुए मानसिक और शारीरिक नियत्रण द्वारा योग का उद्देश्य एक सार्वभाम 
सत्ता के साथ आत्मा का मिलन है। योग को आठ चरणो मे सिखाया जाता है, जिनमे 
से एक प्राणायाम स्पष्टतया श्वसन नियत्रण से सम्बन्धित है। चूँकि यह शरीर क्रिया 
विज्ञान के इस पहलू मे सन्निहित है प्राणायाम को बिना औषधियां के कभी -कभी 
कठिन स्थिति मे दमा रोग क नियत्रण व्यवस्था मे सहायक माना जाता है। प्राणायाम 
के चार उद्देश्य है श्वसन आवृत्ति मे चरणबद्धता की कमो, प्रश्वसन और नि श्वसन 
काल मे 4 2 अनुपात प्राप्त करना प्रश्वसन के अन्त म॑ देर तक साँस रोके रहना 
जो सास मे नि श्वसन और मानसिक एकाग्रता के दुगुने समय तक रहता है। इन चार 
प्रविधियों के मेल को ही अस्थमा मे सुधार का श्रेय दिया जाता है. अस्थमा पर योग 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक [35 


के प्रभाव के मूल्यॉकन हेतु ऐसा अध्ययन करना कठिन होता है। तथापि ऐसा यत्र 
बनाया गया है, जो ऐसा अध्ययन सम्भव बनाता है जिसका रगीन नाम पिक सिटी 
लग एक्सरसाइजर है (पहले मेने सोचा कि पिक शब्द स्वस्थ फेफडो के लिए प्रयोग 
किया गया है, किन्तु पिक सिटी भारत के जयपुर शहर का प्रतिनिधित्व करता हे), 
यह यत्र श्वसन और पूर्व वर्णित प्राणायाम श्वसन विधियों के समकक्ष काल ॥ 

2 प्रश्वसन नि श्वसन का प्रदर्शन स्पष्ट करता है। इसमे अनेक छिद्र होते हैं जो गुजरने 
वाली वायु की मात्रा को बदलते रहते हैं। प्लेस-बो यत्र मे पूर्णतया ऐसा ही छिद्र 
होता है। 


अध्ययन हेतु 22 धूम्रपान न करने वाले मन्द अस्थमा वाले सम्भागियो का 
सम्मिलित किया गया था। उनकी आधाररेखा श्वसन गतियो को निर्धारित करके उन्हे 
(रोगियो को) पिक सिटी श्वसन यत्र अथवा प्लेस-बो यत्र का प्रयोग एक दिन मे 
दो बार पन्द्रह मिनट तक का सुझाव दिया गया था। दो सप्ताह के अन्त म॑ रोगियों 
की पुन जाँच की गई थी। प्लेस बो की तुलना मे पिक सिटी लग एक्सरसाइजर 
के ग्रयोग से सभी मे अधिक सुधार आया।. इस अध्ययन क परिणामा का तात्पर्य 
है कि अस्थमा के लिए एक नया औषधिविहीन अस्त्र हो सकतः है। सुधार का परिणाम 
किसी के लिए औषधियो से पूर्णतया मुक्त होना नहीं हो सकता, किन्तु इसका तात्पय 
औषधि की मात्रा या खुराक मे कमी हो सकता है।'” भारतीय चेस्ट सोसायटी के 
प्रवक्‍ता श्री सुरेश कूलवाल के अनुसार पिक सिटी एक्सरसाइजर का प्रयोग श्वसन 
तत्र के अगो की मॉसपेशियो की क्षमता को बढाता है, किन्तु श्वसन तत्र भी नियमित 
हो जाता है और रोगी को राहत मिलती है तथा धीरे-धीरे बह प्रश्वसन मे कम कठिनाई 
अनुभव करता है। 


मई, 4990 ई मे इसे बोस्टन मे वर्ल्ड लग काफ्रेन्स मे प्रस्तुत किया गया था। 
इसे पमुख चिकित्सा जर्नल, दि लेन्सेट, 4990 मे प्रकाशित किया गया था। इलेक्ट्रॉनिक 
आर प्रिन्ट मोडिया ने इसे व्यापक रूप से स्थान दिया था। विश्व साहित्य मे यह 
योग का प्रथ्म अधिकृत अध्ययन था। प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय फुफ्फुस विशेषज्ञ प्रोफेसर 
धॉमस पेट्टी ने पिक सिटा फ्लोमीटर और पिक सिटी लग एक्सरसाइजर की श्रेष्ठता 
सयुकत राज्य अमेरिका मे उपलब्ध अन्य यत्रो से अधिक स्वीकार की। 

3 नेसल साइकिल की व्याख्या-यद्यपि नेसल साइकिल के अस्तित्व 
से भारत के प्राचीन योगी परिचित थे चिकित्सा जगत के लिए यह 
तथ्य कम ही ज्ञात था। एक तत्रिक! परावतन का सुझाव दिया गया 
ओर वैकल्पिक नथुनां की चक्रीय क्षमता के पदाथ की व्याख्या हेतु 


]36 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


अध्ययन किया गया। यह अध्ययन शरीर क्रिया विज्ञान के प्रमुख 
जर्नलो-जर्नल ऑफ एप्लाइड फिजिओलॉजी, 4987 ई मे प्रकाशित 
किया गया था। तदुपरानत आलेख का विवरण ईयर बुक ऑफ पलमोनरी 
डिजीज, 988, पृष्ठ 34 पर छपा। इस प्रतिष्ठित ईयर बुक म॑ छपने 
वाला भारत से यह एकमात्र आलेख था। 

दमा और गैस्ट्रोएसो फेमीअले रिफ्लक्स (जी ई आर ) का मेल-- 
जी ई आर के लक्षण दमा रोगियो मे होना पाया जाना एक आम धारणा 
है।जी ई आर और दमा के मेल से सम्बन्धित अध्ययन आलेख प्रतिष्ठित 
जर्नल-जर्नल ऑफ अस्थमा, 4983 ई मे प्रकाशित हुआ था। जर्नल 
के सम्पादकीय मे प्रशसात्मक टिप्पणी के साथ वर्णित यह एकमात्र 
आलेख था। 


पिक सिटी सेग्रीगेशन चैम्बर। 


कुजल और नेति जैसे यौगिक उपायो के प्रभावो का अधययन भी दमा 
रोगियो पर किया गया था। कुजल के प्रभाव से सम्बन्धित आलेख जर्नल 
ऑफ अस्थमा मे प्रकाशित हुआ था। 


डॉ वीरेन्द्रसिह ने एक विधि का विकास किया है और उसे पेटेन्ट करा 
लिया है जो स्पिरोमीटर ($9॥०॥०७०) के साथ प्रयोग किये जाने पर 
एक रोगी से दूसरे रोगी तक जीवाणुओ के सक्रमण को फैलने से रोकने 
मे सहायता करती है। स्पिरोमीटर ($90०॥7००) एक यत्र है जिसका 
प्रयोग चिकित्सक फेफडो की जॉच करने के लिए करते है। 


मीडिया द्वारा स्थान 


इलैक्टॉनिक मीडिया--निम्नलिखित इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने उनके आविष्कारों 
और शोध कार्य के विषय मे सूचनाओ को स्थान दिया-- 


(१) 
(2) 
(3) 
(4) 
(5) 


20 जनवरी, 990 ई को बी बी सी रेडियो प्रसारण, लन्दन। 
एबीसी रेडियो रिकार्डिग, और 

वायस ऑफ अमेरिका 2 मई १990, न्यूयार्क। 

दूरदर्शन राष्ट्रीय समाचार प्रसारण 845 रात्रि, & जनवरी 499॥। 


जयपुर दूरदर्शन से तीन टेलिविजन प्रसारण और जयपुर रेडियो केन्द्र 
से पाँच प्रसारण। 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 37 


प्रिन्ट मीडिया--00 से अधिक समाचार-पत्र विश्व भर मे उनके आविष्कारो 
और अनुसन्धान के विषय मे सन्‌ 983 ई से समाचार प्रकाशित कर रहे हैं। उनमे 
से कुछ प्रमुख समाचार-पत्रो के नाम हैं दि सन्‍्डे एक्सप्रेस, दि इन्डिपेन्डेट ऑफ 
इग्लैंड, सऊदी अरब का दि अरब न्यूज, जर्मनी का दि मेडिकल ट्रिब्यून। 

लगभग एक दर्जन पत्रिकाओ ने उनके आविष्कारों से सम्बन्धित फीचस 
प्रकाशित किये हैं। उनमे से कुछ के नाम हैं-- धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दि सन्‍्डे 
मेल, दि ट्रेजर, कादम्बनी, काला कान्डू (तमिल) आदि। 

सदस्यता--डॉ वीरेन्द्र सिह एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन्स ऑफ इण्डिया, 
इण्डियन चेस्ट सोसायटी, इण्डियन अस्थमा केयर सोसायटी ओर इण्डियन मंडिकल 
एसोसिएशन के सदस्य है। वर्तमान मे वह इण्डियन अस्थमा केयर सोसायटी के 
सचिव है। 


समाज की चिकित्सा सेवा--उन्होने रोगो के विषय मे जन-जागृति हेतु 
साहित्य प्रकाशित किया है। वह सन्‌ 985 ई से इण्डियन अस्थमा केयर सोसायटी 
के सचिव हैं| वह लायन्स प्रदूषण नियत्रण जिले के अध्यक्ष है। उन्होने लायन्स क्लब 
और इण्डियन एसोसिएशन चेस्ट सोसायटी के माध्यम से तम्बाकू के विरुद्ध सघर्ष 
शुरू किया है। उन्होने राजस्थान की गन्दी की बस्तियो और ग्रामीण क्षेत्रो मे चिकित्सा 
शिविरों का आयोजन किया है। 
छात्र जीवन सस्मरणो से--सन्‌ 974 ई मे वह कॉलेज की पैथोलॉजी 
एसोसिएशन के उपाध्यक्ष रहे। वर्ष 497-75 मे उन्होने कॉलेज प्रतियोगिताओ मे 
बैडमिन्टन के पाँच पदक जीते थे। सन्‌ 976 ई मे उन्होने अन्त चिकित्सा टेबिल 
टेनिस मे चिकित्सा महाविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया था। सन्‌ 4974 ई में वह 
कॉलेज पत्रिका के सम्पादक मण्डल के सदस्य रहे। सन्‌ 979 ई मे वह जयपुर 
रेजीडेट डॉक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष थे। 
्। 


डॉ ए. के ग्रोवर 
(१955 ई ) 


जन्म एव वश परिचय--स्वर्गीय श्री ईश्वरदास ग्रोवर एवं श्रीमती सन्तोष के 
सुपुत्र डॉ अशोक कुमार ग्रोवर का जन्म 30 अक्टूबर, 955 ई को भारत के विशाल 
राज्य उत्तरप्रदेश के विश्वविख्यात ऐतिहासिक नगर आगरा मे हुआ था। उनका 
बाल्यकाल आगरा (955-57 ई ), बाराबकी (उत्तरप्रदेश) (957-62 ई), 
वाराणसी (उत्तरप्रदेश) (962-64 ई ), अमृतसर (पंजाब) (१964-68 ई), 
मुरादाबाद (उत्तरप्रदेश) (968-70 ई ), अमृतसर (970-7 ई ) और चडीगढ 
में व्यतीत हुआ था। उनकी जीवन-सगिनी श्रीमती पूनम ग्रोवर बी ए, एल एल बी 
हैं। उनके 985 ई मे जन्मा श्री अपूर्व एव सन्‌ 988 ई मे जन्मा श्री तुशार नामक 
दो पुत्र है। 

शिक्षा-दीक्षा--वर्ष 962-64 ई मे डॉ ग्रोवर कक्षा तीन और चार मे सेट 
मेरी स्कूल, बनारस (यूपी ) के छात्र रहे। वर्ष १964-68 ई मे वह कक्षा 5 से 
8 तक श्री हरी राम आश्रम स्कूल, अमृतसर मे अध्ययनरत रहे। वर्ष 968-70 ई 
मे वह कक्षा 9 तथा १0 मे पार्कर इन्टर कॉलेज, मुरादाबाद मे पढते रहे। वर्ष 970- 
7 ई मे उन्होने डीए वी कॉलेज, अमृतसर के छात्र के रूप मे प्री यूनिवर्सिटी परीक्षा 
उत्तीर्ण की। उन्होने डी ए वी कॉलेज, चडीगढ से चिकित्सा प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की | 
वर्ष 972-76 ई मे मौलाना आजाद चिकित्सा महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय 
के छात्र के रूप मे उन्होने एम बी बी एस की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 978-80 ई 
मे वह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान सस्थान, नइ दिल्‍ली के छात्र रहे तथा उन्हे सन्‌ 
980 ई मे एमडी (नेत्र विज्ञान) की उपाधि प्रदान की गई। सन्‌ 982 ई मे उन्होने 
राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञा अकादमी से एम एन ए एम एस की उपाधि प्राप्त की। 

व्यवसाय के क्षेत्र मे--डॉ ग्रोवर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान सस्थान, नई 
दिल्‍ली मे जनवरी, 4978 ई से 3 दिसम्बर, 4980 ई तक कनिष्ठ रेजीडेट डॉक्टर 
तथा जनवरी, 98 ई से 3१ दिसम्बर, 983 ई तक वरिष्ठ रेजीडेट डॉक्टर रहे। 
वह गुरुनानक नेत्र कन्द्र, मौलाना आजाद चिकित्सा महाविद्यालय नई दिल्ली मे ॥3 
अगस्त, 984 ई से 23 अगस्त, 987 ई तक सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत 


भारत के चिकित्मा वेज्ञानिक ]39 


रहे तथा 24 अगस्त 3987 इ से एसोसिएट प्रोफेसर क पद क दायित्व का निवहन 
कर रहे है। 
पता--उनका वर्तमान कार्यालयीय पता इस प्रकार है-- 
डॉ अशोक कुमार ग्रोवर, 
एसोसिएट प्रोफेसर नेत्र विज्ञान, 
प्रभारो ओकूलोप्लास्टिक, ओर्बिटल एवं 
लेक्रीमल शल्य क्रिया चिकित्सालय, गुरुनानक नेत्र केन्द्र, 
मौलाना आजाद चिकित्सा महाविद्यालय, नई दिल्‍ली-0002, भारत 
उनका आवासीय पता अधोलिखित है-- 
2 डी, माता सुन्दरी गली, 
माता सुन्दरी महाविद्यालय के सामने 
नई दिलली-40002, भारत 
सदस्यता और फैलोशिप--डॉ ग्रोवर ऑल इण्डिया अप्थिलमोलोजिकल 
सोसायटी, देहली आप्थलमोलीजिकल सोसायटी, इण्डो-जापान अष्यिलमीलॉजिकलन 
फाउन्डेशन, ओकूलोप्लास्टिक एसोसिएशन ऑफ इण्डिया, इण्डियन मेडिकल 
एसोसिएशन, देहली मेडिकल एसोसिएशन तथा राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान अकादमी के 
सदस्य॒हैं। 
उन्हे जून, 986 ई मे चिकित्सा अनुसन्धान फाउन्डेशन, मद्रास, जुलाइ 
3986 इ में अरविन्द नेत्र चिकित्सालय, मदुरै, जून से सितम्बर, 988 ई तक नेत्र 
विज्ञान सस्थान, किरयू, जापान, तथा अगस्त, 988 ई मे निशि नेत्र चिकित्सालय, 
ओसाका, जापान की फैलोशिप प्राप्त हुई थी। 


अनुसन्धान के क्षेत्र--उनकी विशिष्ट अनुसन्धान अभिरुचि ओकृप्लास्टिक 
चिकित्सा केन्द्र, गुरुनानक नेत्र केन्द्र, मौलाना आजाद चिकित्सा महाविद्यालय, नइ 
दिल्‍ली के प्रभारी के रूप मे ओकृप्लास्टिक, ओर्बिटल और लैक्रीमल शल्य क्रिया 
मे तथा इन्ट्रा ओकूलर लैंस प्रत्यारोपण शल्य क्रिया मे है। 

प्रकाशन--डॉ ग्रोवर अब तक लगभग 50 शोध-पत्र राष्ट्रीय/अन्तराष्ट्राय 
सम्मेलनो मे प्रस्तुत तथा प्रकाशित कर चुके हैं। 

सम्मान एवं पुरस्कार--डॉ ग्रोवर को शल्य क्रिया के क्षेत्र मे लेफ्टीनीट जनरल 
डी आर थापर स्वर्ण पदक प्रदान किया गया था। ऑल इण्डिया साप्यथिलमोलॉजिकल 
सांसायटी ने उन्हे सन 986 ई मे ऐथिकोन फेलाशिप प्रदान की थी। इण्डो -जापानीज 


40 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


ऑप्थलमोलॉजिकल फाउन्डेशन ने उन्हे सन्‌ 988 ई मे तीन माह के लिए फैलोशिप 
प्रदान की थी । वह अफ्रो-एशियन जर्नल ऑफ ऑप्थलमोलॉजी के एसोसिएट सम्पादक 
है। वह भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ मे नेत्र विज्ञान परामर्शद है। वह सेट 
जोन्स चिकित्सा सहायता कोर (भारतीय रेड क्रॉस) के कोर सर्जन हैं। 


सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रमों मे सहभागिता/परिसवादो का 
आयोजन“»अध्यक्षता--डॉ ग्रोवर सन्‌ 986 ई मे गुरुनानक केन्द्र, नई दिल्ली मे 
अन्त चश्षु सम्बन्धी लैस प्रत्यारोपण ([608 0८एाः !,०05 प्रा0]87/800) कार्यशाला 
के आयोजना सचिव थे। सन्‌ 987 ई मे उन्होने ओकूलोप्लास्टिक्स, अश्रु सम्बन्धी 
(लेक्रीमल) तथा प्रशिक्षका (070॥4]) शल्य क्रिया पर कार्यशाला के सगठन सचिव 
का दायित्व गुरुनानक नेत्र केन्द्र, नई दिल्‍ली मे सम्पादित किया था। सन्‌ 989 ई 
मे वह गुरुनानक नेत्र केन्द्र, नई दिल्‍ली मे अन्त चश्षु सम्बन्धी लैस प्रत्यारोपण तथा 
रेडियल केरेटोटोमी पर कार्यशाला के सहसयोजक रहे | सन्‌ 989 ई मे राष्ट्रीय अन्धता 
पर रोकथाम सोसायटी, नई दिल्ली द्वारा औद्योगिक अन्धता पर आयोजित परिसवाद 
के सयोजक वह थे। सन्‌ 989 ई मे वह ऑल इण्डिया आप्यथलमोलॉजिकल सोसायटी 
द्वारा अन्त चश्लु सम्बन्धी लैसो पर आयोजित राष्ट्रीय परिसवाद मे अन्त चक्षु सम्बन्धी 
लैस प्रत्यायोायण और दिल्‍ली ऑप्थलमोलॉजिकल सोसायटी की वार्षिक सभा के 'नेत्र 
विज्ञान मे कल्पना! पर परिसवाद के सह-अध्यक्ष थे। वह जनवरी, 990 ई मे ऑल 
इण्डिया जप्थलमीलॉजिरल सोसायटी द्वारा अपने 48वे वार्षिक सम्मेलन, अहमदाबाद 
के अवसर पर ' पलको की गिरावट व्यवस्था-टेसिस मेनेजमेट (20085 8 2श॥था॥।) ' 
पर शैक्षिक पाठ्यक्रम तथा ओकृूप्लास्टिकस सोसायटी द्वारा जनवरी, 3990 ई मे 
अहमदाबाद मे आयोजित ओकृूप्लास्टिकस पर परिसवाद के सयोजक थे। 
अभिरुचियॉ--डॉ ग्रोवर की अभिरुचि खेलकूद जैसे क्रिकेट, बैडमिन्टन और 
टेबिल-टेनिस और नाटक मे है तथा उन्होने इन प्रवृत्तियो मे कई पुरस्कार भी प्राप्त 
किये है। 
का 


डॉ. आर जी शर्मा 
(१956 ई ) 


जन्म एवं वश परिचय--डॉ राजगोविन्द शर्मा का जन्म भारत के राजस्थान 
राज्य को राजधानी जयपुर नगर मे 27 अक्टूबर, 956 इ को हुआ था। उनके पिता 
डॉ जी सी शर्मा एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय, जयपुर के प्रधानाचार्य एव 
प्रोफेसर शल्य चिकित्सा, एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय एवं चिकित्सालय, 
जयपुर के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी माताजी श्रीमती रुक्मिणी शर्मा एक समपित 
गृहिणी हैं। उनकी धर्मपत्ली श्रीमती सुनीता शर्मा भी गृहिणी है। उनके सुश्री चन्द्रिका 
शर्मा और सुश्री दीपाशी शर्मा नामक दो पुत्रियोँ हैं। 

शिक्षा-दीक्षा--डॉ शर्मा ने सेट जेवियर स्कूल, जयपुर क छात्र रहकर 
राजस्थान बोर्ड से हायर सैकण्ड़ी परीक्षा सन्‌ 972 ई मे प्रथम श्रेणी मे जीव विज्ञान 
विषय मे विशेष योग्यता सहित उत्तीर्ण की। सन्‌ 972 इ में जीव विज्ञान विषय 
मे विशेष योग्यता सहित सेट जेवियर स्कूल से अपनी हायर सैकण्ड्री शिक्षा सम्पूर्ण 
करने के उपरान्त वह राष्ट्रीय सुरक्षा अकादमी के लिए चयनित किये गये। तथापि 
उसके साथ-साथ उन्होने चिकित्सा प्रवेश परीक्षा मे भी सफलता अर्जित की और 
चिकित्सा क्षेत्र मे पदार्पण करने का निश्चय किया। उन्होने त्रिवर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम 
के प्रथम वर्ष की परीक्षा महाराजा कॉलेज, जयपुर से सन्‌ 974 ई मे उत्तीर्ण की। 
उहोने सभी परीक्षाये प्रथम प्रयास मे उत्तीर्ण की और एस एम एस चिकित्सा 
महाविद्यालय, जयपुर से वर्ष 979 ई मे एम बी बी एस अन्तिम वर्ष परीक्षा मे 
सर्वाधिक अक प्राप्त कर भेषज विज्ञान मे विश्वविद्यालय पुरस्कार के साथ-साथ स्वर्ण 
पदक भी प्राप्त किया। उन्होने एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय, जयपुर से सन्‌ 
984 ईं मे सामान्य शल्य चिकित्सा विषय मे एम एस परीक्षा उत्तीर्ण की। सन्‌ 987 
इ मे उन्होंने टाटा मेमोरियल चिकित्सालय, बम्बई से अबुर्द विज्ञान मे एम केम (शल्य 
चिकित्सा के समकक्ष) परीक्षा उत्तीर्ण की। 

व्यवसाय के क्षेत्र मे--सन्‌ 984 ई मे सामान्य शल्य चिकित्सा विषय मे 
एम एस परीक्षा उत्तीर्ण करके डॉ शर्मा राजस्थान राज्य सेवा मे चयनित किये गये 
और १984 ई मे राजस्थान के सवाईमाधोपुर जिले मे ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र 


[+< भ।रत का ।जाकएत। नजज्ञानक 


बौली मे सहायक चिकित्साधिकारी के पद पर नियुक्त किए गए। तदुपरान्त उसी वर्ष 
वह टाटा मेमोरियल चिकित्सालय, बम्बई मे कैसर शल्य चिकित्सा मे उच्च-विशेषज्ञता 
प्राप्त करने के लिए राष्ट्रव्यापी चयन मे सफल हुए। सन्‌ 987 ई मे शल्य चिकित्सकीय 
अर्बुद विज्ञान मे इस त्रिवर्षीय पाठ्यक्रम को पूरा करने पर उन्होने राजस्थान मे प्रथम 
योग्य अर्बुद विज्ञानी होने का विशिष्ट गौरव प्राप्त किया । उसी वर्ष उनका चयन राजस्थान 
लोक सेवा आयोग द्वारा शल्य चिकित्सा विषय के सहायक प्रोफेसर पद के लिए किया 
गया और वह डॉ एस एन चिकित्सा महाविद्यालय, जोधपुर मे पदस्थापित किये 
गये, जहाँ वह अगस्त, 99] ई तक कार्यरत रहे, जिसके पश्चात्‌ वह एस एम 
एस चिकित्सा महाविद्यालय, जयपुर मे पदस्थापित किये गये, जहाँ अभी तक कार्यरत 
है। यद्यपि उनकी इच्छा बम्बई मे ही रहने की थी, वह अपने राज्य राजस्थान लौट 
आए, क्योकि उन्होने अपने लोगो की सेवा करने का निश्चय किया जहाँ उनकी 
आवश्यकता सर्वाधिक थी। 
अपने वर्तमान पद शल्य चिकित्सा विषय के सहायक प्रोफेसर एव प्रभारी, 
कैसर पजीयन, बिडला कैसर केन्द्र, एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय के पद पर 
कार्यरत रहते हुए वह अध्यापन, अनुसन्धान, रोगियो की देखरेख, परिवार कल्याण 
और छात्र प्रवृत्ति मे सक्रिय रूप से सलग्न है। उनका प्रमुख कार्य अर्बुद विज्ञान स 
सम्बद्ध है और व्यापक पुनर्निर्माण कार्य के लिए योग्य आवश्यक प्रमुख शल्य 
चिकित्सकीय प्रक्रियाओ को सम्पादित कर रहे हैं। 
वर्तमान मे वह शल्य चिकित्सा विषय के सहायक प्रोफेसर, एस एम एस 
चिकित्सा महाविद्यालय और चिकित्सालय, जयपुर, शल्य चिकित्सीय अर्बुद विज्ञानी 
(कैंसर शल्य चिकित्सक) तथा प्रभारी कैंसर पजीयन, आर के बिडला कैसर केन्द्र, 
एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय, जयपुर और प्रभारी, अर्बृद (गिल्टी, गॉठ) 
चिकित्सालय और स्टोमा (मुँह की तरह का छिद्र) चिकित्सालय, आर के बिहला कैंसर 
केन्द्र एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय, जयपुर के पद को सुशोभित कर रहे हैं। 
पता--उनका वर्तमान कार्यालयी पता निम्न प्रकार है-- 
डॉ आर जी शर्मा, 
एम बी बी एस , एम एस (शल्य चिकित्सा), 
शल्य चिकित्सीय अर्बुद विज्ञान (बम्बई), 
शल्य चिकित्सकीय अर्बुद विज्ञानी, 
सामान्य परामर्शद एवं कैसर शल्य चिकित्सक, 
सहायक प्रोफेसर शल्य चिकित्सा एव प्रभारी , 
कैसर पजीयन, बिडला कैसर केन्द्र 


भाग्त के चिकित्सा वेज्ञानिक 843 


एस एम एस चिकित्सा महाविद्यालय एव चिकित्सालय 
जयपुर (राजस्थान)-302004, भारत 


उनका आवासीय पता इस प्रकार है-- 
47, उनियारा उद्यान 
जवाहर लाल नेहरू मार्ग, पुष्प पथ, 
जयपुर (राजस्थान)-302004, भारत 
अभिरुच्चियां--उनकी अभिरुवियों छायाचित्राकन, टेनिस और यात्रा करना है। 


सम्मान--डॉ शमा को सन्‌ 990 ई मे भारतीय सिर और गला अर्बुद विज्ञान 
परिषद्‌ ने मेमोरियल सस्‍लोन केटरिंग कैसर केन्द्र, न्यूयार्क, यू एस ए मे सिर ओर गला 
अर्बुद विज्ञान मे यात्रा फैलोशिप प्रदान की थी। वहाँ पर वह जनवरी, 99] ई तक 
ठहरे। सन्‌ 99] ई मे वह एम डी एन्‍्डरसन कैसर केन्द्र (सस्थान), हाउसटन, 
टेक्सास, यू एस ए द्वारा विजिटिग पर्यवेक्षक के पद पर भी आमत्रित किये गये थे। 
विगत मे वह अन्तर्राष्ट्रीय कैसर काग्रेस, 994 ई के लिए राष्ट्रीय सलाहकार मण्डल 
मे चयनित किये गए थे। उन्होने चिकित्सा महाविद्यालय, जोधपुर मे राजस्थान का 
प्रथम कैसर पजीयन केन्द्र स्थापित किया। वह नियमित रूप से कैंसर अनुसन्धान 
शिविरो, जागृति कार्यक्रमो, व्याख्यानो, रेडियो वार्ताओ, वीडियो प्रदर्शनो और कैंसर 
पर पोस्टर प्रर्दशनो का सचालन कर रहे हैं। स्थानीय भाषाओ मे उनके कई आलेख 
प्रमुख दैनिक समाचार-पत्रो मे प्रकाशित हुए हैं। पश्चिमी राजस्थान मे कैंसर पार्श्व 
दृश्य के अध्ययन हेतु उन्हे शोध अनुदान प्रदान किया गया है। यह महत्त्वपूर्ण यत्र 
इण्डियन जर्नल ऑफ कैंसर मे प्रकाशित हुआ है। दिसम्बर, 99 ई मे उन्होने मुँह 
के कैसर पर अन्तर्राष्ट्रीय काग्रेस मे राजस्थान राज्य का प्रतिनिधित्व किया और भारत 
के थार मरुस्थल क्षेत्र मे मुँह के कैंसर पर अपना अध्ययन शोध-पत्र के रूप में प्रस्तुत 
किया। अपने शोध-पत्र मे डॉ शर्मा ने बतलाया कि पश्चिमी राजस्थान मे गत पाँच 
वर्षो मे कैंसर के 2 हजार 62 नए रोगियो का पता चला है। इनमे 500 रोगी मुँह 
और गले के कैसर से पीडित है। उन्होने बताया कि मुँह व गले के कैसर का मुख्य 
कारण बीडी, सिगरेट, जर्दा, गुटका व पान मसाले का अत्यधिक सेवन रहा है। डॉ 
शर्मा ने बताया कि जब एक व्यक्ति तम्बाकू का नियमित सेवन करता है तो उसकी 
असमय मृत्यु की सम्भावना अधिक हो जाती है। तम्बाकू के सेवन से कैसर ही नही 
बल्कि हृदय रोग, मस्तिष्क का लकवा, श्वास रोग, क्षय रोग, निमोनिया व पेट मे 
अल्सर होने की भी प्रबल सम्भावना रहती है। 


प्रकाशन--उनके 40 से अधिक पत्र जर्नलो और सम्मेलनो मे प्रकाशित 
हुए है। 


।44 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


सदस्यता--डॉ शर्मा इण्डियन सोसायटी ऑफ ओनकोलॉजी इण्डियन 
सोसायटी ऑफ हैड एण्ड नैक ओनकोलॉजी और एसोसिएशन ऑफ सर्जन्स ऑफ 
इण्डिया के आजोवन सदस्य है। वह कैमोथिरेपी फाउन्डेशन, यू एस ए के सदस्य 
है। वह राजस्थान कैसर सोसायटी के सस्थापक सदस्य और सयुक्त सचिव है। वह 
इण्डियन एसोसिएशन ऑफ सर्जिकल ओनकोलॉजी, इण्डियन अस्थमा केयर सोसायटी 
की सलाहकार ममिति, इन्टरनेशनल कैसर काग्रेस, 994 ई के राष्ट्रीय सलाहकार 
मण्डल की सहायता समिति तथा भगवान महावीर कैसर चिकित्सालय और शोध केद्र 
के न्‍्यासमण्डल एवं तकनीकी समिति के सदस्य है। 


पुरस्कार--वर्ष 988-90 ई मे उन्हे जोधपुर मे चिकित्सा महाविद्यालय शोध 
अनुदान प्रदान किया गया था। वर्ष १99-93 ई मे उन्हे पुन जयपुर मे चिकित्सा 
महाविद्यालय शोध अनुदान प्रदान किया गया था। सन्‌ 990 ई मे उन्हे 
एम एस के सी सी , न्यूयार्क मे सिर और गला अर्बुद विज्ञान मे प्रशिक्षण हेतु दीवालीबेन 
मेहता चेरिटेबिल न्यास फैलोशिप प्रदान की गई थी। 

सम्मेलनो मे सहभागिता--डॉ शर्मा 5 से अधिक राष्ट्रीय और क्षषेत्रीय 
सम्मेलनो मे भाग ले चुके हैं। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने () फरवरी, 987 ई 
मे बम्बई मे उष्णकटिबन्धो मे शल्य चिकित्सा पर द्वितीय अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन, 
(2) जनवरी, 987 ई मे बम्बई मे बाल रोग विज्ञान सम्बन्धी अर्बुद विज्ञान पर 
एशियाई सेमीनार, (3) फरवरी, 988 ई मे बगलौर मे विकासशील देशो मे कैसर 
नियत्रण पर अन्तर्राष्ट्रीय समीनार, (4) दिसम्बर, 990 ई मे न्यूयार्क, यू एस ए मे मूत्र 
सम्बन्धी अर्बुद विज्ञान मे विकास पर ह्विट्मोर परिसवाद, (5) दिसम्बर, 99 ई मे 
नई दिल्ली मे मुँह के केसर पर द्वितीय अन्तर्राष्ट्रीय काग्रेस, और (6) फरवरी, 988 ई 
मे बगलौर मे कैंसर ग्रास नली (इस्गेफेगस) पर अन्तर्राष्ट्रीय सेमीनार मे भाग लिया। 


राजस्थान मे अर्बुद विज्ञान के विकास मे योगदान--डॉ शर्मा ने अर्बुद 
विज्ञान के विकास मे अधिक योग दिया है। उन्होने सन्‌ 987 ई मे जोधपुर राजस्थान 
का प्रथम पजीयन केन्द्र प्रारम्भ किया। सन्‌ 99 ई मे उन्होने एस एम एस चिकित्सा 
महाविद्यालय, जयपुर मे कैसर पजीयन का समारम्भ किया। उन्हाने बिडला कैंसर 
केन्द्र, जयपुर मे अर्बुद (गिल्टी, गॉठ) चिकित्सालय शुरू किया। उन्होने बिडला कैसर 
केन्द्र, जयपुर मे बृहृदात्र काटने (कोलोटोमी (१०।०॥07५) की देखरेख के लिए स्टोमा 
चिकित्सालय प्रारम्भ किया। उन्होने चिकित्सा महाविद्यालय मे अग-विशिष्ट के कैसर 
के स्वरूपो का परिचय कराया और राजस्थान मे राज्य कैसर नियत्रण मण्डल के निर्माण 
का सुझाव दिया। उन्होने पूर्वी और पश्चिमी राजस्थान मे कैसर की सख्याओ का 
सकलन किया स्नातकोत्तर दृश्य-श्रव्य कैसर शल्य चिकित्सा कार्यक्रमों का आयोजन 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 45 


किया और कैसर परिचायिका ओर चिकित्सा महाविद्यालय म अबुद विज्ञान म उत्तर 
प्रशिक्षण का भी सुझाव दिया। 


कैसर शिक्षा के क्षेत्र मे योग--डॉ शर्मा ने सन्‌ 992 इ मे राजस्थान कैंसर 
परिषद्‌ का निर्माण किया। वह नियमित रूप से कैंसर अनुसन्धान शिविरों का आयोजन 
कर रहे है। वह विभिन्‍न स्थानो पर कैसर के प्रति जागरूकता के लिए वीडियो प्रदर्शनों 
की व्यवस्था कर रहे हे। वह विद्यालये' मे सार्वजनिक शिक्षा पर व्याख्यान दे रहे 
है। उन्होने डॉ पी बी देसाई, डॉ एस एच अडवानी और डॉ अनिता बोर्जेस 
जैसे प्रख्यात व्यक्तियो की वाताओ का आयोजन किया। वह समाचार-पत्रो और 
पत्रिकाओं मे नियमित रूप से आलंख लिखते रहते है । उन्हाने परिचायिकाआ के लिए 
कैसर पर व्याख्यान दिये। उन्हाने पश्चिमी एव पूर्वी राजस्थातर मे कैसर की घटनाआ 
का सर्वप्रथम विधिवत अध्ययन किया। उन्होने जन-साधारण के लिए केसर पर साहित्य 
प्रकाशित किया है। 

उनका समपंण--राजस्थान, जैसे पिछडे राज्य मे एक योग्य अर्बुद विज्ञानी 
होने के कारण जहाँ कोइ विशिष्ट कैंसर केन्द्र नही है वह कैसर पीडितो की पीडा 
यथा सम्भव अधिकाधिक दूर कग्ना और कैंसर के प्रति जागरूकता और जागृति उत्पन्न 
करना अपता दायित्व अनुभव करते हैं। वह शल्य चिकित्सकीय अर्बुद विज्ञान को 
अपना कार्य क्षेत्र बनाने के लिए तत्पर है और अपने प्रशिक्षण का उपयोग कर राजस्थान 
मे अर्बुद विज्ञान को एक विशेष शाखा के रूप मे विकसित करने के इच्छुक हैं । 


पादयेतर प्रवृत्तिया--शैक्षिक कार्य के अलावा डॉ शर्मा ने कॉलेज मे छाया 
चित्राकन और अग्रेजी कहानी लेखन प्रतियोगिता मे पुरस्कार प्राप्त किये। वह 
एस एम एस महाविद्यालय, 4977, टेनिस महाविद्यालय, केप्टन, 969-7] ई मे 
एन सी सी (वायुयान शाखा) सार्जेन्ट और कम्प्यूटर कार्य दल, टी एम एच बम्बई 
के सदस्य रहे है। सन्‌ 973 ई मे उन्होने राष्ट्रीय प्रतिरक्षा अकादमी परीक्षा उत्तीण 
की। वह एस एम एस भित्ति पत्रिका, 976 के सम्पादक मण्डल के सदस्य रहे। वह 
नियमित रूप से चिकित्सा सम्बन्धी प्रकरणो पर रेडियो वार्ताये प्रस्तुत करते है। सन्‌ 
398] ई मे बाढ़ राहत कार्य एव राष्ट्रीय सेवा योजना शिविरों के लिए उन्हे प्रशसा 
प्रमाण-ण्त्र प्रदान किये गये। वह अखिल भारतीय अन्त चिकित्सकीय टूनामंट, 977, 
राष्ट्रीय हेपेटेबिलिअरी ओर पेन्क्रिएटिक सम्मेलन 992 तथा लप्रोस्कोपिक 
कोलिसाइस्टे क्टोमी, 4992 ई की आयोजन समिति के सदस्य थ। उन्हे लॉयन्स क्लब, 
जोधपुर, महावीर इन्टरनेशनल, जोधपुर तथा रोटरी क्लब (दक्षिण), जयपुर द्वारा 

आमत्रित एव अलकृत किया गया था। 
[] 


डॉ जयदीप डोगरा 
(958 ई ) 


जन्म एव बश परिचय--स्वर्गीय श्री योगेन्द्र पाल डोगरा एवं श्रीमती चन्दन 
प्रभा डोगरा के पुत्र डॉ जयदीप डोगरा का जन्म 3 अक्टूबर, 958 ई को बीकानेर 
(राजस्थान) में हुआ था। उनक पिना भूतपूर्व सेन्य अधिकारी थे और टिड्डी प्रतिरोधी 
सगठन के यातायात अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उनको माता राजकीय 
बालिका सीनियर हायर सैकण्ड्री स्कूल, बीकानेर मे व्याख्याता अग्रेजो के पद पर 
कार्यरत हैं। उनकी जीवन सहचरी डॉ नीलम एम डी (एनेस्थेसिया) है। उनके 
4989 ई में उत्पन्न श्री लुवदीव डोगरा नामक एक पुत्र है। डॉ डोगरा को एक सजग 
एवं कुशल चिकित्सक बना की प्रेरणा बचपन से ही अपनी माँ से प्राप्त हुई। 
शैक्षिक जीवन--उन्होन अपनी विद्यालयी शिक्षा केन्द्रीय विद्यालय, बोकानेर 
मे गहण की, जहाँ उन्हे बहुत बुद्धिमान एव नटखट मित्रो की सगति प्राप्त हुई। उन्हाने 
एम बी बी एस और 986 इ मे एमडी (सामान्य भेषज) उपाधियों प्राप्त की। 
व्यवसाय के क्षेत्र मे--सघ लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित डॉ डोगरा 
दिसम्बर, 987 ई से केन्द्रीय स्वास्थ्य सेवा के अन्तर्गत चिकित्सा अधिकारी के पद 
पर कार्यरत हैं। वर्ष 998०-87 ई मे वह काय चिकित्सा विभाग, एस पी आयुर्विज्ञान 
महाविद्यालय, बीकानेर मे चिकित्सा अधिकारी रहे। वर्तमान मे वह जयपुर मे केन्द्रीय 
स्वास्थ्य सेवा मे परामर्शद एवं वग्ष्ठि चिकित्सक के पद पर कार्यरत है। 
पता--उनका वर्तमान आवासीय पता इस प्रकार है-- 
डॉ जयदीप डोगरा, एमडी 
परामर्शद एवं वरिष्ठ चिकित्साधिकारी, 
'शिवशक्ति', सी-] महावोर माग, 
मालवीय नगर, जयपुर-30207, राजस्थान (भारत) 
महत्त्वपूर्ण उपलब्धियॉ--डॉ डोगग विगत 8 वर्षो से एक स्थानीय 
उष्णकटिबन्धीय रोग-त्वचा सम्बन्धी एक कोशिकीय परजीवीरोग अथवा पुराने पाव 
(कूटानियस लैइशमेनीअसिस सिनोनिम ऑरियन्टल सोर--(प्रक्ला8075 ।९५ग7474%५ 


भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक 47 


8५॥07५7 070०708| $02) पर चिकित्सकीय अनुसन्धान म॑ सलग्न हैं। उन्होने पुराने 
घाव के उपचार के लिए एक सुरक्षित एवं प्रभावकारी ओषधि की खोज उस समय 
की जब वह स्नातकोत्तर अध्ययन (एम डी ) म॑ रत थे। सन्‌ 985 इ में वह सप्तम 
इन्टरनेशनल काग्रेस ऑफ प्रोटोजूलॉजी ([0ह009 (0णाए्ा७5४ ण 7002002५) 

नैरोबी, केन्या मे अपना शोध-पत्र प्रस्तुत कर » लिए आमत्रित किये गये थ॑। इस 
यात्रा का आयोजन वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसन्धान परिषद्‌ नई दिल्ली ने किया 
था। बाद मे सन्‌ 986 ई मे उनका यह शोध-पत्र इन्टरनेशनल जर्नल ऑफ डर्मेटोलॉजी 
में प्रकाशित किया गया था। इसम॑ इस बात का उल्‍लख किया गया था कि त्वचा 
सम्बन्धी एक कोशिकीय परजीवी रोग (८४४४॥९०७$ |0४॥ञक्षा885) के उपचार मे 
मुँह सम्बन्धी डेपसोन (399४०॥०) एक प्रभावकारी, कम खर्चीली और व्यापक रूप 
से उपलब्ध औषधि है। इस लेख की अत्यधिक सराहना की गई और पुन सार रूप 
मे डर्मेटोलॉजी डायजेस्ट मे प्रकाशित किया गया। 


वह अपने शोध कार्य को तिरन्तर गतिम्गन बनाये हुए हैं। उनका दूसरा शोध- 
पत्र ““कूटानिअस लैइसमेनिअसिस सब-टाइप्स ट्रीटेड विद डेपसोन ((प्राा०००६ 
[ट8॥78-॥855. 8प5-५ए००६४ 0६४८० एश7 0905076) '' विश्वविद्यालय अनुदान 
आयोग और विज्ञान एव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा अनुसमर्थित किया गया तथा सत्रहवीं 
वर्ल्ड काग्रेस ऑफ डर्मेटोलॉजी (४४०00 (०गष्टा०5४ रण 70774/0029), बर्लिन 
(जर्मनी) मे स्वीकृत किया गया और प्रस्तुत किया गया। 


त्वचा सम्बन्धी एक कोशिकीय परजीबवी रोग (८ए|॥72005 |0शीय)855) 
पर आगे पुन कार्य करते हुए उन्होने एक नई सुरक्षित कवक (फफूँद) रोधी औषधि 
इट्राकोनाजोल (788 (१०॥820०) (आर 5/244 जानसीन) का प्रयोग चिकित्सकौय 
परीक्षणो के लिए किया। उनका यह अध्ययन ''कूटानियस लेइसमैनिएसिस क्लिनिकल 
एक्सपिरियन्स विद इन्ट्राकोनाजोल (आर 5/2। जानसीन) (८एॉँक्वाठ005 
(छाप्रायक्षावह॥5... साधनों ०एलथाशा०ए८ शांत पराइटणा;८ट06 06२ 3/24] 
[॥562॥) ' सितम्बर, 988 ई मे बारहवी इन्टरनेशनल काग्रेस फॉर ट्रापिकल मेडिसन 
एण्ड मलरिया ([गाद्गाक्षाणाबी (१०६7885 00 0९ 7200॥6 क्षात॑ [8978 ) 
मे प्रस्तुत किया तथा 990 ईं मे इन्टरनेशनल जर्नल ऑफ डर्मेटोलॉजी मे प्रकाशित 
किया गया। 

विश्व स्वास्थ्य सगठन, जिनेवा, स्विट्जरलैण्ड ने उनके कार्य की सराहना को 
तथा उनकी शोध-प्रायोजना 'ए ब्लाइन्ड स्टडी ऑन दि एफिकेसी ऑफ डेप्सोन इन 
कूटानियस लैइसमैनिअसिस (4 छाप्रव अंप0५ ० 6 शीि०8०५ रण वैधु05ण6 ॥ 


48 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


2८पाक]2005 [2ग्रगाक्षा।49५) के लिए दस हजार अमेरिकन डॉलर का अनुदान 
स्वीकृत किया। यह अध्ययन इन्टरनेशनल काग्रेस ऑफ केमोथेरैपी ([/ह॥0॥| 
("097855 एा 0॥४7ण29[?५) बर्लिन मे प्रस्तुत किया गया। यह शोध-पत्र सन्‌ 
99] ई मे ट्रॉजेक्शन्स ऑफ रॉयल सोसायटी ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसन एण्ड हाइजीन 
(76 फक्याइक८005 ० रि०्शव $0टालाए एण साकाटयो ८वाटाआा6 ॥॥0 
ल५४०:०) लन्दन में प्रकाशित हुआ था। राजस्थान के पश्चिमी थार के मरु भाग 
और पडोसी पाकिस्तान के इलाकों मे एक खास किस्म की मक्खी से फैलने वाला 
त्वचा रोग (ओरियटल सोरी) का अब समुचित इलाज सम्भव है। यह जानकारी डॉ 
जयदीप डोगरा ने बताया कि ओरियन्द सोर रोग एक खास किस्म की बालुई मक्खी, 
जिसका आकार और शक्‍्ल-सूरत मच्छर जैसी होती है, से फैलता है। जब एक ऐसी 
सक्रमित बालुई मक्खी किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटती है तो वहाँ जलन एवं पीडा 
के साथ घाव व दाने उत्पन्न हो जाते है जो किसी सामान्य औषधि अथवा प्रतिरोधात्मक 
दवाइयो से नही मर पाता है। यह घाव धीरे-धीरे वक्‍त के साथ बढता ही चला जाता 
है और घाव पर गुमड की शक्ल अखितयार हो जाती है। उन्होने बताया कि इस रोग 
के प्रभावी इलाज के लिए एक नई एटी फगल औषधि तैयार की गई है जिसका 
नाम “इट्राकोनाजीला' है जिसे प्रारम्भिक परीक्षणो के पश्चात्‌ प्रभावी पाया गया। 5 
से 9 मई, 3997 तक इस्ताम्बूल (तुर्कोे) मे होने वाली वर्ल्ड काग्रेस ऑफ 
लेशमेनिओसिस मे डॉ डोगरा ने भाग लिया। रेगिस्तानी इलाकों मे पाई जाने वाली 
एक विशेष मक्खी के काटे जाने से फैलने वाले रोग क्यूरनियस-लशमेनिओसिस के 
लिए कारगर दवा इट्राकोनाजोला की खोज सम्बन्धी शोध पत्र पढने के लिए डॉ डोगरा 
को तुर्कों आमत्रित किया गया। डॉ डोगरा इसी खोज के लिए भारतीय चिकित्सा 
अनुसन्धान परिषद से 993 मे युवा वैज्ञानिक के पुरस्कार से सम्मानित हो चुके है। 
राजस्थान मे यह बीमारी मुख्य रूप सं जेसलमेर, बाडमेर, बीकानेर व गगानगर जिलो 
मे फैलती है। 


प्रकाशन--डाॉँ डोगरा के लगभग 20 शोध-पत्र और तीन पुस्तक समीक्षाये 
प्रमुख राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जर्नलो मे प्रकाशित हो चुकी है। 


पुरस्कार, सम्मान और प्रशस्तियॉ--डॉ डोगरा को उनके पत्र 'केमोथेरेपी 
ऑफ कूटानियस लेइसमैनएसिस.._ ओरल डेप्सोन (लाध्याणगाश॥9५ ण 2०परावा९०0५ 
[087र4985 ०० 097950॥०) के उपलक्ष मे सत्रहवी इन्टरनेशनल कांग्रेस 
ऑफ कैमोथेरेपी, बर्लिन के पोस्ट अवॉर्ड से पुरस्कृत एवं सम्मानित किया गया। 
उन्होने रॉयल सोसायटी ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसन एण्ड हाइजीन लन्दन की फेलोशिप 
प्राप्त की | उन्होने कूटानियस लेइशमेनिएसिस (८ता॥॥९००७$ |८५रा॥74५$) पर अपने 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 49 


अनुसन्धान कार्य के उपलक्ष मे सन्‌ 99] ई मे भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद्‌ 
का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया। 2 अप्रैल, १993 ई को डॉ जयदीप डोगरा को 
इन्टरनेशनल सोसायटी ऑफ कैमोथेरेपी की ओर से स्कालरशिप अवॉर्ड से सम्मानित 
किया गया। यह सम्मान उन्हे हृदय रोग की रोकथाम के लिए की गई खोज के उपलक्ष 
मे दिया गया। इस पुरस्कार को पाने वाले विश्व के दस वैज्ञानिक मे डॉ डोगरा एक 
थे। 24 नवम्बर, 993 ई को डॉ डोगरा का चिकित्सकीय नवाचार (मेडिकल 
इनोवेशन) के क्षेत्र मे शोध कार्य के लिए विश्व के तीन वैज्ञानिकों मे चयन किये 
जाने पर जूनियर चैम्बर इन्टरनेशनल द्वारा सम्मान किया गया। जूनियर चैम्बर 
इन्टरनेशनल को प्रतिवष चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र मे किये जाने वाले इस चयन के 
लिए लगभग ॥॥0 देशो से प्रविष्टियाँ प्राप्त होती हैं। प्रत्येक देश के जूनियर चैम्बर 
की ओर से दस वैज्ञानिको का चयन कर उनका नाम जूनियर इन्टरनेशनल को प्रस्तावित 
किया जाता है। चिकित्सको का एक दल प्रत्येक क्षेत्र के तीन वैज्ञानिकों का चयन 
करता है। 25 नवम्बर, 994 ई को रॉयल सोसायटी ऑफ ट्रॉपीकल मेडिसिन ने 
डॉ डोगरा को फैलोशिप प्रदान की। उनको यह उपाधि उनके शोध के सम्मान मे 
प्रदान की । डॉ डोगरा ने पश्चिमी राजस्थान मे पाई जाने वाली “ओरियन्टल सोर' 
नामक बीमारी की दवा की खोज की। १3 मार्च, 4995 ई को डॉ डोगरा को चिकित्सा 
विज्ञान के सर्वोच्च पुरस्कार आई सी एम आर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह 
पुरस्कार उनको सात वर्षो के परिश्रम के बाद ओरियन्टल सोर नामक बीमारी का 
सुलभ इलाज दूँढ निकालने के लिए प्रदान किया गया। इस बीमारी पर शोध करने 
के लिए डॉ डोगरा को विश्व स्वास्थ्य सगठन ने चुना था। इन्टरनेशनल काग्रेस फॉर 
इनफेशियस डिजीज ने डॉ डोगरा को चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग मे 29 अप्रेल, 
१995 ई को 'ओरियन्टल सोर' नामक बीमारी पर व्याख्यान हेतु आमत्रित किया। 
डॉ डोगरा की उपलब्धियो को निम्नाकित द्वारा मान्यता प्रदान की गई-- 
(१) वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसन्धान परिषद्‌, नइ दिल्ली ने उनके कार्य 
'डेप्सोन इन दि ट्रीट्मेट ऑफ कूटानियस लिएसमेनसिएसिस 
(0859णा6 व 06. ९शागशाए 0 ध्पॉक्वाट075 [९ जाा।क्षा955) का 
मूल्यॉकन करने के उपरान्त सातवी इन्टरनेशनल काग्रेस ऑफ 
प्रोटोजूलॉजी, नैरोबी, केन्या म 985 ई मे प्रस्तुत करने के लिए यात्रा 
अनुदान स्वीकृत किया। 
(2) विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने उन्हे सतन्रहवी वर्ल्ड काग्रेस ऑफ 
डर्मेटोलॉजी बर्लिन (जर्मनी) मे अपना कार्य प्रस्तुत करने के लिए यात्रा 
अनुदान स्वीकृत किया। 


|[50 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


(3) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भारत मे दो प्रमुख त्वचा वैज्ञानिको 
से उनको शोध-पत्र का मूल्यॉकन कराने के उपरान्त सत्रहवी वर्ल्ड 
काग्रेस ऑफ डर्मेटोलॉजी, बर्लिन (जर्मनी) मे 987 ई में उनके पत्र 
प्रस्तुतीकरण का अनुसर्मथन किया था। 

(4) विश्व स्वास्थ्य सगठन, जिनेवा, स्विट्जरलैण्ड ने उनके कार्य की 
सराहना की और प्रमुख अन्वेषक के रूप मे उनकी शोध प्रायोजना 
के लिए दस हजार अमेरिकन डॉलर का अनुदान स्वीकृत किया। 

(5) दि यूरोपियन सोसायटी फॉर डर्मेटोलॉजिकल रिसर्च (॥6० 8&ए0ए०था 
50269 0 >८773000272८9/ ।२९४८०॥०॥) ने सन्‌ 987 ई मे उन्हे 
अपनी गौरवपूर्ण सदस्यता प्रदान को। 

(6) दि सोसायटी फॉर इन्वेस्टिगेटिव डर्मेटोलॉजी, यू एस ए ने 989 ई 
में उन्हे अपनी गौरवपूर्ण सदस्यता प्रदान की। 

डॉ डोगरा का नाम अमेरिका से प्रकाशित 'हूज-हू-इन दी वर्ड' नामक पुस्तक 

मे सूचीबद्ध किया गया है। 
[] 


डॉ ए के चारण 
(१949 ई ) 


जन्म एवं वश परिचय--डॉ अनिल कुमार चारण का जन्म भारत के राजस्थान 
राज्य के जोधपुर जिले के अन्तगत मोगडा नामक गॉँव मे 3 अप्रेल ॥949 ई को 
हुआ था। उनके पिता स्वर्गीय श्री देवीसिह चारण राजस्थान सरकार के शिक्षा विभाग 
मे अध्यापक थे तथा उच्च रक्‍न चाप से ग्रसित होने के कारण 5 वष्ठ की आयु 
मे उनका देहावसान हो गया। वह अपने श्रेष्ठ मानवीय व्यवहार के कारण अपने सम्पूर्ण 
जिले मे विख्यात थे और अपने जीवन-काल मे आथिक सकटो से जूझते रहे। वह 
दो विषयो मे एमए थे। डॉ चारण की माताजा श्रीमती जाना देवी ने प्राथमिक स्तर 
तक शिक्षा प्राप्त की थी और वह सुगृहिणी है। उनकी सहधर्मिणी श्रीमती रेखा चारण 
बी ए स्कूल अध्यापिका है। उनके श्री कुलदीप चारण एव श्रो स्नेहदांप चारण नामक 
दो पुत्र हैं। 

बाल्यकाल--उनके पिता के शिक्षा विभाग मे स्थानान्तरण होने वाले पद पर 
कार्यरत रहने के कारण उनका बाल्यकाल राजस्थान के विभिन्‍न स्थानो-कस्बो“शहरो- 
कोटा, राजगढ़, फलौदी, भीनासर और नाथद्वारा मे व्यतीत हुआ जहाँ उन्होने विद्यालयी 
शिक्षा प्राप्त की। 

शिक्षा-दीक्षा--डॉ चारण ने जोधपुर विश्वविद्यालय (अब जयनारायण व्यास 
विश्वविद्यालय, जोधपुर नामकरण) से बी एस सी (जीव विज्ञान वर्ग), एमए 
(भूगोल) एवं पी एच डो वर्ष 978 ई उपाधियों प्राप्त की | उन्होने पी एच डी उपाधि 
हेतु प्रोफेसर डी एन सेन, अध्यक्ष, वनस्पति विज्ञान विभाग, जयनारायण व्यास 
विश्वविद्यालय, जोधपुर के मार्गदशन मे अनुसन्धान कार्य क्या था। उनके शोध- प्रबन्ध 
का शीर्षक था-- (जैव भूगोल क्षेत्र मे) “'फायटो-ज्यॉग्राफी ऑफ वेस्टर्न राजस्थान- 
पश्चिमी राजस्थान का वानस्पतिक भूगोल।”' 


व्यवसाय के पथ पर--सन्‌ 979 से 983 ई तक उन्होने जयनारायण व्यास 
विश्वविद्यालय, जोधपुर मे वनस्पति विज्ञान एवं भूगोल की स्नातकोत्तर कक्षाओं को 
अध्यापित किया था। उन्होने वर्ष 4985 86 ई मे एक शोध प्राणगेजना के अन्तर्गत 
आफिसर्स प्रशिक्षण विद्यालय (हरिश्चन्द्र माथुर राजस्थान राज्य लोक प्रशासन सस्थान ), 


52 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


जयपुर मे शोध सहायक के पद पर तथा वर्ष १987-४9 ईं मे एक शौध-प्रायोजना 
के अन्तर्गत बिडला वैज्ञानिक अनुसन्धान सस्थान जयपुर मे अनुसन्धान वैज्ञानिक के 
पद पर कार्य किया। वर्तमान मे वह सन्‌ १995 ई से विनोदिनी स्नातकोत्तर 
महाविद्यालय, खेतडी जिला झुन्झुनूं (राजस्थान) मे सहायक प्रोफेसर (भूगोल) के 
पद पर सेवारत है। 

प्रकाशन--उनके 27 आलेख/शोध-पत्र प्रकाशित हुए है, जिनमे से 2 
अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओ मे प्रकाशित हुए है। 

उन्होने निम्नाकित दो पुस्तके लिखी है-- 

(१) प्लान्ट ज्यॉग्राफी, १992, साइन्टिफिक पब्लिशर्स, नई दिल्ली। 

(2) ए टेक्स्ट बुक ऑफ बॉयोज्यॉमग्राफी | 

पुरस्कार--वर्ष 977-80 ई मे उन्होने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई 
दिल्ली से कनिष्ठ शोध फैलोशिप एवं वरिष्ठ शोध फैलोशिप अवॉर्ड प्राप्त किया था। 
वर्ष 980-83 ई मे उन्हे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आर ए अवॉर्ड तथा 
राजस्थान सरकार के विज्ञान और प्र।द्योगिकी विभाग द्वारा उनकी प्रायोजना (डी एस सी 
बैल्ट' हेतु अनुसन्धान अनुदान प्रदान किया गया था। 

महत्त्वपूर्ण कार्य-डी एस सी बैल्ट नामक यत्र का आविष्कार--प्रोफेसर अनिल 
कुमार चारण ने पेडो की ऊँचाई, वजन, आयु तथा पेड के तने के घेर के बारे मे 
जानकारी प्राप्त करने के लिए डी एस सी बैल्ट नामक यत्र का आविष्कार किया है। 
यह यत्र भारत मे ही नही अपितु विश्व मे अपनी तरह का पहला यत्र है, जो कि 
एक साथ इतनी खूबियों लिए हुए है। इसके लिए प्रोफेसर चारण को श्रीमान मत्री 
महोदय, पर्यावरण एवं वन विभाग, भारत सरकार की ओर से बधाई पत्र भी पाप्त 
हुआ है और राजस्थान सरकार के विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग के तत्कालीन सचिव 
के समक्ष 5 अगस्त ॥994 ई को अपार जनसमूह की उपस्थिति मे इसका सफल 
परीक्षण किया। इसकी सफलता का प्रमाण यह है कि इन्होने जिस पेड पर इसका 
परीक्षण किया तथा उसकी उम्र जो यत्र ने बताई, वह उक्त पेड लगाने वाले व्यक्ति 
ने बतलाई। उक्त बैल्ट के सफल परीक्षण के बाद इस युवा वैज्ञानिक को अनेक बधाई 
पत्र मिले है। इस आविष्कार के विषय मे समाचार शेखावाटी उद्गार (पाक्षिक) ॥6 
से 3) अगस्त, 994, राजस्थान पत्रिका दिनॉक । जनवरी, 995, दैनिक नवज्याति 
दिनॉक १4 अप्रैल, 994 हिन्दुस्तान टाइम्स, 20 अप्रेल, 994, नवभारत टाइम्स 
27 दिसम्बर, 992 और भृगु सन्देश, 27 मार्च 995 क अक मे विस्तार से प्रकाशित 
हुआ | विश्वविद्यालय अनुदान आयोग प्रायोजना के अन्तर्गत शैक्षिक मोडिया अनुसन्धान 
केन्द्र जयनारायण व्यास विश्क्रिद्यालय अभियात्रिफकी सकाय परिसर जांधपुर 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक ।53 


3420, भारत ने इसके विषय में '[॥८ &09 ०!) $ ८ 8०/॥/-डी एस सी बैल्ट 
की कहानी' नामक फिल्म तैयार की जिसका टी वी प्रसारण ) माच॑ १996 ई 
को किया गया था। 

इस आविष्कार की सफलता की कहानी भी बहुत बडे सघर्षो से भरी हुई है। 
सन्‌ 3977 ई मे एक दिन की बात है। जोधपुर से जैसलमेर आते हुए सडको के 
किनारे लगे छोटे-बडे आकार के नीम के वृक्षो को देखकर इस युवा वैज्ञानिक के दिमाग 
मे पहली बार यह विचार आया कि इन पेडो के विकास के उनके तथ्यो (पैरामीटरस ) 
जैसे-ऊँचाई, छाया (कैनोपी कवर), भार, उम्र तथा तने के घेरे मे एक अनुपात अवश्य 
होना चाहिये अर्थात्‌ वृक्षों की वृद्धि उनकी आयु के समानुपाती होनी चाहिये। 


बस दिमाग मे यह विचार (बात) आना था कि शुरू हो गया एक नया आविष्कार 
करने को तैयार यह युवा वैज्ञानिक। इस प्रकार इस विचार ने एक नया आविष्कार 
कर डाला, किन्तु अपने इस आविष्कार को सही रूप देने मे डॉ चारण को कडा 
परिश्रम करना पडा ओर बस ,हो से शुरू हुआ उनके सघर्षो का दौर। अन्तत इस 
युवा वैज्ञानिक ने इसके बारे मे अपनी खोज पूरी की और सफलता की सीढी चढकर 
इस नये और अपने तरह के पहले यत्र को बनाकर ही दम लिया। उन्हाने हजारो 
वक्षो के आकारों के ऑकडो का विश्लेषण किया और एक नया सूत्र (सिद्धान्त) 
प्रतिपादित, किया जिसे 98। इ मे उन्होंने पूरी तरह विकसित करके 'दि थ्योरां जाफ 
नेचुरल हारमोनी इन दि डंवलपमेट ऑफ ट्रीज' नाम दिया। 


सन्‌ 99 ई मे डॉ चारण ने स्वय प्रतिपादित सिद्धान्त पर कुछ सूत्र बताये 
जिनसे यह ज्ञात होता है कि पृथ्वी के धरातल पर उपस्थित प्रत्येक वृक्ष की जाति 
शा सूत्र अलगु होता है। तात्पर्य यह कि विभिन्‍न जाति के पेडो के विकास का मूृत्र 
अलग होता है#इन सूत्रो के आधार पर डॉ चारण ने एक बैल्ट का आविष्कार आर 
मिर्माण किया, जो डी एस सी बैल्ट उपकरण कहलाया। इस प्रकार दीर्घ अर्से की 
मेहनत आखिर काम आई। यह उपकरण भविष्य मे बहुत उपयोगी होगा। किसी वृक्ष 
का कितना घेरा है, यह इस उपकरण द्वारा सरलतपूर्वक नापा जा सकता है। 


डी एससी बैल्ट की कार्य प्रणाली--जिस पेड का घेरा नापना है उसके 
तने पर जमीन की सतह से 5-6 फुट की ऊँचाई पर एक कील गाड कर इस उपकरण 
को लटका दिया जाता है। इसके बाद इसी में लगे फीते को उस पेड के तने पर 
लपेट दिया जाता है। इस तरह फीते से तो पेड के तने का घेरा माप लिया जाता 
हे। आप सोचते होगे कि इसमे क्‍या नयापन है। यह तो कीई भी व्यक्ति सामान्य 
फोता लकर तने का घेरा मापने का कार्य कर सकता है। परन्तु इस उण्फरण का काय 


54 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


तो अब ही शुरू होता है। पेड पर लटक हुए उपकरण मे उसी माप के बटन को 
दबाने से वक्ष की ऊँचाई, छाया का घेरा, आयु एवं भारत ज्ञात हो जायेगा। 


डी एस सी बैल्ट की सीमाये--इस उपकरण की भी अपनी कुछ सीमाये हैं, 
जैसा कि हर उपकरण के साथ टोता है। यह उपकरण केवल उन्ही वक्षो पर कार्य 
करता है, जिसका तना 5 डिग्री कोण से ज्यादा झुका हुआ या तिरछा न हो तथा 
जिसकी कोई मुख्य बडी शाखा कटी हुई नही हो और जिसका तना खोखला न हो। 
यदि हमे छाया का घेरा मापना हो तो इसके लिए दोपहर के 2 30 बजे के आस- 
पास का समय ही उपयुक्त रहेगा। 





पेड से बधा डी एससी बेल्ट 


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[ँ है इल्‍-ऋान- । | 
42 हि |, | 


[.. सबक 


चित्र डीएससी अल्ट 


2० >>, 


भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक 55 


डी एस सी बैल्ट की उपयोगिताये-पेडो (वृक्षां) को मापने के इस उपकरण 
डी एस सी बेल्ट के कुछ महत्त्वपूर्ण उपयोगो/उपलब्धियो का विवरण निम्न ग्रकार 
प्रस्तुत है-- 

।.. सम्भवतया यह विश्व मे अपने प्रकार का प्रथम उपकरण है जिसको 
किसी पेड के मुख्य तने पर बॉधने पर उस वृज्ष विशेष सम्बन्धी अनंक 
तथ्यो की जानकारी सरलता से हो जाती है, जैसे--() उस वृक्ष की 
ऊँचाई कितनी है? (9) उस पेड की कुल लम्बाइ कितनी है? (पा) 
उस वृक्ष की छाया का कुल घेराव (आवरण परिधि) कितना है या 
यो कहे कि पेड की छाया का कुल घेराव जो जमीन पर पडता हैं, 
वह कितना है? (१५) पेड का भार कितना है? (५) उस वृक्ष के मुख्य 
तने का घेरा कितना है? (५) उस वृक्ष की आयु कितनी हे? (शा) 
उस पर उपलब्ध फलो की सख्या कितनी है? (शा) उस वक्ष पर 
उपलब्ध फलो का कुल वजन कितना है? 


इस प्रकार के अनेक परीक्षण वक्षो से सम्बन्धित इस विशेष उपकरण के माध्यम 
से किये जा सकते हैं। उपर्यक्त वर्णित तथ्यो की जाँच के सम्बन्ध में अनेक बार 
सफल परीक्षण बहुत से वृक्षों पर राजकीय/केन्द्रीय प्रशासन एव आम परिचित लोगो 
के समक्ष इस बैल्ट द्वारा किया गया है। इस उपकरण द्वारा फलो के बारे मे आवश्यक 
जानकारी प्राप्त करने का सूत्र कुछ ही समय पूर्व तैयार किया गया है। अत इस 
क्रम मे फिलहाल कुछ और परीक्षण करना शेष है। 


2 यह उपकरण विश्व मे वन विभागो के अनेको कार्यो एव योजनाओ 
मे अत्यन्त उपयोगी एवं कारगर सिद्ध होगा। इसके अनुसार वृक्षों की 
कटाई के दौरान वही वृक्ष काटा जाना चाहिये जो इस बैल्ट की रेज 
मे आता है। जो वृक्ष इस बेल्ट की रेज मे नहीं आता है उसे विकसित 
होने के लिए छोडा जा सकता है। 


इस बैल्ट की रेज से यह तात्पर्य है कि जिस वृक्ष विश॑ष पर यह उपकरण 
लगाया जाता है उस वृक्ष का चरमोत्कर्ष विकास स्तर यानि वॉछनीय अधिकतम 
जैव भार स्तर से है, क्योकि प्रकृति मे प्रत्येक वृक्ष अपने जीवनकाल मे एक बार 
कुछ अवधि के लिए अपने अधिकतम विकास स्तर यर कायम रहता है। तदुण्रान्त 
उसका ज॑ब-भार स्वत शने शने कम होता चला जाता है। दरूसे बन विभाग 
अपने वृक्षारोपण कार्यक्रमों हो एक पशिचित ममयबद्ध योजनाओ का एक प्रारूप 
दे सकता है; 


56 भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 


अत किसी भी क्षेत्र के वृक्षों की यदि वे इस बैल्ट की रेज मे आते है 
तो ही उनको अपनी आवश्यकतानुसार फिर काटा जा सकता है एवं उन काटे 
गये वृक्षों के स्थान पर नया वृक्षारोपण कार्यक्रम एक निश्चित समयावधि के लिए 
पुन किया जाना सम्भव हो सकता है, क्योकि इस विशेष उपकरण के माध्यम 
से नये लगाये जाने वाले वृक्षो की रेज हमे पहले से ही ज्ञात हो जाती हे। अत 
इन नये वृक्षों को लगाये जाने अथवा पुराने वृक्षों को वन विभाग द्वारा काटे जाने 
मे किसी भी प्रकार की वानिकी क्षति से आसानी से बचा जाकर भविष्य मे होन 
वाली पर्यावरण सम्बन्धी हानियो से सरलता से मानव जाति को छुटकारा मिल 
सकता है। 


इस उपकरण के माध्यम से “वर्ष अवधि स्तर' ज्ञात होने से पेडो का सम्बन्ध 
समयबद्ध वक्षारोपण करना, उचित समय आने पर हर प्रकार से आर्थिक दृष्टिकोण 
से आरा मशीन टिम्बर मार्ट के ठेकेदारों द्वारा उन्हे खरीदने हेतु भी अति सुविधाजनक 
रहता है। पर्यावरण सरक्षण दृष्टिकोण से भी यह उपकरण रेज सहायक सिद्ध होती 
है क्योकि उचित समय पर उचित वृक्षों को काटग़ा इसके अन्तर्गत आता हे। हर पेड 
प्रजाति की इस पृथ्वी पर डी एस सी बैल्ट के अनुसार रेज अलग-अलग होती है। 
यह इस उपकरण की विशेषता है। 


3 अत यह उपकरण-डी एस सी बैल्ट वन विभाग के अलावा अन्य 
स्थानों पर भी उपयोगी सिद्ध होगा, जैसे--महाविद्यालयो, विश्वविद्यालयों 
के वनस्पति-विभागो, कृषि-विद्यालयो, महाविद्यालयों की प्रयोगशालाओ 
मे इस उपकरण को एक प्राथमिक उपकरण ' के रूप मे प्रयोगो के 
प्रयोजन से उपयोग मे लाया जा सकता है। पर्यावरण विभागो मे फील्ड 
सर्वे-उपकरण के रूप में, आरा मशीनो एवं टिम्बर-मार्ट अथवा टिम्बर- 
इण्डस्ट्री मालिको के कार्यो मे और फल-बागानो क्षेत्रों मे फलो की 
खरीद- फरोख्त हेतु इस उपकरण के माध्यम से आवश्यक जानकारी 
हासिल की जा सकती है। 


इस उपकरण के आविष्कार पर डॉ चारण को राजस्थान सरकार के विज्ञान 
एव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा डी एस सी बैल्ट पर रिसर्च प्रोजेक्ट की स्वीकृति प्रदान 
की है। इस प्रोजेक्ट हेतु डॉ चारण को सरकार की ओरे से छात्रवृत्ति प्रदान की जावेगी । 
डॉ चारण 'डी एस सी बेल्ट-इट्स एप्लीकेशन एण्ड इम्लीपेटेशन” पर अपनी शोध 
प्रा नोजना का कार्य करेंगे। यह शोध 'दि थ्योरी ऑफ नेचुरल हारमोनी इन दि डेवलपमेट 
ऑफ ट्रीज' पर आधारित है। इस सिद्धान्त को वह पाधो के ठिक्कास मे प्राकृतिक 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक 57 


तारतम्यता का सिद्धान्त' बतलाते है। उन्होने अपने पिता श्री देवी सिह चारण के नाम 
पर इसे डी एस सी बैल्ट नाम दिया है। 


इस उपकरण की खोज के लिए डॉ चारण बधाई के पात्र हैं, जिनकी खोज 


से पर्यावरण सन्तुलन को बनाकर रखा जा सकता है ओर मानवता की भलाइ की 
जा सकती है। 


हमे डॉ चारण से बडी अपेक्षाये हैं। भविष्य मे उनकी योजनाये निम्नलिखित 
यत्र-निर्माण करने की हैं-- 


। . हामेन बैल्ट--इसको घडी की तरह मनुष्य की कलाई पर लगाने से 
उसकी ऊँचाई, भार, सीने का नाप-साधारण और फुलाने पर, जूते का 
नाप और आयु का ज्ञान हो जावेगा। 

2 चारणस क्लाउड फॉल--यह ऐसा यत्र होगा जो अपनी कार्य प्रणाली 
से इस प्रकार का छिडकाव (स्प्रे 59०9५) छोडेगा जिसके कारण आधा 
घण्टे के भीतर बादलो के नीचे की तह को छू लेगे और छूते ही बादल 
में विद्यमान समस्त जल-राशि धीरे-धीरे करके उसी क्षेत्र पर बूँदो के 
रूप मे गिर जावेगी और फिर विद्यमान बादल उस क्षेत्र पर समाप्त 
हो जावेगे। 


हम आशा करते हैं कि वह शीघ्र ही इन यत्रो के निर्माण मे सफल होगे। 


प्त 


डॉ रमेश सोमवशी 
(१953 ई ) 


जन्म एव वश परिचय-प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ रमेश सोमवशी का जन्म ॥7 
जून, 953 ई को उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ के सदर बाजार मोहल्ल मे श्री 
बद्री सिह के घर मे हुआ था। श्री बद्री सिह ने लखनऊ विश्वविद्यालय से बीए, 
एल एल बी की परीक्षाये उत्तीर्ण की थी, परन्तु सग्ल एवं ईमानदार व्यक्तित्व के स्वामी 
होने के कारण वे वकालत नही कर सके। अत डाक-तार विभाग मे लिपिक पद 
ग्रहण कर लिया तथा सन्‌ 980 ई मे स्वर्गवासी हो गए। डॉ सोमवशी की माताजी 
का नाम श्रीमती रामकली है। वे पॉचवी कक्षा उत्तीर्ण हे तथा 'बक्सी तालाब', लखनऊ 
के समीप 'पल्हरी' नामक गॉँव मे जन्मी थी। वे स्नेहमयी, सरल तथ्य धार्मिक प्रवृत्ति 
की महिला है। वे अभी भी लखनऊ मे रहती हैं तथा ग्रीष्मकाल मे मुक्तेश्वर पधारती 
है। उन्होने अधिकाश तीर्थ स्थलो की यात्रा की है। डॉ सोमवशी की धर्मपत्नी का 
नाम श्रीमती मजु है। उनके सन्‌ 977 ई मे उत्पन्न श्री विशाल तथा सन्‌ 4979 ई 
में उत्पन्न श्री ऋषि नामक दो पुत्र हे। 


डॉ सोमवशी के पाँच भाई और छ बहिने है। सम्पूर्ण परिवार लखनऊ मे 
निवास करता है। उनका बचपन निम्न मध्यवर्गीय परिस्थितियो में व्यतीत हुआ हे। 
उनके ही शब्दो मे, “लोग मेरे निरन्तर परिश्रम करने, मौलिक-विचारो, अनुकूल तथा 
प्रतिकूल परिस्थितियो/लोगो से सहयोग प्राप्त करने, कम आयु मे निष्कर्षात्मक अनुभव 
प्राप्त करने जैसे गुणो की तारीफ करते हैं।'' 


शिक्षा--डॉ सोमवशी की प्रारम्भिक शिक्षा सस्कृत पाठशाला कन्या हाई स्कूल 
हरी चन्द्र इन्टर कॉलेज तथा कान्य कुब्ज कॉलेज, लखनऊ मे सम्पन्न हुई। वर्ष 970- 
76 ई मे उन्हांने पशु चिकित्सा एवं पशु पालन महाविद्यालय, मथुरा तथा स्नाकोत्तर 
पशु विज्ञान महाविद्यालय, इज्जतनगर, बरेली से बां वी एस सी एण्ड ए एच और 
एम वी एस सी (पैथालोजी) की उपाधियों प्राप्त की। सन्‌ 988 ई मे उन्होंने 
पैथोलोजी विभाग, पशु चिकित्सा सकाय, स्वीडिश कृषि विज्ञान महाविद्यालय, 
उपशाला, स्वीडन से एफ आर वी सी एस (फेलों ऑफ रॉयल कॉलेज ऑफ 
वेटेरनरी सर्जन्स) स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया। सन्‌ 990 ई मे डॉ सोमवशी 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक [59 


ने भारतीय पशु चिकित्सा सस्थान (विश्वविद्यालय के समकक्ष मान्यता प्राप्त) 
इज्जतनगर, बरेली, उत्तरप्रदेश से पी एच डी की उपाधि प्राप्त की। 


व्यवसाय के पथ पर--सन्‌ 976-77 ई मे डॉ सोमवशी पैथोलोजी विभाग, 
पशु चिकित्सा महाविद्यालय, गोविन्द वल्‍लभ पन्‍न्त कृषि एव प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय 
पन्‍त नगर, नैनीताल मे वरिष्ठ शोध सहायक के पद पर कार्यरत रहे। सन्‌ 977 ई 
मे कृषि शोध सेवा मे चयन होने पर उन्होने पैथोलोजी विभाग, भारतीय पशु चिकित्सा 
अनुसन्धान सस्थान, इज्जतनगर मे वैज्ञानिक एस-॥ पद का कार्यभार ग्रहण किया। 
जुलाई, सन्‌ 984 ई मे डॉ सोमवशी का स्थानान्तरण वैज्ञानिक एस-2 के पद पर 
पदोन्नति पर पशुधन उत्पादन शोध अनुभाग, भारतीय पशु चिकित्सा अनुसन्धान सस्थान, 
मुक्तेश्वर-कुमायूँ, नैनीताल मे हो गया। तब से वह वहीं कार्यरत हैं। भारतीय कृषि 
अनुसन्धान परिषद्‌, नई दिल्ली ने डॉ सोमवशी का चयन स्वीडिश अन्तर्राष्ट्रीय विकास 
एजेसी (सीडा) के चौदहवे पैथोलोजी अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रम । मार्च से 30 नवम्बर, 
988 ई तक मे भाग लेने के लिए किया था। स्वीडन प्रवास क दौरान उन्होन सम्पूर्ण 
स्वीडन ही नही, अपितु डेन्मार्क, नार्वे और फिनलैंड देशो की अध्ययन यात्राये कीं। 
सम्प्रति वह वरिष्ठ वैज्ञानक (पशु प्रकृति विज्ञान), भारतीय पशु चिकित्सा अनुसन्धान 
सस्थान, परिसर, मुक्तेश्वर-कुमायूँ-26338, (नैनीताल), उत्तर प्रदेश (भारत) हैं। 

पता--उनका वतमान पता इस प्रकार है-- 

डॉ रमेश सोमवशी 

वरिष्ठ वैज्ञानिक, भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान सस्थान परिसर, 

मुक्तेश्वर-26338 (नैनीताल), उत्तर प्रदेश, ( भारत) 

शोथ कार्य--डॉ सोमवशी को पशु रोगो पर 8 वष का शोध अन्वेषण अनुभव 
है। अपने इस वैज्ञानिक कार्यकाल मे डॉ सोमवशी ने पालतू पशुओ के विविध रोगो 
का व्यापक अध्ययन किया जिनमे बैलो के सीगो का केसर, गौ-पशुओ का सक्रामक 
मस्सा, गौ-पशुओ का रक्तमेह, पश्मीना बकरियो तथा प्रयोगशालीय पशुओ जैसे 
खरगोश और हैमस्टर के रोगे का अध्ययन विशेष रूप से किया। उन्होने पी एच डी 
उपाधि हेतु कुक्कुटों के सक्रामक वर्षा शोध तथा एफ्लॉटॉक्सिन की प्रतिक्रियाओ के 
प्रभाव का अध्ययन किया। 

पुरस्कार और सम्मान--हिन्दी-विज्ञान साहित्य परिषद, भाभा परमाणु 
अनुसन्धान केन्द्र, बम्बई की अखिल भारतीय विज्ञान लेख प्रतियोगिता मे डॉ सोमवशी 
ने चार बार द्वितीय पुरस्कार प्राप्त किया। भारतीय पशु-विकृति वैज्ञानक परिषद ने 
वर्ष १99] के डा सी एम सी पुरस्कार (अवार्ड) से उन्हे सम्मानित किया। भारत 


[00 भारत के [चॉकत्सा वैज्ञानिक 


सरकार के विज्ञान एवं तकनीकी मत्रालय ने जीवन-विज्ञान विषय मे उनकी पुस्तक 
“' प्राचीन भारत मे पशु-पालन और पशु चिकित्सा विज्ञान ” पर उन्हे पॉच हजार रुपयो 
का डॉ मेघनाद साहा पुरस्कार, 99] ई प्रदान किया। भारतीय पशु चिकित्सा 
अनुसन्धान सस्थान ने हिन्दी मे वैज्ञानिक कार्यो मे प्रोत्साहन एवं उल्लेखनीय कार्यों 
के उपलक्ष मे उन्हे स्मृति-चिह्न तथा प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर सन्‌ 992 ई मे सम्मानित 
किया। भाभा परमाणु अनुसन्धान केन्द्र, बम्बई-400085 की अखिल भारतीय हिन्दी 
विज्ञान साहित्य परिषद ने उनके लेख “कैसर क्यो होता है?” पर एक हजार 
रुपयो का द्वितीय पुरस्कार 9 फरवरी, 993 को प्रदान किया। यह पुरस्कार उन्हे चौथी 
बार मिला। 


प्रकाशन--डॉ सोमवशी के विभिन्‍न पशु-रोगो पर 75 से अधिक स्तरीय शोध 
पत्र राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं मे प्रकाशित हुए है। डॉ सोमवशी की 
विशेष रुचि हिन्दी मे लोकप्रिय विज्ञान लेखन मे सदैव रही है। अपने एक प्रशिक्षण- 
काल मे उन्होने स्वयसेवी सगठन सेवा मन्दिर, उदयपुर, राजस्थान मे नव साक्षरों के 
लिए हमारा पशुधन, बकरी पालन, पशुओ के सामान्य गेग व पशुओ के छुतहे रोग 
और पशुओ के परजीवी रोग विषयो पर पुस्तिकाये लिखी। हजारो की सख्या मे कई 
सस्करणो मे प्रकाशित इन पुस्तिकाओ से अनेक आदिवासी कृषक लाभान्वित हुए। 
उन्होने 'किसान भारती' (पत नगर), “फसल सदेश' (करनाल), 'खेती व कृषि 
चयनिका' (नई दिल्ली), 'वैज्ञानिक' (बम्बई), “साक्षरता सदेश' (उदयपुर), विज्ञान 
प्रगति' (दिल्ली) आदि लोकप्रिय वैज्ञानिक पत्रिकाओ मे 75 से अधिक लेख लिखे 
और उनका यह क्रम निरन्तर जारी है। “'वैज्ञानिक'” में चार बार उनके लेख पुरस्कृत 
भी हुए हैं। डॉ सोमवशी तीन पुस्तको के सह-लेखक हैं, जिनके शीर्षक हैं--' ' पशुओ 
के सक्रामक रोग” और '“बछडो के रोग तथा इनकी रोकथाम '। ये पुस्तके भारतीय 
कृषि अनुसन्धान परिषद, नई दिल्ली तथा केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय शिक्षा मत्रालय 
नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई है। सन्‌ 990 ई मे डॉ सोमवशी ने “ भारतीय 
पशु चिकित्सा अनुसन्धान के सौ वर्ष-ऐतिहासिक तथ्य एवं उपलब्धियाँ”' शीर्षक 
पुस्तिका लिखी, जिसका सस्थान के शताब्दी समारोह के अवसर पर तत्कालीन 
उपप्रधानमत्री एव कृषि मत्री श्री देवीलाल ने 9 दिसम्बर, 990 ई को विमोचन किया। 
उन्होने “प्राचीन भारत मे पशु पालन एवं पशु चिकित्सा विज्ञान”' तथा “स्वीडन मे 
नौ माह'' नामक पुस्तके भी लिखी है।'' प्राचीन भारत मे पशु पालन एवं पशु चिकित्सा 
विज्ञान ' नामक उनकी पुस्तक पर उन्हे पॉच हजार रुपयो का डॉ मेघनाद साहा पुरस्कार 
प्राप्त हुआ था। इस पुस्तक का प्रकाशन राजभाषा अनुभाग, भारतीय पशु चिकित्सा 


भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक |6| 


अनुसन्धान सस्थान, इज्जतनगर, उत्तर प्रदेश ने किया है। उनकी पुस्तक ''स्वीडन मे 
नौ माह '' उत्कृष्ट यात्रा सस्मरण है । उन्होने कई अन्य पुस्तके जैसे '“मध्य तथा आधुनिक 
कालीन भारत मे पशु पालन और पशु चिकित्सा विज्ञान” “हिमालय के उपयोगी 
पशु” और “'भेड और बकरी के रोग” भी लिखी है। 


डॉ सोमवशी ने कृषकोपयोगी पशु-विज्ञान साहित्य की ही रचना नहीं की, 
अपितु आकाशवाणी, अल्मोडा द्वारा प्रसाग्ति वार्ताओ द्वारा पशुपालको को शिक्षित करने 
का प्रयास भी किया। 


इस प्रकार डॉ सोमवशी ने कृषकोपयोगी पुस्तिकाओ, फोल्डर लेखन तथा 
रेडियो-वार्ताओ द्वारा पशु-रोग ज्ञान का व्यापक प्रचार-प्रसार किया। 

सदस्यता एवं अनुसन्धान छात्रवृत्तियोॉं--डॉ सोमवशी हिन्दी-विज्ञान साहित्य 
परिषद, भाभा परमाणु अनुसन्धान केन्द्र, बम्बई, भारतीय पशु-विकृति वैज्ञानिक परिषद्‌, 
भारतीय पशु चिकित्सा अनुसन्धान सस्थान, इज्जतनगर /बरेली), और ““पहाड'', 
नैनीताल के आजीवन सदस्य हैं| वह अन्य कई वैज्ञानिक सस्थाओ के साधारण सदस्य 
हैं तथा “'मुक्तेश्वर शोध क्लब'' के सचिव। उन्हे भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद 
की शोध छात्रवृत्ति तथा स्वीडिश अन्तर्राष्ट्रीय विकास छात्रवृत्ति प्राप्त हुईं। 


विदेश यात्राये--डॉ सोमवशी अब तक स्वीडन, डेन्मार्क, नार्वे तथा फिनलैंड 
देशो की यात्रा कर चुके हैं। 


विशेष रुचि--डॉ सोमवशी की विशेष रुचि हिन्दी मे विज्ञान लेखन मे हे। 


्। 


डॉ अशि्वनी शर्मा 
(१957 ई ) 


जन्म एव वश परिचय--डॉ एम पी शर्मा और श्रोमती कुन्ती देवी की 
सन्‍्तान डॉ अश्विनी शर्मा का जन्म 5 अक्टूबर, १957 ई को नई दिल्ली मे हुआ 
था। उनके पिता चिकित्सक है और माता गृहिणी। उनकी सहधर्मिणी डॉ (श्रीमती) 
रेखा शर्मा राष्ट्रीय विकास शोध सस्थान चिकित्सालय, करनाल मे चिकित्सा 
अधिकारी है। उनके 987 ई मे उत्पन्न श्री अक्षय एव 989 ई मे उत्पन्न श्री 
अर्चित नामक दो पुत्र है। 


शैक्षिक जीवन--डॉ शर्मा का शैक्षिक जीवन बहुत शानदार रहा है। उन्होने 
सदैव प्रथम श्रेणी प्राप्त की। उन्होने हायर सैकण्डरी परीक्षा कैम्ब्रिज स्कूल, नई 
दिल्ली से उत्तीर्ण की, जहों उनका बचपन व्यतीत हुआ था। उन्होने 978 ई मे 
प्राणी विज्ञान, वनस्पति विज्ञान और रसायन विज्ञान विषय लेकर बी एस सी परीक्षा 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरूश्षेत्र से उत्तीर्ण की। उन्होने 98॥ ई मे राष्ट्रीय डेयरी 
अनुसन्धान सस्थान, करनाल से पशु आनुवशिकी एव प्रजनन मे एम एस सी उपाधि 
प्राप्त की। उनके एम एस सी शोध प्रबन्ध का शीर्षक था, ''स्टडीज ऑन 
साइटोजेनेटिक इफैक्ट्स ऑफ बैक्टेरियल वैक्सीन (ब्लैक क्वार्टर एण्ड 
एन्ट्रोटोक्जेमिआ) (50865 जा ८ए/०8शालार शडटिटा5 जज 54९०८९१०| ४४०९॥९ 
-340 तुपआांथ ॥0 आ|०८००१०7॥०)' एम एस सी मे पाठ्यक्रम कार्य के एक 
अग के रूप मे राष्ट्रीय विकास शोध सस्थान मे डेयरी पशु प्रबन्धन के सभी पक्षों 
पर विचार करते हुए उनके तीन सेमस्टरो मे एक “फार्म प्रशिक्षण मे '” था। उन्होने 
985 ई मे क्लेरमोन्ट फेरन्ड विश्वविद्यालय, फ्रास से फ्रासीसी भाषा मे पाठ्यक्रम 
परीक्षा उत्तीर्ण की। सन्‌ 988 ई मे राष्ट्रीय विकास अनुसन्धान सस्थान, करनाल 
द्वारा उन्हे पशु आनुवशिकी मे पी एच डी उपाधि प्रदान की गई। उनके पी एच डी 
शोध प्रबन्ध का शीर्षक था, “'स्टडीज ऑन दि साइटोलोजीकल मूटाजेनिक 
एण्ड टेराटोलोजीकल इफेक्ट्स ऑए एल्फाटोक्सिमन्स ऑन एनीमल्स (5(00॥85 


०ा 6 ०श06एप्टाटबो प्रापा42आएर कातं (शक्व002०4)] ४2९८५ एा वॉ[400%0॥5 
जा धाधाा्वा5) 


भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक [63 


व्यावसायिक स्थिति और वर्तमान पता--डा शर्मा वैज्ञानिक के पद पर 
कार्यरत है। उनका वर्तमान पता अधोलिखित है-- 

डॉ अश्विनी शर्मा 

वैज्ञानिक, 

राष्ट्रीय पशु आनुवशिकी ससाधन ब्यूरो एवं राष्ट्रीय पशु आनुवशिकी सस्थान 

(भाग्तीय कृषि अनुसन्धान परिषद), 

करनाल (हरियाणा)-3200। ( भारत) 


सदस्यता--डॉ शर्मा इण्डियन साइन्स काग्रेस एसोसिएशन, इण्डियन डेयरी 
एसोसिएशन, इण्डियन सोसायटी ऑफ लाइफ साइन्सेज और इण्डियन सोसायटी ऑफ 
एनीमल जेनेटिक्स एण्ड ब्रीडिंग के सदस्य हे। 


विदेश यात्रा--डॉ शर्म अब तक फ्रास, हग्लैण्ड, हॉलैण्ड, बेल्जियम और 
कनाडा की यात्रा कर चुके है। 


अनुसन्धान अनुभव एवं प्रकाशन--डॉ शर्मा को अब तक एक दशक का 
अनुसन्धान अनुभ्व है। अब तक उनके लगभग 40 शोध पत्र पमुख राष्ट्रीय और 
अन्तर्राष्ट्रीय जर्नलो मे प्रकाशित हो चुके हैं। 


पुरस्कार और अन्य सम्मान--पशु आनुवशिकी ओर पजनन मे पी एच डी 
कार्य के ममय डॉ शर्मा को राष्ट्रीय विकास अनुमन्धान सस्थान की वरिष्ठ फैलोशिप 
प्रदान की गई थी। उन्हे जुलाई, 4985 से जुलाई, ।986 ई तक एक वर्ष के लिए 
फ्रास में पशु कोशिकानुवशिकता में व्यापक प्रशिक्षण के लिए फ्रासीसी सरकार 
की फैलोशिप प्रदान की गई थी। उन्हे भारतीय पशु कल्याण मण्डल, मद्रास द्वारा 
4987 ई में आयाजित अखिल भारतीय छायाचित्राकन प्रतियोगिता मे योग्यता प्रमाण 
पत्र प्रदान किया गया था। पशु कृषि कर्म आयुक्त डॉ ए के चटर्जी इस मण्डल 
के अध्यक्ष थे। अक्टूबर, 988 ई से नवम्बर, 988 इ तक उन्हे कनाडा मे पशु 
जैव प्रोद्योगिकों (कोशिकानुनशिकते।) में व्यापक प्रशिक्षण के लिए कनाडियन 
एक्जीक्यूटिव सर्विस ऑर्गेनाइजेशन की फैलोशिप प्रदान की गई। 6 से 25 फरवरी, 
989 ई तक जीव विज्ञान पीठ (5०0800] ता 800टश्टा८४ $ट०॥५०७) मे अप्नुवशिकी 
अर जलसवर्धन पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित अभिनवन 
पाठ्यक्रम मे पशु कोशिकानुनशिकते। पर भाषण देने क॑ लिए सदर्भ व्यक्ति के रूप 
मे उन्हे प्रो टी जे पेण्डियन, मदुरै कामराज विश्वविद्यालय, तमिलनाडु द्वारा आमत्रित 
किया गया था। पशु विज्ञान मे उनके प्रशसनीय अनुसन्धान के उपलक्ष मे उन्हे दो 


[64 भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक 


वर्षो 4988-89 के लिए गौरवपूर्ण '(६$रफी अहमद किदवई पुरस्कार ”” प्रदान किया गया 
था। यह राष्ट्रीय पुरस्कार भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद द्वारा प्रदान किया गया था 
ओर दस हजार रुपये नकद का पुरस्कार, एक स्वर्ण पदक ओर एक प्रशस्ति-पत्र 
प्रदान किया गया। 


विदेश मे प्रशिक्षण--डॉ शर्मा ने फ्रास और कनाडा मे प्रशिक्षण प्राप्त 
किया। 


फ्रास--उन्होने जुलाई, 985 ई से जुलाई, 986 ई तक १2 माह तक फ्रास 
मे इन्स्टीट्यूट नेशनल रिसर्च एग्रोनोमिक, जोउम ऐन्जोसास कुषि मत्रालय, पेरिस मे 
कीशिकानुबशिकता में व्यापक प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण का सचालन 
कोशिकानुबशिकता के अधिकारी विद्वान डॉ पॉल पोपस्कू की देखरेख मे किया गया 
था और फ्रेच सरकार की फैलोशिप पर इसका आयोजन किया गया था। प्रशिक्षण 
मे अधोलिखित पक्ष सम्मिलित थे-- 


(अ) क्लेरमोन्ड विश्वविद्यालय से सम्बद्ध केविलम विकी मे फ्रेच भाषा मे 
तीन माह का व्यापक प्रशिक्षण। उन्होने भाषा पाठ्यक्रम मे 80ब अक 
अर्जित किए, यद्यपि फ्रेच सीखने के लिए तीत माह की अवधि बहुत 
कम थी। 


उन्होने गुआडेलुपे (फ्रेड वेस्ट इडीज, 6 उत्तर और ७। पश्चिम) 
से क्रेओल ((76०॥०)---पशुओ के मेइओटिक (772000) गुणसूत्रो 
( परीक्षणो से गुणसूत्रो / पर अध्ययन का सचालन किया। लिग परम्परा 
($०:०) गुणसूत्रो के स्थिति निर्धारण और स्थानापननता यदि कोई हो, 
पर विशेष बल दिया गया था। इस पर फ्रेच भाषा मे एक पत्र भी 
प्रकाशित किया गया था। 


(स) फ्रास मे पाई जाने वाली पशुओ की ब्लोन्डेड एक्विटेत (8]9॥420 
&१०॥७ 76) नस्ल मे नवीन स्थानापनन्‍नता की खोज उन सहित ७ 
वैज्ञानिको के दल द्वारा की गई थी। इस स्थानापननता मे गुणसूत्र सख्या 
5 और १7 सम्मिलित थे। यह स्थानापन्‍नता माँ से बच्चों मे की गई 
थी। स्थानापन्‍नता मे सन्निहित गुणसूत्रो को पहचान और स्वीकृति 
विभिन्न सयोजक बन्धो जैसे (-- [२- ओर !२०२- सयोजक बन्ध 
द्वारा कराई गई थी। इस खोज पर शाघ पत्र जर्नल ऑफ हेरेडिटी, 
यू एस ए मे प्रकाशित हुआ है। 


(ब्‌ 


जननी. 


भारत के चिकित्सा वेज़ानिक 65 


(द) उन्होने स्थानापन्‍न पशुओ सामान्य पशुओ के कंन्द्रक प्रकार और 
मेइओटिक (900000) डायकाइनेसिस ((4/772५५- संत्र उत्तरातावस्था 
मे हास या अध सूत्री विभाजन की पूवावस्था) भी तेयार की। 

(य) स्थानापनन पशुओ मे भूण प्रत्यारोपण (६८७७४) का सचालन भी किया 
गया। भ्रूण को माइक्रोमेनीपुलेटर (7007 थग!7०४/०१) की सहायता 
से दो भागो मे काटा गया। एक अर्द्ध भाग का प्रयाग 
की शिकानुबवशिकता (५५ और 5५ गुणसूत्रो) द्वारा लिग को जानने के 
लिए किया गया था और दूसरा अर्द्ध भाग प्राप्तकर्ता का स्थानान्तरित 
कर दिया गया। 

(२) प्रशिक्षण का सक्षिप्त प्रतिवेदन आई एन आ ए , जोयी एन जोसास, कृषि 
मत्रालय, पेरिस, फ्रास और भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद, नई 
दिल्ली, भारत को प्रस्तुत किया गया। 


कनाडा--उन्हे अक्टूबर, 988-नवम्बर, 988 ई मे जैव चिकित्सा विज्ञान 
विभाग, ओन्‍टारिओ पशुचिकित्सा महाविद्यालय, गुएल्फ विश्वविद्यालय, निग 2 डब्ल्यू 
आईं, कनाडा मे पशु जैव प्रौद्योगिकी (कोशिकानुयशिकत) मे व्यापक प्रशिक्षण के 
लिए भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद द्वारा प्रतिनियुक्त किया गया था। प्रशिक्षण का 
सचालन कोशिकानुबवशिकवा के अधिकारी विद्वान डॉ पी के बसरुर की देखरेख 
मे और कनाडियन एक्जीक्यूटिव सविसेज ऑओर्गेनाइजेशन के सयोजन में हुआ था। 
प्रशिक्षण सवर्धित गाय-बैल की कोशिका रेखा के साथ विट्रो (श7०) मे गलित शुक्राणु 
के गुणसूत्रीय आलेखन पर था। इसमे (अ) एक ही परत के सवर्द्धनो का प्रारम्भ, 
(ब) स्विम अप (5५७४7 ४०) प्रविधि द्वारा जीने योग्य शुक्राणु का सग्रह, (स) वीर्य 
की विभिन्‍न एकाग्रता के साथ ही परत के सवर्धन का टीकाकरण, (द) सस्‍्लाइडो का 
छटाव और वस्तु का प्रकाश छायाचित्राकन सम्मिलित था। 

उपर्युक्त ग्रयोग पर एक शोध पत्र नूक्लियस, इन्टरनेशनल जनल ऑफ 
साइटोलोजी एण्ड एलाइड टोपिक्स मे प्रकाशनार्थ भेजा गया। 

प्रशिक्षण पर प्रतिवेदन भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद और कनाडियन 
एक्जीक्यूटिव सर्विस ऑर्गेनाइजेशन, नई दिल्ली को प्रस्तुत किया गया। 

नार्म (५५,५२७) हैदराबाद मे कृषि अनुसन्धान प्रयोजना प्रबन्धन पर 
प्रशिक्षण ( 4 दिसम्बर, 987 ई से 28 अप्रैल, 988 ई ), भारत--5 माह का 
उपर्युक्त प्रशिक्षण तीन चरणों मे विभकत था। प्रथम चरण 6 सप्ताह का नार्म मे, 8 


भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक 65 


(द) उन्होने स्थानापनन पशुओ सामान्य पशुओं के कन्द्रक प्रकार और 
मेइओटिक (॥स्‍070000) डायकाइनेसिस ((4॥72५%- सत्र उत्तरातावस्था 
में हास या अर्थ सूत्री विभाजन की पृवांवस्था) भी तेयार की। 

(य) स्थानापनन पशुरो मे भूण प्रत्यारोपण (५८५४) का सचालन भी किया 
गया। भ्रूण को माइक्रोमेनीपुलेटर (्रालाणाक्षा।एपए&॥0०) की सहायता 
से दो भागो मे काटा गया। एक अर्द्ध भाग का प्रयोग 
को शिक। | वशिक ता (५५ और »५ गुणसूत्रो) द्वारा लिग को जानने के 
लिए किया गया था और दूसरा अर्द्ध भाग प्राप्तकर्ता को स्थानान्तरित 
कर दिया गया। 

(२) प्रशिक्षण का सक्षिप्त प्रतिवेदन आई एन आ ए , जोयी एन जोसास, कृषि 
मत्रालय, पेरिस, फ्रास और भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद, नई 
दिल्‍ली, भारत को प्रस्तुत किया गया। 

कनाडा--उन्हे अक्टूबर, 988-नवम्बर, 988 ई मे जैव चिकित्सा विज्ञान 

विभाग, ओन्‍टारिओ पशुचिकित्सा महाविद्यालय, गुएल्फ विश्वविद्यालय, निग 2 डब्ल्यू 
आई , कनाडा मे पशु जैव प्रौद्योगिकी (कोशिकानुनवशिक0।) मे व्यापक प्रशिक्षण के 
लिए भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद द्वारा प्रतिनियुक्त किया गया था। प्रशिक्षण का 
सचालन कोशिकानुषवशिकत। के अधिकारी विद्वान डॉ पी के बसरुर की देखरेख 
मे और कनाडियन एक्जीक्यूटिव सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशन के सयोजन में हुआ था। 
प्रशिक्षण सवर्धित गाय-बैल की कोशिका रेखा के साथ विट्रो ('॥0) मे गलित शुक्राणु 
के गुणसूत्रीय आलेखन पर था। इसमे (अ) एक ही परत के सवर्द्धनो का प्रारम्भ, 
(ब) स्विम अप (5५७४४ ए) प्रविधि द्वारा जीने योग्य शुक्राणु का सग्रह, (स) वीर्य 
की विभिन्‍न एकाग्रता के साथ ही परत के सवर्धन का टीकाकरण, (द) स्लाइडो का 
छटाव और वस्तु का प्रकाश छायाचित्राकन सम्मिलित था। 

उपर्युक्त प्रयोग पर एक शोध पत्र नूक्लियस, इन्टरनेशनल जर्नल ऑफ 

साइटोलोजी एण्ड एलाइड टोपिक्स मे प्रकाशनार्थ भेजा गया। 

प्रशिक्षण पर प्रतिवेदन भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद और कनाडियन 

एक्जीक्यूटिव सर्विस ऑर्गेनाइजेशन, नई दिल्ली को प्रस्तुत किया गया। 

नार्म (१९७.५॥२७४) हैदराबाद मे कृषि अनुसन्धान प्रयोजना प्रबन्धन पर 


प्रशिक्षण ( 4 दिसम्बर, 987 ई से 28 अप्रैल, 988 ई ), भारत--5 माह का 
उपर्युक्त प्रशिक्षण तीन चरणो मे विभकत था। प्रथम चरण 6 सप्ताह का नार्म मे 8 


]66 भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक 


सप्ताह का द्वितीय चरण राष्ट्रीय विकास अनुसन्धान सस्थान, करनाल मे और 6 सप्ताह 
का तीसरा चरण नार्म मे था। 

(अ) प्रथम चरण मे स्वाग खेलो, चपल चार्ट निर्माण, प्रायोजना प्रबन्धन हरित 
क्रान्ति के खेल, भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद और उसका अन्य राष्ट्रीय और 
अन्तर्राष्ट्रीय अनुसन्धान सगठनों के साथ तालमेल ग्रामीण विकास दर्शन, श्रव्य-दृश्य 
साधनों का प्रयोग रेडियो वाता और दलीय सेमीनार सहित कक्षा-कक्षीय प्रशिक्षण 
सम्मिलित था। 


(ब) द्विनीय चरण मे राष्ट्रीय विकास अनुसन्धान सस्थान, करनाल मे क्षेत्र 
अनुभव प्रशिक्षण कायक्रम सम्मिलित था। उन्होने 25 गोद लिए गॉवों से ओर 25 
गोद न लिए गाँवों से कुल 50 कृषको से साक्षात्कार किया। सूचना को एक निधारित 
प्रपत्र मे भरा गया और बाद मे किसानो के सामाजिक-आर्थिक स्तर पर विश्लेषण 
किया गया। प्रौद्योगिकी विकास प्रयासो के मूल्याकन के लिए राष्ट्रीय विकास अनुसन्धान 
के दस वैज्ञानिको का साक्षात्कार भी लिया गया। 

(स) तृतीय चरण मे कम्प्यूटर कक्षाये एफई टी रिपोर्ट प्रस्तुतीकरण, पोस्टर 
प्रस्तुतीकरण, परस्पर वैयक्तिक सम्बन्ध, उत्प्रेरेण और व्यवहार सम्मिलित थे। प्रशिक्षण 
के क्षेत्र मे लिखित परीक्षा ली गई जिसमे उन्होंने 80ब अक प्राप्त करते हुए 'ए!' 
ग्रेड पाया। 


“गोद लिए गए-गोद न लिए गए गॉवो का सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण और 
राष्ट्रीय विकास अनुसन्धान सस्थान के प्रोद्येगिकी विकास प्रभाव” शीर्षकान्तर्गत एक 
विस्तृत प्रतिवेदन (50 प्रष्ठ) राष्ट्रीय कृषि अनुसन्धान एवं प्रबन्धन अकादमी (नार्म), 
हैदराबाद को प्रस्तुत किया गया। इसकी अत्यधिक प्रशसा की गई। 


अभिरुचियों एव पाठ्यक्रम सहगामी प्रवृत्तियॉ--डॉ शर्मा की अभिरुचियों 
चित्राकन (पेटिग) और नाट्यकला है। उन्हे राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कई 
पुरस्कार मिलं। वह हिन्दी नाटको के लिए दिल्ली दूरदर्शन के मान्य कलाकार थे 
और १98-982 ई मे टीवी धारावाहिको मे काम किया था। 4979- 
984 ई की अवधि मे अन्त विश्वविद्यालय ओर विश्वविद्यालय स्तर पर वह सवश्रेष्ठ 
मूक अभिनता/अभिनेता रहे | कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र मे वह स्थान चित्राकन 
(500 90778) मे सर्वश्रेष्ठ कलाकार रहे। शकर की अन्तर्राष्ट्रीय चित्राकन 
प्रतियोगिता मे वह सर्वश्रेष्ठ चित्रकार (9भा)८७) थे। उन्होंने एन बी ए जी आर / 
एन आई ए जी के वार्षिक प्रतिवेदन, करनाल छात्र सघ पत्रिका/स्मारिकाओ, 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय स्मारिका के आवरण पृष्ठ को चित्रित किभा। भारतीय ण्शु 


भारत के चिकित्सा वेज्ञानिक 867 


५, 


कल्याण मण्डल, मद्रास द्वारा 987 इ में अखिल भारतीय छाया चित्रकारी 
प्रतियोगिता मे उन्हे योग्यता प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया था। पशु कृषि कम 
आयुक्त, भारत सरकार डॉ ए क॑ चटर्जी इस मण्डल के अध्यक्ष थ। डॉ शर्मा 
ने जेव चिकित्सा विज्ञान विभाग, ओन्‍्टेरिया पशु चिकित्सा महाविद्यालय गुएल्फ 
विश्वविद्यालय, कनाडा के लिए अधिकार चिह्न प्रारूपित किया था। 

(] 


कृष्ण मुरारी लाल श्रीवास्तव 


जन्मतिथि 7 सितम्बर 93॥ 
शिक्षा एमए (इतिहास) राजस्थान ठिश्वविद्यालण 
एमए (शिक्षा) अलागढ मुस्लिम विश्वविद्यालय 
वा एड साहित्यरत्न 

अल्पायु म हां पिता श्री पन्‍नालाल का स्वगवास 
हा जान स बाल्यकाल ननिहाल म व्यतीत हुआ। नाना- 
नानी की आथिक स्थिति विशष अच्छा न होन क कारण 
इन्ह आर इनका माता श्रीमती रामकटोरी दवा को परिवार 
क भरण-पाषण क लिए कठार संघर्ष करना पडा। 
अध्यापन अध्यापन क प्रति प्रारम्भ सं ही लगाव होन 
क कारण 4957 ई मे राजस्थान तहसीलदार सेवा म चयन 
होन क बावजूद राजस्व विभाग म नहां गए। लेखन क 
प्रति 4948 ई स ही प्रवत्त रहे। लगभग 39 वर्ष तक 
अध्यापन काय स॑ सम्बद्ध रहे ।30 सितम्बर 989 ई को 
58 वर्ष की आयु म॑ उपप्रधानाचाय क पद से राजकीय 
सवा से निवृत्ति के उपरान्त बाल मन्दिर महिला शिक्षक 
प्रशिक्षण महाविद्यालय जयपुर म व्याख्याता बाल मन्दिर 
महिला शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय जयपुर म प्रधानाचार्य 
तथा श्री भवानी शकर शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय 
नारायणपुर ( अलवर) मे प्रधानाचाय पद पर कायरत रहे । 
वतमान मे लेखन कार्य मे प्रवत्त हे । 
प्रकाशित पुस्तके शिक्षा प्रशासन राष्ट्रीय पर्व एव 
त्याहार भारतीय वैज्ञानिक । 
सम्पर्क शेल सदन ]/276 अग्रवाल फार्म 
मानसरोवर जयपुर-302 020 (गजस्थान) |